३ मार्च को पहुच गए अपने गाँव ..............यहाँ आने के बाद बचपन की कई यादे हिलोर मारने लगती है। मेरा गाँव भी उसी तरह का है जैसे आप-सब का होता होगा।चारो तरफ खेत -खलिहान और पेड़-पौधे,चारो तरफ हरियाली और चारो तरफ खेतो में खिलते उपजते फसले। इन्ही सब को देखने,महसूसने आ गया गाँव अपने कैमरे के साथ।
बहुत पुराना यह पाकड़ का पेड़ है। मुझे आज भी याद है मै इसकी जड़ो पर बैठ कर पी-पी (गाड़ी) चलाया करता था। मैंने अपने बाबा को नहीं देखा था मेरे जन्म से ही पहले वो दुनिया को छोड़ कर चले गए थे,मेरी दादी(ईया) बताया करती थी की,"बबुआ तोहार बाबा इसी पेड़वा के नीचे बईठ के गाय और भैसइन के चरावत रहले" मै भी इसकी जड़ो पर बैठ कर अपने बाबा को महसूस करता था।इसी पाकड़ के पेड़ के ठीक सामने से नदी बहती है।साफ़ -शुद्ध और निर्मल। हजारो बार इस नदी में नहाया हूँ और आज भी नहाने में वही आनंद और उत्साह आता है। एक दर्दनाक घटना भी है जो इस नदी के पास आते ही आँख के सामने तैरने लगती है।राजकुमारी नाम था उसका बमुश्किल ६ वर्ष की थी और मै भी उसी की उम्र का ,हम दोनों गाँव के कई बच्चो के साथ नहा रहे थे कि वो नदी की धारा में न जाने कब समां गयी। उसकी माँ का रोदन आज भी याद है .........
नदी के उस पार खरबूजा और ककरी की खूब फसल होती थी और हम सब बदमाश नदी पार करके खरबूजा और ककरी की फसल को चुरा लाते थे। कई बार मार खाए लेकिन जो आनंद चुरा कर खाने में आता था वह आनंद खरीद कर खाने में कहाँ?
इस पेड़ की कहानी भी बड़ी रोचक है।इसको मेरे पापा ने लगाया था और कहते है कि वह रोज इसकी जड़ो में पानी डाला करते थे।गांव के बड़े-बुजुर्ग पापा को समझाया करते थे कि यह पेड़ तो खुद नदी के किनारे है इसे पानी कि जरूरत ही नहीं है।बाद में जब यह पेड़ बड़ा हो गया तो गाँव के बच्चे इसकी डाल को पकड़ कर बाढ के दिनों में नदी में कूदा करते थे और आज भी वैसे ही कूदा करते है ........
इसको खोप कहते है।कही -कही बखार भी कहा जाता है। इसमे अतिरिक्त अनाज रखा जाता है। यह प्राचीन काल का cold house है जिसमे बिना किसी तकनीक के अनाजो को सुरक्षित रखा जाता है ....
गाँव की अमराई ....चारो तरफ शांति ही शांति .....
उसी पी-पी वाले पेड़ के सामने छठ माई का स्थान ...........वास्तव में यह एक बौद्ध स्मारक का प्रतीक है जो बाद में चल कर हिन्दु प्रतीक का रूप धारण कर लिया। पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में हजारो ऐसे स्मारक मिलेगे जो पहले बौद्ध धर्म के धार्मिक पूजा स्थल थे।
मेरे पिता द्वारा लगाया गया पेड़ और पी-पी वाला पेड़ ..........के बीच में छठ मईया का मनोरम दृश्य ...
एक और खोप ............जिस पर सुबह का प्रकाश पड़ रहा है
खोप और झोपड़ी के बीच सुबह का सूर्य ......जिसकी लालिमा छन कर आ रही है
गाँव के बाहर रहते है यह दरिया बाबा के अनुयायी ...नाम है साहब राम आशीष जी।मैंने पूछा कि आप दरिया बाबा के ही शिष्य क्यों है? क्या आप जाति-पात को मानते है?..पहले प्रश्न के उत्तर में इन्होने कहा कि "दरिया बाबा किसी आडम्बर किसी दिखावा को नहीं मानते इसलिए मै इनकी तरफ आकर्षित हो गया और बाबा का अनुयायी बन गया। दूसरे प्रश्न का उत्तर पहले में ही है दरिया बाबा किसी को न बड़ा न किसी को छोटा मानते है ...........
मैंने इनसे दरिया बाबा के बारे में जानना चाहा तो आपने उनकी एक किताब पकड़ा दी।फोटो में जो किताब दिख रही है वो अब अब मेरे पास है .............घर ले जाकर इसका अध्ययन करुगा .....
साहब राम आशीष जी ज्ञान दीपक नामक किताब पढते हुए ----
कुछ दोहे आप को सुनाता हु --धोखा है धंधा या जग बंधा,अँधा चक्षु का सो धावे।।
विविध सियाना मन अरुझाना,झीनि जाल में सो आवै।।
लालच लागी मृग पगु पागी, अमर कोस धरी दुख दावे।।
फीटीक शिला गज दसन हिला ,हलित भये तन दुःख पावै।।
मेरे बड़े पिता .....गौर से देखिए होठ के नीचे ....समझ गए न ....सुर्ती यानि खैनी दबाये हुए।निहायत सरल लेकिन कर्मठ ...दिन भर कुछ न कुछ करते हुए ...कहते है खाली बैठने से हाजमाँ और दिमाग दोनों गड़बड़ा जाता है।
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