!!चंबल के बाग़ी भी रहे हैं स्वतंत्रता संग्राम के सैनानी!!
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चंबल के घने बीहड़ और उसकी ऊँची-नीची घाटियाँ सदियों ही से अत्याचार पीड़ित विद्रोहियों की शरण स्थली रही रहे हैं। किंवदंतियों के अनुसार जब परशुराम ने सारी पृथ्वी से क्षत्रियों को समूल नष्ट करने का प्रण लिया और अधिकांश का वध कर डाला, तब उनमें बहुत से क्षत्रियों ने इसी चंबल के बीहड़ में आकर शरण ली थी। अत्याचार पीड़ित क्षत्रियों ने चंबल के जिस-जिस धारा-क्षेत्र को अपना शरण स्थल बनाया था, वह धार या घार क्षेत्र उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हुआ--जैसे कछवाह घार, तँवर घार इत्यादि। बीहड़ और बाग़ियों के लिए प्रसिद्ध चंबल की इस धरती ने अपने आँचल में कई इतिहास प्रसिद्ध पुरूषों को उनके संकट काल में शरण दी है। इतिहास के प्रसिद्ध जन-नायक चंद्रगुप्त मौर्य ने इसी क्षेत्र को सिकंदर और बाद में उसके सेनापति सेल्यूकस की आक्रमणकारी सेनाओं का समाना करने के लिए, अपने सैनिक अभियान का केन्द्र बनाया था। प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने लेखों में मथुरा के पूर्व में विद्रोही-डाकुओं के होने का जिक्र किया है।
इसी तरह जब तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई और दिल्ली सल्तनत पर मुहम्मद गौरी के गुलाम कुतबुद्दीन ऐबक का शासन आया, तब दिल्ली के आसपास के अधिकांश हिन्दू राजाओं ने चंबल और यमुना के दोआब में आकर ही शरण ली थी। भिण्ड जिले के जिस अंचल को आज भदावर धार कहते हैं उसके रहवासी ‘भदौरिया ठाकुर’ अपने को दिल्ली से पराजित होकर आगरा के पास यमुना नदी के किनारे ‘भदौरा’ गाँव में आ बसे, चौहान भादू राणा का वंशज मानते हैं। सन् 1860 में प्रकाशित ब्रिटिस गजेटियर वोल्यूम-प्प् डी. एल.’’ ड्रेक बुक मेन्स आई. सी. एस. के अनुसार चंबल के दोआब क्षेत्र के इन विद्रोही शासकों से सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक किसी भी शासक ने उनसे ‘जजिया’ कर नहीं वसूल पाया।
इस बात के भी स्पष्ट साक्ष्य हैं कि आगरा में औरंगजेब की कैद से छूटकर वीर शिवाजी ने भी अपने गुरू स्वामी समर्थ रामदास के साथ, इन्हीं चंबल के बीहड़ों में आकर शरण ली थी। दतिया जिले के सेंवढ़ा तहसील में पड़ने वाले ‘रतनगढ़’ के देवी मंदिर में स्वामी जी ने शिवाजी की मुक्ति के लिए एक चण्डी यज्ञ भी किया था। अपने से बलशाली शत्रु पर धोखे से हमला करके वापस सुरक्षित स्थानों में जा छुपने वाली ‘गुरिल्ला युद्ध प्रणाली’ की प्रेरणा भी शिवाजी को चंबल के बागियों से ही प्राप्त हुई थी। जिसका सफल प्रयोग उन्होंने मुगलों के विरुद्ध महाराष्ट्र जाकर किया और औरंगजेब से ‘पहाड़ी चूहे’ की उपाधि प्राप्त की थी।
चंबल के बीहड़ का प्रमुख केन्द्र है उत्तर प्रदेश के इटावा और जालौन जिले का ‘पचनदा’ क्षेत्र है। यहाँ चंबल, कुँआरी, सिंध, पहूज नदियाँ इकट्ठा होकर यमुना में लय हो जाती हैं। उसके दूसरी ओर है भिण्ड, मुरैना, श्यौपुर इत्यादि जिले, जो आज़ादी से पूर्व ग्वालियर की सिंधिया रियासत के अन्तर्गत आते थे। महाराजा छत्रसाल और बाजीराव पेशवा की संधि के अनुसार सिंधियाओं के राज्य की सीमा रेखा उत्तर में चंबल नदी थी। 1857 ई. में जब अंग्रेजों के विरूद्ध देशी राजाओं ने विद्रोह किया तब चंबल का यह अंचल अंग्रेजों की सहायक संधि के तहत काम कर रही ‘सिंधिया’ रियासत में होने के कारण यहाँ कोई बड़ा विद्रोह तो नहीं हुआ, लेकिन दोहरी शासन व्यवस्था के अन्तर्गत पिसती चंबल की स्वाभिमानी जनता चुप नहीं रह सकी थी। उसके लिए महाराष्ट्र से आए सिंधिया और इंग्लैण्ड के अंग्रेज दोनों ही विदेशी थे!
