सोमवार, 30 दिसंबर 2024

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज 
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यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त होकर भारत आए और फोर्ट विलियम कालेज (1800-1854) में हिन्दुस्तानी विभाग के विभागाध्यक्ष बन बैठे। जब बी.गिलक्राइस्ट भारत आए उस समय कम्पनी का राजकाज फ़ारसी भाषा में होता था। उन्होने भारत में आते ही महसूस किया कि जनता के भीतर से फ़ारसी भाषा का प्रभाव क्षीण और हिन्दुस्तानी भाषा का प्रभाव बढ़ रहा है। इसलिए कम्पनी शासन के हित में कर्मचारियों को हिन्दुस्तानी भाषा का ज्ञान होना अत्यंत जरूरी है। इस विचार से प्रेरित होकर उन्होंने शीध्र ही हिन्दुस्तानी भाषा का अध्ययन शुरु किया। गिलक्राइस्ट ने पश्चिमोत्तर प्रांत को भाषा सम्बन्धी अध्ययन का क्षेत्र बनाया। उन्होंने तीन साल के अध्यन में ‘इँगलिश-हिन्दुसतानी डिक्शनरी’ की रचना की। भाषा का अध्ययन करते समय उन्हें अनेक कठिनाइयों से जूझना पड़ा। इस बात का जिक्र उन्होंने 4 जून 1787 कलकत्ता गर्वनर-जनरल लार्ड कार्नवालिस को लिखे एक पत्र में किया। इस पत्र में उन्होंने लिखा था :

‘‘इन पिछले तीन-वर्षो से मैं जिस ग्रन्थ(‘इँगलिश-हिन्दुसतानी डिक्शनरी’) की रचना करने में लगा हुआ था उसके प्रथम भाग की पांडुलिपि समाप्त हो गई है। आप की आज्ञा से अब मैं दूसरे और तीसरे भाग की रचना करना चाहता हूँ । जहाँ तक हो सकेगा मैं यह कार्य शीघ्र ही करुँगा क्योंकि जैसा इस विषय पर लिखे गए कैप्टन कर्कपैट्रिक के पत्र से मुझे ज्ञात हुआ है, उन्होंने जिस कार्य को समाप्त करने का भार अपने ऊपर लिया था उसे अब वे सरकारी काम के कारण पूरा करने में असमर्थ है; अब उसमें वे अपना अधिक समय नहीं दे सकते’’ इसी पत्र में गिलक्राइस्ट ने आगे लिखा-‘‘अपने अध्ययन की सुविधा और कार्य में सहायता मिलने की दृष्टि से मैं श्रीमान से बनारस की जमींदारी में, और अवश्यकता हुई तो सूबा अवध में, जाने की आज्ञा चाहता हूँ। मुझे आशा है कि सरकार की जैसी कृपा दृष्टि अब तक मुझ पर बनी रही है वैसे ही इस कार्य तक समाप्त होने तक बनी रहेगी। इससे न केवल मुझे वरन् साधारण रुप से सबको लाभ पहुँचेगा।’’ इस पत्र में गिलक्राइस्ट ने गवर्नर से निवेदन किया कि उन्हें अफीम की खेती करने की इज़ाजत दी जाय, जिससे वह अपना खर्च स्वयं उठा सकें। तत्कालीन गवर्नर ने उनका सुझाव स्वीकार कर लिया और उन्हें बनारस प्रांत में नील की खेती करने की इजाज़त प्रदान कर दी। यह बात सोचने लायक है कि फिरंगी अपनी सत्ता का विस्तार करने के लिए देश के संसाधनों का समुचित प्रयोग कैसे कर रहे थे, जबकि यहां का कुलीन वर्ग खेती करना अपनी शान के विपरीत समझता था। सन् 1790 में ‘इँगलिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी’ के दोनों भाग प्रकाशित हो गए थे। जॉन बी. गिलक्राइस्ट ने 20 दिसंबर 1790 को इसकी प्रतियां बोर्ड को भेज दी। वे खुद बंगाल सरकार की आज्ञा के अनुसार सन् 1794 में कलकत्ता वापिस आ गए। गिलक्राइसट कलकत्ता में रहते हुए भाषा का अध्यन करते रहें, जिसके फलस्वरुप कलकत्ते में उन्होंने ‘दि हिन्दी ग्रामर’ और ’दि आरिएंटल लिग्विस्ट’ सन् 1796 और 1798 में प्रकाशित किए। इन दोनों ग्रंथों का प्रचार कम्पनी के कर्मचारियों के बीच व्यापक स्तर पर किया गया। इतना ही नहीं बंगाल सरकार ने इन ग्रन्थों के प्रकाशन के लिए गिलक्राइस्ट की आर्थिक मदद भी की। सन् 1798 में वेलेजली भी कलकत्ता आ गए। गौरतलब है कि वेलेजली ने कम्पनी की सत्ता को जितना मजबूत किया शायद उतना किसी ने नहीं किया होगा। वलेजली ने गिलक्राइस्ट के अध्ययन और परिश्रम की खूब सराहना की और उनके अध्ययन का लाभ कम्पनी के कर्मचारियों को प्रदान करने का निश्चय किया। वेलेजली का यह प्रस्ताव बी. गिलक्राइस्ट को अच्छा लगा। जान बी. गिलक्राइस्ट कम्पनी के कर्मचारियों को फ़ारसी और हिन्दुस्तानी भाषा की शिक्षा देने का काम करने लगे। इसके बाद आरिएंटल सेमिनारी की स्थापना हुई और गिलक्राइस्ट को राइटर्स बिलडिग्स का कमरा न. 11 दे दिया गया। 3 जुलाई 1799 को बंगाल के सरकारी मंत्री एच.वी डारेल के नाम एक पत्र लिखकर उन्होंने कमरा न. एक मांग लिया। वेतन तै होने के समय तक उन्हें बारह हजार रुपया पेशगी दिया गया।

