लघु कथा--
मास्टर सुमेरन को आज कोर्ट में हाज़िर होना है . उन्होंने सरकार की सख़्त भाषा मे आलोचना की है. उनके ऊपर राजद्रोह एवं विभागीय प्रोटोकाल और नियमों के विपरीत लिखने का आरोप है.
मास्टर सुमेरन कोर्ट के विटनेस बॉक्स में खड़े है.
न्यायधीश पूछता है--"मास्टर सुमेरन आप पर राजद्रोह और अपने विभागीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा है. आप कुछ कहना चाहेंगे ?
मास्टर सुमेरन कुछ क्षण चुप रहे फिर बोले, " मी लार्ड ! मैं एक नागरिक होने का फर्ज अदा कर रहा हूँ . मैं सरकार का नौकर होने से पहले एक नागरिक हूँ. इसलिए आलोचना करना मेरा अधिकार है. जब मैं वोट देकर किसी को प्रधानमंत्री बना सकता हूँ तो उसकी आलोचना करने का भी मेरा अधिकार है.
और आप बताइए सरकार की आलोचना करना कबसे राजद्रोह हो गया ?"
ये सब मुझे न समझाइए. आप कोर्ट में पूछे गए सवाल का जवाब दीजिए. आपके ऊपर सरकार को बदनाम करने और विद्रोह करने का आरोप है. जज ने तल्खी से कहा.
सुमेरन को जवाब देना ही था. वे बोले, " मी लार्ड ! लाखों मजदूर, बच्चे, बुजुर्ग आदमी-औरत सड़को पर मर रहे हैं. और इस सरकार ने मुँह-कान बन्द कर रखा है.
फिर तैस में आकर कहने लगे. "इन मजदूरों के साथ जो हो रहा उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की है. वो सब अपराधी है जो कुर्सी पर बैठे है. चाहे वह प्रधानमंत्री हो या गांव का प्रधान......"
जज ने कहा-"कुर्सी पर तो मैं भी बैठा हूँ"
सुमेरन जज की आंखों में आंखे डाल कर बोले,-
"आप भी जिम्मेदार है मी लार्ड....."
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