शनिवार, 14 अगस्त 2021

आज़ादी

आज़ादी की पूर्व संध्या पर एक पंजाबी कविता
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जिसको गुरुदास राम आलम ने लिखी थी। द्वारका भारती ने इसका अनुवाद किया है। 

क्यों भाई निहाल सिंह ,आजादी नहीं देखी ?
ना रे भैया न खाई न देखी !

मैंने जग्गू से सुना ,अम्बाले खड़ी थी 
बहुत बड़ी भीड़ उसके गिर्द लगी थी 
बिरले के घर की ओर चेहरा था उसका 
और लोगो की ओर पीठ थी उसकी 

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लगता है गरीबो से खफ़ा हुई है 
अमीरों के हत्थे पर चढ़ी हुई है 
अख़बारों में पढ़ा वह बड़ी जबर है 
सुंदर तो नहीं है यो भी कानी है 
माने गर कहना हमारा ,हम भी उसे बुलाए 
अपनी झुग्गी-झोपड़ी में ,ज़मी पर सुलाए 
पर पता नहीं क्या खाती है वह 
किस चीज से दिल चुराती है वह 
शिमला में उसके आगे अंडे होते है 
हमारी नाद में सूखे तंडे होते है। 

            दलित निर्वाचित कविताएं 
              कँवल भारती


 

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