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यह प्रश्न उठाया जान चाहिए की क्यों अंग्रेजो के जाने के बाद भी अंग्रेजियत कायम रही या अभी भी कायम है. विशेषाधिकार प्राप्त समाज अंग्रेजी भाषा को बनाये और बचाए इसलिए नहीं रखा की इसका फायदा दलितों या पिछड़े समाज को मिले ,बल्कि उन्होंने इसे इसलिए बचाया ताकि दलित और पिछड़ा समाज अंततः हमारे विशेषाधिकारो का बटवारा न कर सके. यह औपिनिवेशिक दुनिया के विपरीत आचरण रहा. जहा -जहा भी उपनिवेश रहे वहाँ -वहाँ पर उपनिवेश और उपनिवेशी के बीच छतीस का आकड़ा रहा लेकिन भारतीय समाज में इनके बीच तिरसठ का सम्बन्ध बना रहा.आखिर क्यों ? वह इसलिए की भारतीय समाज का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग और अंग्रेजो द्वारा पालित -पोषित समाज के बीच एक सामान स्वार्थ था और वह स्वार्थ था दलितों और निचले समाज के शोषण की पुरानी व्यवस्था को कमजोर न पड़ने देना. आखिर किस आधार पर चन्द्रभान प्रसाद ने मान लिया की दलितों का उद्धार अंग्रेजी माता के मंदिर से ही हो सकता है? हाँ यह जरूर है की चन्द्रभान प्रसाद जिस अपर मिडिल क्लास से आते है उस क्लास के लिए सीढ़ी के रूप में अंग्रेजी आवश्यक है.
अंग्रेजी की आवश्यकता उन दलितों के लिए नहीं है जो दो जून की रोटी के लिए अपना खून -पसीना एक किये हुए है. उनके लिए तो सर्वप्रथम प्रारभिक शिक्षा चाहिए ,वह भी अपनी मातृभाषा में ताकि वह अपनी भाषा में शिक्षा का मतलब समझ सके ,अपनी भाषा में अधिकारों की मांग कर सके .
यह प्रश्न उठाया जान चाहिए की क्यों अंग्रेजो के जाने के बाद भी अंग्रेजियत कायम रही या अभी भी कायम है. विशेषाधिकार प्राप्त समाज अंग्रेजी भाषा को बनाये और बचाए इसलिए नहीं रखा की इसका फायदा दलितों या पिछड़े समाज को मिले ,बल्कि उन्होंने इसे इसलिए बचाया ताकि दलित और पिछड़ा समाज अंततः हमारे विशेषाधिकारो का बटवारा न कर सके. यह औपिनिवेशिक दुनिया के विपरीत आचरण रहा. जहा -जहा भी उपनिवेश रहे वहाँ -वहाँ पर उपनिवेश और उपनिवेशी के बीच छतीस का आकड़ा रहा लेकिन भारतीय समाज में इनके बीच तिरसठ का सम्बन्ध बना रहा.आखिर क्यों ? वह इसलिए की भारतीय समाज का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग और अंग्रेजो द्वारा पालित -पोषित समाज के बीच एक सामान स्वार्थ था और वह स्वार्थ था दलितों और निचले समाज के शोषण की पुरानी व्यवस्था को कमजोर न पड़ने देना. आखिर किस आधार पर चन्द्रभान प्रसाद ने मान लिया की दलितों का उद्धार अंग्रेजी माता के मंदिर से ही हो सकता है? हाँ यह जरूर है की चन्द्रभान प्रसाद जिस अपर मिडिल क्लास से आते है उस क्लास के लिए सीढ़ी के रूप में अंग्रेजी आवश्यक है.
अंग्रेजी की आवश्यकता उन दलितों के लिए नहीं है जो दो जून की रोटी के लिए अपना खून -पसीना एक किये हुए है. उनके लिए तो सर्वप्रथम प्रारभिक शिक्षा चाहिए ,वह भी अपनी मातृभाषा में ताकि वह अपनी भाषा में शिक्षा का मतलब समझ सके ,अपनी भाषा में अधिकारों की मांग कर सके .
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