सोमवार, 23 अगस्त 2021

बौद्ध विषय पर लेख

 बौद्ध संस्कृति की परंपरा


आज जहाँ इराक है, वहाँ कभी सुमेरियन सभ्यता थी।


सुमेरियन सभ्यता का प्राचीन शहर ऊर था। यह समय - समय पर सुमेर की राजधानी थी।


राजधानी ऊर से भारत में बने चूने - मिट्टी के बर्तन मिले हैं। ऊर का सिंगारदान हड़प्पा जैसा है।


द्रविड़ भाषाओं में जो ऊर है, वहीं प्राकृत भाषा में वुर है, यहीं तंजावुर ( तंजौर ) में है। ऊर स्थानबोधक है।


बुद्ध के समय में बोध गया के निकट उरुवेला था। वह उरुवेला वर्तमान का गाँव उरेल है। सुमेरी भाषा से भारत की द्रविड़ भाषाएँ प्राचीन हैं।


सो सुमेरियन सभ्यता का ऊर भारत से लिया गया है। वो भी सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ने के बाद लिया गया है।


सिंधु घाटी सभ्यता का यह ऊर बुद्धकाल के गाँव उरुवेला से जुड़ता है।


स्वयं सुमेरियन सभ्यता ने भारत से अपनी राजधानी का नाम ऊर लिया था।


सुमेर का प्रसिद्ध नगर निप्पुर था। निप्पुर में पुर है। सुमेरी ऊर और पुर वहीं शब्द हैं, जो पूरे भारत के नगरों में व्याप्त हैं।


सुमेर जिसे कीलाक्षर में शुमेर लिखा जाता था, स्वयं अजमेर, बाड़मेर, आमेर आदि की याद दिलाता है।


बौद्ध कालीन कुसीनारा में जो " नारा " है, वह नगरबोधक है। यह नारा जब " नार " हुआ, तब महनार ( बिहार ) बना। यह नारा जब " नेर " हुआ, तब बीकानेर ( राजस्थान ) बना। यह नारा जब " नेरी " हुआ, तब शिवनेरी ( महाराष्ट्र ) बना। यह नारा जब " नी " हुआ, तब सिवनी ( म.प्र.) बना। यह नारा जब " न " हुआ, तब सिवान ( बिहार ) बना। ऐसे अनेक।


बिहार का न सिर्फ सिवान बल्कि सारन और चंपारन भी इसी " न " की कड़ी में है।


मध्यप्रदेश का न सिर्फ सिवनी बल्कि कटनी और बुधनी भी इसी " नी " कड़ी में है।


राजस्थान का न सिर्फ बीकानेर बल्कि जैसलमेर और अजमेर भी इसी " नेर " ( मेर ) की कड़ी में है।


सुमेरी लोग मूलतः कृषक और पशुपालक थे। गेहूँ और जौ की खेती करते थे। पशुपालक ऐसे कि उनकी भाषा में 200 शब्द सिर्फ भेड़ों से संबंधित हैं। शब्दों का बाहुल्य बताता है कि सुमेरी लोग भेड़ के चरवाहे थे। तब सिंधु घाटी सभ्यता काफी विकसित थी।


सिंधु घाटी के लोग कृषि युग से आगे जा चुके थे।  सिंधु घाटी के नगर पक्की हुई ईंटों के थे और ईंट भी स्टैंडर्ड साइज की थीं।


सुमेरी सभ्यता की ईंटें कच्ची, पक्की - अधपकी, अनियमित साइज की हैं। सिंधु घाटी के लोग सुमेरी लोग से हर क्षेत्र में आगे थे।


हड़प्पा लिपि में कोई 400 तो सुमेरी में 900 लिपि चिह्न थे। सुमेरी लिपि में अधिक चिह्नों का होना साबित करता है कि सुमेरी लिपि सिंधु घाटी से बैकवर्ड लिपि थी।


लिपिविज्ञान का सिद्धांत है कि ज्यों - ज्यों लिपि विकसित होती है, त्यों - त्यों लिपि चिह्नों की संख्या घटती जाती है।


फिर भी एल. ए. वैडेल जैसे इतिहासकार मानते हैं कि चार सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सुमेर लोग सिंधु घाटी में बस गए और उन्हीं ने अपनी लिपि का यहाँ प्रसार किए।


सही यह है कि सिंधु घाटी की सभ्यता को सुमेरी लोगों ने नहीं बल्कि सुमेरी लोगों की सभ्यता को सिंधु घाटी के लोगों ने प्रभावित किया है।


और अब तो नए शोध बताते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता जब विकसित थी, तब सुमेरियन सभ्यता का जन्म भी नहीं हुआ था।


                           2.


