डॉ आंबेडकर द्वारा वर्ण व्यवस्था के बारे में गाँधी की आलोचना का उत्तर (पैरा 6 )
क्या महात्मा गाँधी जिस बात का प्रचार करते है स्वयं भी उस पर चलते है ?जिस चीज का उपयोग सब जगह होता हो,उसका व्यक्तिगत रूप से वर्णन करना मनुष्य पसंद नहीं करता।लेकिन जब मनुष्य किसी एक सिद्धांत का प्रचार करता है,और उसे एक सिद्धांत मानता है,तो यह जानने की इच्छा होती है कि वह व्यक्ति स्वयं उस बात पर कहाँ तक व्यहार करता है,जिसका वह स्वयं प्रचार करता है।यह संभव है कि उन सिद्धांतो के अनुसार चलने में उसे सफलता न मिली हो,क्योकि या तो उसके सिद्धांत इतने ऊँचे है कि उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता,अथवा उनके अनुसार व्यहार करने में असफलता का दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि यह केवल उस व्यक्ति का स्वाभाविक घमंड है।कुछ भी हो,वह हमारे सामने जांच के लिए छोड़ देता है।
मुझे कुछ दोष नहीं देना चाहिए अगर मै महात्मा जी से यह पुछू कि उन्होंने अपने सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए अपनी ही व्यस्था में कितना प्रयत्न किया है। जन्म से महात्मा जी बनिया है।उनके पुरखे कामर्स त्याग कर राजवाड़ा के दीवान बन गए ,जो ब्राह्मणों का पेशा है। महात्मा जी को अपने महात्मा बनने से पहले जीवन में जब पेशा अपनाने का समय आया तो उन्होंने तौल की अपेक्षा बैरिस्टरी को उचित समझा। फिर कानून का पेशा त्याग कर वह आधे राजनीतिज्ञ और आधे संत बन गए। वाणिज्य जो उनके पूर्वजो का पेशा है, उन्होंने कभी छुआ तक नहीं। मै उनके छोटे पुत्र को लेता हूँ, वह जन्म से बनिया और अपने पिता का सच्चा अनुयायी है। उसने एक समाचार पत्र के मालिक के यहाँ नौकरी कर रक्खी है, और अपना विवाह एक ब्राह्मण लड़की के साथ किया है। मुझे नहीं मालूम कि महात्मा जी ने अपना पैतृक पेशा न करने के लिए उसे कभी बुरा कहा हो। किसी भी आदर्श की जाँच करने के लिए उसके केवल निकृष्टतम उदाहरणो को लेना गलत एव कठोर हो सकता है। निश्चय ही महात्मा जी से अच्छा कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता।
अगर वो स्वयं अपने आदर्शो को सिद्ध करने में सफल नहीं होते है तो उनका वह सिद्धांत निश्चय ही असंभव है और व्यक्ति के व्याहारिक ज्ञान के बिलकुल विपरीत है।
जिन लोगो ने कर्लायल की पुस्तको का अध्ययन किया है, वे जानते है कि वह सोचने से पहले ही किसी विषय पर बोल दिया करता था। मालूम नहीं जाति -भेद के विषय में महात्मा जी दशा वैसी ही तो नहीं है। नहीं तो कई प्रश्न जो मेरे ध्यान में आते है,ऐसे ही वह बच कर नहीं निकल सकते। किसी व्यक्ति के लिए किस समय किसी कार्य को अनिवार्य ठहराने के लिए कोइ कार्य पैतृक माना जा सकता है? क्या किसी पैतृक पेशे को चाहे वह उसकी क्षमता के अनुरूप न हो और उससे कोई लाभ भी न होता हो, उसे करना उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है? क्या किसी ऐसे पैतृक व्यवसाय से चाहे वह व्यक्ति को पाप युक्त ही क्यों न हो, पेट पालना चाहिए? अगर हर मनुष्य के लिए यह अनिवार्य हो कि वह अपने बाप-दादा का ही पेशा करे तो कुटने के बेटे को कुटना ही बनना चाहिए, क्योकि उसका दादा कुटना था और उसकी स्त्री को वेश्या ही बनना चाहिए, क्योकि उसकी दादी वेश्या थी? क्या महात्मा जी अपने बाद के तर्कयुक्त परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार है? मेरे विचार से उनके आदर्श में व्यक्ति को वही व्यवसाय करना चहिये जो उसके बाप-दादा का हो? यह केवल असंभव या अव्यवहारिक ही नहीं अपितु नैतिक दृष्टि से भी अमानवीय है।
अगर वो स्वयं अपने आदर्शो को सिद्ध करने में सफल नहीं होते है तो उनका वह सिद्धांत निश्चय ही असंभव है और व्यक्ति के व्याहारिक ज्ञान के बिलकुल विपरीत है।
जिन लोगो ने कर्लायल की पुस्तको का अध्ययन किया है, वे जानते है कि वह सोचने से पहले ही किसी विषय पर बोल दिया करता था। मालूम नहीं जाति -भेद के विषय में महात्मा जी दशा वैसी ही तो नहीं है। नहीं तो कई प्रश्न जो मेरे ध्यान में आते है,ऐसे ही वह बच कर नहीं निकल सकते। किसी व्यक्ति के लिए किस समय किसी कार्य को अनिवार्य ठहराने के लिए कोइ कार्य पैतृक माना जा सकता है? क्या किसी पैतृक पेशे को चाहे वह उसकी क्षमता के अनुरूप न हो और उससे कोई लाभ भी न होता हो, उसे करना उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है? क्या किसी ऐसे पैतृक व्यवसाय से चाहे वह व्यक्ति को पाप युक्त ही क्यों न हो, पेट पालना चाहिए? अगर हर मनुष्य के लिए यह अनिवार्य हो कि वह अपने बाप-दादा का ही पेशा करे तो कुटने के बेटे को कुटना ही बनना चाहिए, क्योकि उसका दादा कुटना था और उसकी स्त्री को वेश्या ही बनना चाहिए, क्योकि उसकी दादी वेश्या थी? क्या महात्मा जी अपने बाद के तर्कयुक्त परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार है? मेरे विचार से उनके आदर्श में व्यक्ति को वही व्यवसाय करना चहिये जो उसके बाप-दादा का हो? यह केवल असंभव या अव्यवहारिक ही नहीं अपितु नैतिक दृष्टि से भी अमानवीय है।
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