तालिबान की तरह ईरान के खोमेनी ने भी किया था महिलाओं की आजादी का वादा, लेकिन हुआ उल्टा!
मोरक्को की एक फेमिनिस्ट लेखिका हुईं. फातिमा मर्नीसी. उन्होंने एक बेहद ही प्रसिद्ध किताब लिखी. ‘द वेल: मेल फीमेल डायनमिक्स इन मॉडर्न मुस्लिम सोसाइटी’ शीर्षक से. किताब में उन्होंने अपनी चाची का जिक्र किया है. उनकी चाची ईरान में रहती थीं. मर्नीसी ने लिखा,
“मेरी चाची के भाइयों ने उन्हें उनके हिस्से की जमीन देने से मना कर दिया. शादी के बाद उनके पति यानी मेरे चाचा को उनकी जमीन लेने का अधिकार मिल गया. जब मेरे चाचा को जमीन मिल गई, तो उन्होंने चाची को तलाक दे दिया. मेरी चाची कहती हैं कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमेनी और उनके पूर्व पति एक जैसे हैं. पहले तो दोनों ने पहले बहुत प्यार दिखाया, वादे किए. लेकिन फिर हमारे अधिकार हड़प लिए. जब हम औरतों ने आवाज उठाई और अपने अधिकार मांगे तो हमें चुप रहने और बुर्का पहनने को कह दिया.”
यह कहानी काफी पहले की है. अयातुल्ला खोमेनी जब 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर बने ही थे, उसी के आसपास की. आज हम यह कहानी आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि तालिबान ने महिलाओं को लेकर कुछ वैसे ही वादे किए हैं, जैसे कि खोमेनी ने सुप्रीम लीडर बनने से पहले किए थे. कई लोग कह रहे हैं कि तालिबान बदल गया है और अब वह महिलाओं के ऊपर पहले की तरह अत्याचार नहीं करेगा. खुद तालिबान लगातार इस तरह की बातें कह रहा है. हाल की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबान के प्रवक्ता ने कहा था कि अफगानिस्तान की महिलाएं हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगी. उनकी आजादी पर पहरा नहीं बिठाया जाएगा. यही नहीं, महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होगा. हालांकि, प्रवक्ता ने यह भी कहा कि महिलाओं के संबंध में सारे फैसले शरिया कानून के दायरे में किए जाएंगे.
लेकिन जो खबरें अफगानिस्तान से आ रही हैं, वो उसके दावों की धज्जिया उड़ा रही हैं. अफगानिस्तान के सरकारी मीडिया चैनलों में काम करने वाली महिलाएं खुद आगे आकर बता रही हैं कि तालिबान के नियंत्रण के बाद उनकी नौकरी छीन ली गई है. दूसरे सेक्टर्स में काम करने वाली महिलाओं ने भी इसी तरह के दावे किए हैं. इस तरह की भी रिपोर्ट्स हैं कि महिलाओं को बिना किसी पुरुष और बुर्के के बिना बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है.
ईरान में क्या हुआ था?
साल 1953 में ईरान में एक तख्तापलट हुआ. अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से वहां के शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्देह को सत्ता से बेदखल कर दिया. मोसाद्देह ईरान के तेल भंडार को ब्रिटिश और अमेरिकी तेल कंपनियों के हाथों लुटाने के हिमायती नहीं थे. इसलिए उनकी चुनी हुई सरकार गिराने की साजिश रची गई.
मोहम्मद रजा पहलवी के आने के बाद ईरान में विरोध प्रदर्शन हुए. जिनको पहलवी ने बहुत ही क्रूरता से दबाया. थोड़े समय बाद परिस्थितियां थोड़ी सामान्य हुईं. लेकिन, राजनीतिक तौर पर पहलवी का विरोध जारी रहा. पहलवी अपने राजनीतिक विरोधियों का भी दमन करता रहा. जब ये बातें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठीं, तो पहलवी के ऊपर मानवाधिकारों का सम्मान करने का दबाव पड़ा. जिसके बाद पहलवी ने ईरान में आधुनिकीकरण की योजना बनाई. इसे ‘व्हाइट रिवोल्यूशन’ प्रोजेक्ट का नाम दिया गया. इस प्रोजेक्ट के तहत ईरानी समाज को पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के तहत विकसित करने का उद्देश्य रखा गया. महिलाओं को आजादी दी गई. उन्हें वोट देने का अधिकार मिला.
