सूरजपुर(छत्तीसगढ़ ) के एक गाँव खोपा
पिछले कई वर्षो से मै छत्तीसगढ़ जाता रहा हू।कभी निजी यात्रा पर तो कभी इस इलाके की सभ्यता -संस्कृति को देखने।इस बार निजी यात्रा पर था अपनी भांजी की शादी में पूरे परिवार के साथ।शादी निपटते ही मै निकल अपने शोध यात्रा में ............
इस शोध यात्रा में मै सूरजपुर जो पहले सरगुजा का ही एक भाग था के खोपा गांव जो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है में अपने कैमरा के साथ जा पंहुचा।
1994 में जब मै पहली बार सरगुजा के इस इलाके में पंहुचा था तो मै यहाँ के आदिवासियों को देख कर हतप्रभ था.सच मानिए तब पहली बार मैंने ऐसी गरीबी देखी थी और भीषण दैन्यता के बावजूद उनकी ईमान्दारी को तो आज भी सोच कर श्रद्धा से सर झुक जाता है।येही श्रद्धा मुझे बार-बार अपनी ओर खीच लाती है।1994 में मै 17-18 वर्ष का था और इलाहाबाद विश्वविधालय में B.A.प्रथम वर्ष का छात्र हुआ करता था।तब मै नहीं जानता था की इन आदिवासियो की गरीबी का जिम्मेदार कौन है-खुद वेहै ,उनका ईश्वरहै या हमारे देश-प्रदेश के नीति-नियंता............
पूरे सरगुजा की इंच-इंच भूमि में कोयला है और इस कोयले को निकालते है वहाँ के आदिवासी और इस काले सोने पर अय्यासी करते है उत्तर प्रदेश, बिहार के सामर्थ्यवान लोग।उपनिवेश और उपनिवेशी का रिश्ता आज भी बददश्तूर जारी है।इसी इलाके में दुबारा पंहुचा परिवर्तन देखने अपने कैमरे के साथ, जिसे आप के साथ बाटना चाहता हू -------
आदिवासियों का घर इतना प्रकृति के अनुकूल है की किसी भी मौसम में आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।इनके घर की ख़ूबसूरती आपको आकर्षित अवश्य करेगी।
पिछले कई वर्षो से मै छत्तीसगढ़ जाता रहा हू।कभी निजी यात्रा पर तो कभी इस इलाके की सभ्यता -संस्कृति को देखने।इस बार निजी यात्रा पर था अपनी भांजी की शादी में पूरे परिवार के साथ।शादी निपटते ही मै निकल अपने शोध यात्रा में ............
इस शोध यात्रा में मै सूरजपुर जो पहले सरगुजा का ही एक भाग था के खोपा गांव जो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है में अपने कैमरा के साथ जा पंहुचा।
1994 में जब मै पहली बार सरगुजा के इस इलाके में पंहुचा था तो मै यहाँ के आदिवासियों को देख कर हतप्रभ था.सच मानिए तब पहली बार मैंने ऐसी गरीबी देखी थी और भीषण दैन्यता के बावजूद उनकी ईमान्दारी को तो आज भी सोच कर श्रद्धा से सर झुक जाता है।येही श्रद्धा मुझे बार-बार अपनी ओर खीच लाती है।1994 में मै 17-18 वर्ष का था और इलाहाबाद विश्वविधालय में B.A.प्रथम वर्ष का छात्र हुआ करता था।तब मै नहीं जानता था की इन आदिवासियो की गरीबी का जिम्मेदार कौन है-खुद वेहै ,उनका ईश्वरहै या हमारे देश-प्रदेश के नीति-नियंता............
पूरे सरगुजा की इंच-इंच भूमि में कोयला है और इस कोयले को निकालते है वहाँ के आदिवासी और इस काले सोने पर अय्यासी करते है उत्तर प्रदेश, बिहार के सामर्थ्यवान लोग।उपनिवेश और उपनिवेशी का रिश्ता आज भी बददश्तूर जारी है।इसी इलाके में दुबारा पंहुचा परिवर्तन देखने अपने कैमरे के साथ, जिसे आप के साथ बाटना चाहता हू -------
आदिवासियों का घर इतना प्रकृति के अनुकूल है की किसी भी मौसम में आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।इनके घर की ख़ूबसूरती आपको आकर्षित अवश्य करेगी।


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