अपराधबोध
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हंस के जनवरी 2014 के अंक में राजेंद्र यादव की सुपुत्री का पापा के नाम एक खुला पत्र प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में रचना ने अपने पिता के वसीयत का ज़िक्र करते हुये खेद के साथ व्यक्त किया है कि वसीयत की जानकारी न होने के कारण अनजाने में उनका अंतिम संस्कार धार्मिक कर्मकांड के साथ किया गया जबकि राजेंद्र यादव ने बाकायदे अपनी वसीयत में यह इच्छा प्रकट की थी कि 'मेरे मृत शरीर को किसी अस्पताल में दान कर दिया जाय या फिर बिना किसी रीति -रिवाज़ के विद्युत दाह कर दिया जाये। ' लेकिन बक़ौल रचना , "मुझे इसका कोई अंदाज नहीं था ,दूसरा किसी अपने को अंतिम संस्कार का प्रबन्ध करने का मेरा पहला अनुभव था। सोचने की शक्ति तो जैसे ख़त्म ही हो गयी थी और सोच -समझ की ऐसी शून्यता में मै पण्डितो के कहे अनुसार चलती चली गयी ,जो उन्होंने बोला मै करती चली गयी -एक रोबोट की तरह। सोचा ही नहीं कि आप (राजेंद्र यादव )इन सबके कितने ख़िलाफ़ थे। "
ठीक इसी तरह की भावनाएं अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व दलित कहानीकार ओम प्रकाश वाल्मीकि ने व्यक्त किया। वाल्मीकि साहब ने बड़े दुःखपूर्वक यह सूचना दी कि , जिस रीति -रिवाज़ ,कर्मकांड ,आडम्बर का मै भीषण विरोधी हूँ। उसी कर्मकांड के साथ मेरी पत्नी चंदा मेरी मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार करना चाहती है। इस काम के सहयोग लिए अपनी बहन को भी बुला लिया है। आपको बताता चलु ओमप्रकाश वाल्मीकि पिछले कुछ महीनो से रोग ग्रसित थे और करीब -करीब मृत्यु शैय्या पर पड़े थे। उनके जीवन की अंतिम सांध्य बेला जानकार उनकी पत्नी और साली ने मिलकर ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ उनका अंतिम संस्कार करने की योजना को कार्यरूप दे दिया था।
तो क्या रचना और चंदा को इसका ज़िम्मेवार माना जाय ? क्या राजेंद्र और ओमप्रकाश वाल्मीकि को मृत्यु के पश्चात उनके निहायत करीबी रिश्ते ने जो अपराध किया है उसके लिए उन्हें दोषी माना जाये ? क्यों न इसकी पूरी ज़िम्मेदारी स्वयं राजेंद्र यादव औरओमप्रकाश वाल्मीकि को ही माना जाए।
जनवरी 2014 के उक्त पत्र के पहले रचना यादव ने हंस के दिसंबर 2013 के अंक में स्मृतिशेष 'हे भगवान प्लीज़ मेरे पापा को कुछ मत होने देना 'लिख कर अपने पिता को श्रद्धांजलि दिया था। इस लेख में रचना ने अपने पिता को याद करते हुए ज़िक्र किया है कि ,"जिस उम्र में बच्चों को अपने पिता से स्नेह,संरक्षण,सुरक्षा और सहयोग आदि मिलता ही है ,मै बचपन से उन सबसे वंचित रही। तब पापा से मेरा इतना ही रिश्ता था कि मै जानती थी वे मेरे पिता है ,जो जन्मदिन पर मुझे उपहार देते है ,कभी -कभी हँसी -मज़ाक भी करते है और बस। इसके सिवाय तो कुछ था ही नहीं। पापा की अपनी ही दुनिया थी. ……… उनकी इस निहायत निजी दुनिया में परिवार और परिवार वालो के लिए तो कोई जगह थी ही नहीं।"
रचना ने जो अपराध अपने पिता की मृत्यु के बाद अनजाने में किया,उक्त पंक्तिं को पढ़ने के बाद आपको रचना से नाराज़गी होने के बजाय सहानुभूति होने लगती है क्योंकि राजेंद्र चाहे कितने बड़े रचनाकार विचारक क्यों न हो एक पिता ,एक पति के रूप में असफ़ल ही रहे। उसी असफ़ल पिता का अंतिम संस्कार यदि अनजाने में ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ कर देती हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी रचना के वजाय उनके पिता पर ज्यादा मानी जानी चाहिए।
