सोमवार, 30 दिसंबर 2024

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज 
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यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त होकर भारत आए और फोर्ट विलियम कालेज (1800-1854) में हिन्दुस्तानी विभाग के विभागाध्यक्ष बन बैठे। जब बी.गिलक्राइस्ट भारत आए उस समय कम्पनी का राजकाज फ़ारसी भाषा में होता था। उन्होने भारत में आते ही महसूस किया कि जनता के भीतर से फ़ारसी भाषा का प्रभाव क्षीण और हिन्दुस्तानी भाषा का प्रभाव बढ़ रहा है। इसलिए कम्पनी शासन के हित में कर्मचारियों को हिन्दुस्तानी भाषा का ज्ञान होना अत्यंत जरूरी है। इस विचार से प्रेरित होकर उन्होंने शीध्र ही हिन्दुस्तानी भाषा का अध्ययन शुरु किया। गिलक्राइस्ट ने पश्चिमोत्तर प्रांत को भाषा सम्बन्धी अध्ययन का क्षेत्र बनाया। उन्होंने तीन साल के अध्यन में ‘इँगलिश-हिन्दुसतानी डिक्शनरी’ की रचना की। भाषा का अध्ययन करते समय उन्हें अनेक कठिनाइयों से जूझना पड़ा। इस बात का जिक्र उन्होंने 4 जून 1787 कलकत्ता गर्वनर-जनरल लार्ड कार्नवालिस को लिखे एक पत्र में किया। इस पत्र में उन्होंने लिखा था :

‘‘इन पिछले तीन-वर्षो से मैं जिस ग्रन्थ(‘इँगलिश-हिन्दुसतानी डिक्शनरी’) की रचना करने में लगा हुआ था उसके प्रथम भाग की पांडुलिपि समाप्त हो गई है। आप की आज्ञा से अब मैं दूसरे और तीसरे भाग की रचना करना चाहता हूँ । जहाँ तक हो सकेगा मैं यह कार्य शीघ्र ही करुँगा क्योंकि जैसा इस विषय पर लिखे गए कैप्टन कर्कपैट्रिक के पत्र से मुझे ज्ञात हुआ है, उन्होंने जिस कार्य को समाप्त करने का भार अपने ऊपर लिया था उसे अब वे सरकारी काम के कारण पूरा करने में असमर्थ है; अब उसमें वे अपना अधिक समय नहीं दे सकते’’ इसी पत्र में गिलक्राइस्ट ने आगे लिखा-‘‘अपने अध्ययन की सुविधा और कार्य में सहायता मिलने की दृष्टि से मैं श्रीमान से बनारस की जमींदारी में, और अवश्यकता हुई तो सूबा अवध में, जाने की आज्ञा चाहता हूँ। मुझे आशा है कि सरकार की जैसी कृपा दृष्टि अब तक मुझ पर बनी रही है वैसे ही इस कार्य तक समाप्त होने तक बनी रहेगी। इससे न केवल मुझे वरन् साधारण रुप से सबको लाभ पहुँचेगा।’’ इस पत्र में गिलक्राइस्ट ने गवर्नर से निवेदन किया कि उन्हें अफीम की खेती करने की इज़ाजत दी जाय, जिससे वह अपना खर्च स्वयं उठा सकें। तत्कालीन गवर्नर ने उनका सुझाव स्वीकार कर लिया और उन्हें बनारस प्रांत में नील की खेती करने की इजाज़त प्रदान कर दी। यह बात सोचने लायक है कि फिरंगी अपनी सत्ता का विस्तार करने के लिए देश के संसाधनों का समुचित प्रयोग कैसे कर रहे थे, जबकि यहां का कुलीन वर्ग खेती करना अपनी शान के विपरीत समझता था। सन् 1790 में ‘इँगलिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी’ के दोनों भाग प्रकाशित हो गए थे। जॉन बी. गिलक्राइस्ट ने 20 दिसंबर 1790 को इसकी प्रतियां बोर्ड को भेज दी। वे खुद बंगाल सरकार की आज्ञा के अनुसार सन् 1794 में कलकत्ता वापिस आ गए। गिलक्राइसट कलकत्ता में रहते हुए भाषा का अध्यन करते रहें, जिसके फलस्वरुप कलकत्ते में उन्होंने ‘दि हिन्दी ग्रामर’ और ’दि आरिएंटल लिग्विस्ट’ सन् 1796 और 1798 में प्रकाशित किए। इन दोनों ग्रंथों का प्रचार कम्पनी के कर्मचारियों के बीच व्यापक स्तर पर किया गया। इतना ही नहीं बंगाल सरकार ने इन ग्रन्थों के प्रकाशन के लिए गिलक्राइस्ट की आर्थिक मदद भी की। सन् 1798 में वेलेजली भी कलकत्ता आ गए। गौरतलब है कि वेलेजली ने कम्पनी की सत्ता को जितना मजबूत किया शायद उतना किसी ने नहीं किया होगा। वलेजली ने गिलक्राइस्ट के अध्ययन और परिश्रम की खूब सराहना की और उनके अध्ययन का लाभ कम्पनी के कर्मचारियों को प्रदान करने का निश्चय किया। वेलेजली का यह प्रस्ताव बी. गिलक्राइस्ट को अच्छा लगा। जान बी. गिलक्राइस्ट कम्पनी के कर्मचारियों को फ़ारसी और हिन्दुस्तानी भाषा की शिक्षा देने का काम करने लगे। इसके बाद आरिएंटल सेमिनारी की स्थापना हुई और गिलक्राइस्ट को राइटर्स बिलडिग्स का कमरा न. 11 दे दिया गया। 3 जुलाई 1799 को बंगाल के सरकारी मंत्री एच.वी डारेल के नाम एक पत्र लिखकर उन्होंने कमरा न. एक मांग लिया। वेतन तै होने के समय तक उन्हें बारह हजार रुपया पेशगी दिया गया।

 एम. वेलेजली को यह अहसास हो चुका था कि कम्पनी के राजनीतिक उद्देश्य को साधने के लिए एक शैक्षिक संस्था की बड़ी आवश्यकता है। भारत में कम्पनी की सत्ता को कायम रखने के लिए वेलेजली ने 24 अक्टूबर 1799 को राइट आनरेबुल हेनरी डुंडाज के नाम लिखे पत्र में शैक्षिक संस्था खोलने का इरादा जाहिर किया। इस पत्र में वेलेजली ने राइट आनरेबुल हेनरी डूंडाज को संकेत किया कि वह कम्पनी के हितों के लिए भारतमें एक कॉलेज की स्थापना कलकत्ता में करना चाहते है। पत्र इस़ प्रकार है :

 ‘ मेरा, कोर्ट की प्रतिज्ञा किए बिना ही, कलकत्ते में एक ऐसी संस्था खोलने का इरादा है, इसके लिए मैंने कुछ किया भी है, और मुझे आशा है कि यदि व्यय की आवश्यकता हुई भी तो कंपनी का और अधिक धन खर्च किए बिना ही मैं अपनी आयोजना को सफल बना सकूंगा। जिस विषय में मुझे सबसे अधिक दिलचस्पी है उसमें आपकी सक्रिय और हार्दिक सहायता का मुझे पूरा भरोसा है ।’

   औपनिवेशिक भारत में शिक्षण संस्थाओं के स्थापित होने के निजि स्वार्थों और उद्देश्य को पकड़ा जा सकता है। भारतीय विद्वान फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना के जो भी उद्देश्य बताते हो लेकिन भारतीय जनता को शिक्षित करने का एजेण्डा कतई नहीं था। वेलेजली के प्रयास से सन् 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित हो गया। हिन्दुस्तानी विभाग का विभागाध्यक्ष बी. गिलक्राइस्ट को नियुक्त किया गया। कालेज का पाठ्यक्रम शुरुआत में हस्तलिखित देशी भाषा की पोथी पर आधारित था। इन हस्तलिखित पोथियों को बनाते समय कई प्रकार की अशुद्धियां और दोष रह जाते थे। जिसके चलते विद्यार्थियों को अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ता था। दूसरी समस्या यह थी कि इन पुस्तकों की नकल करने में काफी समय लगता था। इस समस्या के समाधान के लिए कालेज कौंसिल ने सन् 1801 में नियम बनाया कि प्रधानाध्यापक पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण विद्यार्थियों के लाभार्थ छपवाएं। इस नियम के तहत गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी भाषा के विभिन्न संग्रह तैयार करवाएं । सन् 1802 में गिलक्राइस्ट ने कालेज कौंसिल को पत्र लिख कर हिन्दुस्तानी भाषा में संग्रह प्रकाशित करने का निवेदन किया। इस पत्र के साथ गिलक्राइस्ट ने जिन पुस्तकों की सूची भेजी उनके नाम इस प्रकार हैं :

 मिसकीनकृतमर्सिया (नागरी), बत्तीसी सिंहासन(नागरी),शंकुतला नाटक(नागरी),अख्लाक-इ-हिन्दी(नागरी),माधवानल (नागरी), बैताल पचीसी(नागरी), चार दरवेश(फारसी),मीर हसन(फारसी), गुलिस्ता(फारसी), तोता कहानी(फारसी), गुलशन(फारसी), हिन्दुस्तानी प्रिसीपल ने इन पुस्तकों के छपने की सूची कौंसिल के पास भेज दी।

सन् 1801 में जॉन बी. गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी विभाग में मुंशियों की नियुक्ति के लिए कौंसिल को पत्र लिखा। उनके प्रस्ताव को कौंसिल ने स्वीकार कर लिया गया। कौंसिल की ओर से 19 फरवरी 1802 में मुंशियों की नियुक्ति की स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस के तहत ‘भाखा मुंशी’ के पद पर श्री लल्लूलाल को नियुक्त किया गया। फोर्ट विलियम कॉलेज में सन् 1802 से 1823 तक लल्लूलाल ‘भाखा मुंशी’ के पद पर कार्यरत रहे। जॉन बी.गिलक्राइस्ट हिन्दुस्तानी विभाग को असीम ऊँचाई तक ले जाना चाहते थे। इस कार्य योजना के लिए उनके पास मुकम्मल विजन भी था। इनकी इच्छा थी कि अधिक से अधिक पुस्तकों का निर्माण कराया जाए और लेखकों को प्रोत्साहन के लिए पुरस्कार भी दिए जाए। गिलक्राइस्ट का 19 अगस्त, 1803 को एक दूसरा पत्र कौंसिल की बैठक में पेश हुआ जिसमें उन्होंने देशी विद्वानों के परिश्रम के लिए कौंसिल से उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए उनके वास्ते पुरस्कार मांगे। रचनाओं की सूची और ग्रन्थकर्ताओं के संबन्ध में अपनी सिफारिशे उन्होंने पत्र के साथ भेज दी। जॉन गिलक्राइस्ट ने कौंसिल को पहले से ही चेता दिया था कि यह रकम देखने में तो बड़ी है किन्तु ध्येय की महानता और ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के हित और उसकी स्थिरता की दृष्टि से भविष्य में उसके परिणाम पर विचार करने से यह रकम छोटी लगेगी। श्रीमान गवर्नर-जनरल से उन्होंने हिन्दुस्तानी विभाग के प्रति पूर्ण सहानुभूति प्रकट करने की आशा की। गिलक्राइस्ट के प्रति कॉलेज कौंसिल का रवैया उदारपूर्ण नहीं था जिससे वे काफी व्यथित भी रहते थे। सन् 1804 में गिलक्राइस्ट अपने स्वास्थ खराब होने का हवाला देते हुए हिन्दुस्तानी विभाग से त्यागपत्र देकर अपने देश वापिस चले गए।

  फोर्ट विलियम कालेज के इतिहास में हिन्दुस्तानी भाषा में तमाम ग्रन्थों का निर्माण हुआ लेकिन गिलक्राइस्ट के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई आगे चलकर वैसी प्रगति किसी और के कार्यकाल में दर्ज नहीं की गई। गिलक्राइस्ट के जाते ही लल्लूलाल को कालेज से अलग कर दिया गया लेकिन कुछ दिन के बाद उनको पुनः कालेज में बुला लिया गया। लल्लूलाल ने फोर्ट विलियम कॉलेज में रहते हुए, उन्होने अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया। लल्लूलाल ने जिन ग्रन्थों का निर्माण किया उनमें ‘प्रेमसागर’(1803-1810),राजनीति(1810),लतायफ़-इ-हिन्दी(1810),ब्रजभाषा व्याकरण(1811),सभा विलास(1815) सामिल हैं। फोर्टविलियम कॉलेज की स्थापना वेलेजली की महात्वाकांक्षी परियोजना थी जिसका उद्देश्य भारत में कम्पनी शासन कायम करना था न कि हिन्दी गद्य का विकास करना। अपने तमाम उत्थान-पतन से गुजरते हुए सन् 1854 में बंगाल गवर्नर ने फोर्टविलियम कॉलेज को तोड़ने का आदेश जारी कर 

(संदर्भ : फोर्ट विलियम कॉलेज लेखक डॉक्टर लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय)

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