रविवार, 21 जून 2020

"कबीर हैं कि मरते नहीं"
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 लेखक-सुभाष चंद्र कुशवाहा
 अनामिका प्रकाशन
 प्रयागराज

 जिस देश मे बुद्ध-कबीर पैदा हुआ हो, वो भला ग़ुलाम कैसे हो सकता है ? यह सवाल मेरे ज़ेहन में हमेशा पाबस्त रहा । कई क़िताबों को पढा कि जवाब मिले श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विजेंद्र स्नातक से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल तक, लेकिन सवाल सवाल ही रहा, जवाब की परिधि पार नही कर पाया। अभी हाल में प्रकाशित सुभाष चंद्र कुशवाहा की किताब "कबीर हैं कि मरते नहीं" में मेरे सवालों के जवाब परत दर परत मिलते गए कि आख़िर कबीर के रहते यह देश ग़ुलामी की जंजीरों में क्यो जकड़ा रहा ? वे कहते हैं कि, " यह धरती मनुष्यता विरोधियों के चंगुल में रही है...." यह सूत्रवाक्य की मेरे प्रश्नों का जवाब है शायद ।
 कबीर 1812 में ब्रिटेन में प्रकाशित हो चुके थे। भारत मे मुक़म्मल तौर पर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काम किया। इसके पहले तक के आलोचको ने कबीर को कवि मानने से ही इनकार कर दिया था। सोचिए, करीब 116 साल बाद भारत का कोई लेखक एक क़िताब का सम्पादन करता है जबकि उस देश को ग़ुलाम बनाने वाला ब्रिटेन 1812 से ही कबीर पर लिख रहा था और अपने अख़बारों में लगातार प्रकाशित कर रहा था। क़िताब 8 अध्याय में लिखी गयी है।
पहला अध्याय 'बिन अक्षर ज्ञान' में लेखक ने कबीर की विचारधारा और कबीर पर और लेखकों की दृष्टि को रेखांकित किया है। ज्यादातर अध्येताओं ने कबीर को वैष्णव- धारा का विचारक बताया है। लेखक ने इसका जोरदार खंडन किया है। लेखक लिखता है कि, "आलोचना की ऐसी शरारती प्रवृत्तियां, कुलीनतावाद की कोख से पैदा होकर प्रगतिशील तत्त्वों को चालाकी से निगलने का काम करती हैं।" अध्याय 2 और 3 क्रमशः कबीर का जन्म और मृत्यु वर्ष और कबीर कर माँ-बाप और धर्म की पहेली पर लेखक ने शोध-लेख प्रस्तुत किया है। कबीर के जन्म की पहेली को शर्की शासन काल के बिजली खान पठान के द्वारा बनवाए मक़बरा और गुरुनानक की मुलाकात और कुछ लिखित सन्दर्भ देते हुए, लेखक ने उनके जन्मतिथि और मृत्यु तिथि को आम सहमति तक लाने की कोशिश की है। तीसरे अध्याय में कबीर के माता-पिता और उनके धर्म पर 8 पृष्ठ खर्च किये हैं। किवदंती है कि कबीर एक कुंवारी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे जिसको लेखक अपने चुटीले-तर्क से उक्त कथानक को धूल की तरह उड़ा देता है। और ब्रिटिश अख़बार शेफील्ड डेली टेलीग्राफ के हवाले से लेखक बताते है कि कबीर के माता-पिता मुसलमान थे और जुलाहे थे। लेखक ने कबीर के ही कही गयी बात का उल्लेख करते है--'जाति जुलाहा मतिकौ धीर, हरषि-हरषि गुन रमैं कबीर' या 'तू बाह्मन में काशी का जुलाहा' कबीर की जाति को लेकर भी लेखक ने हजारीप्रसाद द्विवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल का सन्दर्भ दिया है। लेखकद्वय कबीर को जुलाहा या कोरी जाति का ही मानते हैं।
अध्याय 4 में रामानंद स्वामी उनके गुरु थे या नही, इसपर लेखक की दृष्टि साफ है। वे कहते है कि, " अगर किवदंतियों के आधार पर यह मान भी लिया जाए कि कबीर रामानंद के समकालीन थे, जैसा कि हिंदी के प्रायः सभी आलोचक मानते हैं, तो क्या ब्राह्मण, वेद, वर्णव्यवस्था और अवतारवाद के खिलाफ़ कबीर के विचार यह साबित करने के लिए काफी है कि रामानंद उनके गुरु कदापि नही थे.."
 सबसे महत्वपूर्ण 5 वां अध्याय है जिसमे लेखक ने 'उन्नीसवीं सदी के विदेशी अख़बारों में कबीर' है। सम्भवतः इस दृष्टिकोण से कबीर को किसी ने नही लिखा है। कबीर के बारे में ब्रिटेन के अख़बारो में जितना छपा है उतना शायद तब, किसी अन्य समाज सुधारक के बारे में नही छपा। सर डब्लू डब्लू हंटर ने कबीर पर काम करते हुए उन्हें पन्द्रहवी सदी का "भारतीय लूथर" कहा है। ब्रैडफोर्ड आब्जर्वर, एलेन्स इंडियन मेल, Armgh Guardian, मॉर्निंग एडवरटाइजर, द वालारो टाइम्स एंड माइनिंग जनरल तथा आस्ट्रेलियाई अखबार एडवोकेट मेलबर्न आदि-आदि अख़बारो-पत्रिकाओं का उल्लेख किया गया है। विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए आपको क़िताब पढ़नी चाहिए।
 6 वां और 7 वां अध्याय कबीर पर गोरखनाथ का प्रभाव और कबीर के पारिवारिक किवदंतियां-कथाओं का वर्णन लेखक ने किया है।
8 वां अध्याय 'कबीर के विचार' 5 वें अध्याय के बाद सबसे प्रमुख अध्याय है। लेखक ने कबीर पर अद्वैत, बौद्धों, सिद्धों, सूफियों और नाथों का प्रभाव पड़ा। इसको साबित करने के लिए लेखक ने कबीर की बानियों को ही सामने रखकर सिद्ध किया है। कबीर को देखने-पढ़ने और समझने के लिए एक नए दृष्टिकोण से लिखी गयी किताब है।

लेखक ने बहुत मेहनत किया है। ब्रिटिश लाइब्रेरी, बिटिश, अमेरिकन, ऑस्ट्रेलियाई और जर्मन अख़बार को छान मारा है। आप इस क़िताब में संदर्भित ग्रन्थ की सूची देखकर ही समझ सकते हैं। क़िताब की छपाई बेहतर है लेकिन कही-कही मुद्रण में कमी है। प्रकाशक का ध्यानाकर्षित करना चाहता हूँ कि क़िताब का मूल्य अंतिम पृष्ठ पर 200/-रु और अंदर के पृष्ठ पर 150/- रु अंकित है। इसको स्पष्ट करना चाहिए।



अंततः कहा जा सकता है कि यह किताब संग्रहणीय है। आम पाठकों के साथ-साथ गंभीर अध्येताओं और शोधकर्ताओं को यह क़िताब जरूर पढ़नी चाहिए।     

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