1192 में तराइन के युद्ध में जब दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान गजनी के सुल्तान से पराजित हुए, तब पृथ्वीराज के एक सेनापति सामंतराव ने अपनी बची खुची सैन्य शक्ति को संगठित कर इटावा व आसपास के इलाकों में अपना राज्य स्थापित किया था। कालांतर में और अधिक सुरक्षित इलाके के रूप में उन्हीं के वंशजों में से एक ने अधिक सुरक्षित इलाके के रूप में ‘पचनदा क्षेत्र के महाभारत कालीन पांडव भीम द्वारा मारे गए बकासुर राक्षस की ऐतिहासिक चक्रनगरी (चकर नगर) को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने चकर नगर में अपना किला और चंबल के किनारे सहसों में अपनी गढ़ी बनाई थी।
1857 में इसी चकर नगर रियासत के राजा कुशलपाल सिंह चौहान थे। आज़ादी की जंग का शंखनाद होते ही, राजा कुशलपाल सिंह और उनके तरूण पुत्र वीर योद्धा निरंजसिंह चैहान ने दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया। इस क्षेत्र के अंग्रेज फौज के बाग़ी सिपाही अपनी सैनिक वर्दियों और बन्दूकों सहित दोआब इलाके में आज़ादी की जंग का परवान चढ़ाने आ डटे दुःख और कष्टों को झेल रही व्यापक जनता किसान, छोटे दुकानदार सभी इस युद्ध में शामिल हो गए। राजा कुशलपाल सिंह जनता में बहुत लोकप्रिय थे। उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में बहुत दक्ष थे। उनका अपना कन्हैया घोड़ा, सहयोद्धा मंगल मेहतर और जंगल मेहतर प्राणों से अधिक प्रिय थे। आज़ादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बाग़ी सिपाहियों, किसानों तथा जनता के सभी समुदायों के नेतृत्व को स्वीकार किया। निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्ति चारो ओर दोआब के इस पार भिण्ड जिले के कुशवाहधार तक फैल गई थी।
उसी दौरान ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज को लेकर जुहीखा घाट पर बर्बर हमला कर दिया और दोआब इलाक में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व स्वयं इटावा का कलेक्टर ए.ओ.ह्यूम कर रहा था। इस युद्ध में दोआब के रणबाँकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या में कुशवाह धार के संग्रामी योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना जी के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए। अंग्रेज दोआब इलाके में दाखि़ल नहीं हो सके।
झाँसी के पतन के बाद झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का कुशवाह धार में आगमन हुआ तब योद्धा निरंजन सिंह और पचनदा क्षेत्र में ही आने वाले भरेह रियासत के राजा रूपसिंह सेंगर अपने योद्धाओं के साथ उनके सहयोग के लिए गये थे और 17 जून 1858 को ग्वालियर के संग्राम में रानी के बलिदान तक साथ रहे थे। झाँसी से कालपी जाते समय कुशवाह धार में पड़ने वाले रौन गाँव के एक जमीदार ने, रानी लक्ष्मीबाई के घोड़े की मृत्यु हो जाने पर अपना घोड़ा और युद्ध के लिए हथियार सैन्य सहायता भी प्रदान की थी। (झाँसी की रानीः वृंदावन लाल वर्मा)
मई 1857 से प्रारंभ स्वतंत्रता संग्राम को 1858 के अंत तक दो वर्षों से अधिक समय तक दोआब क्षेत्र में विद्रोही योद्धा निरंजन सिंह ने न केवल युद्ध जारी रखा बल्कि किसी नदी घाट से बर्बर अंग्रेजी फौजों को इलाके में दाखि़ल नहीं होने दिया, उन्होंने डभोली, दिलीप नगर, जुहीखा, सिकरोदा, नदी घाटों को अंग्रेजों से बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी, बर्बर लुटेरी अंग्रेजी फ़ौजों को करारी शिकस्त देकर विद्रोही चम्बल के मानव की श्रेष्ठ गुणवत्ता से दुनिया को परिचित कराया।
