शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

                                                     दो दुनी पांच
बम्बई तब मुंबई नहीं कहलाता था,न तब कोई सिरफिरा नेता बिहारियों और यु.पी .वालो को मारने -पीटने के तथाकथित क्रांतिकारी कार्यो में मशगूल ही था.तब की यह सच्ची कहानी है -
मुंबई की एक भीड़-भाड़ वाली सड़क पर एक भिखमंगा जोर -जोर से चिल्ला रहा था और  दो दुनी पांच कह कर लोगो का ध्यान आकर्षित कर रहा था.
परन्तु भाई जान !यह मुंबई है यहाँ अपनी तो कोई सुनता नहीं दुसरे की भला कौन सुनता है वो भी एक भिखमंगे की ? खैर बिल्ली के भाग्य से एक छिका टूटा, एक नवागत मुंबई वासी जो अभी हाल में एक दवा कम्पनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का काम कर रहे थे,भिखमंगे की बात सुन कर ठिठक गए और उसे लगे मैथ समझाने कि दो में यदि दो जोड़ा जाये तो चार होता है न कि पांच. भिखमंगा मानने के लिए तैयार ही नहीं था और ऍम .आर  साहब मनवाने के लिए तत्पर. लम्बी रस्सा -कस्सी के बाद भिखमंगे ने अपनी बात वापस ले ली और उनकी बात पर सहमत हो गया कि दो दुनी चार ही होता होगा. ऍम .आर .साहब जब उठ कर जाने लगे तो उस भिखमंगे ने उनकी टाई पकड़ ली और कहा कि यदि दो दुनी चार होता है तो निकालो चार रूपए .
साहबानो !तब चार रूपये आज के ४० रूपये के बराबर होता था. पूरी नंगा-झोरी के बाद उनकी जेब से मात्र एक-आध रूपये ही मिले. भिखमंगे ने उसे ले लिया और कहा कि -"साहब दो दुनी पांच ही होता है आपके गडित में चार होता होगा ,इस बाजारवाद के दौर में दो दुनी पांच ही होता है.
                  भिखमंगा ठीक ही कह रहा था. क्यों ???????

