विनयपिटक और अशोक के शिलालेख में प्रयुक्त तिथियों के नामकरण आज प्रयुक्त तिथियाँ से हूबहू क्यों मेल खाती हैं ??
विनयपिटक बोधियों (ज्ञानियों)का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें विनय अर्थात नियमों का संकलन है। भिक्खुसंघ के लिये 227 और भिक्खुनी संघ के लिये 311विनय दिए गये हैं उपासक और उपसिका संघ के विनयपिटक भी थे लेकिन अभी उपलब्ध नहीं हैं।
विनयपिटक अनुसार कोई विनय टूटने पर उपोसथागार की व्यवस्था थी। उपोसथागार अर्थात अपराध स्वीकृती का स्थल। हर उपसथागार की सीमायें निर्धारित थी।
और तिथियाँ भी निर्धारित थी। विनयपिटक अनुसार यह तिथियाँ पखवाड़े की दोनों अष्टमियाँ , अमावस्या के पूर्व की चतुर्दशी तथा पूर्णिमा हैं।
सम्राट अशोक के अभिलेखों में भी इन तिथियों पर जीव हिंसा प्रतिबंध की गई थी।
देखिये दिल्ली टोपरा स्थित मुख्य शिला स्तंभ का भाग पांच की पंक्ति
"अठमीपखाये चातुदसाये पंनडसाये तिसाये"
𑀅𑀞𑀫𑀻𑀧𑀔𑀸𑀬𑁂 𑀘𑀸𑀢𑀼𑀤𑀲𑀸𑀬𑁂 𑀧𑀁𑀦𑀟𑀲𑀸𑀬𑁂 𑀢𑀺𑀲𑀸𑀬𑁂
जो आज पंचांग प्रचलन में है उसमें भी तिथियाँ के नाम विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों में उल्लेखित तिथियाँ जैसे अठमी अब अपभ्रंषित शब्द (अष्ठ्मी), चातुदस अर्थात अब अपभ्रंषित शब्द (चतुर्दर्श)
पंनडसाये अर्थात पंचदशी (अमावस्या ) तिसाये अर्थात तीसवें , पुण्णिमा (पूर्णिमा) उल्लेखित हैं।
यही तिथियाँ हम आज भी उपयोग कर रहे हैं।
सम्राट अशोक के बाद सबसे बड़ा बुद्धिस्ट राजा शक वंशीय कुषाण हुये हैं। शक संवत इसी कुषाण वंशी राजा कनिष्क ने 78 ई में शुरू किया है । शक संवत आज भारत का राष्ट्रीय संवत भी है
विक्रम संवत लगभग 57 ईसा पूर्व में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। जिसे चंद्रगुप्त विक्रमादिय ने शूरू किया है। और आपको ज्ञात होगा की विक्रमादित्य नाम की उपाधि धारण करने वाले राजाओं की संख्या 100 से अधिक है। धम्मलिपि में एक अभिलेख भी मिलता है जिसमें वेकमादत 𑀯𑁂𑀓𑀫𑀸 𑀤𑀢 राजा का उल्लेख है।
अर्थात विक्रमादिय शब्द भी वेकमादत से ही अपभ्रंषित हैं।
विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों में उल्लेखित तिथियाँ और आज प्रयोग की जा रही तिथियाँ हूबहू मेल खाती हैं ।
इससे यह सिद्ध होता है कि शक संवत और विक्रम संवत विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों में उल्लेखित पंचाग का ही अनुकरण है।
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