29 मई 1861 में राजा निरंजन सिंह को जयपुर के विश्वासघाती नरेश के इशारे पर वहाँ के पालिटिकल एजेन्ट द्वारा बंदी बना लिया गया था। ब्रिटिश उपनिवेशक शासकों के निष्ठावान सेवक सिन्धिया ने विद्रोही कुशवाहधार के योद्धाओं और उनकी सहयोगी जनता को दण्डित करने का सघन अभियान चलाकर अपने स्थानीय जागीरदारों के सहयोग से साम दाम दण्ड भेद की नीति पर अमल करके बड़ी संख्या में विद्रोहियों को गिरफ्तार कर उनकी हत्याएँ कर दीं थीं और इस कार्य में सहयोग करने वालों को जागीरें तथा इनाम दिए थे।(चंबल घाटी के प्रथम स्वतत्रंता संग्राम 1857 के जननायक: निरंजन सिंह चैहान, अभिनंदन-फरवरी 2007)
इस प्रकार हम देखते हैं कि चंबल में ब्रिटिश हुकूमत के विरूद्ध विद्रोह की जो ज्वाला भड़की थी उसके अपने निजी कारण थे। लेकिन इसमें विद्रोहियों की प्रेरणा उसकी अपनी ग्वालियर रियासत न होकर, चंबल से लगे उ.प्र. के आगरा, इटावा, जालौन, झाँसी जिले तथा उसके अपने क्रांतिकारी योद्धा थे, जिन्होंने चंबल में स्वतंत्रता की चिन्गारी को जन-जन में भड़काया था।
यों तो चंबल अंचल में स्वाधीनता आन्दोलन में अपना अमूल्य योगदान देने वाले कई योद्धा हुए है, लेकिन उनमें ‘गेंदालाल दीक्षित’ नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने चंबल के बाग़पन को अखिल भारतीय स्तर पर क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बनाया था। इनका जन्म आगरा जिले के बाह तहसील के मई गाँव में 1889 में हुआ था। आगरा में पढ़ाई के दौरान देश भक्ति की भवना उनमें हिलोरे मारने लगी। औरैया के डी.ए.वी. स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए उनके मन में बहुत तरह की उमंगे उठती रहीं। उनको अपने देश की अवस्था पर बड़ा दुख होता था। वे आर्य समाजी थे और उस ज़माने में आर्य समाज एक क्रांतिकारी शक्ति के रूप में था। वह केवल एक गुटबंदी नहीं थी, बल्कि लोगों के मन में एक ज्वाला थी, जिसके कारण वे बचैन रहते थे। पर आर्य समाज की भी एक हद तक ही उनकी उमंगों की पूर्ती कर सकता था।
गेंदालाल दीक्षित बंगाल और महाराष्ट्र के क्रांतिकारी आन्दोलन की बात पहुँच चुकी थी और उनका मन व्याकुल था कि किसी भी प्रकार इन क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित किया जाए। पर कैसे किया जाय यह समझ में नहीं आता था। फिर उन्होंने सोचा, क्यों न एकलव्य की तरह ही बिना गुरु के साधना की जाए! इस उद्देश्य से उन्होंने एक समिति बनाई जिसका नाम ‘छत्रपति शिवाजी के नाम पर ‘शिवाजी समिति’ रखा। इस समिति का उद्देश्य देश को स्वतंत्र कराना था, उन्हीं उपायों से जिनसे शिवाजी ने महाराष्ट्र को मुगलों की जंजीरों से छुड़ाया था। स्वभाविक रूप से एक शिक्षक होने के नाते उनका ध्यान अपने आसपास के पढ़े-लिखे लोगों की ओर गया। पढ़े-लिखे लोग उन्नति करने, यानी धन और ओहदे के पीछे पड़े हुए थे। इसके अलावा जिस इलाके में वे कार्य कर रहे थे, वह कुछ अधिक पिछड़ा हुआ भी था। इसलिए उन्होंने कुछ विशेष सफलता नहीं मिली। उन्हें बड़ा दुख हुआ कि पढ़े-लिखे लोग उन्नति माने अपनी उन्नति समझते हैं, देश की उन्नति नहीं। इसलिए उनका ध्यान चम्बल और जमुना के बीच बहुत से लोग डाकू बने हुए हैं और वे बड़े साहसी लोग हैं। उन्हें अपने प्राणों की कोई परवाह नहीं है। अस्त्र-शस्त्र चलाना भी जानते हैं, सज़ा से भी नहीं डरते। यदि इन लोगों का ध्यान स्वार्थी कार्यों की ओर से हट कर देश सेवा की ओर लग जाए, तो बहुत लाभ हो सकता है। इसलिए वे बड़ी आशा के साथ डाकुओं की ओर बढ़े और उन्हीं दिनों उन्हें ब्रह्मचारी नामक एक साथी मिल गया जिन्होंने डाकुओं को आजादी आन्दोलन के पथ में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
गेंदालाल दीक्षित को यह लगा कि अब उन्होंने वह गुर पा लिया है, जिसके जरिये वे भारत की स्वतंत्र करा सकते हैं। पढ़े-लिखे लोग ‘उन्नति’ करना चाहते हैं, वे लिबलिबे हैं। और उनका दिमाग पिलपिला है। यदि उनमें से कुछ देश की सेवा करने को तैयार भी हो जाएँ तो वे मरने-मारने से डरेंगे और सबसे बड़ी कमी यह है कि उन्हें बाकायदा गोलियाँ चलाने की शिक्षा देनी पढ़ेगी; जबकि ये डाकू प्रकृति के पुत्र हैं, न तो मारने से घबराते हैं और न मरने से चौंकते हैं। गोलियाँ चला लेते हैं। अक्सर अच्छे निशानेबाज भी हैं। यदि भारत के सारे डाकू संगठित हो गए और देश का कार्य करने पर तुल गए, तो वे देश को स्वतंत्र करा सकेंगे। इस के अलावा धन की भी किल्लत नहीं रहेगी, क्योंकि जब धन की ज़रूरत होगी तो कहीं डाका डाल लिया जाएगा।
गेंदालाल दीक्षित डाकुओं का संगठित करने के साथ-साथ कुछ छात्रों को भी संगठित करने लगे। इस टोली का नाम ‘मातृवेदी’ रखा गया और इसमें बहुत-से भले घर के लोग शामिल हुए, जिनमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारी ‘राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और औरया के मुकुन्दी लाल का नाम सबसे प्रमुख है। इस प्रकार दीक्षित जी ने डाकुओं के साथ-साथ एक दल और खड़ा गया जिसमें केवल शिक्षित लोग ही थे। इस दल के सामने क्या उद्देश्य था, यह उसके सदस्यों द्वारा गाई जाने वाली प्रतिज्ञा से ही पता लग सकता है। प्रतिज्ञा इस प्रकार है-
है देश को स्वाधीन करना जन्म मम संसार में, तत्पर रहूँगा मैं सदा अंग्रेज-दल संहार में।
अन्याय का बदला चुकाना मुख्य मेरा धर्म है, मद-दलन अत्याचरियों का प्रथम शुचि कर्म है।
मेरी अनेकों भावनाएँ उठ रहीं हृद्धाम में, बस शांत केवल कर सकूँगा मैं उन्हें संग्राम में।
स्वाधीनता का मूल्य बढ़कर है सभी संसार में, बदला चुकेगा हरणकर्ता के रूधिर की धार से।
अंग्रेंज-रुधिर-प्रभाव से निज पितृ तर्पण करूँ, अंग्रेज सिर सहित भक्ति मैं जननि के अर्पण करूँ।
हो तो दुष्ट दुःशासन-रूधिर स्नान से यह द्रोपदी, हो सहस्रबाहु विनाश से यह रेणुका सुख में पगी।
है कठिन अत्याचार का ऋण ब्रिटिश ने हमको दिया,सह ब्याज उसके उऋण का हमने कठिन प्रण है किया।
मैं अमर हूँ मेरा कभी भी नाश हो सकता नहीं, है देह नश्वर त्राण इसका हो नहीं सकता कहीं।
होते हमारे मात जग में पद-दलित होगी नहीं, रहते करोड़ों पुत्र के जननी दुखित होगी नहीं।
उद्धार हो जब देश का इस क्लेष से तलवार से, भयभीत होंगे नहीं हम जेल से कारागार से।
रहते हुए तन प्रण रण से मुख न मोड़ेंगे कभी, कर षक्ति है जब तक न अपने शस्त्र छोड़ेगे कभी।
परतंत्र होकर स्वर्ग के भी वास की इच्छा नहीं, स्वाधीन होकर नरक में रहना भला उससे कहीं।