 एम. वेलेजली को यह अहसास हो चुका था कि कम्पनी के राजनीतिक उद्देश्य को साधने के लिए एक शैक्षिक संस्था की बड़ी आवश्यकता है। भारत में कम्पनी की सत्ता को कायम रखने के लिए वेलेजली ने 24 अक्टूबर 1799 को राइट आनरेबुल हेनरी डुंडाज के नाम लिखे पत्र में शैक्षिक संस्था खोलने का इरादा जाहिर किया। इस पत्र में वेलेजली ने राइट आनरेबुल हेनरी डूंडाज को संकेत किया कि वह कम्पनी के हितों के लिए भारतमें एक कॉलेज की स्थापना कलकत्ता में करना चाहते है। पत्र इस़ प्रकार है :

 ‘ मेरा, कोर्ट की प्रतिज्ञा किए बिना ही, कलकत्ते में एक ऐसी संस्था खोलने का इरादा है, इसके लिए मैंने कुछ किया भी है, और मुझे आशा है कि यदि व्यय की आवश्यकता हुई भी तो कंपनी का और अधिक धन खर्च किए बिना ही मैं अपनी आयोजना को सफल बना सकूंगा। जिस विषय में मुझे सबसे अधिक दिलचस्पी है उसमें आपकी सक्रिय और हार्दिक सहायता का मुझे पूरा भरोसा है ।’

   औपनिवेशिक भारत में शिक्षण संस्थाओं के स्थापित होने के निजि स्वार्थों और उद्देश्य को पकड़ा जा सकता है। भारतीय विद्वान फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना के जो भी उद्देश्य बताते हो लेकिन भारतीय जनता को शिक्षित करने का एजेण्डा कतई नहीं था। वेलेजली के प्रयास से सन् 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित हो गया। हिन्दुस्तानी विभाग का विभागाध्यक्ष बी. गिलक्राइस्ट को नियुक्त किया गया। कालेज का पाठ्यक्रम शुरुआत में हस्तलिखित देशी भाषा की पोथी पर आधारित था। इन हस्तलिखित पोथियों को बनाते समय कई प्रकार की अशुद्धियां और दोष रह जाते थे। जिसके चलते विद्यार्थियों को अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ता था। दूसरी समस्या यह थी कि इन पुस्तकों की नकल करने में काफी समय लगता था। इस समस्या के समाधान के लिए कालेज कौंसिल ने सन् 1801 में नियम बनाया कि प्रधानाध्यापक पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण विद्यार्थियों के लाभार्थ छपवाएं। इस नियम के तहत गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी भाषा के विभिन्न संग्रह तैयार करवाएं । सन् 1802 में गिलक्राइस्ट ने कालेज कौंसिल को पत्र लिख कर हिन्दुस्तानी भाषा में संग्रह प्रकाशित करने का निवेदन किया। इस पत्र के साथ गिलक्राइस्ट ने जिन पुस्तकों की सूची भेजी उनके नाम इस प्रकार हैं :

 मिसकीनकृतमर्सिया (नागरी), बत्तीसी सिंहासन(नागरी),शंकुतला नाटक(नागरी),अख्लाक-इ-हिन्दी(नागरी),माधवानल (नागरी), बैताल पचीसी(नागरी), चार दरवेश(फारसी),मीर हसन(फारसी), गुलिस्ता(फारसी), तोता कहानी(फारसी), गुलशन(फारसी), हिन्दुस्तानी प्रिसीपल ने इन पुस्तकों के छपने की सूची कौंसिल के पास भेज दी।

सन् 1801 में जॉन बी. गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी विभाग में मुंशियों की नियुक्ति के लिए कौंसिल को पत्र लिखा। उनके प्रस्ताव को कौंसिल ने स्वीकार कर लिया गया। कौंसिल की ओर से 19 फरवरी 1802 में मुंशियों की नियुक्ति की स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस के तहत ‘भाखा मुंशी’ के पद पर श्री लल्लूलाल को नियुक्त किया गया। फोर्ट विलियम कॉलेज में सन् 1802 से 1823 तक लल्लूलाल ‘भाखा मुंशी’ के पद पर कार्यरत रहे। जॉन बी.गिलक्राइस्ट हिन्दुस्तानी विभाग को असीम ऊँचाई तक ले जाना चाहते थे। इस कार्य योजना के लिए उनके पास मुकम्मल विजन भी था। इनकी इच्छा थी कि अधिक से अधिक पुस्तकों का निर्माण कराया जाए और लेखकों को प्रोत्साहन के लिए पुरस्कार भी दिए जाए। गिलक्राइस्ट का 19 अगस्त, 1803 को एक दूसरा पत्र कौंसिल की बैठक में पेश हुआ जिसमें उन्होंने देशी विद्वानों के परिश्रम के लिए कौंसिल से उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए उनके वास्ते पुरस्कार मांगे। रचनाओं की सूची और ग्रन्थकर्ताओं के संबन्ध में अपनी सिफारिशे उन्होंने पत्र के साथ भेज दी। जॉन गिलक्राइस्ट ने कौंसिल को पहले से ही चेता दिया था कि यह रकम देखने में तो बड़ी है किन्तु ध्येय की महानता और ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के हित और उसकी स्थिरता की दृष्टि से भविष्य में उसके परिणाम पर विचार करने से यह रकम छोटी लगेगी। श्रीमान गवर्नर-जनरल से उन्होंने हिन्दुस्तानी विभाग के प्रति पूर्ण सहानुभूति प्रकट करने की आशा की। गिलक्राइस्ट के प्रति कॉलेज कौंसिल का रवैया उदारपूर्ण नहीं था जिससे वे काफी व्यथित भी रहते थे। सन् 1804 में गिलक्राइस्ट अपने स्वास्थ खराब होने का हवाला देते हुए हिन्दुस्तानी विभाग से त्यागपत्र देकर अपने देश वापिस चले गए।

  फोर्ट विलियम कालेज के इतिहास में हिन्दुस्तानी भाषा में तमाम ग्रन्थों का निर्माण हुआ लेकिन गिलक्राइस्ट के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई आगे चलकर वैसी प्रगति किसी और के कार्यकाल में दर्ज नहीं की गई। गिलक्राइस्ट के जाते ही लल्लूलाल को कालेज से अलग कर दिया गया लेकिन कुछ दिन के बाद उनको पुनः कालेज में बुला लिया गया। लल्लूलाल ने फोर्ट विलियम कॉलेज में रहते हुए, उन्होने अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया। लल्लूलाल ने जिन ग्रन्थों का निर्माण किया उनमें ‘प्रेमसागर’(1803-1810),राजनीति(1810),लतायफ़-इ-हिन्दी(1810),ब्रजभाषा व्याकरण(1811),सभा विलास(1815) सामिल हैं। फोर्टविलियम कॉलेज की स्थापना वेलेजली की महात्वाकांक्षी परियोजना थी जिसका उद्देश्य भारत में कम्पनी शासन कायम करना था न कि हिन्दी गद्य का विकास करना। अपने तमाम उत्थान-पतन से गुजरते हुए सन् 1854 में बंगाल गवर्नर ने फोर्टविलियम कॉलेज को तोड़ने का आदेश जारी कर 

