प्रतियोगिता
मेरे बचपने में
प्रतियोगिताए कुछ इस तरह की हुआ करती थी -
हाथ में बेहया का डंडा लेकर
पन्नियों और कपड़ो की गेंद बना कर
दिन भर
बिना रेफ़री के
अजलान शाह मैच खेलते थे .
या ,
बरसाती दिनों के
नलियों और मोरियो में
कागज से बने नाव का
बिना किसी कर्मकाण्ड के
जलावतरण करते थे.
या
कभी-कभी
सड़क किनारे खड़े होकर
हम सब दोस्त
एक निश्चित दूरी पर
बिना शर्म-लिहाज के
सूसू की धार
पहुचाया करते थे
जो नहीं पंहुचा पाते थे
वो कल के लिए तैयारी
करके आते थे
और, अब के बच्चे
प्रतियोगिता के बोझ तले
अपने पैंट में सूसू कर देते है
जो नहीं करते
वो कमरे के एकांत में
फाँसी पर झूल जाते है !!!!!
ramesh kumar
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