आगे
अगर ऐसा नहीं होता तो चन्द्रभान प्रसाद मैकाले का नहीं बल्कि उन अंग्रेजो का जन्मदिन मनाते(अगर जन्मदिन मनाने की मज़बूरी हो तो )जिन्होंने भारतीय इतिहास,संस्कृति,भाषा ,साहित्य को खोजने ,सहेजने एव उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .इनमे से कुछ नाम सुझाया जा सकता है,पहला नाम सर विलियम जोन्स का है जिन्होंने 'एशियाटिक सोसाएटी ऑफ़ बंगाल 'नामक शोध संस्था की स्थापना की ,जिनके अनथक प्रयत्न से भारतीय इतिहास में वैज्ञानिक पद्धति का विकास हुआ.सर जोन्स ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सेंद्रोकोट्स की पहचान भारतीय ग्रंथो उल्लखित चन्द्रगुप्त मौर्य से की. यह पहचान ही भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गयी. दूसरा नाम विल्किंस का लिया जा सकता है जिन्होंने भारतीय संस्कृति ,इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया,इसी तरह भारतीय विद्या अध्यन को बढ़ावा देने वाले जर्मनी के मैक्स मुलर थे . जेम्स प्रिन्सेप ने दुनिया के महान राजाओं में सम्राट अशोक की लाटो को पढ़ा ,यदि वह इसकी खोज न करते तो शायद अशोक अभी भी काल के गर्त में कही धूल-धूसरित पड़े होते.सर जान मार्शल ने सिन्धु सभ्यता की खोज की ,इस खोज से भारतीय सभ्यता की महानता का पता चला तथा इसके साथ ही अंग्रेजो के white burden का सिद्धांत का खंडन हुआ.भारत के प्राचीनतम नगरो की खोज कनिघम ने किया था.इसी तरह जी.डब्लू.ब्रिग्स को जिन्होंने अपनी पुस्तक the chamaars लिखा. इस पुस्तक में लेखक ने चमारो की स्थिति का यथार्थ एव न्याय पूर्वक विवरण प्रस्तुत किया गया है.तत्कालीन किसी भी भारतीय विद्वान ने दलित और दमित समाज का ऐसा न्यायपूर्वक विवरण नहीं दिया है ,जिसमे आर्थिक सामाजिक उनके रीति -रिवाज ,खान -पान का सटीक उल्लेख हो.इस तरह अनेक विद्वानों का नाम लिया जा सकता . मेरे कहने का यह अर्थ कदापि नहीं है की इन विदेशी विद्वानों के समक्ष भारतीय विद्वानों की भूमिका कमतर थी बल्कि इन विद्वानों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है की विदेशी होने के वावजूद इन्होने भारतीय इतिहास ,संस्कृति में इनका अवदान किसी भी भारतीय से कमतर नहीं है.
अगर ऐसा नहीं होता तो चन्द्रभान प्रसाद मैकाले का नहीं बल्कि उन अंग्रेजो का जन्मदिन मनाते(अगर जन्मदिन मनाने की मज़बूरी हो तो )जिन्होंने भारतीय इतिहास,संस्कृति,भाषा ,साहित्य को खोजने ,सहेजने एव उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .इनमे से कुछ नाम सुझाया जा सकता है,पहला नाम सर विलियम जोन्स का है जिन्होंने 'एशियाटिक सोसाएटी ऑफ़ बंगाल 'नामक शोध संस्था की स्थापना की ,जिनके अनथक प्रयत्न से भारतीय इतिहास में वैज्ञानिक पद्धति का विकास हुआ.सर जोन्स ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सेंद्रोकोट्स की पहचान भारतीय ग्रंथो उल्लखित चन्द्रगुप्त मौर्य से की. यह पहचान ही भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गयी. दूसरा नाम विल्किंस का लिया जा सकता है जिन्होंने भारतीय संस्कृति ,इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया,इसी तरह भारतीय विद्या अध्यन को बढ़ावा देने वाले जर्मनी के मैक्स मुलर थे . जेम्स प्रिन्सेप ने दुनिया के महान राजाओं में सम्राट अशोक की लाटो को पढ़ा ,यदि वह इसकी खोज न करते तो शायद अशोक अभी भी काल के गर्त में कही धूल-धूसरित पड़े होते.सर जान मार्शल ने सिन्धु सभ्यता की खोज की ,इस खोज से भारतीय सभ्यता की महानता का पता चला तथा इसके साथ ही अंग्रेजो के white burden का सिद्धांत का खंडन हुआ.भारत के प्राचीनतम नगरो की खोज कनिघम ने किया था.इसी तरह जी.डब्लू.ब्रिग्स को जिन्होंने अपनी पुस्तक the chamaars लिखा. इस पुस्तक में लेखक ने चमारो की स्थिति का यथार्थ एव न्याय पूर्वक विवरण प्रस्तुत किया गया है.तत्कालीन किसी भी भारतीय विद्वान ने दलित और दमित समाज का ऐसा न्यायपूर्वक विवरण नहीं दिया है ,जिसमे आर्थिक सामाजिक उनके रीति -रिवाज ,खान -पान का सटीक उल्लेख हो.इस तरह अनेक विद्वानों का नाम लिया जा सकता . मेरे कहने का यह अर्थ कदापि नहीं है की इन विदेशी विद्वानों के समक्ष भारतीय विद्वानों की भूमिका कमतर थी बल्कि इन विद्वानों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है की विदेशी होने के वावजूद इन्होने भारतीय इतिहास ,संस्कृति में इनका अवदान किसी भी भारतीय से कमतर नहीं है.
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