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क्या भक्ति आन्दोलन विफल हुआ?
(कँवल भारती)
हिंदी आलोचना में “भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य” मैनेजर पाण्डेय की एक चर्चित किताब मानी जाती है, जो उनके अनुसार उनके पीएचडी थीसिस का संक्षिप्त और संशोधित रूप है। इस पुस्तक के केन्द्र में, यद्यपि, सूरदास का काव्य है, पर भक्ति पर चर्चा के दौरान उसमें जायसी, कबीर, मीरा और तुलसी आदि कवि भी आ गए हैं, और कुछ अन्य विषयों का भी, जो उससे सम्बन्धित हैं, निरूपण हो गया है। इस पुस्तक का पहला अध्याय “भक्ति काव्य और हिंदी आलोचना” है, जो महत्वपूर्ण और विचारणीय है। इस अध्याय में पाण्डेय जी ने पंडित रामचंद्र शुक्ल की कुछ स्थापनाओं से असहमति व्यक्त की है, हालाँकि खंडन नहीं किया है, पर अधिकांश से उनकी सहमति है। इस अध्याय को पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पंडित मैनेजर पाण्डेय पर पंडित रामविलास शर्मा का प्रभाव ज्यादा है। जैसे ‘परम्परा का मूल्यांकन’ में पंडित रामविलास शर्मा ने सब धान सत्ताईस सेर तौल दिए हैं, वैसे ही मैनेजर पाण्डेय ने निर्गुण, सगुण, कबीर, मीरा, तुलसी सबको गडमड करके भक्त की श्रेणी में डाल दिया है। इस अध्याय में कबीर और निर्गुण आदि के संबंध में कुछ बातों से घोर आपत्ति है, जिनकी आलोचना जरूरी है.
कुछ तथ्य आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं :
1. पाण्डेय जी लिखते हैं : ‘यह कौन नहीं जानता कि कबीर, रैदास, सेन, घना आदि निर्गुण संतों के गुरु रामानंद सगुण भक्त थे।’ (पृष्ठ 46) सवाल है कि अगर गुरु सगुण है, तो उसके ये चेले निर्गुण क्यों हो गए? चेलों को भी सगुण होना चाहिए था। रामानंद का चेला बनने के बाद उनके नाम कबीरानन्द, रैदासानंद, सेनानन्द और घनानन्द क्यों नहीं हुए, जैसी कि ब्राह्मणों में गुरु-शिष्य परम्परा है, और रामानंद के अन्य ब्राह्मण शिष्यों के ऐसे नाम मिलते भी हैं, जैसे, आत्मानन्द, सुखानन्द, भावानन्द, सुरसुरानन्द, अनभानन्द, नित्यानंद, योगानंद; और ये सभी संत सगुण भी हैं। अगर कबीर के गुरु रामानंद होते, तो कबीर का नाम भी कबीरानंद रखा गया होता, और दोनों के विचार भी समान होते। लेकिन यहाँ तो उल्टा है। गुरु मूर्ति-पूजक है, पर शिष्य मूर्ति-भंजक है; गुरु वेद-शास्त्र का मंडन करता है, पर शिष्य खंडन करता है; गुरु दक्षिण चलता है, पर शिष्य बाएं चलता है। पाण्डेयजी किस आधार पर कबीर को रामानंद का शिष्य कहते हैं? जवाब है, उसी आधार पर, जिस आधार पर सारे ब्राह्मण कहते हैं। लगता है, पांडेयजी ने इतिहास की कसौटी पर भी इसे परखने की कोशिश नहीं की, वरना जान लेते कि रामानंद की मृत्यु के समय कबीर की क्या अवस्था रही होगी?
