रविवार, 18 जनवरी 2015

प्रतिगामी राह ---


 




 कवि  वेणुगोपाल की एक कविता का अंश है -
                        "कि हिंदी कवि तो 
                          डूबता- उतराता तो अपनी कविता में है 
                          लेकिन 
                          लाश अक्सर उसकी दिल्ली में मिलती है। "
वेणुगोपाल ने इस कविता के माध्यम से सत्ता और साहित्यकार के आपसी सम्बन्ध और परिणाम को रेखाँकित करने की कोशिश  चुटीले अंदाज से किया है लेकिन लोकप्रिय तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपनी मौत  की घोषणा कर निःसंदेह हम-सब को हैरान-परेशान कर दिया है। पेरुमल ने अपनी मौत की घोषणा अपने फेसबुक वॉल पर बेहद निराशा के साथ किया है। हिंदुत्ववादी -जातिवादी संगठनो के कारण वे बेहद परेशान और निराश थे इसलिए अपने विरोधियोँ से आजिज़ आकर मरने की खबर स्वयं अपने फेसबुक वॉल पर  करते है -"लेखक पेरुमल मुरुगल मर चुका है। वह ईश्वर नहीं है ,इसलिए वह फिर अवतरित नहीं होने वाला। इसके बाद एक अध्यापक पी मुरुगन जीवित रहेगा। " इस सुसाइड नोट में मुरुगन ने उन सभी लोगों को धन्यबाद देते हुए लिखा  है कि जिन्होंने उनका साथ दिया और एक लेखक की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए साथ खड़े रहे उन सबका बहुत-बहुत धन्यबाद। अपनी मृत्यु की घोषणा के साथ लेखक ने अपने सभी उपन्यास,कथा-कहानी,कविताएं वापस लेने की बात कही है। अपने प्रकाशकों से कहा है कि वे उनकी किताबों को न बेचें। मुरुगन अपने प्रकाशकों को धीरज और सांत्वना देते हुए लिखते है कि यदि प्रकाशकों को नुकसान होगा तो वे उनकी भरपाई करेंगे। साथ ही साथ अपने पाठकों के लिए भी लिखा है कि वे उनकी पुस्तकों को जला दें। अपने 'सुसाइड नोट' के अंतिम पंक्ति में जातीय ,धार्मिक और राजनीतिक समूहों से अपील करते हुए पेरुमल लिखते है , 'वे अपना विरोध समाप्त कर लेखक को अकेले छोड़ दे क्योकि उसने अपनी सभी किताबों को वापस ले लिया है। '
 पेरुमल मुरुगन अपने   उपन्यास  'माथोरुभगन' को  लेकर काफ़ी विरोध का सामना कर रहे थे। उनके विरोधियोँ में प्रमुख रूप से कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग है जो उपन्यास के विषयवस्तु ,भाषा को लेकर उग्र थे। इस समुदाय का आरोप था कि माथोरुभगन में उनकी जाति की महिलाओं और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। इसलिए कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग लेखक से नाराज़ चल रहे थे। यह नाराज़गी तब और भी उग्र रूप धारण कर लिया जब इसमे हिंदुत्व वादी संगठनों  के नेताओं ने हिन्दू देवी -देवताओ के  अपमान का तत्व भी इस विरोध आंदोलन में मिश्रित कर दिया। तब से लेखक बहुत हताश और परेशान था।
प्रश्न यह नहीं है कि  लेखक ने किसी समुदाय ,व्यक्ति या धर्म की आस्था पर चोट पहुँचाया है बल्कि सवाल यह है कि हम किस दौर में रह रहे है कि ज़रा सी तर्क की गर्मी लगी नहीं कि आस्था नामक चीज़ पिघलने लगती है। हम उस दौर में रह रहे है जब  वोल्तेअर कह गया है कि , 'मै तुम्हारे विचारों से सहमत नहीं हूँ लेकिन तुम्हारे विचारों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ। 'तो क्या हम उलटी दिशा में विकास कर रहे है ,जहाँ अंततःहम सभी आदि दशा में पहुँच जाएंगे जहाँ पर आधुनिक यंत्र-संयंत्र और आधुनिक सुविधाएं भी रहेंगी और मध्यकालीन प्रतिगामी विचारों के वाहक भी होंगे ?अभी हाल में फ़्रांस में शार्ली एब्दो पर जानलेवा हमला हुआ जिसमे क़रीब दर्जन भर पत्रकारो और कार्टूनिस्टों की हत्या कर दी गयी, मात्र आस्था को लेकर। शार्ली एब्दो की घटना ज्वलंत उदाहरण है कि हमने विरोध को लोकतांत्रिक तरीके से लड़ना  सीखा ही नहीं यदि सीखा होता तो हमें एके 47 और एके 56 की ज़रूरत नहीं पड़ती और किसी लेख़क को अपनी 'मृत्यु' की घोषणा नहीं करनी पड़ती।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में -- 'तुम्हारी मृत्यु में
                                                      प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु
                                                      कवि कहीं अकेला मरता है। '



                       

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...