सोमवार, 11 दिसंबर 2017
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
रविवार, 5 नवंबर 2017
सोमवार, 15 जून 2015
मेरे मित्र साईं बाबा के परम भक्त हैं प्रत्येक वर्ष नासिक की यात्रा पर जाते है और हर गुरुवार को मंदिर जाकर दर्शन करते है। जाहिर है प्रसाद भी चढ़ाते है और उस प्रसाद को अपने परिवार अपने इष्ट मित्र को भी देते हैं। उनका मेरा परिचय पुराना है वे मेरी नास्तिकता से पूरी तरह परिचित है बावजूद वे हमेशा मुझको अपने रंग में रंगना चाहते है। इस ख़्याल के बावजूद भी कि मेरा रंग सूर्ख लाल है जिसपर और कोई रंग कम ही चढ़ता है।
एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी। साईं बाबा की निमलित आँखे और ध्यानमग्नअवस्था से आस्था और शांति टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी नौकरी, शादी में आयी हुई अड़चनों को दूर में करने में बाबा की आशीर्वाद को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ? तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता " अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ। चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया। चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है. वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो बिखरी पड़ी है। मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । " उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह हो गया था । उनकी पत्नी चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!
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एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी। साईं बाबा की निमलित आँखे और ध्यानमग्नअवस्था से आस्था और शांति टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी नौकरी, शादी में आयी हुई अड़चनों को दूर में करने में बाबा की आशीर्वाद को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ? तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता " अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ। चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया। चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है. वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो बिखरी पड़ी है। मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । " उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह हो गया था । उनकी पत्नी चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!
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रविवार, 18 जनवरी 2015
प्रतिगामी राह ---
कवि वेणुगोपाल की एक कविता का अंश है -
"कि हिंदी कवि तो
डूबता- उतराता तो अपनी कविता में है
लेकिन
लाश अक्सर उसकी दिल्ली में मिलती है। "
वेणुगोपाल ने इस कविता के माध्यम से सत्ता और साहित्यकार के आपसी सम्बन्ध और परिणाम को रेखाँकित करने की कोशिश चुटीले अंदाज से किया है लेकिन लोकप्रिय तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपनी मौत की घोषणा कर निःसंदेह हम-सब को हैरान-परेशान कर दिया है। पेरुमल ने अपनी मौत की घोषणा अपने फेसबुक वॉल पर बेहद निराशा के साथ किया है। हिंदुत्ववादी -जातिवादी संगठनो के कारण वे बेहद परेशान और निराश थे इसलिए अपने विरोधियोँ से आजिज़ आकर मरने की खबर स्वयं अपने फेसबुक वॉल पर करते है -"लेखक पेरुमल मुरुगल मर चुका है। वह ईश्वर नहीं है ,इसलिए वह फिर अवतरित नहीं होने वाला। इसके बाद एक अध्यापक पी मुरुगन जीवित रहेगा। " इस सुसाइड नोट में मुरुगन ने उन सभी लोगों को धन्यबाद देते हुए लिखा है कि जिन्होंने उनका साथ दिया और एक लेखक की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए साथ खड़े रहे उन सबका बहुत-बहुत धन्यबाद। अपनी मृत्यु की घोषणा के साथ लेखक ने अपने सभी उपन्यास,कथा-कहानी,कविताएं वापस लेने की बात कही है। अपने प्रकाशकों से कहा है कि वे उनकी किताबों को न बेचें। मुरुगन अपने प्रकाशकों को धीरज और सांत्वना देते हुए लिखते है कि यदि प्रकाशकों को नुकसान होगा तो वे उनकी भरपाई करेंगे। साथ ही साथ अपने पाठकों के लिए भी लिखा है कि वे उनकी पुस्तकों को जला दें। अपने 'सुसाइड नोट' के अंतिम पंक्ति में जातीय ,धार्मिक और राजनीतिक समूहों से अपील करते हुए पेरुमल लिखते है , 'वे अपना विरोध समाप्त कर लेखक को अकेले छोड़ दे क्योकि उसने अपनी सभी किताबों को वापस ले लिया है। '
पेरुमल मुरुगन अपने उपन्यास 'माथोरुभगन' को लेकर काफ़ी विरोध का सामना कर रहे थे। उनके विरोधियोँ में प्रमुख रूप से कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग है जो उपन्यास के विषयवस्तु ,भाषा को लेकर उग्र थे। इस समुदाय का आरोप था कि माथोरुभगन में उनकी जाति की महिलाओं और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। इसलिए कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग लेखक से नाराज़ चल रहे थे। यह नाराज़गी तब और भी उग्र रूप धारण कर लिया जब इसमे हिंदुत्व वादी संगठनों के नेताओं ने हिन्दू देवी -देवताओ के अपमान का तत्व भी इस विरोध आंदोलन में मिश्रित कर दिया। तब से लेखक बहुत हताश और परेशान था।
प्रश्न यह नहीं है कि लेखक ने किसी समुदाय ,व्यक्ति या धर्म की आस्था पर चोट पहुँचाया है बल्कि सवाल यह है कि हम किस दौर में रह रहे है कि ज़रा सी तर्क की गर्मी लगी नहीं कि आस्था नामक चीज़ पिघलने लगती है। हम उस दौर में रह रहे है जब वोल्तेअर कह गया है कि , 'मै तुम्हारे विचारों से सहमत नहीं हूँ लेकिन तुम्हारे विचारों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ। 'तो क्या हम उलटी दिशा में विकास कर रहे है ,जहाँ अंततःहम सभी आदि दशा में पहुँच जाएंगे जहाँ पर आधुनिक यंत्र-संयंत्र और आधुनिक सुविधाएं भी रहेंगी और मध्यकालीन प्रतिगामी विचारों के वाहक भी होंगे ?अभी हाल में फ़्रांस में शार्ली एब्दो पर जानलेवा हमला हुआ जिसमे क़रीब दर्जन भर पत्रकारो और कार्टूनिस्टों की हत्या कर दी गयी, मात्र आस्था को लेकर। शार्ली एब्दो की घटना ज्वलंत उदाहरण है कि हमने विरोध को लोकतांत्रिक तरीके से लड़ना सीखा ही नहीं यदि सीखा होता तो हमें एके 47 और एके 56 की ज़रूरत नहीं पड़ती और किसी लेख़क को अपनी 'मृत्यु' की घोषणा नहीं करनी पड़ती।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में -- 'तुम्हारी मृत्यु में
प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु
कवि कहीं अकेला मरता है। '
पेरुमल मुरुगन अपने उपन्यास 'माथोरुभगन' को लेकर काफ़ी विरोध का सामना कर रहे थे। उनके विरोधियोँ में प्रमुख रूप से कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग है जो उपन्यास के विषयवस्तु ,भाषा को लेकर उग्र थे। इस समुदाय का आरोप था कि माथोरुभगन में उनकी जाति की महिलाओं और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। इसलिए कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग लेखक से नाराज़ चल रहे थे। यह नाराज़गी तब और भी उग्र रूप धारण कर लिया जब इसमे हिंदुत्व वादी संगठनों के नेताओं ने हिन्दू देवी -देवताओ के अपमान का तत्व भी इस विरोध आंदोलन में मिश्रित कर दिया। तब से लेखक बहुत हताश और परेशान था।
प्रश्न यह नहीं है कि लेखक ने किसी समुदाय ,व्यक्ति या धर्म की आस्था पर चोट पहुँचाया है बल्कि सवाल यह है कि हम किस दौर में रह रहे है कि ज़रा सी तर्क की गर्मी लगी नहीं कि आस्था नामक चीज़ पिघलने लगती है। हम उस दौर में रह रहे है जब वोल्तेअर कह गया है कि , 'मै तुम्हारे विचारों से सहमत नहीं हूँ लेकिन तुम्हारे विचारों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ। 'तो क्या हम उलटी दिशा में विकास कर रहे है ,जहाँ अंततःहम सभी आदि दशा में पहुँच जाएंगे जहाँ पर आधुनिक यंत्र-संयंत्र और आधुनिक सुविधाएं भी रहेंगी और मध्यकालीन प्रतिगामी विचारों के वाहक भी होंगे ?अभी हाल में फ़्रांस में शार्ली एब्दो पर जानलेवा हमला हुआ जिसमे क़रीब दर्जन भर पत्रकारो और कार्टूनिस्टों की हत्या कर दी गयी, मात्र आस्था को लेकर। शार्ली एब्दो की घटना ज्वलंत उदाहरण है कि हमने विरोध को लोकतांत्रिक तरीके से लड़ना सीखा ही नहीं यदि सीखा होता तो हमें एके 47 और एके 56 की ज़रूरत नहीं पड़ती और किसी लेख़क को अपनी 'मृत्यु' की घोषणा नहीं करनी पड़ती।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में -- 'तुम्हारी मृत्यु में