गणित में शून्य का आगमन बौद्ध दर्शन से हुआ है। बगैर फिलासफी जीरो की खोज असंभव है।


गौतम बुद्ध के समकालीन बौद्ध दार्शनिक मंजूश्री और विमल कीर्ति के बीच जो संवाद हुआ था, वह शून्य को लेकर था।


यहीं से खुराक लेकर नागार्जुन ने दर्शन के क्षेत्र में शून्यवाद की स्थापना की थी।


बौद्ध दर्शन में जो शून्य है, वहीं अरबी में सिफ़र ( सिफ्र) है अर्थात खाली।


अरबी में जो सिफ़र है, वहीं लैटिन में जेफिरम है।


जो लैटिन में जेफिरम है, वहीं अंग्रेजी में जीरो है।


( Zephirum > Zepiro > Zeuero > Zero )


सुन्न जितना नैचुरल है, फर्टाइल है ...शून्य उतना ही आर्टिफिशियल है...शून्य में कोई उपसर्ग- प्रत्यय जोड़ने से ही शब्द - निर्माण संभव है जैसे शून्यता, शून्यवाद, जनशून्य आदि।


सुन्न फर्टाइल है ...सुन्न की शाखाएँ-प्रशाखाएँ दूर - दूर तक फैली हैं ...शरीर सुन्न होता है ... आदमी सन्न रह जाता है ....जगह सुनसान होती है ...सन्नाटा छा जाता है ...सबमें सुन्न है ....शून्य कहीं नहीं।


सुन्न मूल रूप से दर्शन का शब्द है ...मैथमैटिक्स के क्षेत्र में वहीं से आया है। यूरोप और अमेरिका के अनेक गणितज्ञों ने इस बात पर अपनी मुहर लगाई है।


सुन्न का प्रयोग न सिर्फ प्राचीन बौद्ध दर्शन में, बल्कि सिद्धों, नाथों और संतों के साहित्य में भी बड़े पैमाने पर हुआ है।


सुन्न, जिसे लोक जनता आज भी सुन्ना ( सिफर, 0 ) कहती है, हर हाल में प्राकृत धारा की खोज है, जिसमें शून्य की भूमिका शून्य है।


आइंस्टाइन से लेकर हाकिंग तक दुनिया के भौतिक विज्ञानी गुरुत्वाकर्षण, शून्य और समय को लेकर जो अभूतपूर्व काम कर चुके हैं, उसमें एक फाँक बची रही है और दुनिया के भौतिक विज्ञानी इसी फाँक को दूर करने की कोशिश करते रहे हैं।


इस कोशिश के दो अलग-अलग पक्ष आज भी बने हुए हैं, जिनमें से एक सुपर स्ट्रिग सिद्धांत है और दूसरा लूप क्वांटम ग्रैविटी है। लूप क्वांटम ग्रैविटी को अश्टेकर प्रोग्राम के नाम से भी जाना जाता है। अश्टेकर प्रोग्राम के सिद्धांतकार खुद अश्टेकर हैं।


अश्टेकर ने अपने सिद्धांत की विवेचना करते हुए लिखा है कि छठी सदी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध ने कहा था कि समय की अवधि शुद्ध रूप से परंपरागत धारणा है, समय और शून्य हमारे अनुभवों की सापेक्षता में अस्तित्वमान होते हैं, बुद्ध ने पुद्गल नैरात्म्य और विज्ञप्ति मात्रता जैसी अवधारणाओं के जो सूत्र दिए थे, उन पर भारत में किसी ने वर्तमान समय में काम नहीं किया।( आलेख : बुद्ध के पुनर्पाठ का समय, मुद्राराक्षस, पृष्ठ 103 )


बुद्ध का दर्शन और पश्चिम।


18 वीं और 19 वीं सदी में जर्मनी में जिस विज्ञानवादी दर्शन का विकास हुआ, उस पर बौद्ध विचारक असंग और वसुबंधु ने चौथी सदी में नागार्जुन के शून्यवाद के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम किया था।


जिस " ज्ञान - मीमांसा " को पश्चिम के दर्शनशास्त्र में सबसे बड़ी जगह मिली, उसका प्रतिपादन बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग ने किया था। वे बौद्ध दर्शन के बड़े नैयायिक और तर्कशास्त्री थे।


