मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

Democritus और plato

ये जो हँसोड़ तस्वीर दिख रही है यह किसी मशखरे की नही, एक दार्शनिक Democritus की है जिसने आज से कोई 2400 साल पहले एटॉमिक थ्योरी दिया था।

Democritus ग्रीस का एक नगर अब्देरा का रहवासी था और अपनी बात मजाकिया अन्दाज में कहने का हामी था। अपनी गंभीर से गंभीर बात भी यह मजाकिया अंदाज में कह दिया करता था। दरअसल ग्रीस का अब्देरा नगर इसी तरह के लोगो का शहर माना जाता रहा। 
प्राचीन दुनिया और यूनान में यह माना जाता था कि दुनिया चार तत्वों से मिलकर बना है और यह चार तत्व हैं-- आग,पानी, हवा और मिट्टी । 

लेकिन इस हँसोड़ दार्शनिक ने यह मानने से इनकार कर दिया और एक अपनी नई थ्योरी दी।  
उसने बताया कि यदि सेब या किसी अन्य वस्तु को  बेहद छोटे टुकड़े में भी कर दिया जाय तबभी उसका मूल गुण जस का तस रहेगा। यानी कि किसी भी वस्तु या तत्व को बेहद छोटे सूक्ष्म टुकड़े में तोड़ा जा सकता है और यह अंतिम टुकड़ा भी अपने मूल तत्व से अलग नही होगा। उसमे वे सभी गुण होंगे।   उसने इस बेहद सूक्ष्म टुकड़े को a-tomos( अ-टिमोस) कहा। A मतलब "नही" और Tomos का मतलब "जिसे तोड़ा नही जा सकता।"

लेकिन तत्कालीन दार्शनिक प्लेटो ने इसका जबरदस्त विरोध किया और ग्रीस के बौद्धिक समाज मे Democritus को गलत साबित करने पर मजबूर कर दिया। प्लेटो और उसके पहले से प्रचलित सिद्धांत यानी यह "दुनिया मूलतः चार तत्व से बनी है" को ही मान्य सिद्धान्त माना जाता रहा।  आने वाले 2200 सालो तक democritus को किसी ने याद तक नही किया।
लेकिन 1808 में अचानक democritus का सिद्धांत वैज्ञानिक दुनिया मे चर्चा का विषय बन गया। 1766 में एक पशुपालक के घर एक बालक पैदा हुआ जिसका नाम था- John Dalton, 
1808 में जॉन ने पाया कि all matter is made of ATOM और यह एटम अविभाज्य और अविनासी है और दिए गए तत्व के सभी परमाणु द्रव्यमान और गुणों में समान होते हैं।

 प्लेटो ने अपने समकालीन विद्वान दार्शनिक मित्र Democritus को  कभी गंभीरता से नही लिया और उसको गलत साबित करने के लिए जनमानस-धर्म और सत्ता का भरपूर प्रयोग करके उसे गलत साबित तो कर दिया लेकिन 2200 साल प्लेटो अंततः गलत साबित हुए।

एक शे'र याद आ रहा है--

समझे थे हम जो दोस्त तुझे ऐ मियां ग़लत
तेरा नही है जुर्म हमारा गुमाँ ग़लत।

सोवियत में बुद्ध

प्रसिद्ध सोवियत लेखक G.Bongard और A. Vigasin ने अपनी क़िताब The image of india, A study of Ancient Civilizations in the USSR में लिखते हैं--१२ वीं सदी में रूस में  'बर्लाम और जोआसफ़ की कथा'  बहुत लोकप्रिय थी। सुविदित है कि यह कहानी बुद्ध की जीवनी का रूपांतरण है और जोआसफ़ नाम भारतीय शब्द बोधिसत्व से (बुदास्फ रूप के माध्यम से) बना है। ईसवी संवत के आरम्भ में बोधिसत्व की कथा मध्य एशिया में काफी लोकप्रिय थी।

वे आगे लिखते हैं, "  ससानिद वंश के विख्यात राजा नौशेरवां ने बोधिसत्व की कथा को पहलवी भाषा मे अनुवाद कराया था।

कालांतर में पहलवी भाषा मे लिखा गया बर्लाम और जोआसफ़ कि कथा का रूपांतरण कहीं खो गया परंतु इसका अरबी रूपांतरण उपलब्ध है, जो 8 वीं सदी में हुआ था। कालांतर में रूस में जोआसफ़ के बारे में एक सर्वाधिक लोकप्रिय भजन रचा गया। जिसमें बताया गया कि कैसे भारतीय राजा "अवेनीर" के पुत्र ने अंधा, कोढ़ी दंतहीन बूढ़ा देखा और लोगो का दुःख देखकर रोने लगा और स्वयं भिक्षुक बन गया।

1681 में छपे इस कथा के संस्करण के लिए 17वीं सदी के विलक्षण रूसी चित्रकार सिमोन उशाकोव ने उत्कीर्णन चित्र बनाए थे। रूस के शाही थिएटर में सबसे पहले जो कथा मंचित की गई वह जोआसफ़ यानी बोधिसत्व की कथा ही थी।

फोर्ट विलियम कॉलेज

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