प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु
कवि कहीं अकेला मरता है। '
रविवार, 20 अप्रैल 2014
अपराधबोध
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हंस के जनवरी 2014 के अंक में राजेंद्र यादव की सुपुत्री का पापा के नाम एक खुला पत्र प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में रचना ने अपने पिता के वसीयत का ज़िक्र करते हुये खेद के साथ व्यक्त किया है कि वसीयत की जानकारी न होने के कारण अनजाने में उनका अंतिम संस्कार धार्मिक कर्मकांड के साथ किया गया जबकि राजेंद्र यादव ने बाकायदे अपनी वसीयत में यह इच्छा प्रकट की थी कि 'मेरे मृत शरीर को किसी अस्पताल में दान कर दिया जाय या फिर बिना किसी रीति -रिवाज़ के विद्युत दाह कर दिया जाये। ' लेकिन बक़ौल रचना , "मुझे इसका कोई अंदाज नहीं था ,दूसरा किसी अपने को अंतिम संस्कार का प्रबन्ध करने का मेरा पहला अनुभव था। सोचने की शक्ति तो जैसे ख़त्म ही हो गयी थी और सोच -समझ की ऐसी शून्यता में मै पण्डितो के कहे अनुसार चलती चली गयी ,जो उन्होंने बोला मै करती चली गयी -एक रोबोट की तरह। सोचा ही नहीं कि आप (राजेंद्र यादव )इन सबके कितने ख़िलाफ़ थे। "
ठीक इसी तरह की भावनाएं अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व दलित कहानीकार ओम प्रकाश वाल्मीकि ने व्यक्त किया। वाल्मीकि साहब ने बड़े दुःखपूर्वक यह सूचना दी कि , जिस रीति -रिवाज़ ,कर्मकांड ,आडम्बर का मै भीषण विरोधी हूँ। उसी कर्मकांड के साथ मेरी पत्नी चंदा मेरी मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार करना चाहती है। इस काम के सहयोग लिए अपनी बहन को भी बुला लिया है। आपको बताता चलु ओमप्रकाश वाल्मीकि पिछले कुछ महीनो से रोग ग्रसित थे और करीब -करीब मृत्यु शैय्या पर पड़े थे। उनके जीवन की अंतिम सांध्य बेला जानकार उनकी पत्नी और साली ने मिलकर ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ उनका अंतिम संस्कार करने की योजना को कार्यरूप दे दिया था।
तो क्या रचना और चंदा को इसका ज़िम्मेवार माना जाय ? क्या राजेंद्र और ओमप्रकाश वाल्मीकि को मृत्यु के पश्चात उनके निहायत करीबी रिश्ते ने जो अपराध किया है उसके लिए उन्हें दोषी माना जाये ? क्यों न इसकी पूरी ज़िम्मेदारी स्वयं राजेंद्र यादव औरओमप्रकाश वाल्मीकि को ही माना जाए।
जनवरी 2014 के उक्त पत्र के पहले रचना यादव ने हंस के दिसंबर 2013 के अंक में स्मृतिशेष 'हे भगवान प्लीज़ मेरे पापा को कुछ मत होने देना 'लिख कर अपने पिता को श्रद्धांजलि दिया था। इस लेख में रचना ने अपने पिता को याद करते हुए ज़िक्र किया है कि ,"जिस उम्र में बच्चों को अपने पिता से स्नेह,संरक्षण,सुरक्षा और सहयोग आदि मिलता ही है ,मै बचपन से उन सबसे वंचित रही। तब पापा से मेरा इतना ही रिश्ता था कि मै जानती थी वे मेरे पिता है ,जो जन्मदिन पर मुझे उपहार देते है ,कभी -कभी हँसी -मज़ाक भी करते है और बस। इसके सिवाय तो कुछ था ही नहीं। पापा की अपनी ही दुनिया थी. ……… उनकी इस निहायत निजी दुनिया में परिवार और परिवार वालो के लिए तो कोई जगह थी ही नहीं।"
रचना ने जो अपराध अपने पिता की मृत्यु के बाद अनजाने में किया,उक्त पंक्तिं को पढ़ने के बाद आपको रचना से नाराज़गी होने के बजाय सहानुभूति होने लगती है क्योंकि राजेंद्र चाहे कितने बड़े रचनाकार विचारक क्यों न हो एक पिता ,एक पति के रूप में असफ़ल ही रहे। उसी असफ़ल पिता का अंतिम संस्कार यदि अनजाने में ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ कर देती हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी रचना के वजाय उनके पिता पर ज्यादा मानी जानी चाहिए।
