" क्यों बंजर होती जा रही साहित्य की समृद्ध भूमि"
आज़मगढ़ के साहित्यिक योगदान के सन्दर्भ में इतिहास को यदि खंगाले तो यह धरती साहित्य व विचार की एक संमृद्ध भूमि रही है। यह धरती प्राचीन काल से ही वैचारिक एवं सांस्कृतिक रूप से विरासत का एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में अपनी एक स्पष्ट व मौलिक पहचान बनाई और इसी पहचान को अयोध्या सिंह उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन, कैफ़ी आज़मी , शिब्ली नोमानी आदि अनेक साहित्यकारों ने इसको आगे बढाया। यह प्रश्न उठता है कि क्यों यह समृद्ध भूमि आज पूरी तरह से साहित्य एव विचार के क्षेत्र में बंजर है, क्यों इस भूमि पर नई कोपलो का जन्म नहीं हो रहा है ? क्यों कोई नये विचार की कलियाँ नहीं खिल रही है। एकाध उदाहरणों को छोड़ दे तो यह प्रश्न आपको -हमको विचलित तो करते ही है कि क्यों साहित्य के क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज नहीं हो पा रही है। वैसे यह प्रश्न पूरे हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रो के ऊपर सटीक बैठती है लेकिन यहाँ पर मै केवल आजमगढ़ के सन्दर्भ में बात करूँगा।
आज़मगढ़ भी उसी हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र में पड़ता है, जिसको राजनीतिक भाषा में काऊ बेल्ट कहते है। यह वही काऊ बेल्ट क्षेत्र है, जो सामंती प्रवृत्ति,उंच-नीच, जाति -पात के घेरे में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। आज़ादी के बाद भी यह प्रवृत्तिया कमोवेश जारी है। यहाँ के साहित्यकारों के बीच आपसी तनातनी, वैचारिक मतभेद (मनभेद)और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी नए कवियों, लेखको के लिए राह नहीं खोल सकी। वरिष्ठ साहित्यकारों को आपसी मतभेदों से ही फुर्सत नहीं मिल सकी कि वह एक नवीन विचार दे या नए विचारो को पनपने में सहयोग कर सके। हिंदी प्रकाशको का व्यवहार भी साहित्यकारों को उभरने न देने के के लिए जिम्मेदार रहे है। यह प्रकाशक लाभ के लिए और सरकारी खरीद के लिए ही पुस्तको का चयन करते है।वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव का कहना बिलकुल सही है कि हिंदी साहित्य को नुक्सान जितना हिंदी के विरोधियो ने नहीं किया उतना कालेजो व विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, लेक्चररो और रीडरो ने किया। हिंदी साहित्य की रीढ़ तोड़ने में इनका बड़ा योगदान है।।।
यह लेख दैनिक हिंदुस्तान के वाराणसी संस्करण दिनांक 12 मार्च 2013 को "मेरे शहर में" नामक कालम में प्रकाशित हुआ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें