एक कविता और
" मेरे शहर में "
" मेरे शहर में "
मेरे शहर के साहित्यविद
ज्ञान के गस्ट्रिक रोग से ग्रसित है
जो गलत-सही जगह पोकने पर मजबूर है.
जो गलत-सही जगह पोकने पर मजबूर है.
मेरे शहर में
किताबे कम बदूके ज्यादा दिखती है
मेरे शहर में
दूध और पानी एक भाव बिकती है.
मेरे शहर में
फसल नेताओ की लहलहाती है
और
भूख से बिलबिलाते लोग
मुंबई,दिल्ली और दुबई निर्वासित है.
मेरे शहर की
सड़के
मजदूर की फटी बेवाई है
जिसके पीर पर
कोई मरहम काम नहीं करती
.
.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें