आर्यों के घोड़े
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क्या सिंधु घाटी सभ्यता के लोग घोड़ों के बारे में जानते थे?
ऊपर से देखने पर यह बड़ा साधारण-सा सवाल मालूम होता है। इसके राजनैतिक आशयों से अपरिचित कोई भी व्यक्ति यही कह बैठेगा कि शायद हाँ या शायद ना लेकिन आख़िर इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है? किंतु एक बहुत महत्वपूर्ण समीकरण इधर इससे जुड़ गया है। भारत में जाति का चिंतन सामुदायिक रूप से केंद्रीय महत्व का रहा है, किंतु जबसे जाति राजनीतिक पूँजी बनी है, सिंधु सभ्यता के घोड़ों का प्रश्न विस्फोटक सम्भावनाओं से भर गया है।
कारण यह कि सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त होने वाली मुहरों, सीलों और शिल्प में कहीं भी अश्वों के दर्शन नहीं होते, जबकि उस सभ्यता ने वृषभों और महिषों का विपुल-चित्रण किया है। इसके समक्ष फिर ऋग्वेद की ऋचाएँ हैं, जो अश्वों के वर्णनों से भरी पड़ी हैं। वास्तव में घोड़ा वैदिक सभ्यता का महत्वपूर्ण पशु था, जबकि सिंधु सभ्यता में बैल और सांड़ अधिक लोकप्रिय थे, वहीं टोटेम के रूप में एकशृंगी (यूनिकॉर्न) को सर्वाधिक चित्रित किया जाता था। जिन लोगों की रुचि यह सिद्ध करने में है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वैदिक सभ्यता के लोगों से भिन्न थे, वो इसे विभेद के एक महत्वपूर्ण बिंदु की तरह प्रस्तुत करते हैं। इसमें आगे वो यह जोड़ देते हैं कि जब आर्य यूरेशिया या मध्येशिया से अपने घोड़ों या अश्व-जुते रथों पर सवार होकर आए तो उन्होंने अपनी गति, वेग और आक्रामकता से सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को हतप्रभ कर दिया और उन्हें तितर-बितर हो जाने पर विवश कर दिया। यह आर्य-इन्वेशन थ्योरी कहलाती है। यह नई स्थापना नहीं है, किंतु इधर इसके ध्वजवाहक श्री टोनी जोसेफ़ बन गए हैं, जिन्होंने 'अर्ली इंडियंस' शीर्षक से एक पुस्तक लिखकर इस थ्योरी के पक्ष में नए डीएनए-आधारित तर्क दिए हैं।
दूसरी तरफ़ वे हैं, जो मानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग ही आर्य या वैदिक थे, सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता के बीच कोई विभेद या अंतराल नहीं है और इतना ही नहीं, वास्तव में कालक्रम में वैदिक संस्कृति सिंधु सभ्यता से पहले ही अस्तित्व में आ चुकी थी। वो इस प्रश्न का सामना नहीं करना चाहते कि अगर ऐसा था तो बीसवीं सदी में मोहेंजोदारो व अन्य नगरों के उत्खनन से पहले तक सिंधु घाटी सभ्यता भारत की पौराणिक-स्मृति से पूरी तरह से विलुप्त क्यों थी? यह घोड़ों वाला तर्क भी उन्हें दुविधा में डालता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों के पास से घोड़ों की कोई भी सूचना क्यों बरामद नहीं होती। यही कारण था कि जब उत्तरप्रदेश के बागपत ज़िले में गंगाघाटी के गांव सनौली से 4000 वर्ष पुराने तीन रथ उत्खनन में प्राप्त हुए तो हड़प्पा सभ्यता को आर्य-सभ्यता मानने वालों में हर्ष की लहर दौड़ गई। उनका यह मानना है कि सनौली सिंधु घाटी सभ्यता का पुरातात्विक केंद्र था और वहाँ से रथ का मिलना यह सिद्ध करता है कि हड़प्पा संस्कृति के लोग घोड़ों से सर्वथा अपरिचित नहीं थे। सनौली के रथ उन्हें विजयरथ सरीखे प्रतीत हुए हैं। आर्य-इन्वेशन थ्योरी के प्रतिपादकों ने अपने बचाव में इतना भर कहा है कि इन रथों के वाहक बैल भी हो सकते थे।
श्री भगवान सिंह ने अपनी पुस्तक 'हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य' में बलपूर्वक यह कहा है कि घोड़ा हड़प्पावासियों के लिए अपरिचित नहीं था। वैसा उन्होंने हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त घोड़ों की अस्थियों के आधार पर कहा है। इसकी काट में टोनी जोसेफ़ ने 'अर्ली इंडियंस' में तर्क दिया है कि हड़प्पा के लोग जब मेसापोटामिया को हाथी, भैंसे, मोर का निर्यात करते थे तो बदले में कदाचित् उन्होंने घोड़ों का आयात भी किया होगा- किंतु घोड़े की जो केंद्रीय भूमिका वैदिक सभ्यता में है, उसका लेशमात्र भी हड़प्पा सभ्यता में नहीं है। टोनी जोसेफ़ के अनुसार भारत में पालतू घोड़ों की बहुतायत ईसा पूर्व 1900 के आसपास देखी जाती है, जो कि परवर्ती-हड़प्पा कालखण्ड है और वेद हड़प्पा काल के बाद रचे गए थे। उधर श्री भगवान सिंह एक रोचक स्थापना देते हैं। वे कहते हैं कि वैदिक जनों ने अश्व से पहले गर्दभ को पालतू बनाया था और आरम्भ में गर्दभ को ही अश्व कहा जाता था। अश्विनीकुमारों का वाहन इसीलिए गर्दभ है। गर्दभ के लिए अंग्रेज़ी का शब्द 'ऐस' भी 'अश्व' का अपभ्रंश उन्होंने माना है और प्रकारान्तर से जेंद भाषा के 'अस्प', लातीन के 'एकुअस', ग्रीक के 'इप्पोस' और अंग्रेज़ी के 'हॉर्स'- सभी की उत्पत्ति अश्व से ही स्वीकारी है। 'इन सर्च ऑफ़ द क्रैडल ऑफ़ सिविलाइज़ेशन' नामक एक अन्य पुस्तक- जो आर्य-इन्वेशन सिद्धांत का विरोध करती है- की लेखक-त्रयी फ्रॉले-फ़्यूरष्टाइन-काक ने कहा है कि अव्वल तो भारत में पुरा-पाषाण गुफाओं में घोड़े के भित्तिचित्र पाए गए हैं। दूसरे उन्होंने पूछा है कि भला कौन-सी यायावर जाति रथों पर सवार होकर किसी सभ्यता पर आक्रमण करती है? रथ तो नागरिक-सभ्यता का वाहन हैं, बंजारों की गाड़ी नहीं है। यानी प्राचीन भारतीय इतिहास में घोड़ों की भूमिका को लेकर यह एक बहुत ही मज़ेदार बहस चल रही है।
भारत में जाति का प्रश्न अब मनोवैज्ञानिक महत्व का बन गया है, क्योंकि जो भारत का मूलनिवासी होगा, उसी का देश के संसाधनों पर पहला अधिकार होगा- यह अनकही धारणा चुपचाप सामूहिक अवचेतन में रोप दी गई है। आर्य-द्रविड़ या सवर्ण-दलित द्वैत के मूल में भी अब वर्चस्व का युद्ध आ गया है। यही कारण है कि दलित-चिंतकों ने धोलावीरा को यूनेस्को द्वारा विश्व-धरोहर स्वीकारे जाने की व्याख्या द्रविड़ों की श्रेष्ठता के उद्घोष की तरह की है, क्योंकि वो सिंधु घाटी को अनार्य-सभ्यता की तरह देखते हैं। वहीं सवर्ण-गौरव के प्रवक्ताओं ने इसे वैदिक संस्कृति के सातत्य में देखते हुए गर्व से सीना फुलाया है। जो इस युद्ध से चकित किंतु तटस्थ या