गुरुवार, 28 मई 2020

आइए जानते हैं-- गद्दार दूधनाथ तिवारी को ----------------------------------------------------- अभी अभी 1857 के विद्रोह की आग बुझी भी नही थी कि भारत के सुदूर अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के पोर्ट ब्लेयर द्वीप पर आदिवासियों ने अंग्रेजों के सैनिक अड्डे रॉस आइलैंड पर हमला कर दिया. यह विद्रोह अंडमानी ट्राइब्स (aboriginies) ने अपने 5000 साथियों के साथ तीर-धनुष और भालों से अंग्रेजों की कॉलोनी रॉस आइलैंड पर किया था। लेकिन ये वीर अंडमानी ज्यादातर मारे गए, कुछ ग़ुलाम बनाए गए. अंडमानी हारे नही होते यदि वे दूधनाथ तिवारी को अपने कबीले में इज्ज़त-बेटी न दिया होता और अपने कबीले के राज को अपना हमदर्द समझकर बताया नही होता. दूधनाथ तिवारी बिहार का एक ब्राह्मण था उसने 1857 के सिपाही विद्रोह में भाग लिया था। वो नेटिव इन्फेंट्री 14 वें रेजिमेंट का साधारण सिपाही था. विद्रोह के बाद उसके ऊपर राजद्रोह और हत्या का आरोप लगाया गया और 8 अप्रैल 1858 को अंडमान के रॉस आइलैंड पर सजा काटने के लिए भेज दिया गया. लेकिन कुछ दिन बाद ही वो अपने अन्य 90 साथियों के साथ रॉस आइलैंड से भाग गया. वो भागकर जंगल मे गया उसके सभी 90 दोस्त जंगल मे ही भटक गए. उसमें कुछ भूख- प्यास और थक कर मर गए कुछ आदिवासियों द्वारा मारे गए. लेकिन दूधनाथ की तकदीर अच्छी थी. उसको आदिवासियों ने पकड़ लिया और अपने कबीले में ले गए. दूधनाथ तिवारी चालाक और शातिर था . वो आदिवासियों के बीच अच्छे तरीके से रहने लगा वो उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करता. उसकी अच्छाईयों को देखते हुए कबीले के मुखिया हीरा ने अपनी दो पुत्रियों लीपा (20 वर्ष) और जिगाह (16 वर्ष) के साथ उसका विवाह कर दिया.आदिवासियों ने उसे अपना मान लिया और अपने कबीले के सभी राज बता दिए. अंग्रेजो का अंडमान द्वीपसमूह पर आक्रमण करके कब्जा करना वहां के आदिवासियों को अच्छा नही लगा. वे समझते थे कि ये लोग हमारे रीतिरिवाज और उनकी आदिवासियत संस्कृति के लिए खतरा बन सकते हैं. अंदर ही अंदर विद्रोह की आग सुलग रही थी. Aboriginies कबीले में करीब 6000 की संख्या थी जिसमे से 5000 मर्द-औरतों ने रॉस आइलैंड पर आक्रमण करने की योजना बनाई. JP Walker एक अंग्रेज अधिकारी था और 1857 के विद्रोह के समय आगरा में एक अधिकारी के तौर पर नियुक्त था. जिसको विद्रोह के बाद प्रमोशन देकर रॉस आइलैंड अंडमान का सुपरिंटेंडेंट बना दिया गया था . दूधनाथ तिवारी मुखबिर बन गया और उसने अपने ही आश्रयदाताओं के ख़िलाफ गद्दारी की. ज्यादातर अण्डमानी आदिवासी मारें गए कुछ को पकड़कर जेल में डाल दिया गया कुछ को फांसी दे दी गई. इस विद्रोह को बुरी तरह कुचल दिया गया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी सिर उठाने के काबिल न बचा. यदि दूधनाथ तिवारी ने गद्दारी न किया होता तो भारत का सुदूर इलाका स्वन्त्रता की पहली अलख जगाता. आज भी किसी अण्डमानी के सामने दूधनाथ तिवारी का नाम ले लीजिए वो बहुत ही घृणित प्रतिक्रिया देगा.

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