मेरे मित्र साईं बाबा के परम भक्त हैं प्रत्येक वर्ष नासिक की यात्रा पर जाते है और हर गुरुवार को मंदिर जाकर दर्शन करते है। जाहिर है प्रसाद भी चढ़ाते है और उस प्रसाद को अपने परिवार अपने इष्ट मित्र को भी देते हैं। उनका मेरा परिचय पुराना है वे मेरी नास्तिकता से पूरी तरह परिचित है बावजूद वे हमेशा मुझको अपने रंग में रंगना चाहते है। इस ख़्याल के बावजूद भी कि मेरा रंग सूर्ख लाल है जिसपर और कोई रंग कम ही चढ़ता है।
एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी। साईं बाबा की निमलित आँखे और ध्यानमग्नअवस्था से आस्था और शांति टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी नौकरी, शादी में आयी हुई अड़चनों को दूर में करने में बाबा की आशीर्वाद को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ? तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता " अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ। चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया। चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है. वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो बिखरी पड़ी है। मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । " उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह हो गया था । उनकी पत्नी चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!
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एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी। साईं बाबा की निमलित आँखे और ध्यानमग्नअवस्था से आस्था और शांति टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी नौकरी, शादी में आयी हुई अड़चनों को दूर में करने में बाबा की आशीर्वाद को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ? तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता " अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ। चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया। चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है. वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो बिखरी पड़ी है। मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । " उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह हो गया था । उनकी पत्नी चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!
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