कदाचित् निर्लिप्त हैं- जैसे कि इन पंक्तियों का लेखक- वो नेपथ्य में खड़े होकर यह सब देख रहे हैं और मन ही मन सोच रहे हैं कि आज से चार या पाँच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे कौन थे, और कहाँ से आए थे, उससे अब आख़िरकार हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ना है? हममें से बहुतेरों को तो यही नहीं पता कि आज से पाँच या छह पीढ़ी पहले या अठारहवीं या उन्नीसवीं सदी में हमारे पुरखे क्या कर रहे थे, किन लोगों से उनका मेल-मिलाप था, रक्त में कब-कहाँ-कैसे मिलावट हुई। यह रक्त की शुद्धता का विचार हमारे देश की बड़ी बुराइयों में से है कि चाहे जो हो जाए, रक्त की मिलावट नहीं होनी चाहिए और जातियों की यथास्थिति (जिसे अंतर्जातीय विवाह-सम्बंधों से चुनौती मिलती है) बनी रहनी चाहिए।
जबकि अंतिम निष्कर्ष में तो आज समूची पृथ्वी की मनुष्य-जाति जिस सेपियंस-वर्ग से ताल्लुक़ रखती है, उनका उदय निर्विवाद रूप से पूर्वी-अफ्रीका में दो लाख साल पहले हुआ था। इससे तीनेक लाख साल पहले यूरोप और मध्येशिया में निएंडरथल्स विकसित हुए थे। आज जब भारत में आर्य-द्रविड़ का प्रश्न ज्वलंत बना हुआ है, तब संसार में सेपियंस-निएंडरथल-द्वैत चर्चाओं के दायरे में है- जो कि देखा जाए तो एक अधिक व्यापक-महत्व का प्रश्न है। इसकी निष्पत्ति यह है कि सेपियंस ने कोई 30 हज़ार साल पहले निएंडरथल्स का भले सर्वनाश कर दिया था, लेकिन इन दोनों जातियों के बीच क्रॉस-ब्रीडिंग हुई थी और आज भी दुनिया के ग़ैर-अफ्रीकी मनुष्यों में 1 से 4 प्रतिशत तक निएंडरथल-जीनोम पाए जाते हैं। यानी हममें से बहुतों के पैतृक या मातृकाएँ कदाचित् निएंडरथल रहे होंगे। लेकिन बात वही है कि इससे भी आज क्या फ़र्क़ पड़ता है। दुनिया तो आगे की तरफ़ देख रही है और होमो सेपियंस के बजाय होमो देअस की बात कर रही है। आने वाले सौ सालों में पृथ्वी पर मनुष्य-जाति का अस्तित्व रहेगा या नहीं और रहेगा तो किस रूप में- आज के समय का सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है।
भारत के मूलनिवासी कौन थे- इस प्रश्न का अकादमिक महत्व अलबत्ता तब भी यथावत रहेगा- प्रबुद्ध जिज्ञासुजन इस बारे में सच्चाई जानना चाहेंगे। फ़र्क़ यही है कि सिंधु घाटी सभ्यता के वैदिक सिद्ध होने से वो ना गर्व से भर उठेंगे और ना ही उसके अनार्य सिद्ध होने से वे लज्जा से चेहरा लाल कर बैठेंगे या अपमानित महसूस करेंगे (जैसा कि राखीगढ़ी से प्राप्त एक कंकाल की डीएनए-जाँच से प्राप्त साक्ष्यों के द्वारा संकेत किया गया था कि उसमें द्रविड़-जीन्स की बहुलता है, बनिस्बत यूरेशियन-जीन्स के- इस पर इंडिया टुडे द्वारा एक आमुख कथा प्रस्तुत की गई थी)। वास्तव में, ना इसमें गौरव करने जैसा कुछ है, ना लज्जित होने जैसा कुछ है- क्योंकि सभ्यताओं की यात्राएँ मिश्रित-रक्त की यात्राएँ हैं, और किसी का भी ख़ून सौ फ़ीसद शुद्ध नहीं होता। कह लीजिये कि सभ्यताएँ गतिशील होती हैं- अश्वों की तरह!



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