है सुवर्ण पिंजर वास अति दुःखपूर्ण सुन्दर कीर को, वह चाहता स्वच्छंद विचरण अति विपन गंभीर को।
जंजीर की झंनकार में शुभ गीत गाते जाएँगे, तलवार के आघात में निज जय मनाते जाएँगें।
हे ईश! भारतवर्श में शतबार मेरा जनम हो, कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।
इस प्रकार गेंदालाल दीक्षित एक तरफ तो डाकुओं का संगठन करते रहे। इसमें उनका दाहिना हाथ लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी रहे। ब्रह्मचारी बहुत ही साहसी व्यक्ति था और अपनी जान हथेली पर लिए घूमता था। यहाँ तक कि ग्वालियर राज्य को यह फिकर हुई कि ब्रह्मचारी को पकड़ लिया जाए, यद्यपि उस समय तक किसी को पता नहीं था कि ब्रह्मचारी इस प्रकार एक क्रान्तिकारी नेता की देख-रेख में कार्य कर रहा है। चारों तरफ खुफिया दौड़ने लगे और लोगों से कहा गया कि ब्रह्मचारी को गिरफ्तार करा दो तो इनाम-इकराम मिलेगा।
पर ब्रह्मचारी पकड़ में नहीं आया और अपना काम साहस के साथ करने लगा। अस्सी आदमियों का एक गिरोह बन और इस गिरोह के साथ ब्रह्मचारी तथा गेंदालाल एक महाजन के यहाँ डाका डालने के लिए रवाना हुए। धनी का घर बहुत दूर था, इसलिए पैदल चलते हुए रास्ते में एक जगह पड़ाव डालना ज़रूरी था। वहीं पर खाने-पीने की व्यवस्था हुई और सब लोग विश्राम करने लगे।
उनके साथ में एक ऐसा आदमी भी था जो पुलिस से मिला हुआ था। उसने सोचा कि अच्छा मौका है, किसी तरह ब्रह्मचारी को ज़हर खिला दूँ तो काम बन जाए। इस लिए वह सबकी सेवा करने के लिए बड़े उत्साह से आगे बढ़ा। उसने पूड़ियाँ बनवाईं और ज़हर डाली हुईं पूड़ियाँ ब्रह्मचारी के सामने रख दीं। जब ब्रह्मचारी ने पूड़ियाँ खाईं, तो उसकी जीभ ऐंठने लगी। पर वह बहुत तगड़ा आदमी था, मरा नहीं। इसके विपरीत वह सावधान हो गया और उसने चारों तरफ आँखें दौड़ाकर समझ लिया कि इसके लिए कौन दोषी है। मुख़बिर ने भी समझ लिया कि उसका पता लग गया है तो वह जल्दी से पानी लेने के बहाने जाने लगा। इस पर ब्रह्मचारी ने पास रखी बंदूक उठाई और धाँय से वहीं गोली मार दी। गोली चलते ही चारो तरफ हलचल मच गई और पास ही कहीं पुलिस थी, वह भी आ गई। मुख़बिर ने पुलिस वालों को आस ही पास रखा था। पुलिस और ब्रह्मचारी के दल में डटकर लड़ाई हुई और दल के पैंतीस आदमी वहीं पर गोली से मारे गए। पुलिस वाले संख्या में कम थे, पर उनके पास सब तरह का सामान था। जो मारे गए सो मारे गए और घटनास्थल पर ब्रह्मचारी और गेंदालाल गिरफ्तार हो गए।
गेंदालाल तो गिरफ़्तार हो गए पर उनके युवक काम करते रहे। यह तय हुआ कि एक टुकड़ी ग्वालियर जाए और जेल तोड़कर गेंदालाल को निकाल लाए, पर यह काम अभी हो नहीं पाया था, योजना चालू थी कि षड्यंत्र फूट गया और गिरफ्तारियाँ हुईं। इस प्रकार वह षड्यंत्र चला जिसका नाम ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ पड़ा। ग्वालियर जेल में गेंदालाल दीक्षित पर बहुत अत्याचार हुए, ग्वालियर से जब उन्हें मैनपुरी जेल लाया गया और कुछ दिन में ही वे जेल से फ़रार हो गए। ग्वालियर जेल में दी गई यातनाओं के कारण उन्हें क्षय रोग हो गया था। एक क्रांतिकारी मित्र ने उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। अपने अंतिम समय में गेंदालाल ने अपनी पत्नी से कहा था-‘‘तुम रोती हो तो रोओ, किन्तु-आखिर इस रोने से क्या हासिल? दुःख तो मुझे भी है। मैंने किस बात का बीड़ा उठाया था और उसे कितना सिद्ध कर पाया। मर तो मैं रहा हूँ, पर जिस कारण मैं मर रहा हूँ वह पूरा कहाँ हुआ। मैं यह देखकर मर रहा हूँ कि मैंने जो कुछ भी किया वह छिन्न-भिन्न हो गया। मुझे दुःख है कि माता पर अत्याचार करने वालों से बदला नहीं ले सका, जो मन की बात थी वह मन में ही रह गई। मेरा यह शरीर नष्ट हो जाएगा, किन्तु मैं मोक्ष नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि बार-बार इसी भूमि पर जन्म लूँ और बार-बार इसी के लिए मरूँ। ऐसा तब तक करता रहूँ जब तक कि देश गुलामी की जंजीरों से छूट न जाए।’’
उनके साथी डाकुओं को तो पहले ही सजा हो चुकी थी, पर मैनपुरी में जो षड्यंत्र चला, उसमें कई लोगों को छः छः साल की सजा हुई थी। एक सबसे मज़ेदार बात यह है कि इसमें नेता तो जेल से भाग गया था और राम प्रसाद बिस्मिल पकड़े नहीं जा सके। मकुन्दी लाल तथा अन्य कुछ लोगों को सजाएँ हुईं। पर ये लोग भी जल्दी आम माफ़ी में छूट गए। केवल मुकुन्दी लाल को नहीं छोड़ा गया और उन्हें सज़ा काटनी पड़ी। गेंदालाल दीक्षित 21 दिसंबर 1920 को सरकारी अस्पताल के क्षय-रोग वार्ड में अनाथों की तरह दुःखद मृत्यु हुई थी।
कहने को तो चंबल के इस अमर बाग़ी के साथ ही चंबल में बग़ावत की चिंन्गारी समाप्त हो जानी थी, लेकिन विद्रोह की ज्वाला को अखिल भारतीय स्तर पर और ज्यादा भड़काया था गेंदालाल दीक्षित की ‘मातृवेदी संस्था’ के दो युवा राम प्रसाद बिस्मिल और मकुन्दी लाल ने। जो आगे चलकर काकोरी कांड के अभियुक्त बने और जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी की सज़ा हुई थी। गेंदालाल दीक्षित का यह दल बंगाल के दल से स्वतंत्र था।
पं. राम प्रसाद बिस्मिल के बाप दादा मूल रूप से ग्वालियर राज्य के रहने वाले थे। तोमर घार में चम्बल नदी के किनारे के दो गाँव रुअर-बरबाई उस युग मेें बहुत प्रसिद्ध थे, क्योंकि वहाँ के लोग बड़े ही उदण्ड थे।, कभी कर नहीं देते थे। कई बार राजा की तरफ़ से फौज़ आदि भेजी जाती थी, तो लोग अपने जानवरो को लेकर जंगलों में चल देते थे। घर पर ऐसी कोई चीज़ नहीं छूटती थी, जिसे बेचकर अधिकारी कुछ वसूल कर सकते। वहाँ के एक ज़मींदार के सम्बन्ध में यह कथा है कि एक बार राज्य के लोगों ने उसे पकड़ लिया और बहुत सताया। कई दिनों तक उन्हें भूखा-प्यासा रखा, फिर पैरों में सूखी घास डलवाकर आग लगवा दी, पर वह टस से मस न हुआ। उसका कहना यही था कि मैंने मालगुजारी नहीं दी तो इतने बड़े महाराज हैं, उनका क्या बिगड़ जाएगा? राज्य को यही बात लिख दी गई तो उस ज़मीदार के पास जितनी ज़मीन थी, वह उसे माफ़ी में दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल के पूर्वज इन्हीं गाँवों के तोमर ठाकुर थे, जो घरेलू झगड़ों के चलते शाहजहाँ पुर चले गए थे।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा आर्यसमाज स्कूल में हुई थी, स्वामी सोमदेव को वे अपना गुरू मानते थे। स्वामी जी की मृत्यु के बाद रामप्रसाद देशभक्ति की पुस्तकें पढ़ने लगे और उनके मन में यह चेतना जागी कि अपने परिवार से भी बड़ा कोई समुदाय है और देशवासी बड़े दुःखी हैं। वे इसके बाद लखनऊ कांग्रेस का अधिवेशन देखने गए। इसी अवसर पर रामप्रसाद को यह मालूम हुआ कि क्रांतिकारियों की कोई गुप्त समिति भी कार्य कर रही है और उन्होंने निश्चय किया कि क्रांतिकारी आन्दोलन में भाग लेना चाहिए। इस आन्दोलन के नेता पं. गेंदालाल दीक्षित थे। समिति को धन की कमी थी। पर लोगों को क्रांतिकारी बनाने के लिए साहित्य की ज़रूरत थी, इसीलिए पुस्तक लिखी गई--‘अमरीका को स्वाधीनता कैसे मिली’। साथ ही एक पर्चा भी छापा। ब्रिटिश सरकार ने पर्चा तथा पुस्तक दोनों ही ज़ब्त कर लिए। (भारत के क्रांतिकारीः मन्मथ गुप्त)
राम प्रसाद ‘मातृवेदी’ संगठन के लिए कई पिस्तौलें, टोपीदार बन्दूकें आदि एकत्रित कर लीं। मैनपुरी में कुछ क्रांतिकारी गिरफ्तार हो चुके थे और उन पर मुकदमा चल रहा था। इन्हीं दिनो दिल्ली में कांग्रेस हुई। यह तय हुआ कि ज़ब्त पुस्तक ‘अमरीका को स्वतंत्रता कैसे मिली’ की बाकी प्रतियाँ कांग्रेस में बेची जाएँ। वहाँ खुल्लम-खुल्लाा नवयुवक यह कहकर पुस्तक बेच रहे थे कि यू.पी. में ज़ब्त किताब ले लो। पुलिस वालों को इसकी खबर लगी और खुफ़िये पुस्तकें पकड़ने दौड़ पड़े। एक टेण्ट में दो सौ के करीब ज़ब्त पुस्तके थीं। रामप्रसाद एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला हाथ पर लगाए हुए, अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटकर, पुलिस के सामने से निकल गए।
इस के बाद वे बराबर क्रान्तिकारी कार्य करते रहे। दिल्ली कांग्रेस से लौटकर वे शाहजहाँपुर पहुँचे। वहाँ पकड़ धकड़ जारी थी। इसलिए वे वहाँ से चल पड़े । सात आठ आदमी थे। रात के दो बजे थे। पुलिस वालों ने टोका तो ‘छात्र हैं, लखनऊ जा रहे हैं,’ कह कर बचे। अब मालूम हुआ कि मैनपुरी षड्यंत्र में रामप्रसाद का भी वारंट है। इसलिए वे भागकर गाँव पहुँचे और वहाँ बिलकुल खेतिहर की तरह खेती करने लगे और थोड़े ही दिनों में अच्छे-खासे किसान बन गए थे।
राम प्रसाद का फ़रारी का जीवन बड़ा कष्टकर रहा था। इसी बीच प्रथम महायुद्ध समाप्त होने पर कुछ राजनीतिक कैदियों को आम माफ़ीनामें में छोड़ दिया गया, साथ ही फ़रारों पर से गिरफ्तारी का परवाना होने के कारण राम प्रसाद अब खुलेआम घूमने लगे थे। असहयोग आन्दोलन की लहर पूरे देश में फैल गई थी। राम प्रसाद ने रोजी-रोटी के लिए गाँधी के चरखा और करघा से प्रेरित हो बुनकर बन गए। ‘बोल्सेविको की करतूत’, ‘मन की लहर’ और ’स्वदेशी रंग’ क्रांतिकारी पुस्तकें भी लिखीं। चौरी चौरा कांड के कारण गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया था। इससे क्रांतिकारियों में ही नहीं गाँधी के सच्चे अनुयायी मोती लाल नेहरू इत्यादि में भी निराशा पैदा हो गई थी। जब आन्दोलन वापस ले लिया गया तो क्रांतिकारी फिर संगठन में लग गए।
उत्तर भारत में शचीन्द्रनाथ सान्याल के नेतृत्व में फिर से क्रांतिकारी दल अंगड़ाई लेकर उठ खड़ा हुआ। राम प्रसाद अपने साथी अशफ़ाकउल्ला, रोशनसिंह, प्रेमकृष्ण खन्ना आदि के साथ इसमेें शरीक हो गए। राम प्रसाद को अस्त्र-शस्त्र खरीदने, चलाने, छिपाने तथा डकैतियाँ डालने का अच्छा अनुभव था, इस कारण वे जल्दी ही दल के ‘हिंसा-विभाग’ के नेता हो गए। डकैतियाँ डालना इसलिए जरूरी था कि दल को धन चाहिए था, पर्चे छपाने को पैसा चाहिए थे, अस्त्र-शस्त्र के लिए पैसे चाहिए थे तथा चैबीस घंटे दल का कार्य करने वाले लोगों को सत्तू-चना खिलाना था। रेल का किराया देना था, इत्यादि इत्यादि। इस दल का नाम ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ रखा गया। उद्देश्य ऐसे प्रजातंत्र की स्थापना था, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण असंम्भव हो। दल के अन्य नेताओं में सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, दामोदरस्वरूप सेठ, राजेन्द्र नाथ लहिड़ी, विष्णुशरण दुबलिस आदि थे। दल की एक क्रांतिकारी परिषद थी, जिसमें सारे निर्णय किए जाते थे।