चूकि ओमप्रकाश वाल्मीकि की पत्नी चंदा इस प्रकार लिख कर अपने पति को श्रद्धांजलि नहीं दिया है इसलिए उनके विचारों को जानना अभी तो कठिन ही है। मै चंदा को समझने के लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' का सहारा लेता हूँ। जूठन में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है , 'बात सन 1980 के आस -पास की है। मै और मेरी बीबी चंदा राजस्थान भ्रमण से वाया दिल्ली चंद्रपुर (महाराष्ट्र ) लौट रहे थे। जयपुर से पिंक सिटी एक्सप्रेस में सीट मिली थी। पास की सीट पर एक संभ्रांत परिवार पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे बैठे थे ,जो जयपुर से नई दिल्ली जा रहे थे। बात -चीत में पता चला कि पति किसी मंत्रालय में अधिकारी थे। सामान्य बात -चीत चल रही थी। सहज और सुखद वातावरण था। राजस्थान की खूबसूरती पर चर्चा चल रही थी। मेरी पत्नी और अधिकारी की पत्नी घुलमिल कर बतिया रही थी। स्त्रियों में परिचय की दीवार जल्दी टूटती है। अचानक बातचीत का विषय बदल गया। अधिकारी की पत्नी ने मेरी पत्नी से पूछा ,"बहन जी आप लोग बंगाली है ?" मेरी पत्नी ने सहजता से उत्तर दिया ,"जी नहीं ,उत्तर प्रदेश के है। मेरे पति आर्डिनेंस फैक्टरी ,चंद्रपुर में पोस्टिड है। "
कौन जात हो" अधिकारी की पत्नी ने दूसरा सवाल दागा। प्रश्न सुनते ही मेरी पत्नी का चेहरा फ़क्क पड़ गया और वो मेरी और देखने लगी।
सारा माहौल बिगड़ गया। जैसे अचानक स्वादिष्ट व्यंजन में मक्खी गिर गयी। जब तक मेरी पत्नी कुछ देती ,मैंने कहा -"भँगी"
भँगी शब्द सुनते ही सन्नाटा छा गया। '
जातिवाद के इतने कठोर दंश को सहने के वावजूद चंदा अपने पति का अंतिम संस्कार उसी ब्राह्मण वादी तरीके से कर रही है वो भी उस व्यक्ति का जो ब्राह्मणवाद का घोर विरोधी रहा है। तो क्या इसके लिए चंदा को ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए ?
राजेंद्र यादव को एक विचारक ,बुद्धिजीवी और काल मरोड़क संपादक के तौर पर याद किया जाना चाहिए। यह वही राजेंद्र है जिन्होंने अन्धविश्वास ,कुरीतियाँ ,पुरुषवादी अहंकार ,धर्म और वर्ण जाति पर कस कर चोट पहुंचाया। अपनी क़लम से उन्होंने समाज के अंतर्विरोधों का जम कर लिखा।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी अपनी कहानियो ,कविताओं के माध्यम से वर्ण व्यस्था और परलोकवादी व्यवस्था के प्रबल विरोध करते रहे है ,उन्ही के साथ ऐसा छल ?
तो फिर क्यों न उन्हें ही स्वम का अपराधी माना जाए ????
राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ मृत्यु के पश्चात जो कुछ हुआ ,बुरा हुआ लेकिन इसके जिम्मेवार तो वे ही है। उन्होंने दुनिया को बदलने का जो सराहनीय प्रयास किया है इसके लिए उन्हें पूरा प्रगतिशील समाज याद रखेगा लेकिन अपने ही परिवार को बदल पाने और उस मानसिकता से दूर न कर पाने की ज़िम्मेदारी तो उनकी ही है। ऐसा क्यों होता है कि महान व्यक्ति दुनिया को बदलने का ज़ज्बा लिए दिन रात एक कर देते है वही अपने घर ,अपने लोगो जिनके साथ वह हर समय रहता है उसी पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता ?इसके लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार क्यों नहीं माना जाए।
काश ऐसा होता तो उनके करीबियों को किसी वसीयत की ज़रूरत नहीं पड़ती, किसी चंदा को अपने पति को न समझने का आऱोप नहीं लगता ,और न विरोधियो को हँसने का मौका मिलता।