2. पाण्डेयजी लिखते हैं : ‘सूर के काव्य में प्रेम कबीर से अधिक स्वाभाविक और जायसी से अधिक लौकिक है। सूर को कबीर की तरह वात्सल्य और माधुर्य की अभिव्यक्ति के लिए बालक तथा बहुरिया बनने की आवश्यकता नहीं है।’ (39) बात सही है, पर पांडेयजी ने इसकी व्याख्या नहीं की। जायसी और सूर दोनों ने किस्से-कहानियों का काव्य लिखा है। जायसी के काव्य का आधार एक लोककथा है, तो सूर ने कृष्ण चरित्र और उनकी रासलीला को अपने काव्य का आधार बनाया है। यह वह प्रेम नहीं है, जिसे कबीर स्थापित करते हैं। कबीर का प्रेम मनुष्य से मनुष्य का प्रेम है, वह मानवीय है। दूसरी बात यह कि कबीर कहाँ बहुरिया बनेंगे और क्यों बनेंगे? यह कबीर के उस पद का गलत पाठ है, जिसमें ‘बहुरिया’ शब्द आया है. उसे ठीक से ब्राह्मण आलोचकों ने समझा ही नहीं कि किसका मंगलचार है, और कौन बहुरिया है? और कौन ब्याह चले हैं? कबीर का वह पद उस स्थिति का चित्रं करता है, जब एक विधवा स्त्री को सती करने के लिए ले जाया जा रहा है। (देखिए, मेरी किताब ‘कबीर का ज्ञानोदय)
3. पांडेयजी का मत है : ‘स्वच्छंद प्रेम के उन्मुक्त गायक सूर के काव्य में कहीं भी जाति और वंश के प्रभुत्व का समर्थन तो क्या, स्वीकार भी नहीं है। सूर का काव्य समाज और शास्त्र की सभी रूढ़ियों से स्वतंत्र है।’ (पृष्ठ 46) यह मैनेजर पाण्डेय का मिथ्या ज्ञान है। सूर के काव्य में जाति और वंश के क्या, गोत्र और वर्ण तक का ज़िक्र है। यथा : ‘पूरन ब्रह्म सकल अबिनासी ताके तुम हौ ज्ञाता, रेख, न रूप, जाति, कुल, नाहीं जाके नहिं पितु माता।’ निर्गुण के विरुद्ध सगुण की स्थापना में सूर तुलसी से भी आगे हैं। सूर ने कृष्ण की लीलाओं, नाम-महात्म्य, राधा-कृष्ण और गोपियों के प्रणय प्रसंगों का वर्णन करके निर्गुण की अवधारणा पर ही प्रहार किया है। सम्पूर्ण भ्रमर-गीत निर्गुण और सगुण का संवाद ही है, जो उद्धव के द्वारा गोपियों और कृष्ण के बीच चलता है। इस पद में कृष्ण उद्धव से कहते हैं—तुम तो उस ब्रह्म के ज्ञाता हो, जिसके न माता है, न पिता है, न रूप है, न रंग है, न जाति है और न कुल है। मतलब साफ़ है, वह ब्रह्म या ईश्वर ही क्या, जिसका कोई वर्ण, कुल और जाति न हो? और यह कुल, वर्ण और जाति भी उच्च होनी चाहिए। गोपियाँ जवाब देती हैं : ‘जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै, दाख छांड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहें? सूरदास प्रभु गुनहि छांड़ि कै को निर्गुन निर बैहै?’ यहाँ सूरदास ने निर्गुण को ठगने का सौदा कहा है और उसे नीम का कड़वा फल बताया है। दरअसल उद्धव कृष्ण और गोपियों की यह पूरी कथा काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल निर्गुण आन्दोलन को विफल करना था। ध्यान रहे कि उद्धव गोपियों को कथा सुनाते हैं, जो निम्न जातियों की हैं। और निम्न जातियों में ही कबीर की निर्गुण क्रांति का प्रभाव था। सूर का यह पद देखिए, जिसमें गोपियाँ अपने को वर्णहीन लघु जाति का बताती हैं—
हम तो दुहूं भाँति फल पायो
जो ब्रजनाथ मिले तो नीको, नातरू जग जस गायो
कहं वै गोकुल की गोपी, सब बरनहीन लघु जाती
कहं वै कमला के स्वामी संग मिल बैठी इक पांति
निगम ध्यान मुनिजन अगोचर ते भए घोष निवासी
ता ऊपर अब सांच कहो थौं मुक्ति कौन की दासी
जोक कथा पा लागों ऊधो, ना कहु बारम्बार
सूर स्याम तजि और भजे जो ताकी जननी छार
इस पद में कहा गया है कि जो कृष्ण को छोड़कर अन्य का भजन करता है, उसकी माता को धिक्कार है। इसमें निर्गुण दर्शन के शब्द ‘मुक्ति’ का भी यह कहकर उपहास उड़ाया गया है कि यह किसकी दासी है? ‘दासी’ शब्द पर विचार कीजिए। यह प्रतिक्रांति का शब्द है, क्रांति का नहीं. सूरदास स्वामी और दास की ब्राह्मणवादी संस्कृति से आते थे। इसीलिए उनके काव्य में कुल, जाति और वर्ण के शब्द बार-बार आते हैं।
सूर के काव्य पर इस दृष्टि से विचार किए जाने की जरूरत है कि सूर का काव्य पूरी तरह कल्पना की उड़ान है और उसमें कुछ भी ऐतिहासिकता नहीं है। वह केवल दलित वर्गों में निर्गुण दर्शन की क्रान्ति को रोकने के मकसद से नाम, रूप, लीला, धाम की वैष्णवी भक्ति को स्थापित करने के लिये रचा गया है। एक पद में सूर गोपियों के मुख से सीधे सवाल करते हैं--
निर्गुण कौन देस को बासी?
मधुकर, हंसि समुझाय सौंह दै बूझति साँच, न हांसी।
कौ है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस कै अभिलाषी।
यह एक कवि की नहीं, बल्कि ब्राह्मण की समस्या है कि वह निर्गुण को अभारतीय मान रहा है और पूछ रहा है कि वह किस देश का वासी है? उसका सगुण ईश्वर भी वह है, जिसके माता-पिता हों, और जिसका वर्ण उच्च हो, तथा जो पत्नी और दासी रखता हो। ध्यान रहे कि भारतीय दर्शन में निर्गुण पूरी तरह दलित सन्तों की नयी खोज थी, जो ब्राह्मणों के अवतारवाद और आवागमन के मायाजाल से आम-आदमी की मुक्ति का मार्ग था।
सूर-काव्य के सम्बन्ध में इस दृष्टि से भी विचार करने की जरूरत है कि भ्रमर गीत नारी अस्मिता के साथ क्रूर खिलवाड़ करते हैं। ये नारियाँ भी निम्न जातियों की हैं, जिन्हें कृष्ण के प्रणय में पागल दिखाया गया है। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि कृष्ण के प्रेम में ब्राह्मण स्त्रियाँ पागल क्यों नहीं हुईं? ठाकुरों की स्त्रियाँ पागल क्यों नहीं हुई?