कुछ दिनों तक गाँवों में डकैतियाँ डालने के बाद दल को यह अनुभव हुआ कि यह ठीक नहीं है। इसमें धन कम मिलता था, साथ ही कई बार साहसी गाँव वालों पर बेकार का अत्यचार होता था, कई बार मुख़बिर भी ग़लत खबर देते थे। चंबल में रहते हुए राम प्रसाद को पता था कि मध्यकाल में जब इस अंचल से मुगलों की सेना रसद लेकर इधर से गुज़रती थी, तो यहाँ के बाग़ी उसे लूट लिया करते थे। इस काम में यहाँ के स्थानीय राजा भी उनकी मदद किया करते थे। दूसरे क्रांतिकारियों के लिए डाका डालना तो आवश्यक था। रूस तथा इंग्लैण्ड के क्रांतिकारी भी दल के लिए डाका डाला करते थे। रूसी नेता स्तालिन ने इसी प्रकार बाकू के पास एक डाके में भाग लिया था। तब इस सम्बन्ध में बहुत सोच-विचार के बाद राम प्रसाद ने निर्णय लिया कि यदि लूटना ही है तो सरकारी माल क्यों न लूटा जाए? राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके क्रांतिकारी साथियों की इसी मंशा का परिणाम था; भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह स्वर्णिम अध्याय--‘काकोरी काण्ड’। जिसके अन्तर्गत 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जा रही 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन को मात्र दस क्रांतिकारियों ने मिलकर काकोरी स्टेशन के नज़दीक लूट लिया था। काकोरी ट्रेन डकैती में जिन लोगों ने भाग लिया था, उनके नाम इस प्रकार थे--राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मन्मथनाथ गुप्त थे। इनमें बनवारी लाल बाद को मुखबिर बन गया।
कुछ दिन बाद सब अभियुक्तों पर लखनऊ जिला जेल में मुकदमा चला, मुकदमें में दफ़ा 121(सम्राट के विरूद्ध युद्ध-घोषणा), 120(राजनीतिक षड्यंत्र), 396(कत्ल-डकैती), 302(कत्ल) के अनुसार अभियोग पेश किया गया। अट्ठारह महीने मुकदमा चलने के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ लहिड़ी और रोशन सिंह, असफाकउल्ला को 17-19 दिसंबर 1927 को फाँसी हुई। काकोरी कांड में शामिल चन्द्रशेखर आज़ाद गिरफ्तार नहीं किए जा सके थे। जिन्होंने बाद में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, बटुकेश्वर दत्त इत्यादि शहीदों के साथ, चंबल के बाग़ियों की उस विद्रोही परंपरा को अपने शहीद होने तक सम्पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया था।...
आज़ादी के बाद इतिहास का उत्खनन का कार्य बहुतेरे कारणों यथा विश्वासघातियों के चेहरे उजागर होने, स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं की आज़ादी की अवधारणा सामने आने के फलस्वरूप विभिन्न शासक वर्गों के घिनोने जनविरोधी चरित्र बेनक़ाब होने के डर आदि से नहीं किया है। यही कारण है कि शहीदों को उनके विचारों आदर्शों के आधार पर स्मरण न कर औपचारिक रूप से रस्म अदाई कर ली जाती है।
-जितेन्द्र विसारिया
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