बुधवार, 11 अगस्त 2021

जेम्स प्रिंसेप और देवनापिय असोक

 देवानंपिय पियदस्सी को स्टीवेन्सन ने " द्वधारं पिये पिय " पढ़ा, जाहिर है कि गलत पढ़ा, लेकिन पढ़ने के निकट तो पहुँच ही गए थे.....


बाद में जेम्स प्रिंसेप ने देवानंपिय पियदस्सी पढ़ा, सही पढ़ा, लेकिन देवानंपिय पियदस्सी कौन था, प्रिंसेप को नहीं पता था....


प्रिंसेप ने अनुमान किया कि देवानंपिय पियदस्सी स्वयं बुद्ध का नाम है, लेकिन बुद्ध तो राजा नहीं थे, जबकि आगे पियदस्सी राजा लिखा है.....


सो, प्रिंसेप ने एक दूसरा अनुमान किया कि देवानंपिय पियदस्सी वास्तव में सिलोन के राजा तिस्स हैं, जो देवानंपिय पियदस्सी की उपाधि धारण करते थे.....


लेकिन सवाल यह था कि सिलोन के राजा के इतने सारे शिलालेख भारत में कैसे आए, जरूर बात कुछ और है.....


तब टर्नर सिलोन में थे, पालि साहित्य का अध्ययन कर रहे थे कि दीपवंश को पढ़ते हुए उनकी आँखें चमक उठीं.....


दीपवंश में लिखा था कि बुद्ध के निर्वाण के 218 वर्ष बाद पियदस्सी का सिंहासनारोहण हुआ, जो कि चंद्रगुप्त के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र थे.....


टर्नर ने देवानंपिय पियदस्सी की पहचान सम्राट अशोक के रूप में कर ली, खबर प्रिंसेप को पहुँची, प्रिंसेप ने टर्नर की इस खोज के लिए प्रशंसा की......


घटना 1837 की है, भारत को उसका सम्राट मिल गया, इतिहास एक भयंकर भूल से बच गया....


प्रिंसेप की प्रतिभा में बिजली की तेज थी, धम्म लिपि को पढ़ने के दो साल बाद प्रिंसेप गंभीर रूप से बीमार हो गए.....


बीमारी ऐसी कि नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा, 1840 में दिवंगत हो गए, प्रिंसेप को बड़ी छोटी उम्र मिली थी.....


धम्म लिपि को पढ़ने और प्रिंसेप की मृत्यु के बीच महज तीन साल का फासला था, लेकिन प्रिंसेप ने भारत के हजारों साल के इतिहास को अचानक ही बदल डाला....


20 अगस्त को जेम्स प्रिंसेप का जन्मदिन है, हम भारतीयों की ओर से उन्हें अशेष बधाइयाँ!

राजेन्द्र प्रसाद सिंह




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