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

आगे ......
 यह प्रश्न उठाया जान चाहिए की क्यों अंग्रेजो के जाने के बाद भी अंग्रेजियत कायम रही या अभी भी कायम है. विशेषाधिकार प्राप्त समाज अंग्रेजी भाषा को बनाये और बचाए इसलिए नहीं रखा की इसका फायदा दलितों या पिछड़े समाज को मिले ,बल्कि उन्होंने इसे इसलिए बचाया ताकि दलित और पिछड़ा समाज अंततः हमारे विशेषाधिकारो का बटवारा न कर सके. यह औपिनिवेशिक दुनिया के विपरीत आचरण रहा. जहा -जहा भी उपनिवेश रहे वहाँ -वहाँ पर उपनिवेश और उपनिवेशी के बीच छतीस का आकड़ा रहा लेकिन भारतीय समाज में इनके बीच तिरसठ का सम्बन्ध बना रहा.आखिर  क्यों ? वह इसलिए की भारतीय समाज का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग और अंग्रेजो द्वारा पालित -पोषित समाज के बीच एक सामान स्वार्थ था और वह स्वार्थ था दलितों और निचले समाज के शोषण की पुरानी व्यवस्था को कमजोर न पड़ने देना. आखिर किस आधार पर चन्द्रभान प्रसाद ने मान लिया की दलितों का उद्धार अंग्रेजी माता के मंदिर से ही हो सकता है? हाँ यह जरूर है की चन्द्रभान प्रसाद जिस अपर मिडिल क्लास से आते है उस क्लास के लिए सीढ़ी के रूप में अंग्रेजी आवश्यक है.
अंग्रेजी की आवश्यकता उन दलितों के लिए नहीं है जो दो जून की रोटी के लिए अपना खून -पसीना एक किये हुए है. उनके लिए तो सर्वप्रथम प्रारभिक शिक्षा चाहिए ,वह भी अपनी मातृभाषा में ताकि वह अपनी भाषा में शिक्षा का मतलब समझ सके ,अपनी भाषा में अधिकारों की मांग कर सके .
        आगे 
अगर ऐसा नहीं होता तो चन्द्रभान प्रसाद मैकाले का नहीं बल्कि उन अंग्रेजो का जन्मदिन मनाते(अगर जन्मदिन मनाने की मज़बूरी हो तो )जिन्होंने भारतीय इतिहास,संस्कृति,भाषा ,साहित्य को खोजने ,सहेजने एव उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .इनमे से कुछ नाम सुझाया जा सकता है,पहला नाम सर विलियम जोन्स का है जिन्होंने 'एशियाटिक सोसाएटी ऑफ़ बंगाल 'नामक शोध संस्था की स्थापना की ,जिनके अनथक प्रयत्न से भारतीय इतिहास में वैज्ञानिक पद्धति  का विकास हुआ.सर जोन्स ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सेंद्रोकोट्स की पहचान भारतीय ग्रंथो उल्लखित चन्द्रगुप्त मौर्य से की. यह पहचान ही भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गयी. दूसरा  नाम विल्किंस का लिया जा सकता है जिन्होंने भारतीय संस्कृति ,इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया,इसी तरह भारतीय विद्या अध्यन को बढ़ावा देने वाले जर्मनी के मैक्स मुलर थे . जेम्स प्रिन्सेप ने दुनिया के महान राजाओं में सम्राट अशोक की लाटो को पढ़ा ,यदि वह इसकी खोज न करते तो शायद अशोक अभी भी काल के गर्त में कही धूल-धूसरित पड़े होते.सर जान मार्शल ने सिन्धु सभ्यता की खोज की ,इस खोज से भारतीय सभ्यता की महानता का पता चला तथा इसके साथ ही अंग्रेजो के white burden का सिद्धांत का खंडन हुआ.भारत के प्राचीनतम नगरो की खोज कनिघम ने किया था.इसी तरह जी.डब्लू.ब्रिग्स को जिन्होंने अपनी पुस्तक the chamaars  लिखा. इस पुस्तक में लेखक ने चमारो की स्थिति का यथार्थ एव न्याय पूर्वक विवरण प्रस्तुत किया गया है.तत्कालीन किसी भी भारतीय विद्वान ने दलित और दमित समाज का ऐसा न्यायपूर्वक विवरण नहीं दिया है ,जिसमे आर्थिक सामाजिक उनके रीति -रिवाज ,खान -पान का सटीक उल्लेख हो.इस तरह अनेक विद्वानों का नाम लिया जा सकता . मेरे कहने का यह अर्थ कदापि नहीं है की इन विदेशी विद्वानों के समक्ष भारतीय विद्वानों की भूमिका कमतर थी बल्कि इन विद्वानों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है की विदेशी होने के वावजूद इन्होने भारतीय इतिहास ,संस्कृति में इनका अवदान किसी भी भारतीय से कमतर नहीं है.
 

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

                                                        अंग्रेजी -माता का प्रसाद  किसके लिए 
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर -खीरी में एक मंदिर का निर्माण चर्चा में है.वैसे तो देश भर में रोज-ब-रोज कही न कही धर्मं स्थलों का निर्माण हो रहा है लेकिन जिस मंदिर का निर्माण लखीमपुर में हुआ उसमे था क्या की वह इतना चर्चित एव विवादित हुआ.
दलित विमर्श के जरिये चर्चा में आए दलित विचारक चन्द्रभान प्रसाद ने इस तथाकथित मंदिर का निर्माण करवाया है.आश्चर्य होता है की जब बहुसंख्यक दलित विचारक मंदिरों को अन्धविश्वास का प्रतीक मानते है तो एक चर्चित दलित बुद्धिजीवी मंदिर क्यों बनवा रहा है? एक दलित कवि ने लिखा है -
                                                     
                                                        एसा क्यों होता है
                                                        कि
                                                        किसी धर्मस्थल से गुजरते हुए
                                                        अक्सर मेरा सर झुक जाता है
                                                       श्रद्धा से,नहीं
                                                       शर्म से .