क्या यह अहीर स्त्रियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ नहीं है? एक कृष्ण का इतनी स्त्रियों के साथ रास रचाना ब्राह्मण चिन्तन के लिये भले ही ठीक हो, पर दलित चिन्तन तो इसे दलित स्त्रियों का चरित्र हनन ही कहेगा। ब्रज की सारी गोपियाँ, जो अहीर स्त्रियाँ हैं, कृष्ण के साथ रात-भर रास रचाती हैं, और एक भी द्विज स्त्री उसमें शामिल नहीं है। इसका क्या अर्थ है? कोई बंशी बजाये और उसे सुनकर सारी दलित स्त्रियाँ रास रचाने पहुँच जायें, क्या यह सम्पूर्ण दलित स्त्रियों के लिये अपमानजनक नहीं है? और, ब्राह्मण चिन्तन इस अस्मिता-हनन पर मुग्ध है, तो शर्म की बात है।
मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है : ‘‘सगुण काव्य-धारा की सीमा बताने के लिए मुक्तिबोध ने यह सवाल किया है, ‘क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि रामभक्ति शाखा के अंतर्गत एक भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया?’ यह तथ्य है.” (पृष्ठ 46-47) पांडेयजी ने इस तथ्य की पड़ताल नहीं की, बल्कि इसके खंडन में यह कहा कि इसका कारण उच्च जातीय वर्गों का वर्चस्व नहीं है। लेकिन मुख्य प्रश्न तो यह है कि रामभक्ति की धारा थी कहाँ? एकमात्र तुलसीदास ही इस धारा में दिखाई देते हैं। क्या एक कवि से कोई काव्य-धारा बनती है? हाल ही में मैं राजेन्द्र प्रसाद सिंह का लेख पढ़ रहा था कि कोई काव्य-धारा कम से कम पचास-साठ कवियों से बनती है। क्या रामभक्ति शाखा में, उच्च जातियों के ही सही, पचास-साठ कवियों के नाम मिलते हैं? राजेन्द्र प्रसाद सही कहते हैं कि रामभक्ति की काव्य-धारा जबरदस्ती की धारा है। ऐसी कोई धारा चली ही नहीं। चूँकि निम्नजातीय शूद्र वर्गों में निर्गुणवाद का प्रभाव था, इसलिए कृष्णभक्ति की शाखा में भी निम्नजातीय शूद्र वर्गों के कवियों की संख्या नगण्य है। यह निर्गुणवाद की बहुत बड़ी क्रांति थी, जो कबीर के बाद की सदियों में भी ब्राह्मणों की चिंता बनी हुई थी। इसके विरुद्ध प्रतिक्रांति में पहले तो ब्राह्मणों द्वारा निर्गुण और सगुण की एकता के प्रयास किए गए। ऐसे प्रयास कबीर के समय में ही शुरू हो गए थे और कबीर को कहना पड़ा था—‘गुन में निर्गुन निर्गुन में गुन, सुन सुन आवे हांसी’; और उसके बाद पूरी योजना के साथ सगुण राम और कृष्ण को स्थापित किया गया। सवाल राम और कृष्ण का नहीं था, बल्कि उनके बहाने सगुणवाद को कायम करना था, जिसके साथ वर्णव्यवस्था और परलोक का सिद्धांत जुड़ा हुआ था। इसलिए सगुणवाद के द्वारा ब्राह्मणवाद के पुनरुद्धार का काम किया गया था।
इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध ने शूद्र-चेतना का प्रश्न उठाया था। पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध के इस प्रश्न को हवा में उड़ा दिया। उन्होंने प्रतिप्रश्न किया : “आधुनिक प्रगतिशील आन्दोलन के अंतर्गत भी कोई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया।”