कहा कुछ, किया कुछ!
ईरान को पश्चिम की तरह विकसित करने की पहल का अयातुल्ला खोमेनी ने विरोध किया. इसे इस्लाम विरोधी और ईरानी समाज को भ्रष्ट करने वाला बताया. लेकिन खोमेनी ने भी महिलाओं की बराबरी और अधिकार के बात की. कहा कि औरतों को महज़ ‘सेक्स टूल’ बनाकर नहीं रखा जाएगा. खोमेनी की लोकप्रियता बढ़ती गई. पहलवी ने खोमेनी को देश से भी निकाल लिया. जिससे खोमेनी की लोकप्रियता में और बढ़ोतरी हुई. खोमेनी के निकाले जाने के बाद देश में पहलवी का विरोध बढ़ता गया और अंत में उन्हें सत्ता से हटना पड़ा.
खोमेनी को सुप्रीम लीडर बनाया गया. पर सत्ता हासिल करने के दो महीने के अंदर ही खोमेनी ने औरतों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया. ईरान की औरतों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन उनके विरोध प्रदर्शनों को कुचल दिया गया. कई महिलाओं को जेल में डाल दिया गया. कई की सार्वजनिक तौर पर पत्थर मार-मारकर हत्या कर दी गई. पॉलिटिकल साइंटिस्ट और जेंडर स्टडीज स्कॉलर फातिमा सदेगी अपनी किताब ‘विमेन एंड द इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान’ में लिखती हैं कि अयातुल्ला खोमेनी ने ईरान की महिलाओं को आजादी और समानता देने का वादा किया था, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.
अपनी किताब में फातिमा सदेगी लिखती हैं कि पहलवी के शासनकाल में फैमिली प्रोटेक्शन नाम का एक कानून बना था. जिसे ईरान के नारीवादियों ने खूब सराहा था. खोमेनी ने सत्ता हासिल करने के कुछ महीनों के अंदर ही इस कानून को समाप्त कर दिया. इसी दौरान एक नियम और बना दिया गया कि स्कूलों में लड़के और लड़कियों को अलग-अलग रखा जाएगा. दो साल बाद औरतों के लिए पर्दा करना अनिवार्य हो गया. इसके खिलाफ 8 मार्च, 1981 को महिलाओं ने तेहरान में भारी विरोध प्रदर्शन किया. लेकिन इसका खोमेनी पर कोई असर नहीं पड़ा. एक के बाद एक महिला विरोधी कदम उठाए जाते रहे.
सत्ता मिलने के बाद अयातुल्ला खोमेनी ने कहा कि शाह पहलवी ने वोट का अधिकार देकर महिलाओं और इस्लाम को भ्रष्ट कर दिया है. खोमेनी ने यह अधिकार महिलाओं से छीन लिया. खोमेनी ने अपनी एक किताब लिखी. जिसमें लिखा कि स्त्रियों और पुरुषों को जल्द से जल्द शादी कर लेनी चाहिए. यही नहीं, पुरुषों को एक से अधिक पत्नियां रखने का अधिकार होना चाहिए. पत्नी को तलाक देने का अधिकार भी पूरी तरह से पति के पास ही होना चाहिए. साथ ही साथ न्याय व्यवस्था में औरतों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए.