चन्द्रभान प्रसाद तर्क दे सकते है कि मैंने किसी देवी-देवता का मंदिर नहीं बनवाया बल्कि अंग्रेजी माता का मंदिर बनवाया है.वे ये भी कह सकते है कि यह किसी काल्पनिक देवी-देवता कि पूजा हेतु बना मंदिर नहीं है,बल्कि आज कि यथार्थ देवी अंग्रेजी माता का मंदिर है.अच्छा तो यह होता कि प्रसाद जी अंग्रेजी माता के मंदिर के स्थान पर कोई येसी शैक्षिक संस्था बनाते जिसमे दलितों को विशेष रूप से अंग्रेजी का ज्ञान करवाया जाता ताकि अंतर्राष्ट्रीय भाषा को जॉब-कयुनिकेशन के रूप में सीखने में आसानी होती.डॉ. तुलसी राम अपने एक हालिया बयान में कहते है कि "मंदिर कि संस्कृति बड़ी डेंजरस होती है,अंधविश्वास फैलाती है.आप अंग्रेजी देवी की स्तुति करेगे तो जाहिर है की यह देवी-देवतावों पर भी लागू होगी.आप एक मंदिर में जा रहे है तो दुसरे मंदिर में भी उसका reflection  होगा.मंदिर का निर्माण रैशंलिज्म के खिलाफ है, यह तर्क पर आधारित समाज की स्थापना को धक्का पहुचाता है"
चर्चा ये भी है की चन्द्रभान प्रसाद अंग्रेजी -माता का मंदिर बनवाने के साथ-साथ प्रति वर्ष २५ अक्टूबर को मैकाले का जन्मदिन भी मनाते है.यह तो और भी खतरनाक बात है-मुहावरे की भाषा में कहे तो यह 'कोढ़ में खाज 'वाली बात हुई. चन्द्रभान प्रसाद जिस मैकाले और अग्रेजिअत के पैरोकार है,आइये पहले उस मैकाले को समझे-१८वी शताब्दी का भारत मूलतः सामंतवादी समाज था,जिसमे मजबूत वर्गों के सामने अनेक कमजोर वर्ग एव जातिया/उपजातिया उपस्थित थी. आरम्भ से ही भारतीय शासको या शिक्षा प्रदान करने वाली जिमेदार वर्ग ने सुधि नहीं ली. १९वी शताब्दी के आरम्भ तक भारत में शिक्षा नाममात्र की थी और जो थी भी वह भी कुछेक प्रभावशाली लोगो के लिए.अग्रेजो के आने के बाद शिक्षा देने की प्राचीन प्रणाली और नवीन प्रणाली के बीच आपस में वैचारिक संघर्ष हुआ और इस संघर्ष में नवीन प्रणाली यानी आधुनिक शिक्षा पद्धति जिसका आधार अग्रेजी थी,की जीत हुयी और इस पद्धति के मुख्य सिद्धांतकार थे-मैकाले. उसी समय लार्ड मैकाले १८३४ में गवर्नर जनरल की कार्यकारणी में विधि सदस्य के रूप में भारत आये थे.तत्कालीन लार्ड विलियम बैंटिक ने उन्हें बंगाल की 'लोक शिक्षा समिति'का मुखिया नियुक्त किया.बैंटिक ने उन्हें '१८१३ के आज्ञापत्र'की शिक्षा सम्वन्धी धारा की व्याख्या करने को कहा. आपको बताता चलू की १८१३ के चार्टर अधिनियम के द्वारा ही भारत में मिशनरियों को धर्म प्रचार और शिक्षण कार्य करने की स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी .मैकाले भारतीय आयुर्वेद ,विज्ञानं .भूगोल इतिहास ,ज्यामिति को बकवास मानते थे, उनका एक कथन सबको मालुम है-यूरोपीय पुस्तकालय की एक आलमारी भारत तथा अरब के सम्पूर्ण साहित्य के बराबर मूल्यवान है."मैकाले को न तो संस्कृत का ज्ञान था और न अरबी का ही परन्तु इसके बावजूद उन्होंने इस प्रकार की घोषणा करने में जरा भी संकोच नहीं किया.अपने प्रस्तावों में मैकाले की योजना थी,एक एसा वर्ग बनाया जाये जो रंग तथा रक्त से भारतीय हो लेकिन प्रवृति,विचार ,नैतिकता और बुद्धि से अग्रेज भक्त हो '?
चन्द्रभान प्रसाद जिस अग्रेजी भाषा और संस्कृति के समर्थक है,उसका इतिहास उन्हें पता नहीं है और यदि पता है भी तो उस इतिहास की अंतर्वस्तु को समझने में वे असफल है. 
'
'                                                                                                                                        क्रमशः