दिङ्नाग के शिष्य धर्मकीर्ति थे और न्यायशास्त्र में उन्होंने भी स्मरणीय काम किया था। धर्मकीर्ति को पश्चिम के दार्शनिकों ने इमैन्युएल कांट की संज्ञा दी थी।


दीपंकर श्रीज्ञान ने 11 वर्ष की अवस्था में गंभीर चिंतन शुरू कर दिया था।


रत्नकीर्ति और ज्ञानश्री मित्र ने तर्कशास्त्र पर काम किया था।


चौथी सदी के कुमारजीव ने वस्तुबोध की प्रक्रिया पर गंभीर वैचारिक लेखन किया था।


इन सारे ही दार्शनिकों को दक्षिण- पूर्वी एशिया से लेकर तुर्की और यूनान तक के देशों ने आमंत्रित किया था।


पश्चिम का दर्शनशास्त्र 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में शब्दार्थ दर्शन और उच्चतर गणित की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ अनेक नई मंजिलें तय कर चुका है।


मगर भारत के बौद्धों ने अपने विहारों में असंग से लेकर धर्मकीर्ति तक के काम को आगे क्यों नहीं बढ़ाए? वे बौद्ध धर्म के ऊपरी कलेवर को ही बौद्ध धर्म क्यों माने?


लगभग 8 वीं सदी से दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में बौद्धों का काम बिलकुल गायब है। ( आलेख : उत्तर देने का दाव अभी शेष, मुद्राराक्षस, पृष्ठ 54-55 )


                         3.


गौतम बुद्ध की वैज्ञानिक दिशा में सबसे बड़ी और मौलिक स्थापना कारण - कार्य सिद्धांत है। अर्थात कारण ही कार्य का जन्मदाता है। अकारण कुछ भी नहीं होता है और न हो सकता है।


गौतम बुद्ध ने जिस कारण - कार्य सिद्धांत की बुनियाद को छठी सदी ईसा पूर्व में डाला था, उसे समझने में यूरोप को पूरे दो हजार साल से भी अधिक समय लग गए।


पूरे यूरोप में इसे सबसे पहली बार सोलहवीं सदी में फ्रांसीस बेकन ( 1561 - 1626 ) ने लिखा और समझाया कि जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले घटनाओं का अध्ययन कारण सहित करना चाहिए, तब सिद्धांत बनाकर उन्हें प्रयोगात्मक जाँच करनी चाहिए।


बुद्धिज्म का जो थेर है, वहीं अंग्रेजी में थ्योरी है। इसीलिए बुद्ध की शिक्षाओं को सिद्धांत कहा जाता है।


यूरोप में जब कारण - कार्य के प्रति चेतना फ्रांसिस बेकन ने फैलाई, तब जाकर गैलिलियो, केपलर और न्यूटन पैदा हुए।


ज्ञान की दुनिया में बुद्ध बेमिसाल हैं।


दुनिया को 1, 2, 3 .... लिखने का तरीका बौद्ध सभ्यता ने सिखाया है।


बौद्ध सभ्यता की धम्म लिपि से लेखन में 1, 2, 3 ..... का विकास हुआ है।


सबसे पहले सातवीं सदी में इसे अरबों ने सीखा और हिंदसा ( हिंद देश से प्राप्त ) कहा।


अरबों से बारहवीं सदी में इसे यूरोप ने सीखा और अरेबिक कहा।


यूरोप में बारहवीं सदी के बाद जो वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति हुई, उसमें बौद्ध सभ्यता के 1, 2, 3 ......का बहुत बड़ा योगदान है।


रोमन अंकों के लेखन में जटिलता है। अरेबिक में सहजता है। अरेबिक ने जोड़ - घटाव की प्रक्रिया को सहज किया।


यही कारण है कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति 12 वीं सदी के बाद हुई, तब जब लोगों ने अरबों से अरेबिक सिखी।


हर सभ्यता बौद्ध सभ्यता नहीं होती!


                           4.


बौद्ध सभ्यता ने अनेक देशों को नाम दिए हैं, जिसका पता उन देशों को भी नहीं है।


भाषावैज्ञानिकों ने बताए हैं कि श्रीलंका का सिलोन ( Ceylon ) नाम पुर्तगालियों की देन है।


मगर ह्वेनसांग ने पुर्तगालियों के श्रीलंका में आने के सैकड़ों साल पहले ही लिख दिया है कि इसे आजकल " सिलन गिरि " भी कहते हैं।


पुर्तगालियों से पहले श्रीलंका के लिए " सिलन " नाम प्रचलित था, वहीं " सिलोन " है।


पालि की एक पारिभाषिक शब्दावली " सीलन " है। " सीलन " का सीधा- सीधा अर्थ होता है - " विनय ( विनयपिटक के नियम ) के अधीन रहना "।