दोनों प्रश्न अलग-अलग हैं. मुक्तिबोध का प्रश्न ‘शूद्र-चेतना’ का प्रश्न है, जबकि पांडेयजी का प्रश्न ‘शूद्र-उपेक्षा’ का प्रश्न है। आधुनिक प्रगतिशील आन्दोलन के अंतर्गत कोई महत्वपूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया, यह इतिहास लिखने वालों की सोच को दर्शाता है। इस सोच में प्रगतिशील आन्दोलन के निम्नजातीय शूद्र कवियों की उपेक्षा की गई, जबकि पचासियों शूद्र कवियों की कविताएँ चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने ही अपने प्रकाशन से छापीं थीं। किन्तु रामभक्ति शाखा के अंतर्गत निम्नजातीय शूद्र वर्ग का एक भी कवि इसलिए नहीं है, क्योंकि उनकी चेतना निर्गुण के साथ जुडी थी, दशरथ-नन्दन सगुण राम के साथ नहीं।
पांडेयजी लिखते हैं : “भक्ति आन्दोलन की दोनों धाराओं के बीच एकता की पहिचान का पहला व्यवस्थित प्रयास नाभादास के ‘भक्तमाल’ में है।” उनके अनुसार नाभादास शूद्र समुदाय से आए हुए सगुण रामभक्त थे। “उनके भक्तमाल में निर्गुण-सगुण, ब्राह्मण-शूद्र, स्त्री-पुरुष—सभी तरह के भक्तों के लिए सम्मानजनक जगह है।” (पृष्ठ 48) ‘भक्तमाल’ अथवा ‘भक्त-कल्प-द्रुम’ ब्राह्मणों का प्रायोजित ग्रन्थ है, भले ही इसके लेखक नाभादास शूद्र हों। किन्तु, यही वह ग्रन्थ है, जिसने निर्गुण-सगुण का गुड़-गोबर एक कर दिया है। यह एकता का व्यवस्थित प्रयास नहीं है, जैसा कि पाण्डेयजी का मत है, बल्कि यह निर्गुण कवियों को रामानंद का चेला बनाकर वैष्णवी रंग में रंगने का ब्राह्मणी उपक्रम है, जो नाभादास के माथे डाला गया। इसी प्रायोजित ब्राह्मणी ग्रन्थ से कबीर, रैदास आदि निर्गुण कवियों को रामानंद का शिष्य बनाने का काम शुरू हुआ। कबीर और रैदास के जीवन के साथ पूर्वजन्म की कहानियां जोड़ने का काम भी इसी ग्रन्थ ने किया। इसी ग्रन्थ के आधार पर बाद के ब्राह्मणों ने कबीर आदि निर्गुण संतों के जीवन-चरित्र लिखे, जिनमें उन्हें रामानंद का शिष्य और पूर्वजन्म का ब्राह्मण बताया गया। अगर ‘भक्तमाल’ न लिखा गया होता, तो कबीर-रैदास आदि कवियों के साथ रामानंद का नाम कभी नहीं जुड़ता, ‘संत वाणी संग्रह’ भी इसी ग्रन्थ के अनुकरण पर तैयार किया गया था।
अब हम भक्ति आन्दोलन की विफलता पर बात करेंगे। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं : “भक्ति-आन्दोलन पर समग्र रूप से विचार करने वाले किसी भी व्यक्ति के सामने यह प्रश्न जरूर खड़ा होगा कि वह आन्दोलन विफल क्यों हुआ?” क्या वास्तव में भक्ति आन्दोलन विफल हुआ? मेरा उत्तर है नहीं। भक्ति आन्दोलन विफल हुआ ही नहीं। अगर कोई आन्दोलन विफल हुआ, तो वह निर्गुण आन्दोलन है। निर्गुण और सगुण दोनों अलग-अलग आन्दोलन हैं। इन दोनों को एक समझने की कोशिश करना इतिहास का कुपाठ करना है। मुक्तिबोध ने इसे सही पकड़ा है। पाण्डेयजी के अनुसार, वे यही प्रश्न करते हैं : “क्या कारण है कि निर्गुण भक्तिमार्गीय जातिवाद आन्दोलन सफल नहीं हो पाया।” हालाँकि निर्गुणवाद भक्तिमार्गीय नहीं था, और न जातिवादी था। उसने जातिवाद और वर्णव्यवस्था का खंडन किया था, और समता तथा बन्धुता पर आधारित समाज की कल्पना की थी। लेकिन मुक्तिबोध का प्रश्न सही है कि निर्गुण आन्दोलन सफल क्यों नहीं हो सका? वे पूरे भक्ति आन्दोलन के विफल होने की बात नहीं कहते हैं, केवल निर्गुण आन्दोलन के विफल होने की बात करते हैं। सच भी यही है। अगर भक्ति आन्दोलन असफल होता, तो सगुण आन्दोलन कैसे जीवित है? उसे भी मर जाना चाहिए था। पर सगुण भक्ति का आन्दोलन न सिर्फ सफल हुआ, बल्कि आज इतने उत्थान पर है कि करोना के संकट में भी, राम का भव्य मंदिर बन रहा है।