(संदर्भ : फोर्ट विलियम कॉलेज लेखक डॉक्टर लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय)

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

चीन में बौद्ध धर्म

चीनी सम्राट मिंग ति के निमंत्रण पर दो भारतीय बौद्ध विद्वान 67 ई. में सबसे पहले चीन गए थे। एक का नाम काश्यप मातंग और दूसरे का नाम धर्मरक्षित था। धर्मरक्षित का एक नाम धर्मरत्न भी मिलता है। 

काश्यप मातंग का जन्म मगध में हुआ था। लेकिन चीन जाते समय वे गांधार में रहते थे। काश्यप मातंग और धर्मरत्न बौद्ध धम्म की पुस्तकें चीन ले गए। वे एक श्वेत घोड़े पर सवार होकर गए थे। 

चीनी सम्राट ने उनके रहने के लिए श्वेताश्व विहार का निर्माण करवाया। यही चीन का प्राचीनतम बौद्ध विहार था।

शुरुआती दौर में बौद्ध धम्म को कनफ्यूसियस‌ मतानुयायियों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धम्म का समर्थन प्राप्त होने लगा। द्वितीय सदी के प्रसिद्ध दार्शनिक मोत्सू ने बौद्ध धम्म को कनफ्यूसियस के धर्म से श्रेष्ठ बताया।

चीनी सम्राट वु (265-290 ई.) तथा मिन् (313-316 ई.) के समय में यहाँ अनेक बौद्ध मठों एवं विहारों का निर्माण हुआ।

लगभग 100 वर्षों बाद दक्षिणी चीन के राजा लियांग-वूती ने बौद्ध धम्म को राजधर्म का दर्जा दिया। वेई, सुई और तांग राजवंशों ने बौद्ध धम्म को राजकीय संरक्षण दिए। 

तांग काल को तो इतिहास में " चीन का बौद्ध काल " कहा जाता है।

तांग काल में प्रभाकर मित्र, दिवाकर, बोधिरुचि, अमोघवज्र, वज्रमित्र जैसे बौद्ध विद्वान चीन गए।

अनेक चीनी यात्री भी बौद्ध ग्रंथों की खोज में भारत आए। फाहियान, ह्वेनसांग और इत्सिंग इनमें सर्वाधिक प्रमुख हैं। 

भारत के कई बौद्ध विद्वान चीन में काफी लोकप्रिय हुए। उनमें एक नाम बोधिधर्म का है। काँचीपुरम के बोधिधर्म वहाँ इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी वहाँ पूजा की जाने लगी।

बौद्ध धम्म के प्रचार के साथ चीन में अनेक बौद्ध गुफाएँ बनाई गईं। इन गुफाओं में कहीं चट्टानें काट कर बड़ी बड़ी मूर्तियाँ बनाई गईं तो कहीं उनके अंदर चित्रकारी की गई।

दुन-हुआंग और लांग-मेन के बौद्ध गुफा परिसर दुनिया में प्रसिद्ध है।

कोरियाई देशों में बौद्ध धम्म 372 ई. में चीन से पहुँचा। कोरिया चीन के उत्तर-पूर्व में स्थित है। सबसे पहले सुन्दो नामक एक बौद्ध भिक्खु बुद्ध की मूर्ति और सूत्र लेकर कोरिया पहुँचे।

बाद में 384 ई. में बौद्ध आचार्य मल्लानंद कोरिया गए। कोरिया के प्योंगयांग नगर में एक भारतीय बौद्ध भिक्खु ने 404 ई. में दो मठों का निर्माण कराया था। 