श्रीलंका अभी भी बौद्ध देश है और ह्वेनसांग के समय में कहीं अधिक बुद्धप्रिय देश था। इसके अनेक प्रमाण हैं। जो बौद्ध ग्रंथ फाहियान को भारत में नहीं मिले, वो श्रीलंका में मिले।


विनय के अधीन तब श्रीलंका की अधिसंख्य आबादी रहती थी। तब यह ठीक जान पड़ता है कि इसी सीलन से सिलोन ( Ceylon ) का विकास हुआ है।


( नोट : - सिंहल द्वीप का एक नाम " सिलन गिरि " था। ह्वेनसांग की भारत - यात्रा, पृ. 403, ठा. प्र. शर्मा / सीलन का अर्थ " विनय के अधीन रहना " है। ( पालि - हिंदी कोश, पृ. 351, भ. आ. कौशल्यायन )


चीन का प्राचीन नाम चाहे जो भी रहा हो, ईसा से कोई दो सदी पूर्व इस देश का नाम चीन / चाइना प्रचलित हुआ, यह वही समय है, जब बुद्ध का झान ( ध्यान ) चीन पहुँचा, जिसे चीनी भाषा में चान / चिआन कहा जाता है।


बुद्ध का झान जब चीन पहुँचा, तब उसका नाम चीन / चाइना प्रचलित हुआ। 


बुद्ध के चान / चिआन से चीन / चाइना के नाम का जरूर कोई संबंध है। यदि नहीं है तो विचार कीजिए कि दक्षिण - पूर्व एशिया को हिंद- चीन और मध्य एशिया के बड़े भू - भाग को चीनी - तुर्किस्तान क्यों कहा जाता है, जबकि प्राचीन काल में ये सब इलाक़े बौद्ध धर्म से जुड़े थे।


इसी प्रकार तिब्बत निवासी खुद अपने देश को बोद् के नाम से संबोधित करते हैं। यह बोद् क्या है? वहीं बुद्ध की ही एक उच्चारण - रीति है और जो भोट है, वह बोद् की तर्ज़ पर है तथा इसी भोट से भूटान बना है।


हड़प्पा और मुअनजोदड़ो में अन्नागार मिले हैं। हड़प्पा में राजमार्ग के दोनों ओर ऊँचे चबूतरों पर विशाल अन्नागार बने हुए थे।


अन्नागार की यह परंपरा पूर्व मौर्य काल और मौर्य काल में भी चलती रही। आश्चर्य कि ये भी सिंधु घाटी सभ्यता की तरह राजमार्ग पर ही बने।


सोहगौरा ताम्रपत्र में अन्नागार बनाए जाने का उल्लेख है। यह अन्नागार भी चौराहे पर बना था। इस अभिलेख में दो अन्नागारों के निर्माण का उल्लेख है, जिनमें तीन कमरों के होने की चर्चा की गई है।


सोहगौरा ताम्रपत्र गोरखपुर क्षेत्र के सोहगौरा नामक गाँव से मिला है। लगभग चौथी सदी ई. पू. का है। 


सबसे ऊपर बौद्ध धर्म के प्रतीक चिह्न हैं जैसे बोधिवृक्ष, स्तूप आदि। बोधिवृक्ष जो ताम्रपत्र पर सबसे पहले है, इसे बिहार सरकार ने अपना राज्यचिह्न बनाया है। दो प्रतीक कोष्ठागार के हैं जो भवन जैसे दिखाई पड़ रहे हैं। यह भवन वास्तुकला का अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करता है।


कोष्ठागार के दो भवन इसलिए कि ताम्रपत्र में दो कोष्ठागार ( अनाज संचयन हेतु ) आपत काल में जनहित के लिए बनाए जाने का उल्लेख है।


सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों में पक्की ईंटों से बने स्नानघर और शौचालय थे। शौचालय का निर्माण सिंधु घाटी सभ्यता की खास विशेषता है।


ईसा पूर्व 1200 में मिश्र में शौचालय मिलते हैं। प्रथम शताब्दी में रोमन सभ्यता में शौचालय मिलते हैं। ग्रीक में भारत से जो ज्ञान पहुँचा, रोमन सभ्यता में शौचालय का इस्तेमाल संभवत उसकी परिणति है।