चूकि ओमप्रकाश वाल्मीकि की पत्नी चंदा इस प्रकार लिख कर अपने पति को श्रद्धांजलि नहीं दिया है इसलिए उनके विचारों को जानना अभी तो कठिन ही है। मै चंदा को समझने के लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' का सहारा लेता हूँ। जूठन में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है , 'बात सन 1980 के आस -पास की है। मै और मेरी बीबी चंदा राजस्थान भ्रमण से वाया दिल्ली चंद्रपुर (महाराष्ट्र ) लौट रहे थे। जयपुर से पिंक सिटी एक्सप्रेस में सीट मिली थी। पास की सीट पर एक संभ्रांत परिवार पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे बैठे थे ,जो जयपुर से नई दिल्ली जा रहे थे। बात -चीत में पता चला कि पति किसी मंत्रालय में अधिकारी थे। सामान्य बात -चीत चल रही थी। सहज और सुखद वातावरण था। राजस्थान की खूबसूरती पर चर्चा चल रही थी। मेरी पत्नी और अधिकारी की पत्नी घुलमिल कर बतिया रही थी। स्त्रियों में परिचय की दीवार जल्दी टूटती है। अचानक बातचीत का विषय बदल गया। अधिकारी की पत्नी ने मेरी पत्नी से पूछा ,"बहन जी आप लोग बंगाली है ?" मेरी पत्नी ने सहजता से उत्तर दिया ,"जी नहीं ,उत्तर प्रदेश के है। मेरे पति आर्डिनेंस फैक्टरी ,चंद्रपुर में पोस्टिड है। "
कौन जात हो" अधिकारी की पत्नी ने दूसरा सवाल दागा। प्रश्न सुनते ही मेरी पत्नी का चेहरा फ़क्क पड़ गया और वो मेरी और देखने लगी।
सारा माहौल बिगड़ गया। जैसे अचानक स्वादिष्ट व्यंजन में मक्खी गिर गयी। जब तक मेरी पत्नी कुछ देती ,मैंने कहा -"भँगी"
भँगी शब्द सुनते ही सन्नाटा छा गया। '
जातिवाद के इतने कठोर दंश को सहने के वावजूद चंदा अपने पति का अंतिम संस्कार उसी ब्राह्मण वादी तरीके से कर रही है वो भी उस व्यक्ति का जो ब्राह्मणवाद का घोर विरोधी रहा है। तो क्या इसके लिए चंदा को ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए ?
राजेंद्र यादव को एक विचारक ,बुद्धिजीवी और काल मरोड़क संपादक के तौर पर याद किया जाना चाहिए। यह वही राजेंद्र है जिन्होंने अन्धविश्वास ,कुरीतियाँ ,पुरुषवादी अहंकार ,धर्म और वर्ण जाति पर कस कर चोट पहुंचाया। अपनी क़लम से उन्होंने समाज के अंतर्विरोधों का जम कर लिखा।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी अपनी कहानियो ,कविताओं के माध्यम से वर्ण व्यस्था और परलोकवादी व्यवस्था के प्रबल विरोध करते रहे है ,उन्ही के साथ ऐसा छल ?
तो फिर क्यों न उन्हें ही स्वम का अपराधी माना जाए ????
राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ मृत्यु के पश्चात जो कुछ हुआ ,बुरा हुआ लेकिन इसके जिम्मेवार तो वे ही है। उन्होंने दुनिया को बदलने का जो सराहनीय प्रयास किया है इसके लिए उन्हें पूरा प्रगतिशील समाज याद रखेगा लेकिन अपने ही परिवार को बदल पाने और उस मानसिकता से दूर न कर पाने की ज़िम्मेदारी तो उनकी ही है। ऐसा क्यों होता है कि महान व्यक्ति दुनिया को बदलने का ज़ज्बा लिए दिन रात एक कर देते है वही अपने घर ,अपने लोगो जिनके साथ वह हर समय रहता है उसी पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता ?इसके लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार क्यों नहीं माना जाए।
काश ऐसा होता तो उनके करीबियों को किसी वसीयत की ज़रूरत नहीं पड़ती, किसी चंदा को अपने पति को न समझने का आऱोप नहीं लगता ,और न विरोधियो को हँसने का मौका मिलता।
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
अकबर के राज्यकाल के पूर्व हिन्दू -मुस्लिम स्थापत्य कला का संभवतः सबसे सुंदर नमूना शेरशाह का मक़बरा है। इसे स्वयं शेरशाह ने सहसराम बिहार में झील के बीच कुर्सी देकर बनवाया था। इसकी डिजाइन मुस्लिम है,लेकिन इसके भीतरी भाग में हिन्दू ब्रैकेट और पटाई के तीरो के ऊपरी भागो (horzontal architraves) का सुन्दर प्रयोग किया गया है। किसी आलोचक ने ठीक कहा है ,"तुगलक काल की इमारतो के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के बीच जैसे संपर्क स्थापित करता है। "
इतनी खूबसूरत कला का हस्र देखकर दिल टूट गया। चारो तरफ़ गंदगी का जैसे अंबार लगा है। झील में इतनी काई जमी है कि पानी काला -मटमैला दिखता है। यद्यपि यह भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन है जिस पर सम्भवतः लाखो रूपये सलाना इसकी देखरेख के लिए आता होगा।
दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हम अपनी विरासत को बचाने में असमर्थ है ………………।
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