साहिर के न रहने पर कैफ़ी आज़मी ने कुछ यूँ कहा था :
तुम्हारे शहर में आए हैं हम , साहिर कहाँ हो तुम
ये रूपोश तुम्हारी है सितम, साहिर कहाँ हो तुम
तुम्हारे घर में हम आकर ,कभी प्यासे न जायेंगे
उठाओ जाम, कर लें होंट नम, साहिर कहाँ हो तुम
पुराने दोस्तों से हो गये क्यों इतने बेगाने
पुकारो तो कहीं से कम से कम, साहिर कहाँ हो तुम
मेरी नज़रों में मेरे दोस्त, एक मंदिर है लुधियाना
ये मंदिर और तुम उसके सनम, साहिर कहाँ हो तुम
— कैफ़ी आज़मी

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