                                                  

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

                                                                  किवाड़ 
                                                
                                                     किवाड़
                                                     बनाए जा सकते है 
                                                     लकडियो से, 
                                                     लोहे से,
                                                     सीसे से, 
                                                    बॉस की खपचियो से 
                                                    और 
                                                    खांसी की आवाज से 
                                                    हां!ठीक सुना है आपने 
                                                    खांसी की आवाज से ..
                                                    उन संडासों के बगल से गुजरिये
                                                    जहा गरीबी के नंगेपन को छुपाने और 
                                                    भरसक आत्मसम्मान को बचाने के लिए
                                                    खांसी की आवाज किवाड़ो में तब्दील हो जाती है.

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

                                              एक कविता और          
                                                           "  मेरे शहर में "

                                                     मेरे शहर के साहित्यविद 
                                                     ज्ञान के गस्ट्रिक रोग से ग्रसित है
                                                     जो गलत-सही जगह पोकने पर मजबूर है.

                                                     मेरे शहर में 
                                                     किताबे कम बदूके ज्यादा दिखती है 
                                                     मेरे शहर में 
                                                     दूध और पानी एक भाव बिकती है.

                                                    मेरे शहर में 
                                                    फसल नेताओ की लहलहाती है 
                                                    और 
                                                    भूख से बिलबिलाते लोग 
                                                    मुंबई,दिल्ली और दुबई निर्वासित है.

                                                    मेरे शहर की 
                                                    सड़के
                                                    मजदूर की फटी बेवाई है 
                                                     जिसके पीर पर 
                                                    कोई मरहम  काम नहीं करती
                                                                       
                                                                                     .
                                                     
                                            *  मेरी कुछ और कविताए*
                                   
                                                    यात्रा के दौरान
                                                    हम दोनों दोस्त बने
                                                    साथ खाए-पिए
                                                    बोले-बतियाये
                                                    लेकिन
                                                    अयोध्या आते ही
                                                    मेरे हाथ में था के-सरिया 
                                                    उसके जिस्म पे जख्म ग हरा .

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

                                        मेरी खुद की एक छोटी सी कविता 
                           
                                           इश्वर का अवतरण
                                           धुँव,प्रहलाद या पांचाली के लिए
                                         
                                            इश्वर का अवतरण  
                                            राजाओ,रानियो या राजकुमारों के लिए

                                            इश्वर का अवतरण
                                            रासरंग,सत्ता  या हिंसा के लिए

                                             इश्वर का अवतरण हुआ कभी
                                              किसानो ,गरीबो या दलितों के लिए ?

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First day changing

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...