मंगलवार, 24 अगस्त 2021

सावित्री बनाम सरस्वती

 सावित्री बनाम सरस्वती

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हिन्दू-ब्राह्मणी माइथोलॉजी में सरस्वती को 'ज्ञान की देवी' माना गया है। सैकड़ो साल से इस देश मे ज्ञान के प्रतीक के तौर पर सरस्वती को प्रतिष्ठित किया जाता रहा और अब भी सामान्य जन सरस्वती को ही 'गॉडेस ऑफ नॉलेज' मानते हैं. विद्यालयों-कॉलेजेज-यूनिवर्सिटीज को सरस्वती का मंदिर आज भी  कहते हैं.  और तो और साहित्यिक-सामाजिक गोष्ठियों में भी सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर पर फूल-माला और दीया-मोमबत्ती जलाने की परंपरा आम तौर पर होता ही है.


सरस्वती ब्रह्मा की अति सुंदर पुत्री थी. उनके पिता और सरस्वती के बीच कई प्रकार की पौराणिक कहानियां अनुस्यूत हैं. प्राचीन समाज मे नैतिकता का पैमाना जैसा कि आज है तब नही रहा होगा. इस आधार पर ब्रह्मा-सरस्वती के संबंध को नाजायज या अनैतिक नही कहा जाना चाहिए. ऐसा दुनिया के सभी प्राचीन समाजों में होता रहा है। 


ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट, प्राचीन मध्य एशिया का समाज, जहाँ से इस्लाम का उद्भव हुआ. मिस्र, रोमन समाज मे भी कई ऐसी परम्पराए थी कि आज आधुनिक समाज की  नैतिकता का पैमाना के  संदर्भ में देखे तो अनैतिक लगेगा.


प्रश्न है कि सरस्वती को ज्ञान की देवी क्यो और किस आधार पर कहा जाता है ?  जबकि पूरे हिन्दू आख्यानों में सरस्वती का ज्ञान-शिक्षा या शिक्षण से कोई भी संबंध नही दिखता . 


सरस्वती की तस्वीर में  जो पुस्तक दिखाई जाती है वह भी प्राचीनता की कसौटी पर खरा नही उतरता  क्योंकि कागज का आविष्कार बहुत बाद में हुआ और वह भी आर्यावर्त के बाहर, चीन में पहली सदी बाद हुआ था . यानि कि सरस्वती की जो तस्वीर हम देखते हैं वह भी बहुत बाद कि कल्पना है. 


अब आते हैं शिक्षा के देवी ने आख़िर शिक्षा में क्या काम किया ?  क्या उन्होंने कोई ग्रंथ लिखा ? क्या उन्होंने कोई पाठशाला खोला ? क्या उन्होंने समाज के किसी भी हिस्से को शिक्षा का अलख ही जगाया ?  इसका जवाब है-- "नही"


पूरे हिन्दू आख्यानों में सरस्वती को किसलिये याद किया गया  ? 

जो आख्यान है वो इस प्रकार है -- "एक बार कुंभकर्ण को इंद्र की गद्दी पाने की इच्छा जगी .  इन्द्रासन को पाने के लिए वो भगवान शिव की तपस्या करने लगा . कठोर तपस्या करते देख ब्रह्मा परेशान हो गए . आख़िर एक राक्षस इंद्र की गद्दी कैसे दिया जाए । ब्रह्मा जानते थे कि शिव भोले है और उसकी तपस्या से शिव पिघल जायेगे और इंद्र की गद्दी पर एक अनार्य राक्षस बैठ जाएगा . तब उन्होंने अपनी पुत्री सरस्वती को याद किया और अपनी परेशानी को बताया.  सरस्वती ने उनकी परेशानी को झट से दूर कर दिया . 


कुम्भकर्ण की तपस्या से खुश होकर  शिव आए और  कुम्भकर्ण ने जैसे ही शिव से  "इन्द्रासन" मांगने के लिए मुँह खोला वैसे ही सरस्वती कुम्भकर्ण की ज़ुबान पर बैठ गईं और "इन्द्रासन" के जगह "निद्रासन" बोल दिया.  यानि सरस्वती ने अपने पूरे जीवन मे ज्ञान से संबंधित यही काम किया. यही धोखेबाजी का इतिहास है सरस्वती का .


अब आइए, आधुनिक ज्ञान की देवी सावित्रीबाई फुले की---

एक अनपढ़ बालिका कैसे "ज्ञान की देवी" बन गई ?  एक साधारण घर के बेटी जब जोतिबा के घर बहू बनकर गई तब जोतिबा ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया और भारत की पहली बालिका विद्यालय फुले दंपत्ति ने खोला. इस तरह उन्होंने कई विद्यालय खोले और पूरे पुणे में ज्ञान की रोशनी से प्रकाशित कर दिया.

उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय स्थल बनवाए जिसमे कुंवारी- विधवा महिलाएं अपने बच्चे को जन सकती थी. 


ज्ञान की इस रोशनी को फैलाने में  फुले दंपत्ति को  जो तकलीफ़ और परेशानियां उठानी पड़ी वह किसी सामान्य व्यक्ति के लिए सहना आसान नही था.


अब आप तय करें कि "ज्ञान की देवी" किसे मानें ???

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