उसके बाद अनेक बौद्ध विद्वान कोरिया गए। कोरिया से भी अनेक यात्री ज्ञान की खोज में भारत आए।

बड़ी संख्या में बौद्ध ग्रंथों का कोरिया की भाषा में अनुवाद हुए। 

आठवीं सदी में कोरियाई यात्री हाइचो बौद्ध संस्कृति को जानने के लिए भारत की यात्रा की। वे पूर्वी भारत में 724 ई. में पहुँचे थे। 

उन्होंने सारनाथ, राजगीर, कुशीनगर और बौद्ध गया के प्रसिद्ध स्तूपों को देखा। बताया कि सभी मगध राज्य में हैं। सारनाथ के अशोक स्तंभ से वे बहुत प्रभावित हुए।

जापान में बौद्ध धम्म कोरिया से पहुँचा। बात 552 ई. की है। 

उस समय कोरिया के सम्राट ने जापानी सम्राट के लिए अनेक प्रकार की भेंट भेजी, जिनमें बौद्ध मूर्तियाँ, सूत्र, पूजा की वस्तुएँ और उनके साथ अनेक कलाकार एवं वास्तुकार आदि शामिल थे। 

जल्द ही जापान में बौद्ध धम्म प्रभावशाली हो गया। वहाँ जिस लिपि में बौद्ध सूत्र लिखे जाते थे, उसे शित्तन कहा जाता है। यह शित्तन वस्तुतः सिद्धम का दूसरा रूप है।

रविवार, 22 दिसंबर 2024

जिसने डार्विन को चुनौती दी

एलिजा बट गम्बल (1841–1920): जिसने डार्विन को गलत साबित किया।

शायद आपको आश्चर्य हो लेकिन यह तथ्य है कि डार्विन महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानते थे। इसके लिए उन्होंने 1871 में प्रकाशित अपनी किताब ‘The Descent of Man' में तथाकथित ‘वैज्ञानिक तथ्य’ दिए है। इस किताब के आने तक डार्विन की प्रतिष्ठा आसमान छू रही थी। लेकिन अमेरिका में महिला आंदोलन में सक्रिय एलिजा बट गम्बल (Eliza Burt Gamble ) को डार्विन के ‘वैज्ञानिक तर्क’ वैज्ञानिक नही लगे और उन्होंने डार्विन को उनके ही क्षेत्र में चुनौती देने की ठान ली।

 इसके लिए उन्होंने लाइब्रेरी की राह पकड़ी और उस समय तक के जीव विज्ञान का अध्ययन किया। अंत मे 1894 में उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण किताब लिखी -The Evolution of Woman: An Inquiry into the Dogma of Her Inferiority to Man इसमे उन्होंने डार्विन के तर्क को उन्हीं के विकासवाद के सिद्धान्त के आधार पर काटा और साबित किया कि महिलाएं पुरुषों से किसी भी मायने में हीन नही है। वे उनके बराबर है। जो अंतर हमे दिखता है वे जैविक नही बल्कि सांस्कृतिक व सामाजिक है। लेकिन यह विक्टोरियन युग था, और डार्विन का यह सिद्धांत कि महिलाएँ पुरुषों से हीन होती है, उस समय का 'कॉमन सेंस' था। इसके अलावा महिलाओं को वैज्ञानिक के रूप में स्वीकार करने का चलन नही था। याद कीजिये कि 2 बार नोबेल जीतने वाली मैडम क्युरी को भी फ्रेंच वैज्ञानिक सोसाइटी में प्रवेश नही दिया गया था। डार्विन से पहली बार टकराने वाली यह किताब 1950-60 के प्रखर नारीवादी आंदोलनों के कारण ही स्थापित हो सकी और तमाम नारीवादी आंदोलनों का आधार बन सकी.

आज से ठीक 100 साल पहले उनकी मृत्यु हुई. तब से लेकर आज तक भिन्न भिन्न रूपों में डार्विन और एलिजा बट गम्बल की यह लड़ाई जारी है. आज भी तमाम तथाकथिक वैज्ञानिक शोधों में यह साबित करने का प्रयास किया जाता है की महिलाएं पुरुषों से अलग है. जेंडर और सेक्स का घालमेल आज भी जारी है. लेकिन एलिजा बट गम्बल की परंपरा के वैज्ञानिक विशेषकर महिला वैज्ञानिक आज सफलतापूर्वक उन 'वैज्ञानिक' मिथकों को अपने वैज्ञानिक तर्कों से धवस्त कर रहे / रही हैं और भविष्य की नींव रख रहे/रही हैं, जो पूरी तरह महिला-पुरुष समानता पर आधारित है.

