वाल्मिकी रामायण के अनुसार ‘देवताओं’ के व्यभिचार ( बलात्कार) से पैदा हुए थे, राम की सेना के बंदर ( हनुमान आदि) भालू ( जामवंत आदि)- संदर्भ राम का हनुमान बनने या बनाने की होड़
अप्सराओं, गन्धर्वों की स्त्रियों, यक्ष और नागों की कन्याओं, रीछों की स्त्रियों, विद्याधरियों, किन्नरियों तथा वानरियों के साथ देवाताओं के व्यभिचार से राम के सहायक वानर पैदा हुए और व्यभिचार करने का यह आदेश ब्राह्मा जी ने देवताओं के दिया। इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण के सातवें सर्ग ( पृ.96,97,98,99) में किया गया है।
( स्रोत- वाल्मिकी रामायण, सातवां सर्ग, पृ. 96, 97,98,99, प्रकाशक गीता प्रेस )
इस संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ने लिखा है- “वाल्मिकी अपनी रामायण की शुरूआत में ही इस तथ्य पर जोर देते हैं कि राम, विष्णु के अवतार हैं। विष्णु ने दशरथ के पुत्र राम के रूप में जन्म लेने का निर्णय लिया था। जब भगवान ब्रह्मा को यह पता चला, तो उन्हें लगा कि विष्णु के अवतार राम की पूर्ण सफलता के लिए ऐसे प्रबंध किए जाने होंगे जिनसे राम को शक्तिशाली साथी और सहयोगी मिल सकें। उस समय धरती पर ऐसा कोई नहीं था।
देवताओं ने ब्रह्मा की आज्ञा का पालन करने का निर्णय लिया और वे बड़े पैमाने पर व्यभिचार में लिप्त हो गए। उन्होंने न केवल अप्सराओं- जो वेश्याएं थी- और यक्षों और नागों की अविवाहित पुत्रियों, वरन् रूक्ष, विद्याधर, गन्धर्वों, किन्नरों और वानरों की विधिवत विवाहिता पत्नियों के साथ भी व्यभिचार किया। इस सामूहिक व्यभिचार से वानर उत्पन्न हुए, जो राम के सहयोगी बने।”
( स्रोत- हिंदू धर्म की पहेलियां, डॉ. भीमराव आंबेडकर
प्रकाशक फारवर्ड प्रेस, पृ. 197)
इसी विक्षिप्त मनु ने सभी शूद्रों ( पिछड़ों) और अतिशूद्रों ( दलितों ) को वर्णसंकर कहा है यानि उनका जन्म व्यभिचार या बलात्कार से हुआ है।
इस संदर्भ विस्तार से डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों में एक पहेली “ मनु की विक्षिप्तता या मिश्रित जातियों की उत्पत्ति की ब्राह्मणवादी व्याख्या” में किया है।
( स्रोत- हिंदू धर्म की पहेलियां, पृ.150-165, प्रकाशक फारवर्ड प्रेस )
हर शूद्र ( पिछड़े) अतिशूद्र ( दलित) को डॉ. आंबेडकर की हिंदू धर्म की पहेलियां जरूर ही ठीक पढ़ लेना चाहिए, पता चल जाएगा, हिंदू धर्मग्रंथों में कितने अपमानजनक तरीके से शूद्रों ( पिछड़ों ) और अतिशूद्रों ( दलितों ) जन्म और कर्म के बारे में लिखा हुआ है।
इसके बाद भी कोई राम का हनुमान, उनका जामवंत और उनकी सेना बंदर-भालू बनाना चाहता है, तो ऐसे लोगों पर तरस खाने के अलावा क्या किया जाए सकता है। इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है?
खैर गुलाम मनोवृत्ति क्या न कराए! गुलाम मनोवृत्ति मान-सम्मान और स्वाभिमान को ताक पर रख देती है, तुच्छ स्वार्थों के लिए।
सिद्धार्थ रामू
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