सिंधु घाटी सभ्यता से शौचालय की यह परंपरा बौद्ध मठों तक पहुँचती है।


वैशाली म्यूजियम में एक टाॅयलेट पैन रखा है। यह वैशाली के कोल्हुआ की खुदाई से मिला था।


टाॅयलेट पैन पहली - दूसरी सदी का है। कोई 18 - 19 सौ साल पुराना है। यह एक बौद्ध मठ से मिला है।


टाॅयलेट पैन का व्यास 88 सेंमी और मोटाई 7 सेंमी है। पावदान की लंबाई 24 सेंमी और चौड़ाई 13 सेंमी है।


टाॅयलेट पैन टेराकोटा का बना है। लट्रीन और यूरिन के लिए अलग-अलग छेद हैं।


अनुमानतः यह भिक्षुणियों की मोनेस्ट्री का टाॅयलेट पैन है।


आज खुले में शौच से मुक्ति की बात हो रही है, तब विचार कीजिए कि इस दिशा में बौद्ध सभ्यता का क्या योगदान है।


                              5.


सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों की लेखन - कला कई मामलों में धम्म लिपि ( ब्राह्मी लिपि ) के लोगों की लेखन - कला से मिलती - जुलती है।


सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि और धम्म लिपि के कम से कम 10 लेटर एक जैसे हैं। ( चित्र - 36 )


इतना ही नहीं, सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि और तमिल ब्राह्मी लिपि के कम से कम 5 लेटर एक जैसे हैं। ( चित्र- 37 )


सिंधु घाटी की प्राक् बौद्ध सभ्यता और गौतम बुद्ध तथा उनके बाद की बौद्ध सभ्यता के बीच लेखन - कला में तालमेल है। परंपराएँ मरती नहीं हैं।


वे इतिहासकार जो मौर्यों की कारीगरी को ईरान में जाकर खोजते हैं, वे क्यों नहीं बताते हैं कि मौर्यों का शाही महल ईरान के सूसा और एकबटना के शाही महल से किस कारण अधिक सुंदर और शानदार था।


पाटलिपुत्र का शाही महल ईरान के शाही महल से अधिक सुंदर और शानदार था, यह बात न तो भारत और न ईरान के इतिहासकारों ने बताई है बल्कि यूनान के इतिहासकारों ने बताई है। पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं है।


अब अशोक कालीन रामपुरवा के बैल की मूर्ति को लीजिए, देखिए पूरा मूर्ति - विन्यास सिंधु घाटी के उस कूबड़दार वृषभ ( तथाकथित ) से मेल खाता है।


यदि कोई शक हो तो फिर मौर्य कालीन हाथी के उत्कीर्णन को देखिए, वो भी सिंधु घाटी सभ्यता के सीलों पर उत्कीर्ण हाथी से कैसे मेल खाता है।( चित्र - 38 )


भला जिस देश के पास सिंधु घाटी की विरासत हो, वह कहाँ  - कहाँ की जूठन खाता चलेगा?


सिंधु काल के प्रीस्ट किंग की मूर्ति तथा मौर्य काल की यक्षिणी की मूर्ति की तुलना कीजिए।


दोनों मूर्तियों की नाक टूटी हुई है और दोनों का एक - एक हाथ टूटा हुआ है। यह आकस्मिक हो सकता है।


मगर दोनों मूर्तियों के सिर पर जो गोलाकार शिरोभूषण है, वह आकस्मिक नहीं है, वह एक खास किस्म की सभ्यता के संकेतक है और वह सभ्यता है - बौद्ध सभ्यता।


मौर्य काल और सिंधु घाटी सभ्यता का काल - दोनों बौद्ध सभ्यता में भीगा हुआ काल है। इसीलिए दोनों काल की मूर्तियों में मौजूद गोलाकार शिरोभूषण की समानता आकस्मिक नहीं है। ( चित्र - 39 )


गुंबद ....एक प्रकार की अर्द्ध गोलाकार छत है। छत मनुष्य ने घर में रहने लिए बनाई है।


गुंबद को अंग्रेजी में Dome कहते हैं। Dome घर से जुड़ा है। इसलिए घरेलू को अंग्रेजी में Homestic नहीं, Domestic कहते हैं।


रूसी में दोम अर्थात घर, लैटिन में डोमस अर्थात घर। Dome अर्थात गुंबद घर से जुड़ा है। इसलिए गुंबद का इतिहास मानव सभ्यता में प्राचीन है।


मगर ईंट - पत्थरों से स्पष्ट तथा स्वतंत्र गुंबद बनाए जाने का स्पष्ट इतिहास हमें भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम बौद्ध परंपरा में मिलता है। आप इसे डबल गुंबद भी कह सकते हैं।