एलिजा बट गम्बल की कहानी हमें यही बताती है की विज्ञान भी जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक ही हो. यहाँ भी समाज की तरह ही तमाम पूर्वाग्रहों की तीखी लड़ाई जारी रहती है. मार्क्स ने इस बारे में बहुत ही सटीक कहा था- तर्क हमेशा होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वो अपने तार्किक रूप में ही हो.

[Reason has always existed, but not always in a reasonable form]


शनिवार, 21 दिसंबर 2024

शब्दों की आवाजाही

चाय के कप में बिस्कुट डुबाकर खाने के दौरान अचानक मन में आया कि यह चाय चीनी शब्द है। फिर बिस्कुट, जो कि फ्रांसीसी शब्द है, और बिस्कुट के साथ जो चानाचूर है, वह हिंदी शब्द है। चाय में जो चीनी और पानी होता है, वहां चीनी चीनी शब्द है, जबकि पानी हिंदी शब्द है। चाय का प्याला फारसी है, लेकिन कप अंग्रेजी शब्द है। वहीं अंग्रेजी शब्द भी पुर्तगाली भाषा से आया है।

चाय चाहे चीनी हो, लेकिन कॉफी तुर्की शब्द है। वहीं केक और ब्रेड का केक अंग्रेजी शब्द है, और ब्रेड पुर्तगाली है।

अब थोड़ा महंगे खाने-पीने की बात करते हैं। पहले से ही बता दूं कि खाना-पीना हिंदी है और दाम ग्रीक शब्द है। रेस्टोरेंट या बुफे में पिज्जा, बर्गर या चॉकलेट ऑर्डर करते समय क्या आपने कभी सोचा है कि रेस्टोरेंट और बुफे दोनों ही फ्रेंच भाषा के शब्द हैं, साथ में पिज्जा भी। पिज्जा में डाली गई मसाला अरबी है, और उसमें डाला गया मिर्च फारसी।

बर्गर और चॉप दोनों ही अंग्रेजी शब्द हैं, लेकिन चॉकलेट एक मेक्सिकन शब्द है। ऑर्डर भी अंग्रेजी में होता है। जो मेन्यू से ऑर्डर करते हैं, वह भी फ्रेंच शब्द है। मैनेजर को नगद पैसे देने समय ध्यान रखें कि नगद अरबी है, और मैनेजर इटालियन है। अगर आप दरवाजे पर खड़े चौकीदार को बख्शीश देते हैं, तो चौकीदार और उसकी बख्शीश दोनों ही फारसी शब्द हैं।

अब बाजार में चलते हैं, जहां सब्जी और फल खरीदते हैं। बाजार फारसी शब्द है, और सब्जी भी। जो रास्ता आप जा रहे हैं, वह भी फारसी है। फल में अनानास पुर्तगाली है, आंवला या बाटाबिलेबू भी पुर्तगाली है। लीची चीनी शब्द है, तরমूज फारसी, और नींबू तुर्की शब्द है। प्यारे और कमरांग दोनों ही पुर्तगाली हैं। लेकिन प्यारे का हरा रंग फारसी शब्द है।

जब आप वजन कराकर असल दाम देते हैं, तो ध्यान रखें कि वजन अरबी शब्द है, असल भी अरबी शब्द है। लेकिन दाम ग्रीक शब्द है, जैसा कि मैंने पहले बताया।

धर्मकर्म में भी यही स्थिति है। मस्जिद अरबी है, दरगाह/ईदगाह फारसी है। चर्च पुर्तगाली शब्द है, और चर्च का पादरी भी। जीसस खुद पुर्तगाली थे। केयांग बर्मीज है, और पगोडा जापानी शब्द है। और मंदिर में भगवान तुर्की शब्द हैं।

और क्या बचा है? ओ हाँ! कामकाजी स्थल! ऑफिस और अदालत में "बाबा", स्कूल और कॉलेज में "किंडरगार्टन" और "संतान"। बाबा खुद तुर्की है, ऑफिस अंग्रेजी में है, लेकिन अदालत अरबी है, और अदालत का कानून फारसी है, लेकिन वकील अरबी है।

जो स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई होती है, वह अंग्रेजी शब्द है, लेकिन किंडरगार्टन फिर से जर्मन है!

