कच्छ के नमक मजदूर
कच्छ के रण में बनने वाला नमक देश की करीब 75 फ़ीसदी नमक की जरुरत को पूरा करता है लेकिन बहुत कम लोगों को इस कारोबार में लगे अगरिया समुदाय के नमक मजदूरो की त्रासदी का भान है।ये मजदूर जिंदगी भर नमक बनाते है और अंत में मौत के बाद इन्हे नमक में ही दफ़न कर दिया जाता है।नमक मजदूरों के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि नमक में लगातार काम करने के कारण इनकी टांगे असामान्य रूप से पतली हो जाती है और इस कदर सख्त हो जाती हैं की मौत के बाद की चिता की आग भी उन्हें जला नहीं पाती।
नमक के खेतो में काम करने वाले मजदूर बताते है कि इसलिए चिता की आग बुझने के बाद इनके परिजन इनकी टांगो को इकट्ठा करते है और अलग से नमक की बनाई गई कब्र में दफ़न करते है,ताकि वे अपनेआप गल जाए।
अहमदाबाद से 235 किलोमीटर और कच्छ जिला मुख्यालय से 150 किलोमीटर दूर स्थित सूरजबारी अरब सागर से मात्र 10 किलोमीटर की दुरी पर है।गुजरात के पर्यटक अधिकारी मोहम्मद फारुक पठान ने बताया,"समुदाय के लोग यहाँ सदियों से रह रहे है और जीविका के रूप में उन्हें केवल येही काम आता है। यहाँ का भूजल समुद्री जल के मुकाबले दस गुना अधिक नमकीन है।इस भूजल को नलकूपों से निकाला जाता है और उसके बाद उस पानी को 25 गुना 25 मीटर के छोटे-छोटे खेतो में भर दिया जाता है।पठान ने बताया कि "जब सूरज की किरणे इस पानी पर पड़ती है,तो यह धीरे-धीरे सफ़ेद नमक में बदल जाती है।अगरिया मजदूर हर 15वे दिन इन खेतो से 10 से 15 टन नमक बनाते है।इसके बाद इस नमक को ट्रकों और ट्रेनों में भर कर देश भर की नमक कंपनियों और रसायन फैक्ट्रियो को भेजा जाता है।।।।।।
29 जनवरी 2013
राष्ट्रीय सहारा