गुंबद बना स्तूप गुंबात स्तूप है। यह स्तूप पाकिस्तान की स्वात घाटी में बारीकोट से 9 किमी दक्षिण है। ( चित्र - 40 )


स्तूप के ऊपर गुंबद बना है। इसीलिए इस स्तूप को गुंबात स्तूप कहते हैं। गुंबात पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ गुंबद होता है।


भारतीय प्रायद्वीप में किसी इमारत पर स्पष्ट एवं डबल गुंबद बनाए जाने का यह पहला स्पष्ट प्रमाण है, जिसका निर्माण- काल ईसा की दूसरी सदी के बाद नहीं ले जाया जा सकता है।


भारत में मध्यकालीन इमारतें गुंबदयुक्त है तो यह बौद्ध स्थापत्य की देन है।


मध्यकाल में अष्टकोणीय इमारतें खूब बनी हैं। शेरशाह का मकबरा अष्टकोणीय है।


मुंडेश्वरी मंदिर भी अष्टकोणीय है।


बौद्ध स्थापत्य कला में अष्टकोणीय का अपना महत्व है। मनौती स्तूप की डिजाइन अष्टांगिक मार्ग के कारण अष्टकोणीय होती है। कुएँ भी अष्टकोणीय बने हैं। अष्टकोणीय कुआँ सासाराम में भी है, जिसे हथिया कुआँ कहा जाता है और बोध गया के क्षेत्र में भी हैं।


न केवल मनौती स्तूप बल्कि अन्य बड़े स्तूप भी अष्टकोणीय बनाए गए हैं। अष्टकोणीय स्थापत्य बौद्धों की देन है। अष्टांगिक मार्ग के प्रतीक स्वरूप बनाए गए हैं। बाद में अन्य संस्कृतियों के लोगों ने इस अष्टकोणीय स्थापत्य को अपना लिए।


धम्म चक्र का इतिहास पुराना है। सिंधु घाटी सभ्यता की सीलों पर छः तिलियों का धम्म चक्र मिल जाएगा। धोलावीरा के साइनबोर्ड पर भी छः तिलियों का धम्म चक्र है। ( चित्र - 41)


बुद्ध के समय में आठ तिलियों के धम्म चक्र बने। अशोक ने 24 और 32 तिलियों के धम्म चक्र का इस्तेमाल किए। 32 से अधिक तिलियों के भी धम्म चक्र बने।


धम्म चक्र प्रकार के स्तूप भी बने। संघोल के स्तूप उदाहरण हैं। धम्म चक्र प्रकार का स्तूप धोलावीरा में भी मिला है।


सिंधु घाटी की सभ्यता ने 6 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल लिपि में किया था।


गौतम बुद्ध ने 8 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल शिक्षा में किया था।


सम्राट अशोक ने 24 और 32 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल शासन में किया था।


ऐसे ही धम्म चक्र का कदम सिंधु घाटी सभ्यता से मौर्य काल तक बढ़ते गया।


जब बुद्ध थे, तब पीपल को पूरा यूरोप नहीं जानता था .....सेंट्रल अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में तो पीपल 19 सदी के आखिरी दौर में पहुँचा।


बुद्ध के कई सदी बाद वनस्पतिविज्ञानियों ने पीपल का बटैनिकल नाम Ficus Religiosa रखा। यह नाम गौतम बुद्ध के कारण पड़ा।


पीपल का Sacred Fig नाम भी बुद्ध के कारण हुआ। अंग्रेजी में जो पीपल का नाम Bo Tree है, वह Bodhi Tree का संक्षिप्त रूप है। पीपल से वाकिफ न होने के कारण यूरोपीय भाषाओं में पीपल का कोई आॅरिजनल नाम नहीं है।


एशिया के वे देश बेहद ख़ुशनसीब हैं कि उन्हें पीपल से परिचय तब हो गया, जब वे धम्म के शरणागत हुए। गौतम बुद्ध के कारण पीपल को एशिया में पहचान मिली।


बुद्ध ने यह पीपल सिंधु घाटी की प्राक बौद्ध सभ्यता से अर्जित किए थे और उसे Tree of  Awakening ( बोधिवृक्ष ) की दुबारा ऊँचाई दी।


बुद्ध से पहले दीपंकर बुद्ध का बोधिवृक्ष यहीं पीपल था। वे चौथे बुद्ध थे और सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन थे।