अब दूसरा प्रश्न कि निर्गुण आन्दोलन विफल क्यों हुआ, जबकि यह 15वीं और 16वीं सदी तक निम्नजातीय शूद्र वर्गों का धर्म रहा था? स्पष्ट है कि निर्गुण के विरुद्ध ब्राह्मणों की जबर्दस्त प्रतिक्रांति हुई थी। पाण्डेयजी लिखते हैं कि ‘मुक्तिबोध निर्गुण की असफलता और अंत का कारण सगुण को मानते हैं।’ वे सही मानते हैं। पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध के इस कथन को उद्धृत किया है : “जो भक्ति आन्दोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सास्कृतिक आकांक्षाएं बोलती थीं, उसका मनुष्य सत्य बोलता था, उसी भक्ति आन्दोलन को उच्चवार्गियों ने आगे चलकर अपनी तरह का बना दिया, और उससे समझौता करके, फिर उस पर अपना प्रभाव कायम करके और अनन्तर जनता के अपने तत्वों को उनमें से निकालकर उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।” आगे पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध का यह कथन उद्धृत किया है कि “साहित्य के क्षेत्र में उच्च वर्गों का प्रधानभाव श्रृंगार (है, जिससे) विलास का प्रभावशाली विकास हुआ; इसलिए भक्तिकाव्य की प्रधानता जाती रही है।” जैसे ताश के खेल में इक्का महत्वपूर्ण होता है। उसी तरह इस विमर्श में पाण्डेयजी को ‘इक्के’ के रूप में नामवर सिंह का यह कथन मिल गया कि सगुण कवियों के श्रृंगार पर सामंती प्रभाव नहीं है। बस पाण्डेयजी को तुरंत इलहाम हो गया : “दोष श्रृंगार में नहीं, मुक्तिबोध की दृष्टि में है।” (पृष्ठ 49) लेकिन मुक्तिबोध ने श्रृंगार को, सामंती प्रभाव का नहीं, उच्च वर्गों का प्रधानभाव कहा है।
लेकिन पाण्डेयजी को नामवर सिंह का यह मत ठीक नहीं लगता कि ‘सगुण-काव्य की मुख्य कमजोरी शास्त्र-सापेक्षता है’। वे शास्त्रवाद के समर्थन में सवाल करते हैं कि ‘आखिर सगुण-काव्य में शास्त्र-सापेक्ष क्या है—सूर का वात्सल्य और श्रृंगार? मीरा का प्रेम और विद्रोह? या तुलसी का आत्मनिवेदन और आत्मसंघर्ष?’ फिर वे पूछते हैं : ‘क्या यह सब शास्त्र-सापेक्ष और लोक-विमुख है?’ लोक एक ऐसा शब्द है, जिसे सब अपने-अपने हिसाब से प्रयोग करते हैं। लोक का मतलब सिर्फ संसार है, और संसार में शास्त्र-सापेक्ष और शास्त्र-निरपेक्ष सभी लोग होते हैं। लोक-विमुख क्या है? यह इस पर निर्भर करता है कि लोक किस मत के प्रभुत्व में है? जैसे वर्चस्ववादी सत्ता होती है, वैसे ही वर्चस्ववादी लोक भी होता है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि लोक में बहुमत किसका है-- शास्त्र-सापेक्ष लोगों का या शास्त्र-निरपेक्ष लोगों का? जाहिर है कि बहुमत शास्त्र-निरपेक्ष लोगों का नहीं है, बल्कि शास्त्र-सापेक्ष लोगों का है। शास्त्र का मतलब है, आवागमन और वर्णव्यवस्था का सिद्धांत।
