शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

चीन में बौद्ध धर्म

चीनी सम्राट मिंग ति के निमंत्रण पर दो भारतीय बौद्ध विद्वान 67 ई. में सबसे पहले चीन गए थे। एक का नाम काश्यप मातंग और दूसरे का नाम धर्मरक्षित था। धर्मरक्षित का एक नाम धर्मरत्न भी मिलता है। 

काश्यप मातंग का जन्म मगध में हुआ था। लेकिन चीन जाते समय वे गांधार में रहते थे। काश्यप मातंग और धर्मरत्न बौद्ध धम्म की पुस्तकें चीन ले गए। वे एक श्वेत घोड़े पर सवार होकर गए थे। 

चीनी सम्राट ने उनके रहने के लिए श्वेताश्व विहार का निर्माण करवाया। यही चीन का प्राचीनतम बौद्ध विहार था।

शुरुआती दौर में बौद्ध धम्म को कनफ्यूसियस‌ मतानुयायियों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धम्म का समर्थन प्राप्त होने लगा। द्वितीय सदी के प्रसिद्ध दार्शनिक मोत्सू ने बौद्ध धम्म को कनफ्यूसियस के धर्म से श्रेष्ठ बताया।

चीनी सम्राट वु (265-290 ई.) तथा मिन् (313-316 ई.) के समय में यहाँ अनेक बौद्ध मठों एवं विहारों का निर्माण हुआ।

लगभग 100 वर्षों बाद दक्षिणी चीन के राजा लियांग-वूती ने बौद्ध धम्म को राजधर्म का दर्जा दिया। वेई, सुई और तांग राजवंशों ने बौद्ध धम्म को राजकीय संरक्षण दिए। 

तांग काल को तो इतिहास में " चीन का बौद्ध काल " कहा जाता है।

तांग काल में प्रभाकर मित्र, दिवाकर, बोधिरुचि, अमोघवज्र, वज्रमित्र जैसे बौद्ध विद्वान चीन गए।

अनेक चीनी यात्री भी बौद्ध ग्रंथों की खोज में भारत आए। फाहियान, ह्वेनसांग और इत्सिंग इनमें सर्वाधिक प्रमुख हैं। 

भारत के कई बौद्ध विद्वान चीन में काफी लोकप्रिय हुए। उनमें एक नाम बोधिधर्म का है। काँचीपुरम के बोधिधर्म वहाँ इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी वहाँ पूजा की जाने लगी।

बौद्ध धम्म के प्रचार के साथ चीन में अनेक बौद्ध गुफाएँ बनाई गईं। इन गुफाओं में कहीं चट्टानें काट कर बड़ी बड़ी मूर्तियाँ बनाई गईं तो कहीं उनके अंदर चित्रकारी की गई।

दुन-हुआंग और लांग-मेन के बौद्ध गुफा परिसर दुनिया में प्रसिद्ध है।

कोरियाई देशों में बौद्ध धम्म 372 ई. में चीन से पहुँचा। कोरिया चीन के उत्तर-पूर्व में स्थित है। सबसे पहले सुन्दो नामक एक बौद्ध भिक्खु बुद्ध की मूर्ति और सूत्र लेकर कोरिया पहुँचे।

बाद में 384 ई. में बौद्ध आचार्य मल्लानंद कोरिया गए। कोरिया के प्योंगयांग नगर में एक भारतीय बौद्ध भिक्खु ने 404 ई. में दो मठों का निर्माण कराया था। 

उसके बाद अनेक बौद्ध विद्वान कोरिया गए। कोरिया से भी अनेक यात्री ज्ञान की खोज में भारत आए।

बड़ी संख्या में बौद्ध ग्रंथों का कोरिया की भाषा में अनुवाद हुए। 

आठवीं सदी में कोरियाई यात्री हाइचो बौद्ध संस्कृति को जानने के लिए भारत की यात्रा की। वे पूर्वी भारत में 724 ई. में पहुँचे थे। 

उन्होंने सारनाथ, राजगीर, कुशीनगर और बौद्ध गया के प्रसिद्ध स्तूपों को देखा। बताया कि सभी मगध राज्य में हैं। सारनाथ के अशोक स्तंभ से वे बहुत प्रभावित हुए।

जापान में बौद्ध धम्म कोरिया से पहुँचा। बात 552 ई. की है। 

उस समय कोरिया के सम्राट ने जापानी सम्राट के लिए अनेक प्रकार की भेंट भेजी, जिनमें बौद्ध मूर्तियाँ, सूत्र, पूजा की वस्तुएँ और उनके साथ अनेक कलाकार एवं वास्तुकार आदि शामिल थे। 

जल्द ही जापान में बौद्ध धम्म प्रभावशाली हो गया। वहाँ जिस लिपि में बौद्ध सूत्र लिखे जाते थे, उसे शित्तन कहा जाता है। यह शित्तन वस्तुतः सिद्धम का दूसरा रूप है।

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