साल 2019 में लखीसराय के सूर्यगढ़ा प्रखंड के रामपुर गाँव के पश्चिम स्थित भेलवा पोखर की खुदाई में काले पत्थर का यह बौद्ध स्मारक मिला है। ( चित्र - 42 )


बौद्ध स्मारक कोई 46 किलो का है। दो मंजिला है। प्रत्येक मंजिल पर 4 - 4 बुद्ध उकेरे गए हैं। कुल 8 बुद्ध की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।


यह संयोग नहीं बल्कि जान - बूझकर आठों उत्कीर्ण बुद्ध प्रतिमाओं का नाक - नक्शा ( हुलिया ) बिगाड़ा गया है ताकि प्रतिमा की शिनाख्त नहीं हो सके।


संयोग कहिए कि स्मारक के निचले हिस्से में दो पंक्तियों का अभिलेख है - ये धम्मा हेतुपप्भवा ...।


यह वहीं प्रसिद्ध सूक्ति है, जिसे बौद्ध साहित्य में अस्सजी - सारिपुत्त संवाद के रूप में जाना जाता है।


यह सूक्ति अस्सजी की है, जिसमें उन्होंने संक्षेप में सारिपुत्त को धम्म का सारांश बताए हैं।


वह सारांश यह है कि जो घटनाएँ कारण से पैदा होती हैं, तथागत ने घटनाओं के कारण बताए हैं और उनका रोकने का उपाय है, उसे भी बताए हैं।


दरअसल यह बौद्ध स्मारक महाबोधि मंदिर का भावानुवाद है, प्रतिकृति नहीं है।


दुनिया में आज भी महाबोधि मंदिर की कोई 39 प्रतिकृतियाँ मौजूद हैं और जो अमेरिका और चीन - जापान - कोरिया से लेकर नेपाल, बर्मा, श्रीलंका तथा थाईलैंड तक फैली हैं।


गौतम बुद्ध का कपिलवस्तु ठीक वैसा ही बसा हुआ था, जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो के नगर बसे हुए थे।


दो भागों में - एक रिहायशी क्षेत्र और दूसरा धार्मिक क्षेत्र।


कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र गनवरिया था और धार्मिक क्षेत्र पिपरहवा था। गनवरिया और पिपरहवा दोनों मिलकर कपिलवस्तु था। बुद्ध का घर गनवरिया के रिहायशी क्षेत्र में था।


हड़प्पा, मोहनजोदड़ो जैसे नगरों में भी रिहायशी क्षेत्र अलग था और धार्मिक क्षेत्र अलग था, जिसे पुरातात्विकों ने स्तूप क्षेत्र कहा है।


सिंधु घाटी सभ्यता की नगर - योजना से कपिलवस्तु की नगर - योजना का साम्य संभवत आकस्मिक नहीं है।


हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में पठियार गाँव के पास पठियार शिलालेख है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि विस्मयकारी लिपि में लिखे गए इस शिलालेख को कोई समझ नहीं पाया है।


लेकिन शिलालेख में नीचे और ऊपर सिर्फ दो पंक्ति लिखी हुई है। ऊपर की लिपि धम्म  और नीचे की लिपि खरोष्ठी है।


ऊपर लिखा है - वायलस पुकरिणी और नीचे लिखा है - राठि दारास वायलस पुकरिणी।


ऊपर का अर्थ हुआ - सार्वजनिक जलाशय और  नीचे का अर्थ हुआ - राष्ट्रिक दारा का सार्वजनिक जलाशय।


मगर लिपि में ही पठियार शिलालेख पर स्वस्तिक बना है। अनेक धम्म लिपि के अभिलेखों में स्वस्तिक मिलता है। आश्चर्यजनक रूप से स्वस्तिक की यह परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ती है। वहाँ भी स्वस्तिक मिलते हैं।


                          6.


अनेक बौद्ध घटनाएँ परिवर्तित रूप में बाद के साहित्य में मिलती हैं।


जैसा कि पालि साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध मथुरा से वेरंजा गए थे और अनेक लोगों ने माना है कि वेरंजा ही व्रज है।


वेरंजा उत्तर प्रदेश के ब्रजभाषा क्षेत्र के ब्रजमंडल में एटा से 16 किमी की दूरी पर उत्तर में है।


वेरंजा की पहचान अतिरंजी खेड़ा से की गई है। अतिरंजी खेड़ा की खोज कनिंघम ने 1861 - 62 में की थी।


अतिरंजी खेड़ा वर्तमान में काली नदी के किनारे है। काली नदी कन्नौज में कालिंदी के नाम से मशहूर है।