पाण्डेयजी लिखते हैं, ‘वैसे आधुनिक भारतीय भाषाओं के निर्माण और आधुनिक भारतीय साहित्य के विकास में भक्ति आन्दोलन की भूमिका को देखते हुए यह कहना सही नहीं होगा कि वह पूरी तरह विफल हो गया, लेकिन यह भी सच है कि उसका सामाजिक उद्देश्य पूरा न हो सका। भक्ति आन्दोलन के माध्यम से जनसाधारण की जो सामाजिक और सांस्कृतिक आकांक्षाएं प्रकट हुईं थीं, वे अधूरी ही रह गईं।’ (पृष्ठ 49) यहाँ पाण्डेयजी ने निर्गुण-सगुण दोनों को गडमड कर दिया है। प्रश्न है, किसका सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ--निर्गुण का या सगुण का? अगर निर्गुण का सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, तो बात समझ में आती है। वह सच में पूरा नहीं हुआ? क्योंकि, सगुण की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति ने निर्गुण की समतावादी क्रांति को उसी तरह खत्म कर दिया, जिस तरह पुष्यमित्र की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति ने बुद्ध की सामाजिक क्रांति को खत्म कर दिया था। लेकिन पाण्डेयजी अगर यह कहते हैं कि सगुण-भक्ति आन्दोलन का सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, तो यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती, क्योंकि सगुण-भक्ति का आन्दोलन विफल नहीं हुआ। वह पूरी सफलता के साथ उत्तरोत्तर आगे बढ़ा, और लोक में ‘मंगल’ के रूप में स्थापित हुआ, जिस पर पंडित रामचन्द्र शुक्ल सबसे अधिक मुग्ध थे।
पाण्डेयजी यह नहीं मानते कि सगुण आन्दोलन सफल हुआ है, पर उसकी विफलता का कोई प्रमाण भी वे नहीं देते। हालाँकि वे सगुण और निर्गुणधारा के संघर्ष को जानते हैं, पर सगुणधारा को निर्गुणधारा की विफलता का कारण नहीं मानते। वे बहुत ही भोला सा प्रश्न करते हैं, ‘अगर हम यह मान भी लें कि सगुणधारा ने निर्गुणधारा को समाप्त कर दिया, तो हमारे सामने एक और सवाल आ खड़ा होगा कि सगुणधारा को किसने समाप्त किया?’ अब इस भोलेपन का क्या जवाब दिया जाए? जब सगुणधारा समाप्त हुई ही नहीं, अविरल बह रही है, तो यह प्रश्न कहाँ मायने रखता है कि ‘सगुणधारा को किसने समाप्त किया?’ निर्गुणधारा अपने समय में जिस ब्राह्मण और मुल्ला के ख़िलाफ़ युद्धरत थी, वे उस काल के शासक वर्ग थे। शासक वर्ग केवल समाज की सत्ताधारी भौतिक शक्ति ही नहीं होता, बल्कि बौद्धिक शक्ति भी होता है। इस दृष्टि से दोनों तत्कालीन सत्ता के केन्द्र बने हुए थे। तब क्या कोई सोच सकता है कि सत्ता के इस बौद्धिक केन्द्र को निर्गुणधारा की वैचारिक क्रांति से कितना बड़ा खतरा रहा होगा? और इससे निम्नजातीय शूद्र कवियों की जान कितने खतरे में पड़ी होगी? तब किसने किसको खत्म किया होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं है। कमजोर व्यक्ति शब्दों से लड़ता है, और ताकतवर अपने सारे साधनों से लड़ता है। इसलिए, पूरा भक्ति आन्दोलन नहीं, जैसा कि पाण्डेयजी कहते हैं, बल्कि सिर्फ निर्गुण आन्दोलन सामंती और ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था के विरुद्ध खडा हुआ था। और उसी ने ‘अभिव्यक्ति के खतरे’ उठाए थे। उस अभिव्यक्ति में आग थी, जिसने ब्राह्मणवाद के मार्ग में अंगार बिखेर दिए थे। इसलिए निर्गुण को विफल होना ही था, क्योंकि वह शासित जातियों का आन्दोलन था, और वह जिसके विरुद्ध खड़ा हुआ था, वह ताकतवर शासक वर्ग था। लेकिन पाण्डेयजी का कहना है कि ‘केवल साहित्य के सहारे समाज को बदलने की आकांक्षा का अंत प्राय: असफलता में होता है।’ (पृष्ठ 50) कम-से-कम मैं तो यह सिद्धांत नहीं मानता। यह तो साहित्य की भूमिका को ही नकारना हुआ। क्या भक्ति-साहित्य ने समाज को नहीं बदला? क्या रामचरितमानस ने हिन्दू जनता पर कोई प्रभाव नहीं डाला? क्या ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने लाखों लोगों को ‘आर्यसमाजी’ नहीं बनाया? क्या जोतिबा फुले और डा. आंबेडकर के साहित्य ने दलित वर्गों में क्रांति नहीं की? अगर निर्गुण-काव्य ने निम्न वर्गों पर गहरा प्रभाव न डाला होता, तो क्या वह ब्राह्मणवाद के लिए खतरा बनता? क्या तुलसीदास और सूरदास उसका खंडन करते? लेकिन तथ्य यह भी है कि जिस पौधे को खाद-पानी नहीं मिलता है, वह मर जाता है। इसी तरह वे विचार भी मर जाते हैं, जिनका प्रचार नहीं किया जाता है। विचार वही अमर होते हैं, जिनको अमर बनाने के लिए पाला-पोसा जाता है। निर्गुण को वह खाद-पानी नहीं मिला, जो सगुण को मिला। सगुण-दर्शन शासक वर्ग के हित में था, इसलिए शासक वर्ग ने उसे सारे साधनों से पाला-पोसा।
अध्याय के अंत में पाण्डेयजी ने लिखा है कि ‘कबीर ने जीवन-भर जिन धार्मिक और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया, उन्हीं में कबीर को कैद करने की कोशिश कबीरपंथियों ने की है।’ पाण्डेयजी, यही तो प्रतिक्रांति है, जो ब्राह्मणों ने ‘कबीर-पंथ’ बनाकर की। कबीर चौरा (बनारस) और छत्तीसगढ़ के मठ किसने बनाए? वे कबीर के निम्नजातीय अनुयायियों ने नहीं बनाए, बल्कि द्विजों ने बनाए। बनारस का मठ वहाँ के राजा चेत सिंह ने बनाया था, और वे ही उसके आजीवन संरक्षक रहे थे। उस मठ के सभी महंत ब्राह्मण रहे। इसी तरह छत्तीसगढ़ मठ का निर्माण वैश्य जाति के धर्मदास ने कराया था, जिसकी गुरु गद्दी उसके वंश के पास है। इतनी बड़ी प्रतिक्रांति बगैर धन और ताकत के नहीं हो सकती। मठ कायम करने के लिए धन और संसाधन चाहिए, जो निम्नजातीय अनुयायियों के पास नहीं थे, बल्कि द्विजों के पास थे। द्विजों ने ये मठ निर्गुणधारा का ‘सत्यानाश’ करने के लिए बनाए थे। यह प्रतिक्रांति 17वीं और 18वीं शताब्दी में हुई थी। यानी सूर और तुलसी के काल में निर्गुणधारा अपने पूरे उत्थान पर थी। पाण्डेयजी कहते हैं, “कबीरपंथ में कबीर के विचारों की दुर्गति के इतिहास से साबित होता है कि कोई क्रांतिकारी विचारधारा विरोधियों की आलोचनाओं से नहीं मरती; वह इतिहास-प्रक्रिया से बेखबर अनुयायियों की अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्वाकांक्षा से मरती है।’ नहीं पाण्डेयजी, क्रान्ति की विचारधारा प्रतिक्रांति से मरती है। अगर अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्वाकांक्षा से विचारधारा मरती होती, तो सबसे पहले ब्राह्मणवादी मनु की विचारधारा मरती।
(जुलाई 22, 2020)