तंग विचारों को पहनाया कानूनी जामा
खोमेनी ने इन्हीं तंग नजर विचारों को बाद में कानूनी तौर पर मान्यता दे दी. राजनीतिक रूप से भी महिलाओं की हिस्सेदारी घट गई. ईरान की पहली इस्लामिक संसद में केवल 6 महिला सांसद थीं. सिर से लेकर पैरों तक बुर्के में लिपटी हुईं. कानून बनाए गए कि ‘इस्लाम’ के नजरिए के हिसाब से महिलाएं अपने पिता और पति की अनुमति के बिना कहीं की भी यात्रा नहीं कर पाएंगी. कहा गया कि यह पति का अधिकार है कि वो जब चाहे बच्चे पैदा करे. महिलाओं को केवल घर की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए और बच्चों को पालना-पोषना चाहिए. जॉब के दौरान महिलाओं की नाइट शिफ्ट को पुरुष के अधिकार के खिलाफ माना गया क्योंकि खोमेनी की नजर में एक पत्नी को अपने पति की इच्छा के मुताबिक उसके सामने मौजूद होना चाहिए. हालांकि, लगातार हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद ईरान की महिलाओं के पास अब छोटी-मोटी नौकरियां करने का अधिकार है.
इराक के साथ चले आठ साल लंबे युद्ध में कई ईरानी महिलाओं ने अपने पतियों को खो दिया. ऐसे में उन्हें पहले से ही शादीशुदा पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया गया. महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ते जा रहे तंग नजरिए के चलते ऑनर किलिंग की घटनाएं भी तेजी से बढ़ीं. छोटी-छोटी बच्चियों के बलात्कार में भी इजाफा हुआ.
ईरान में जज के तौर पर काम कर चुकीं शिरीन इबादी ने पिछले साल एक ओपनियन पीस लिखा था. इस लेख में उन्होंने कहा कि ईरान की इस्लामिक क्रांति ने महिलाओं को बहुत बड़ा धोखा दिया है. उन्होंने लिखा कि ईरान में महिलाएं अपनी मर्जी से कपड़े पहनना चाहती हैं. उन्हें हिजाब से दिक्कत नहीं है. उन्हें दिक्कत इस बात से है कि इसे पहनने के लिए उन्हें मजबूर किया जाता है. कई महिलाएं केवल इसलिए जेल में डाल दी गईं क्योंकि सड़क पर चलते हुए उनका हिजाब थोड़ा सा सरक गया.
इबादी आगे लिखती हैं कि अब पुरुषों को चार-चार पत्नियां रखने की छूट है और महिलाओं को उनके बच्चे की गार्डियनशिप तक लेने का अधिकार नहीं है. एक महिला काम करने जा सकती है लेकिन अपने पिता या पति की मंजूरी के बिना यात्रा नहीं कर सकती. ईरान में इस समय दो महिला एंबेसडर हैं. उन्हें अपने कामकाज के लिए यात्रा करनी पड़ती है. लेकिन इस यात्रा के लिए दोनों अपने पतियों से पहले मंजूरी लेती हैं. ईरान के इस्लामिक संविधान के मुताबिक, कोई महिला देश की मुखिया नहीं बन सकती. इस्लामिक क्रांति के बाद अब तक केवल एक महिला मंत्री पद पर नियुक्त हुई है.
इबादी लिखती हैं कि ईरान की शासन व्यवस्था को मूल तौर पर महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी रोकने के लिए ही बनाया गया है. जो उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं, उनको गार्डियन ऑफ काउंसिल से अनुमति लेनी होती है. इस काउंसिल में 12 सदस्य होते हैं. जिनमें से 6 इस्लामिक कानून के विशेषज्ञ होते हैं. इन 6 सदस्यों की नियुक्ति सुप्रीम लीडर की तरफ से की जाती है. बाकी के 6 सदस्य न्यायव्यस्था से जुड़े होते हैं. इनकी नियुक्ति भी सुप्रीम लीडर ही करता है. इस तरह से ईरान में चुनाव महज एक मजाक है.
हालांकि, ईरान की महिलाएं लगातार संघर्ष कर रही हैं. सरकार के लिए वे उसकी सबसे बड़ी दुश्मन हैं. इसलिए ईरान के जेल महिलाओं के भरे हुए हैं. उम्मीद है कि एक ना एक दिन वे अपने उद्देश्य में कामयाब हो जाएंगी. आखिर में मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का एक शेर-
बे-पर्दा कल जो आईं नज़र चंद बीबियां
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो मैं ने आप का पर्दा वो क्या हुआ
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया


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