स्कूल में पढ़ाई जाने वाली किताबें "केताब" दोनों ही अरबी शब्द हैं। जिस कागज पर इतनी पढ़ाई होती है, वह फारसी शब्द है। लेकिन कलम अरबी है। रबर पेंसिल फिर से अंग्रेजी शब्द है!

अगर पूरा याद नहीं हो, तो कम से कम इतना याद रखें कि "मन" शब्द अरबी है।

शब्दों की यह कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन कहानी अरबी है, और काहानी हिंदी में। दोनों का "खतम" अरबी में है। माफी नहीं मांगी या "सॉरी" नहीं कहा, क्योंकि माफी अरबी है और "सॉरी" अंग्रेजी शब्द है।

पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏
🙏🙏🙏

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

buxar

बुखारा को उज़बेक भाषा में Buxoro/Buxara बोलते हैं। Buxara उइगुर भाषा का शब्द है। उइगुर भाषा में Buxara का अर्थ " बुद्धिस्ट मंदिर " होता है।

सोग्दियन भाषा में Buxara का परिवर्तित रूप Puxar है, जिसका अर्थ " बुद्धिस्ट मंदिर " होता है। 

उइगुर भाषा का Buxara शब्द मूलतः बुद्धिस्ट शब्द " विहार " है। विहार से Buxara बना है। Buxara का पहला साक्ष्य 4-5वीं सदी के ताम्र सिक्के पर मिलता है।

बिहार का Buxar जहां मिथकों में राक्षसों का निवास बताया गया है, वहां बौद्ध विहार था। Buxar का अर्थ बौद्ध विहार है।

त्रिपुरा में Boxanagar है। यहां भी Boxa बौद्ध विहार से जुड़ा है। Boxanagar के बौद्ध-स्थल की तस्वीर नीचे है, जो खुदाई में मिला है।

गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

बदायूं एक बौद्ध स्थल

बदायूँ (बुद्धमऊ) का नामकरण और इतिहास-
              

बदायूं (उ. प्र.) का नाम भगवान बुद्ध के नाम पर पड़ा था। मझिआंव गांव भी है। 

सूर्यकुण्ड ग्राम-मझिआंव  जनपद-बदायूँ  इस स्थान को प्रथम बार चीनी यात्री "फाहियान" ने सन 415 ई. में भारत यात्रा के दौरान खोजा था। इस स्थान पर शाक्य मुनि भगवान बुद्ध ने वर्षा वास किया था। पीपल पेड़ के नीचे बैठकर बौद्ध भिक्षुओं एवं उपासकों को धम्मदेशना दी थी।

सम्राट अशोक के समय इस धरती पर बौद्ध विहार बनवाए थे। बदायूँ (बुद्धमऊ) के राजा महिपाल ने भव्य सूर्यकुण्ड बनवाया था।  जिसके चारो ओर चौरासी बौद्ध मठ वनवाये थे। 

प्रो. गोटी जॉन के अनुसार, एक प्राचीन शिलालेख में इस शहर का नाम 'बेदामूथ' रखा गया और यह क्षेत्र पांचाल जनपद का हिस्सा था। 

मुस्लिम इतिहासकार रोज खान लोधी ने कहा कि यहां सम्राट अशोक ने एक बौद्ध विहार और एक किला बनवाया और इसका नाम 'बुद्धमऊ' रखा था। 

स्मिथ महोदय के अनुसार, बदायूँ का नाम बुद्ध के नाम पर पड़ा था।

लखनपुर शिलालेख में बदायूँ का नाम 'बौदा म्यूता' मिलता है।।

बुद्धमऊ शब्द बदायूं हो गया आगे सूफी प्रभाव के कारण बदायूं शरीफ़ कहा जाने लगा था।

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फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...