अर्थात वेरंजा कालिंदी नदी के किनारे था और हिंदी के मध्यकालीन कवियों ने स्मृति - अवशेष के रूप में ब्रज को कालिंदी नदी के किनारे बताया है।


रसखान ने लिखा -- कालिंदी कूल कदंब की डारन - अर्थात वे ब्रज के कदंब वृक्ष कालिंदी नदी के किनारे खड़े थे।


कवि गंग ने लिखा -- कालिदह कालिंदी -- अर्थात कालिंदी में कालिदह था। कालिदह तो काली नदी का दह ( नदी का गहरा भाग ) रहा होगा।


आज की काली नदी पहले की कालिंदी है। पर्शियन लेखकों ने कालिंदी का नाम काली नदी किया है और यह कवि गंग के समय में प्रचलित थी।


वर्तमान में यमुना का एक नाम कालिंदी है। मगर यमुना को कालिंदी नाम बाद के साहित्य में मिला है।


पहले के साहित्य में कालिंदी और यमुना अलग-अलग नदियाँ थीं। वाल्मीकि रामायण में दो नदियों का अलग-अलग उल्लेख है -- " कालिंदीं यमुनां रम्यां " ( 4. 40.21)।


आज का ब्रज यमुना नदी के किनारे है और तब का वेरंजा कालिंदी के तट पर था।


हिंदी साहित्य में गोपियों के विरह को बैठे ठाले का विलाप कहा गया है। कारण कि कृष्ण ब्रज से मथुरा चले गए थे और आज के ब्रज से मथुरा की दूरी कुछ मिनटों की है।


एक और उदाहरण।


घूमते - घूमते ह्वेनसांग गांधार क्षेत्र में पहुँचे,

फिर पुष्कलावती गए।


पुष्कलावती के पास एक स्तूप था। वह बोधिसत्व श्रमक की स्मृति में बना था। 


बोधिसत्व श्रमक वहीं रहकर अपने अंधे माता - पिता की सेवा करते थे।


एक दिन का वाकया है कि वे अपने अंधे माता-पिता के लिए फल लाने गए थे।


तभी एक राजा जो शिकार के लिए निकले थे, श्रमक को अनजाने में बिष - बाण से मार दिए।


श्रमक बोधिसत्व मरे नहीं बल्कि उनका घाव औषधि से ठीक हो गया।


माता - पिता की सेवा करनेवाले बोधिसत्व श्रमक की स्मृति में वह स्तूप बना था। यहीं बुद्धिज्म है।


श्रमक का यह इतिहास पढ़कर जाने क्यों पुराणों के श्रवण कुमार याद आए।


( ह्वेनसांग के यात्रा- वृतांत से साभार )


अनेक जगहों पर बुद्ध की मूर्तियाँ दूसरे नामों से भी पूजी जाती हैं - कहीं मोरवा बाबा हैं, कहीं तेलिया मसान हैं तो कहीं दूसरे धर्म के देवी - देवता में रूपांतरित हो गए हैं।


कहीं - कहीं एक बुद्ध विरोधी परंपरा बनाकर भी बौद्ध- स्थलों को तोड़ने- फोड़ने की कवायद हुई है।


एक उदाहरण प्रस्तुत है।


बोज्जनकोंडा एक बौद्ध स्थल है। यह आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के संकरम ( संघाराम ) में स्थित है। मकर संक्रांति के अगले दिन यहाँ " कनुमा दिवस " मनाए जाने की परंपरा है।


कनुमा दिवस के मौके पर यहाँ सैकड़ों लोग जुटते हैं। बड़े उत्तेजित भाव से पत्थरों की बौछार करते हैं। बौद्ध स्थल के ही पत्थरों को उखाड़ कर बौद्ध स्थल पर ही फेंकते हैं।


दानव मानकर फेंकते हैं और बौद्ध स्थल नष्ट-भ्रष्ट करते हैं। विगत कुछ सालों से यह पुरानी परंपरा लगभग बंद हो चुकी है। बावजूद इसके वहाँ इस साल 2020 में भी जिला प्रशासन मुस्तैद था।


अलेक्जेंडर रीम ने 1906 में खुदाई की थी। तब पत्थर फेंकने का रिवाज नहीं था। संभवतः 1920 के दशक में यह रिवाज प्रचलित हुआ।


अफसोस कि 1920 के दशक में जब पूरा देश अंग्रेजों को बाहर निकालने में लगा था, तब कुछ लोग 1920 के ही दशक में बुद्ध की यह दुर्गति कर रहे थे।

Rajendra Prasad Singh



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