ऋषियों को , ऋग्वेद को प्राचीन साबित करने के चक्कर में बतौर औजार " ऋ " का आविष्कार हुआ है ।
" ऋ " के आविष्कारक ने " ऋ " का आविष्कार तो बहुत बाद में किया , लेकिन उसे "ऋ" को बहुत प्राचीन साबित करना था ।
सो , " ऋ " को बहुत प्राचीन साबित करने के लिए आविष्कारक ने एक साजिश रची और उसने बगैर सोचे - समझे इसे ले जाकर वर्णमाला के स्वरों में बैठा दिया ।
" ऋ " को वर्णमाला के स्वरों में उसने इसे इसलिए बैठाया कि यह कहा जा सके कि यह बहुत प्राचीन ध्वनि है , तब की है जब इसका उच्चारण स्वर की भाँति होता था ।
मगर " ऋ " का उच्चारण स्वर की भाँति कभी नहीं होता था , सबूत भी नहीं है । इसमें स्वर का कोई गुण नहीं है। पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है ।
" ऋ " का आविष्कारक ऋषियों को , ऋग्वेद को कई मामलों में आधा - अधूरा बहुत प्राचीन साबित करने में तो सफल हो गया , मगर दुनिया के भाषा वैज्ञानिकों को हैरत में डाल गया ।
आज सभी भाषा वैज्ञानिक कहते हैं कि " ऋ " का उच्चारण बहुत प्राचीन काल में स्वर की भाँति कैसे और कहाँ से होता था , हमें नहीं पता है ।
अभिलेखीय साक्ष्य बताते हैं कि " ऋ " प्राचीन ध्वनि नहीं है तो जाने क्यों भाषा वैज्ञानिक इसे प्राचीन मानने पर तुले हुए हैं ?
Rajendra Prasad Singh
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