शनिवार, 2 मार्च 2013

vaigyanik bhautikvaad (rahul sankritayan)

                                   प्राचीन भारत में यौन सदाचार 

धर्मात्मा लोग जिस वक़्त सदाचार की बात करते है,उस वक़्त उनके ख़याल में रहता है कि सदाचार एक ऐसा अटल-अचल विधान है जो सभी देश काल में एक सा बना रहता है,किन्तु यह धारणा बिल्कुल गलत है।उत्तरी भारत मामा-फूफी की लड़की सगी बहिन के सामान मानी जाती है,जबकि उड़ीसा और गुजरात से दक्खिन उन्हें ब्याहने का हक़ सबसे पहले ममेरे-फुफेरे भाई का होता है।और प्राचीन भारत के सदाचार को जानना चाहते है तो पुरानी पुस्तको को उलटकर देखिये,मैंने इनके बारे में अन्यंत्र (मानव-समाज पृष्ठ 88-96)काफी लिखा है,यहाँ उससे कुछ पंक्तिया उद्धृत करता हू -
"नदी पार होते-होते पराशर का सत्यवती(मल्लाह पुत्री )के साथ समागम प्रसिद्ध है।"यदयपि यहाँ ग्रंथकार ने पराशर के दिव्यशक्ति से कोहरा पैदा कर लज्जा ढकने की कोशिश की है,किन्तु उत्त्थ्यपुत्र दीर्घतमा -ऋग्वेद के कितने ही सूक्तो के कर्ता तथा पीछे गौतम नाम से प्रसिद्ध गौतम-गोत्रियो के प्रथम पूर्वज -ने लोगो के सामने ही स्त्री समागम किया।
"उस पुराने युग में ऋतुकाल के अवसर पर स्त्री किसी पुरुष से रति की भिक्षा माँग सकती थी।शर्मिष्ठा ने इसी तरह ययाति से रति भिक्षा माँगी थी (महाभारत ,आदिपर्व 82) यहीनहीं  ऐसी भिक्षा का देना न स्वीकार करने पर गर्भपात के सामान  होता है,यह भी वही बताया गया है।उलूपी ने भी अर्जुन से रति भिक्षा मागते हुए कहा था कि  स्त्री की प्रार्थना पर एक रात का समागम अधर्म नहीं है। उतंक ने ऋतु  शांति के लिए अपनी गुरु-स्त्री के साथ गमन किया और उसे बुरा नहीं समझा गया।चंद्रमा ने अपने गुरु बृहस्पति की भार्या तारा  के साथ रति की,जिस से बुध पैदा हुआ। गौतमी पत्नी अहल्या का इंद्र के साथ सबंध प्रसिद्ध  है,किन्तु गौतम ने अपनी पत्नी को सदा के लिए त्याज्य नहीं बनाया।


महाभारत काल में विवाह-बंधन कितना शिथिल था,इसके कितने ही उदहारण तो कुमारी कन्याओ से प्रतिष्ठित पुत्र(कानीन )हैं। पांडवो की माँ कुंती जब कुमारी थी ,तभी उस से कर्ण पैदा हुआ था। कुमारी गंगा से शांतनु ने भीष्म को पैदा किया था।पराशर ने कुमारी सत्यवती (मल्लाह पुत्री ) से व्यास को पैदा किया था,पीछे यही सत्यवती शांतनु की रानी बनी।कुंती की सौत माद्री की जन्मभूमि मद्रप्रदेश (वर्तमान स्यालकोट के आस-पास के ज़िले )के उन्मुक्त स्त्री -पुरुष सम्वन्ध की कर्ण ने कड़ी आलोचना की है। .....मद्र देश में पिता ,पुत्र ,माता ,सास ,ससुर ,मामा ,जमाई बेटी ,भाई पाहून ,दास ,दासी का यौन  समिश्रण बहुत ज्यादा था। वहा  की स्त्रिया स्वेच्छापूर्वक पुरुष -सहवास करती ,अपरिचित के साथ भी प्रेम के गीत गाती।गांधारियो की भाति माद्रिया  भी शराब पीती ,नाचती।वहा वैवाहिक सम्वन्ध नियत न था ,स्त्रिया मनमाना पति करती।एक स्त्री के कई पति का उदहारण प्रातः -स्मरणीय पञ्च -कन्यायो में एक द्रोपदी हमारे सामने मौजूद है।

"बहिन ,बेटी -पोती के साथ के व्याह के कितने ही उदहारण हमें इन  पुराने ग्रन्थो में मिलते है।इक्ष्वाकु के निर्वासित कुमारो ने अपनी बहिनों से व्याह कर शाक्य वंश की नीव डाली -एस तरह का व्याह स्याम के राजवंश में अब भी मौजूद है। दशरथ जातक के अनुसार सीता राम की बहिन और भार्या दोनों थी।ब्रह्मा की अपनी पुत्री सरस्वती पर आसक्ति पूरण प्रसिद्ध है।ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की कन्या ने अपने दादा (ब्रह्मा )से व्याह किया था। बिना व्याह के स्त्री -पुरुषो का जिस तरह उन्मुक्त सम्वन्ध उसे देखते कोई कह नहीं सकता की यौन सदाचार भारत में सब देश -काल में एक सा चला आया है।जो बात भारत के बारे में है,वही दुनिया के दुसरे मुल्को पर भी लागू है।"

यौन ही नहीं सभी प्रकार के सदाचार बराबर बदलते रहते है।एंगेल्स ने इसी बात की और ध्यान दिलाते हुए लिखा है --
"यदि सच -झूठ के सम्बन्ध में हमने बहुत तरक्की नहीं की ,तो भलाई -बुराई के बारे में तो हम और भी पीछे रहे । भलाई -बुराई का ख्याल एक जाति से दूसरी जाति ,एक काल से दुसरे काल में इतना बदला है कि अक्सर वह एक दुसरे से बिलकुल उलटा है।

एथेंस का न्याय वही नहीं था ,जो आज के इंग्लैंड या भारत का है।याज्ञावल्क्य की भाती सुकरात के श्रोता भी दासता को अन्याययुक्त नहीं समझते थे। बीसवी सदी के भारत में कितनी ही बाते न्यायनुमोदित है ,जिन्हें २२ वीं सदी का भारत अन्याय नहीं समझेगा।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...