सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

ऋग्वेद और आर्य

 एसी. दास ने ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लिखा है कि आर्यों का मूल निवास ‘सप्तसिंधु'

या ‘पंजाब` में था। कुछ लोग जो आर्यों को बाहर से आया मानते हैं, वे भी बताते हैं ये लोग प्रथमत: सप्तसिंधु प्रदेश में बसे थे। एक संगत अनुमान यह है कि ऋग्वेद के अधिकांश भाग की रचना लगभग १५००-१२०० ई. पू. के बीच पंजाब में हुई, अथवा कम-से-कम इसमें उल्लिखित घटनाएं इस काल की हैं।१ पर पुरातात्त्विक साक्ष्य इसके समर्थन में नहीं हैं। गैरिक मृद्भांड की संस्कृति (ओ.सी.पी.) ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खाती है। इसका सबसे मोटा जमाव हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर अवस्थित जोधपुरा में देखा गया है। बावजूद इसके, इसे ऋग्वेदकालीन लोगों की कृति मानने में कई कठिनाईयां हैं। यह भी कि इस संस्कृति के आज तक ज्ञात लगभग एक सौ से अधिक स्थानों में से बहुत कम ही सप्तसैंधव क्षेत्र में हैं जो कि ऋग्वैदिक सभ्यता का केंद्र था। अधिकांशत: ये स्थल गंगा - यमुना दोआब में केंद्रित हैं।२ प्रत्येक नयी पुरातात्त्विक संस्कृति की खोज के साथ उसे ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से जोड़ने की होड़ लग जाती है, पर कोई भी पुरावशेष ऐसा कर नहीं पाता है। कुछ ऐसा ही असमीकरण ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से काले एवं लाल मृद्भांड की संस्कृति का भी है। ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खानेवाली तीसरी संस्कृति ताम्र निधियों की है जिसमें से लगभग आधी गंगा - यमुना दोआब में केंद्रित हैं। सप्तसिंधु से इनका भी वास्ता नगण्य है। इनका वास्ता पूरब में बंगाल और उड़ीसा से है, दक्षिण में आंध्र प्रदेश से है तथा पश्चिम में गुजरात और हरियाणा से है जबकि ऋग्वैदिक लोग पूरब में बंगाल और उड़ीसा तक पहुंचे भी नहीं थे। कुल मिलाकर ऋग्वैदिक जनों की पुरातात्त्विक पहचान की समस्या को सुलझाना कठिन है।३ अब जबकि पुरातात्त्विक साक्ष्य के मूल्य पर महाभारत और रामायण में प्रतिबिंबित ‘महाकाव्य युग` (एपिक एज) की कपोलकल्पित धारणा त्यागी जा रही है, तब क्यों और किस आधार पर आज भी इस कालखंड को भारतीय इतिहास में ‘ऋग्वैदिक इंडिया` कहा जाता है जबकि ‘ताम्र-पाषाण युग` की अवधारणा सर्वाधिक निरापद है।

२.

ऐसी कल्पना कुछ लोगों की है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में वस्तु-विनियम मुख्य था, पर सोनेे-चांदी के सिक्के भी थे। सोने के सिक्के ‘निष्क` कहे जाते थे। सातवलेकर ने ‘निष्क` का अनुवाद, सोने के सिक्के किया है जो सही मालूम होता है।४ चांदी के सिक्के ‘रजत` हो सकते हैं।५ यदि यह कल्पना ठीक है तो सवाल है कि ऋग्वेद में वर्णित सोने और चांदी के ये सिक्के किस कालखंड के हैं? भारत में प्राप्त सिक्के तो ईसा  पूर्व छठी सदी से पहले के नहीं हैं। धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिले हैं। आरंभ में सिक्के प्राय: चांदी के होते थे, हालांकि कुछ तांबे के भी मिले हैं। ये सिक्के आहत मुद्राएँ कहलाते हैं। सोने के सिक्के भारत में सबसे पहले हिंद - यूनानियों ने जारी किए।६ यदि ऊपर के वर्णन से सिक्के का इतिहास ग्रहण किया जाय तो साफ होगा कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कुछ चीजें बुद्ध और मौर्योत्तर काल में दिखाई पड़ती हैं। फिर ‘ऋग्वैदिक इंडिया` इसके पहले कब और कहां था? दावा तो यह भी है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लौह-प्रौद्योगिकी का ज्ञान था। ऐसा कि ऋग्वैदिक जनों ने एक महिला के कटे हुए पैरों की जगह लोहे की जांघ लगा दी थी७ जबकि इतिहास गवाह है कि लोहे का ज्ञान पाकिस्तान के गंधार क्षेत्र में १००० ई. पू. के आसपास हुआ था।८ बताया यह भी जाता है कि ऋग्वेद में अकेले कुएं के तेरह पर्याय आये हैं। यह भी कि अश्मचक्र (१०.१०१.७) पत्थर के घेरेवाले पक्के कुएं थे।९ पर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि घेरेदार कुएं सबसे पहले मौर्यकाल में गंगा घाटी में प्रकट हुए थे।१० तब क्या यह माना जाय कि ऋग्वेद में जिस ‘अश्मचक्र` की चर्चा है, वह मौर्यकालीन है? यदि नहीं तो आखिर वे कौन-से इंद्रवादी थे जिन्होंने बाद में कुएं को ‘मृग-हस्तिन` (हाथवाले पशु) की तरह जिज्ञासा से ‘इंद्रागार` (वर्षा के देवता इंद्र का घर) कहा था और जिनके देवता ‘इंद्रासन` कुएं में वास करते थे? यह भी कि यदि ऋग्वेद के सभी कूपवाची शब्द तरल हैं तो फिर ऐसे लचीले और बहुरूपिए शब्दों से इतिहास का निर्माण नहीं हो सकता है। कारण कि इतिहास ठोस तथ्यों और प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर लिखा जाता है।

३.

ऋग्वेद की सर्वाधिक चर्चा पुराणों में है।११ ये सभी के सभी अति प्राचीन होने का दावा करते हैं, परन्तु इनकी रचना या पुनर्रचना छठी से बारहवीं सदी के बीच हुई है।१२ प्राचीन काल के ये सभी पुराण मिथकों, आख्यानों और प्रवचनों से भरे हैं। ऐतिहासिक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र' को माना जाता है जिसमें वेदों का जिक्र है, पुराणों का भी है जबकि पुराण मौर्यकालीन नहीं हैं, बाद के हैं। ‘अर्थशास्त्र' में ‘चीनपट्ट` का उल्लेख, जिसका वर्णन प्राय: प्राचीन संस्कृत साहित्य में है, बाद की तिथि सूचित करता है, क्योंकि चीन स्पष्ट ही प्रारंभिक मौर्यों के क्षितिज के बाहर था और नागार्जुनीकोंडा के अभिलेखों के पहले किसी भी भारतीय अभिलेख में उसका उल्लेख नहीं पाया जाता है।१३ अशोक के अभिलेख, सबसे पुराने अभिलेख जो पढ़े जा चुके हैं, में ऋग्वेद-वेद का कोई उल्लेख नहीं है। चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में दूत बनकर आये मेगास्थनीज की ‘इंडिका` भी वेदों का कोई हवाला नहीं देती है। सर्वाधिक चौंकानेवाला तथ्य तो यह कहा जाना है कि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था। यदि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था तो इसे पश्चिमोत्तर भारत में होना चाहिए था जहां वैदिक संस्कृति का प्रभाव था और आगे भी कई सदियों तक रहा। वास्तविकता तो यह है कि बुद्ध की लड़ाई भारत में पहले से चले आ रहे विश्वासों और मान्यताओं के विरुद्ध थी। ऐसी ही लड़ाई ईरान में जरथु ने लड़ी थी जबकि वहां ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा नहीं है। तब यह शंका निर्मूल नहीं है कि बौद्धधारा वेदपूर्व थी।१४ निश्चय ही ‘तेविज्जसुत्त` (दीर्घनिकाय) का संवाद जिसमें वेदों का जिक्र है, क्षेपक है क्योंकि आरंभिक पालि बौद्धग्रंथों में इंद्र तथा ब्रह्मा को बुद्ध के उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुननेवालों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।१५ अभिलेख भी पीछे नहीं हैं। मद्रास में गुंटूर जिले से प्राप्त वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनीकोंडा अभिलेखों में (ईसा की तीसरी सदी) बुद्ध को इंद्र द्वारा पूजित अंकित है।१६

४.

इतिहास का यह तथ्य गलत है कि पुष्यमित्र के स्मरणीय अश्वमेघ यज्ञ से उस ब्राह्मण प्रतिक्रिया का आरंभ होता है जिसकी पूर्णाहुति पांच शताब्दियों के बाद समुद्रगुप्त और उसके उत्तराधिकारियों के काल में होती है। सच यह है कि पुष्यमित्र ब्राह्मण-धर्म का पुनरुद्धारक नहीं था अपितु वह बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का संस्थापक था। इतिहास गवाह है कि मौर्य राजाओं ने ईरानी सामन्तों को अपनी सेवा में रखा था। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि अशोक मौर्य के राज्य में एक ईरानी सामंत तुषस्प काठियावाड़ का शासक था।१७ ऐसा ही ईरानी सामंत पुष्यमित्र शुंग था जो अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ का सेनापति था। डा. राजमल बोरा ने श्रीधर व्यंकटेश केतकर के हवाले से बताया है कि मगों का भारतीय इतिहास वेदकाल से पहले का है।१८ पुष्यमित्र शुंग ईरानी मग ब्राह्मण था। हरप्रसाद शास्त्री भी शुंगों को ईरानी मानने के पक्ष में थे। पता नहीं क्यों, बाद में उन्होंने यह फैसला वापस ले लिया था। इन्हीं मग ब्राह्मणों ने भारत में आकर सूर्य की एक विशेष पूजा चलायी थी। शुंग राजा इसलिए अपने नाम के साथ ‘मित्र` (सूर्य) लगाया करते थे। गुप्तकाल का ज्योतिषज्ञ वराहमिहिर भी मग ब्राह्मण था जो अपने नाम के आगे ‘मिहिर` (सूर्य) लगाया करता था। मौर्यों के खिलाफ शुंगों का विद्रोह बौद्धधारा के बदले वैदिक धर्म स्थापित करने का उपक्रम था। वैदिक धर्म के इन इंद्रवादियों को ईरान में जरथु ने खारिज कर दिया था जिसकी चर्चा ऋग्वेद के दसवें मंडल में है। बावजूद इसके यह माना जाता है कि ऋग्वेद का भारत में समय अवेस्ता से पहले है। दूसरी शती ई.पू. में भी ऋग्वैदिक स्तोत्रों का संकलन पूर्ण नहीं हुआ था।१९ जाहिर सी बात है कि पश्चिम एशिया के ‘इन्दर` पुराने हैं, पर भारत के संदर्भ में वर्ण-संकोचित ‘इंद्र` नये हैं।

५.

ईरान और भारतवर्ष को छोड़कर प्राचीनकाल में ‘आर्य` शब्द अनातोलिया की हित्ती भाषा में पाया जाता है। अनातोलिया के निकट बोगाजकोइ से, जो हित्ती राजाओं की राजधानी थी, कीलाक्षर इष्टिकाओं में सुरक्षित कुछ अभिलेख मिले हैं। हिंद - यूरोपीय भाषा में यह प्राचीनतम लिखित सामग्री है।२० इनका समय १४०० ई.पू. माना गया है। ऐसा माना जाता है कि आर्य संस्कृति की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता हिंद - यूरोपीय भाषा है।२१ बोगाजकोइ के इन अभिलेखों में तथाकथित ऋग्वैदिक देवताओं को हित्ती-मितन्नी राजाओं के संधि-साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कभी यह नहीं बताया गया है कि ऋग्वेद में बोगाजकोई से आये देवताओं की उपस्थिति है जबकि संभावना इसी की है। बोगाजकोई में ‘अग्नि` साक्षी नहीं हैं। अग्नि तो अवेस्तावादियों के देवता थे जिनकी धाक चंद्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में थी। बाद के मौर्य सम्राटों ने ईरानी केंचुल को उतार फेंकने की कोशिश की थी जिसका नतीजा बृहद्रथ-हत्याकांड के रूप में सामने आया। भारत में अग्नि शुंगों के काल में वेदों के माध्यम से स्थापित हुई। बोगाजकोइ के साक्षी-देवता इन्-द-र (इंद्र), उ-रु-वन (वरूण), मि-इत्-र (मित्र) और न-स-अत्-ति-इअ (नासत्यौ) हैं, जिसका कोष्ठक में दिये गये रूप वेदों का है। स्पष्ट है कि ऋग्वेद की भाषा में शब्दों के वर्ण-विलंबित रूपों का स्खलन हुआ है। वैदिक भाषा की प्रवृत्ति वर्ण-संकोच की ओर है। संस्कृत में यह वर्ण संकोच अपनी पराकाष्ठा पर है जिसमें पाणिनि ने अपना व्याकरण लिखा था। अवेस्ता ऐसे मामले में निश्चत रूप से वेदों के सापेक्ष पुराना ग्रंथ है। आवेस्तीक गाथाओं की भाषा ऋग्वेद की भाषा की अपेक्षा किसी भी दशा में कम आर्ष नहीं है अपितु कुछ दृष्टि से अधिक ही आर्ष है।२२ यदि जरथु बुद्ध के समकालीन थे तो यह तय है कि वेदों की रचना बुद्ध के बाद हुई है। शायद इसीलिए ‘ऋग्वैदिक इंडिया` मौर्यकालीन चित्र प्रस्तुत करता है। इसीलिए यह भी कि बोगाजकोइ के ‘इन्-द-र` से भारत के ‘इंद्र` नये हैं।

६.

‘ऋग्वैदिक इंडिया` में हजार खंभों के ऊपर हजार दरवाजे वाले घर हैं, सौ दीवारों वाले पत्थर के किले हैं, इंद्र की मूर्त्तियां हैं२३ जबकि पुरावशेष इनमें से किसी को स्वीकार नहीं करता है। उत्खननों से पता चलता है कि बहुत-सारे बड़े-बड़े नगर मौर्यकाल के हैं। मेगास्थनीज ने कहा है कि पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रसाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजप्रसाद। पत्थर के स्तंभों और भूलमुंडों के टुकड़े आधुनिक पटना नगर के किनारे कुम्हरार में पाये गये हैं जो ८० स्तंभोंवाले विशाल भवन के अस्तित्व का संकेत देते हैं।२४ इसके पहले इतने विशाल भवनों का कोई भी पुरातात्त्विक साक्ष्य भारत के किसी कोने से कहीं नहीं मिलता है। तब क्या ‘ऋग्वैदिक इंडिया` का मिथक मौर्यकाल से नहीं जुड़ता है? समय का तकाजा है कि अब वेदों के रचनाकाल के संदर्भ में मीमांसकों को उद्धृत करना बंद कर दिया जाए; जो बताते हैं कि सृष्टि की आयु के साथ वेदों की आयु भी दो अरब वर्ष के लगभग पुराना है। ऋग्वेद के तिथि-निर्धारण में खगोलविज्ञान का प्रयोग भी अविश्वसनीय है।२५ याकोबी और तिलक के अनुयायी अब वैदिक साहित्य में वर्णित नक्षत्रों के आधार पर ज्यातिष और वैदिक रचनाकाल में मनगढ़ंत रिश्ते कायम करना बंद करें। आज जबकि आधुनिक विज्ञान ने पुरावशेषों के काल-निर्धारण के काफी अच्छे तरीके खोज निकाले हैं तब अंतहीन युगचक्रों (मन्वंतरों) की काल-मापक पौराणिक दृष्टि से भारतीय इतिहास को मुक्त हो जाना चाहिए। आज का अध्ययन पुरावशेषों में फ्लोरीन की मात्रा के मापन, काठ कोयले की हड्डी में रेडियो-धर्मिता की मात्रा, भूचुंबकीय अवलोकन और वृक्ष-तैथिकी पर आधारित है तब सत्ययुग या कृतयृग की किसी विलुप्त स्वर्णयुग की कल्पना निरर्थक है।२६

७.

ऐसे तथाकथित गौरवपूर्ण तथा अतिरंजित ‘ऋग्वैदिक इंडिया` के मनगंढ़त किस्सों के साथ भारत की भाषा का एक प्रकार से जाली इतिहास जुड़ा हुआ है। वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत की सीढ़ी से उतरकर पालि की जमीन पर पैर रखना सर्वथा भ्रामक है। सही इसका उल्टा है। पालि भारत की प्राचीनतम ऐतिहासिक भाषा है। इसके साक्षी पुरावशेष हैं। भारत के पुराने अभिलेख पालि भाषा में हैं। पालि भारत की प्राचीनतम प्राकृत भाषाओं में से एक है और यह भी कि पालि भाषा वैदिक भाषा के अधिक निकट है और प्राकृत भाषाएं संस्कृत भाषा के।२७ ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख पालि भाषा में हैं। ये सबसे पुराने अभिलेख हैं जो पढ़े जा चुके हैं। अभिलेखों में संस्कृत भाषा ईसा की दूसरी सदी से मिलने लगती है जिसका व्यापक प्रयोग ईसा की चौथी-पांचवीं सदी में होता है। शक राजा रुद्रदामन ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लंबा अभिलेख १५० ई. में जारी किया था। शकों को संस्कृत पर गर्व था। शायद इसीलिए रूद्रदामन बड़े अभिमान से कहता है कि संस्कृत भाषा पर उसका अधिकार है। नासिक की बौद्ध गुफाओं के अतिसंस्कृतमय लेख भी शक दाताओं के हैं जबकि सातवाहनों ने अपने अभिलेख प्राकृत भाषा में खुदवाये थे। यह देशी और विदेशी राजाओं की भाषाई प्रतिद्वंद्विता है।२८

८.

संस्कृत के निर्माण में गंधार की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। ५२०-१८ ई. पू. के बहिस्तान शिलालेख इस बात का गवाह हैं कि ईरानियों का कब्जा गंधार पर था। जाहिर है कि ईरानी भाषा तब गंधार में प्रवेश कर चुकी थी जिसे भाषाविज्ञान में प्राचीन फारसी कहते हैं। यह भाषा वैदिक भाषा के करीब है। इसी भाषा में गंधार क्षेत्र की प्राकृतों का मिश्रण होने से संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ था। यदि भारत के प्राचीन भूगोल पर विचार करें तो ऐसा दिखलाई देता है कि जितना हम उत्तर-पश्चिम की दिशा की ओर जाते हैं संस्कृत और प्राकृत का अंतर कम होता जाता है। उदाहरणार्थ, गंधारी प्राकृत में संस्कृत में प्र,र्म,त्र जैसे बहुत-से संयुक्त-व्यंजन के रूप सुरक्षित हैं।२९ इसी गंधार में पेशावर के आसपास का क्षेत्र निया प्रदेश है। निया प्राकृत में श, ष और स तीनों ऊष्म व्यंजन हैं, यह भी कि इसमें क्र, ग्र, त्र, द्र, प्र, ब्र, भ्र, अविकृत रूप में मिलते हैं। कहना न होगा कि इसी प्रविधि का इस्तेमाल संस्कृत के निर्माण में कसकर किया गया था। शायद इसीलिए ‘अष्टाध्यायी` का पाणिनि पेशावर के निकट शलातुर का निवासी था।३० मध्य एशिया से आये विदेशी राजवंशों ने भारत में आकर संस्कृत भाषा पर इतना बल क्यों दिया, इसका रहस्य शायद खुल गया होगा। जिसे भाषाविज्ञान में संयुक्त व्यंजन कहा गया है, वह एक प्रकार से वर्ण-संकोच है। संस्कृत इसी वर्ण-संकोच की भाषा है। इस वर्ण-संकोच का सबसे बड़ा औजार ‘र` का बहुरूपिया रूप (व्र, वृ, र्व, र्, त्र, श्र, ऋ) था। ऐसी तकनीक वाली फैक्ट्री में एक बार देशी शब्दों के आ जाने से उनकी शक्ल संस्कृत वाली हो जाया करती थी। १४वीं-१५वीं सदी ई.पू. के आसपास अश्वशास्त्र पर हित्ती भाषा में एक रचना मिलती है जिसमें बहुत से ऐसे शब्द हैं जो संस्कृत के निकट हैं। ये शब्द संख्यावाची हैं। ऐसे शब्द देशांतरण के बावजूद कम बदलते हैं। इस रचना में अइक (एक), तेर (त्रि), पंज (पञ्च), सत्त (सप्त) और (नव) शब्दों का प्रयोग अंकों के लिए किया गया है।३१ संख्यावाची पांच के लिए आज भी पंजाबी और सिंधी में हित्ती भाषा का ‘पंज` प्रचलित है और सात के लिए ‘सत्त` का प्रचलन है। यह ‘सत्त` पालि और प्राकृत में भी हैं संस्कृत ‘सप्त` निश्चित रूप से संस्कृत के नये कानून के हिसाब से है। हिन्दी तेरह के समक्ष ‘त्रि` का भी वर्ण-संकोच स्पष्ट है। ऐसी प्रवृत्ति कश्मीरी में भी है। शायद इसीलिए कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो कश्मीरी का संबंध वैदिक संस्कृत से स्थापित करते हैं। ऐसे भी संस्कृत के पुराने लेखकों का संबंध कश्मीर से रहा है। मध्य एशिया, खास तौर से गंधार क्षेत्र से आयी संस्कृत भाषा के ये सब पद-चिन्ह हैं जिसका साक्ष्य अति प्राचीन का दावा करनेवाले संस्कृत के ग्रंथ सावधानी के बावजूद भी मिटा नहीं सके हैं। वह दिन दूर नहीं जिस दिन यह बताया जाएगा कि संस्कृत ‘आंग्ल` से अंग्रेजी का ‘इंग्लिश` बना है। संस्कृत के प्राय: तत्सम रूप वास्तव में देशी भाषाओं के तद्भव रूप हैं जिसे संस्कृत को मूलभाषा माने जाने की गलती से तद्भव मान लिया जाता है। जाहिर है कि नये कानून के औजारों से पुराने शब्दों को संस्कृत ने अपने कब्जे में लिया था। इसे लूट-खसोट, हड़प या परिमार्जन, जो भी कहेंं।

९.

इतिहासकारों का यह फैसला गलत है कि समृद्ध और शक्तिशाली विदेशी संस्कृत के जरिए अपने को भारतीय कुलीन-वर्ग में स्थापित करने का उपक्रम करते थे। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत विदेशी बाटमारों (भाषा के संदर्भ में रास्ता चलते लूट-पाट) की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई भौगोलिक रूप नहीं मिलता है। प्राकृतों के भौगोलिक रूप (महाराष्ट्री, शौरसेनी, गंधारी, मागधी) मिलते हैं। संस्कृत दूसरी भाषाओं से शब्दों की लूट-पाट की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई अपना भाषाई-भूगोल नहीं था। संस्कृत में प्राकृतों के शब्द-भंडार का संस्कृतिकरण हुआ है। यदि यह पूछा जाय कि संस्कृत किस भू-भाग की भाषा है तो इसका जवाब गोल-मटोल मिलेगा। यह कि संस्कृत वैदिक युग में समस्त मध्यदेश में फैली हुई थी। संस्कृत भाषा की यह अदृष्ट धारा वैदिक युग में मध्यदेश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ठीक वैसी ही प्रवाहित होती थी जैसे पौराणिक कथाओं में अदृष्ट सरस्वती की पवित्र धारा बहती थी जिसके तट पर आर्यों का प्रमुख उपनिवेश था। सरस्वतीवादियों को अब इस अस्तित्त्वविहीन नदी का पानी नापना बंद कर देना चाहिए। यदि इतने विशाल भू-भाग में संस्कृत बोली जाती थी तब १९२१ एवं १९७१ की जनगणना में संस्कृतभाषी लोगों की जनसंख्या क्रमश: ५५५ एवं १२८२ क्यों पायी गयी है?३२ क्या संस्कृतभाषी लोग जंगलों तथा पहाड़ों में रहने वाले असुविधाभोगी आदिवासियों की तरह विलुप्त हो गये हैं? संस्कृत का वर्चस्व को देखकर ऐसा तो कदापि नहीं लगता है। सच तो यह है कि मुट्ठीभर मध्य एशियाई विदेशियों ने मौर्योत्तर काल में निरंतर दबाव बनाते हुए गुप्तयुग में संस्कृत को राजभाषा बनवाया था जबकि प्राकृत में लिखित साहित्य को दरबारी क्षेत्र के बाहर संरक्षण प्राप्त था। गुप्तयुग में संस्कृत का साहित्य विशिष्ट वर्ग, दरबार, कुलीन वंश तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों से संबंधित व्यक्तियों से संबंधित था। नि:संदेह संस्कृत गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी, पर आम जनता की भाषा प्राकृत थी जो उस काल के नाटकों में प्रयुक्त द्वैध भाषा के सामाजिक संदर्भ से स्पष्ट होता है।३३ राजभाषा के मामले में मुगलकाल में यह इतिहास दुहराया जाता है जब ईरानी संस्कृति से प्रभावित दिल्ली के मुट्ठीभर अभिजनों ने फारसी को राजभाषा बनवाया था जबकि बाबर की मातृभाषा तुर्की थी। तुर्क सुलतानों का तुर्की तथा अफगानों की जबान पश्तो कभी भी यहां राजभाषा का दर्जा नहीं नहीं प्राप्त कर सकी।

१०.

भारतीय भाषाओं में ऐसे शब्द नहीं मिलते हैं जो ब्राह्मण और क्षत्रिय के सजात शब्द हों, पर विश् (वैश्य) से मिलते-जुलते शब्द बहुसंख्यक हिंद - यूरोपीय भाषाओं में मिलते हैं।३४ जाहिर है कि भारत की वर्णमूलक संस्कृति ऐसे लोगों द्वारा लायी गयी है जिन्होंने संस्कृत के नियम-कानून बनाये हैं। वर्ण-संकोच की ऐसी भाषा जो आम जनता और सुविधाभोगी वर्ग के बीच फासला पैदा करके लूटने की सुविधा दे। ऐसी ही वर्ण-संकोचमूलक भाषा और वर्ण-विस्तारमूलक समाज के बलबूते गुप्तकाल को भारतीय इतिहास में आभिजात्य नजरिये से ‘स्वर्णयुग` कहा जाता है। एक ऐसा युग जिसमें ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक दान दिये जाते थे, मंदिर बनवाये जाते थे और महिलाएं सती हुआ करती थीं। सबसे चौंकानेवाली बात तो यह है कि इस काल में वर्ण-व्यवस्था पर आधारित ‘अमरकोश` लिखा जाता है। ऐसे समय में संस्कृत को राजभाषा बनाया जाना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। पर संस्कृत पुरानी भाषा नहीं है। पैशाची पुरानी है। चीन तुर्किस्तान के खरोष्ठी शिलालेखों में इसका पुरातात्त्विक साक्ष्य मिलता है।३५ भाषावैज्ञानिकों का फैसला है कि यह वैदिक संस्कृत के निकट की भाषा है।

११.

निष्कर्ष यह कि वैदिक भाषा ईरान की प्राचीन फारसी, पश्चिमोत्तर की पैशाची और भारत की पालि के लगभग समकालीन थी। इसे ज्यादा से ज्यादा ६०० ई.पू. के आसपास का माना जाना चाहिए। वैदिक भाषा का अगला पड़ाव संस्कृत है। यह संस्कृत ईरान की पहलवी, पश्चिमोत्तर की निया प्राकृत एवं भारत के मिश्रित बौद्ध संस्कृत के प्राकृतांश के लगभग समकालीन है। मिश्रित बौद्ध संस्कृत की भाषा पालि के बाद पहली सदी के आसपास की है जब पश्चिमोत्तर में संस्कृत का जन्म हो रहा था। एक ऐसी भाषा जिसके जनमने के बाद उसकी मां पैशाची मृतप्राय हो जाती है। पालि में संस्कृत का प्रवेश बाद में हुआ, इसलिए कि इसके पहले संस्कृत भाषा नहीं थी। इस भाषा का उदय ईसा की पहली सदी के आसपास होता है। इसीलिए फ्रैंके ने दिखाया है कि शिलालेखों की भाषा के रूप में संस्कृत प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रकट होती है।३६ जाहिर है कि संस्कृत की प्राचीनता सिर्फ साहित्यिक या कहें मनगढ़ंत है, तभी तो अमेरिकी भाषावैज्ञानिक ब्लूमफील्ड को आश्यर्च होता है।३७ बात एकदम साफ है कि वैदिक भाषा भी पालि और पैशाची प्राकृतों की तरह ईसा से पहले की एक प्राचीन प्राकृत है जबकि संस्कृत ईसा के आसपास की ‘साहित्यिक प्राकृतों` की तरह एक प्रकार से कृत्रिम भाषा है। आज की तारीख में पालि भारत की सबसे पुरानी ऐतिहासिक भाषा है। भाषा के जानकार अब वैदिक और लौकिक संस्कृत के बाद पालि का इतिहास लिखना बंद करें और ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा के साथ वैदिक भाषा को जोड़कर उसे पालि के पहले सिद्ध करने से बाज आएँ।


संदर्भ

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२४. प्राचीन भारत, पूर्वोद्धृत; पृ. १३७

२५. रोमिला थापर : आर्य : मिथक और यथार्थ; सफदर हाश्मी मेमोरियल ट्रस्ट, नई दिल्ली (पुनर्मुद्रित, २००२); पृ. ५९

२६. दामोदर धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत; पृ. ४२-४३

२७. इंद्रचंद्र शास्त्री : पालि भाषा और साहित्य; हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (संस्करण, १९८७); वक्तव्य

२८. ज्यूल ब्लाख/अनु. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय : भारतीय आर्य भाषा; हिंदी समिति, लखनऊ (संस्करण, १९७२); पृ. ४

२९. राजमल बोरा, पूर्वोद्धृत; पृ. ३७

३०. वासुदेवशरण अग्रवाल : पाणिनिकालीन भारतवर्ष; मोतीलाल बनारसीदारस, बनारस (संस्करण,२०१२ वि.); पृ. १४

३१. आर्य संस्कृति की खोज, पूर्वोद्धृत; पृ. ४३

३२. स्वपन कु बिस्वास, पूर्वोद्धृत; पृ. ११७

३३. आर. पिशल/अनु. हेमचंद्र जोशी : प्राकृत भाषाओं का व्याकरण; बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना (संस्करण, १९५८); पृ. ४४

३४. आर्य संस्कृति की खोज, पूर्वोद्धृत; पृ. ६५

३५. नेमिचंद्र शास्त्री : प्राकृत भाषा और साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; तारा बुक एजेन्सी, वाराणसी (पुनर्मुद्रण, १९८८); पृ. ९०

३६. पाण्डुरंग दामोदर गुणे/अनु. भोलानाथ तिवारी : तुलनात्मक भाषाविज्ञान; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (पुनर्मुद्रण, १९९६); पृ. १६५

३७. ब्लूमफील्ड/अनु. डॉ. विश्वनाथ प्रसाद : भाषा; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (संस्करण, १९६८); पृ. ६९

रविवार, 3 अक्टूबर 2021

गांधी का जंतर

 गांधी का जंतर ----


तुम्हें एक जंतर देता हूँ । जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहं तुमपर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आज़माओ :


"जो सबसे गरीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुंम उठाने का विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा , क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा ?  क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ?  यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा,  जिनके पेट भूखें हैं  और आत्मा अतृप्त है ?


तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहं समाप्त होता जा रहा है।"


                               मोहनदास करम चंद गांधी


शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

साहिर

 Qalame Sahir Ghalib ke naam


यह नज़्म 1968 में लिखी गई


इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,

तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।

तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,

अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।


सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,

अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।

उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,

यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।


जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,

उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।

आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,

मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।


जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,

उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,

उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।


ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,

कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।

जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,

मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।


यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,

हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।

गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,

हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।

                                                 साहिर

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

अल्लाह की बेटियां

 

630 ईस्वी से पहले ये तीनो अरब देशों में पूजनीय थी। इन्हें अल्लाह की बेटियां कहा जाता था।

अल लात

मिनात

और उज़्ज़ा

बुधवार, 8 सितंबर 2021

ब्राह्मणों का ऐतिहासिक उल्लेख

 कहाँ लिखा हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी है ?


जानना चाहते हो तो

पढिए निम्नलिखित पुस्तकें:-


1) मनुस्मृति

  श्लोक नं.२४


2) बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित

वैदिक आर्या का मूलस्थान (Arctic home in the Vedas)


३) मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा दि.२७ दिसंबर १९२४ का काँग्रेस अधिवेशन मे दिया हुआ अध्यक्षीय भाषण।


४) पंडित जवाहर लाल नेहरु का 

"पिता की ओर से पुत्री के नाम खत"


५) लाला लजतपराय द्वारा लिखित

 भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ २१-२२


६) बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित

 भारत वर्ष का इतिहास   पृष्ठ ६३  ओर ८७


७) पंडित श्यामबिहारी मिश्रा और सुखदेव बिहारी मिश्रा द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास,भाग १ पृष्ठ ६२ ओर ६३


८) पं.जनार्दन भट्ट एम.ए द्वारा लिखित

 -माधुरी मासिक - भारतीय पुरातत्व की नयी खोज १९२५ - पृष्ठ २७ ओर २९


९) पंडित गंगाप्रसाद द्वारा लिखित

जाति भेदी  पृष्ठ १० और २७


१०) रविँद्र दर्शन - सुख सनपात्री भंडारी पृष्ठ २१ ओर २२


११) भारतीय लिपीतत्व - नागेँद्रनाथ बसू. पृष्ठ ४७ ओर ५१


१२) प्राचीन भारत वर्ष की सभ्यता का इतिहास - रमेश चंद्र दत्त, भाग -१ पृष्ठ १७ ओर २९


१३) हिँदी भाषा की उत्पति - आचार्य महावीर द्विवेदी


१४) हिंदी भाषेचा विकास - बाबू श्यामसुंदर पृ. ३ ओर ७


१५) हिँदुत्व - पं.लक्ष्मीनारायण गर्दे, पृष्ठ - ८,९ ओर २९


१६) आर्योँ का आदिम निवास -पं.जगन्नाथ पांचोली.


१७) महाभारत मीमांसा - राय बहादूर चिंतामणी विनायक वैद्य.


१८) जाति शिक्षा - स्वामी सत्यदेव परिभ्राजक,पृष्ठ ८ ओर ९


१९) २९ वा अखिल भारतीय हिंदू महासमेलन रामानंद चटर्जी, मॉडर्न रिव्ह्यू का भाषण


२०) २९ नवंबर १९२६ के दिन आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का आज या नियतकालिन लेख। 


२१) देशभक्त सामाजिक का संपादकीय  लेख. पृष्ठ २९ फरवरी १९२४


२२) प्रेमा का वृंदावन मासिक - योगेशचंद्र पाल १९२७

पृष्ठ १३६ ओर १४३


२३) काका कालेलकर की *पिछडा वर्ग रिपोर्ट*


२४) धर्मशास्राचा इतिहास - पा.वा.काणे करना


 २५) हिंदू सभ्यता - राधाकृष्ण मुखर्जी, पृष्ठ ४१,४७ ओर ५९


२६) डी.डी.कोसंबी - प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता


२७) वोल्गा से गंगा - राहुल सांस्कृत्यायन


२८) ग्रीक ओरिजन्स ऑफ कोकणस्थ चित्पावन -प्रताप जोशी


२९) ना.गो.चाफेकर चित्पावन - पृष्ठ २९५


३०) वि.का.राजवाडे के मतानुसार ब्राम्हण विदेशी है। 


३१) स्वामी दयानंद सरस्वती -सत्यप्रकाश ग्रंथ


३२) टाईम्स ऑफ इंडिया का 2001 का DNA रिपोर्ट


३३) ऋग्वेद मे लिखा है की ब्राह्मण विदेशी है:-


34)आर्यां का मूळ वस्तीस्थान उत्तर ध्रुव.

-(आर्टीक्ट होम ईन द वेदाज)


35)हम ब्राह्मण लोग मध्य एशिया से भारत आये है  । 

(डिस्कव्हरी अॉफ इंडिया- पंडित जवाहरलाल नेहरु)


यह सब पढके (खासकर वेदों को) खुद ब्राह्मणों को भी समझ में आ जाएगा कि आर्यों का मूल निवास भारत में नही है।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

अय्यंकाली




 अय्यंकाली: केरल की दलित क्रांति के प्रतीक


    ( अय्यंकाली, जिन्होंने अपनी बैलगागाड़ी से नंबूदरी ब्राह्मणों एवं नायरों  वर्चस्व और अंहकार को कुचल दिया)


                        जन्मदिन ( 28 अगस्त) पर सादर नमन के साथ 


केरल के पहले दलित विद्रोही अय्यंकाली को याद करते हुए मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय लिखते हैं-

                      तुम्हीं ने जलाया था, प्रथम ज्ञानदीप

                      बैलगाड़ी पर सवार हो

                      गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

                      अपनी देह की यंत्रशक्ति से

                      पलट दिया था, कालचक्र को


आधुनिक युग ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलितों के विद्रोह का भी  युग है। इस युग में देश के अलग-अलग कोनों में दलित विद्रोह की लहर पर लहर उठती रही और आज भी उसका सिलसिला किसी न किसी रूप में चल रहा है, क्योंकि सामाजिक समानता के जिस स्वप्न के साथ ये विद्रोह शुरू हुए थे, वह अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है। दक्षिण भारत और पश्चिमोत्तर भारत में यह विद्रोह ज्यादा व्यापक और प्रभावी रहा है।


तमिलनाडु में इसका नेतृत्व आयोथी थास (20 मई 1845-1914) ने किया, तो महाराष्ट्र में इसका नेतृत्व डॉ. आंबेडकर ( 14 अप्रैल 1891-6 दिसंबर 1956) ने किया, जो बाद पूरे देश के दलितों के विद्रोह के मार्गदर्शक बने। केरल में इस विद्रोह का नेतृत्व अय्यंकाली ( 28 अगस्त 1863-18 जून 1941) ने किया है और उन्होंने वहां उथल-पुथल मचा दी। वहां के सामाजिक संबंधों में काफी हद तक आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया और अपनी बैलगाड़ी से सवर्णों के जातीय श्रेष्ठता बोध के अभिमान को रौंद दिया।


केरल में आधुनिकता की नींव डालने वाले पहले व्यक्ति श्रीनारायण गुरु (20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928) थे, लेकिन इस नींव पर विशाल भवन जिन लोगों ने खड़ा किया, उनमें दलित विद्रोही अय्यंकाली की निर्णायक भूमिका है। जिन्होंने केरल में समानता एवं न्याय की आधुनिक चेतना को सबसे निचले स्तर तक विस्तारित कर दिया। बहुतों के लिए यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि जो व्यक्ति न लिख सकता था और न पढ़ सकता था, उसने पढ़ने के अधिकार के लिए ऐसा आंदोलन चलाया हो, जिसकी दुनिया में शायद कोई दूसरी मिसाल न हो, जो व्यक्ति किसी तरह हस्ताक्षर करना सीखा हो, वह व्यक्ति आधुनिक केरल के निर्माताओं में सबसे अगली पंक्ति में खड़ा हो। इस मामले में अय्यंकाली से तुलना के संदर्भ में कबीर और रैदास याद आते हैं, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा से वंचित होने के बावजूद भी भारतीय मध्यकालीन बहुजन नवजागरण का नेतृत्व किया।


केरल में दलितों के ऊपर नंबूदरी ब्राह्मणों एवं नायरों ने ऐसी अनेक बंदिशें लाद रखी थीं, जिसकी कल्पना करना भी किसी सभ्य समाज एवं इंसान के लिए मुश्किल है। मुख्य सड़कों पर दलित चल नहीं सकते थे, बाजारों में वे प्रवेश नहीं कर सकते थे, स्कूलों के द्वार उनके लिए बंद थे, मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित था, अदालत के भीतर पांव रखने की उन्हें इजाजत नहीं थी, उनके मुकदमे अदालत के बाहर सुने जाते थे। महिलाएं और पुरुष कमर के ऊपर और घुटने के नीचे वस्त्र नहीं पहन सकते थे। महिलाएं यदि अपना स्तन ढकने की कोशिश करतीं, तो उन्हें टैक्स देना पड़ता था।


कई फीट की दूरी से उनकी छाया नंबूदरी ब्राह्मणों को अपवित्र कर सकती थी। इसी स्थिति को देखकर स्वामी विवेकानंद ने इसे जातियों का पागलपन कहा था। इस स्थिति को तोड़ने की केरल में पहली कोशिश श्रीनारायण गुरु ने की, लेकिन उनकी कोशिशों का ज्यादा फायदा दलितों से ऊपर की मध्य जातियों-विशेष कर इजावा जाति को मिला। हां उन्होंने उस चेतना को ज़रूर जन्म दिया और विस्तार किया, जिससे दलितों के बीच अय्यंकाली जैसा विद्रोही व्यक्तित्व जन्म लिया। 


28 अगस्त 1863 को अय्यंकाली का जन्म त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में  पुलाया जाति (दलित) में हुआ था। भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो दलित जाति में जन्म लिया हो और उसे जातीय अपमान का सामना न करना पड़ा हो, चाहे वह दुनिया के विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों से पढ़कर आए डॉ. आंबेडकर ही क्यों न हों। अय्यंकाली को जातीय अपमान का अनुभव बचपन में ही हो गया था, जब उनकी फुटबाल की गेंद एक नायर परिवार के अहाते में जा गिरी। अपमानित बालक शायद डॉ. आंबेडकर की तरह, लेकिन उनसे पहले इस जातीय अपमान से मुक्ति का संकल्प मन ही मन ले लिया।


हालांकि अय्यंकाली को भी ज्योतिबा फुले ( 11 अप्रैल 1827-28 नवंबर 1890) की तरह उनके पिता ने समझाया कि यही परिपाटी है, इसे स्वीकार करना होगा यानि जातीय अपमान स्वीकार करने और बर्दाश्त करके जीना सीखना होगा, लेकिन अय्यंकाली ने कुछ और ही ठान लिया था। आयोथी थास, स्वामी अछूतानंद ( 6 मई 1879-20 जुलाई 1933) और डॉ. आंबेडकर जैसे दलित विद्रोहियों के विपरीत अय्यंकाली को स्कूल जाना मयस्सर नहीं हुआ और उन्हें अक्षर ज्ञान नहीं मिल पाया। इसका कारण यह था कि न तो उनके पिता अंग्रेजों की सेना में थे और न ही त्रावणकोर राज्य के उस हिस्से में ईसाई मिशनरियों का कोई स्कूल था, क्योंकि सैनिक छावनी और मिशनरी स्कूल ही वे जगहें थीं, जहां दलितों की पहली पीढ़ी शिक्षित हुई थी या महाराष्ट्र जैसी जगहों पर ज्योतिबा फुले ने दलितों के लिए स्कूल खोला।


ऐसा कोई भी स्कूल अय्यंकाली को नसीब नहीं हुआ। उन्होंने अपने समकालीन और बाद के दलित नायकों से कुछ अलग ब्राह्मणवाद के खिलाफ सीधे  विद्रोह का रास्ता चुना और इसके चलते उन्हें और उनके साथियों को नायरों के हिंसक हमलों का सामना भी करना पड़ा, जिसका पुरजोर जवाब उसी तरह से अय्यंकाली और उनके साथियों ने दिया। इस सीधे विद्रोह का शायद एक कारण यह था कि त्रावणकोर राज्य में प्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश शासन नहीं था, वहां हिंदू राज्य था और उसका राजा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार राज करता था। ब्रिटिश सुधारों के चलते जो थोड़ी सी सांस लेने की गुंजाइश तमिलनाडु में आयोथी थास, महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर और उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूनानंद को मिली हुई थी, वह भी त्रावणकोणर में अय्यंकाली को प्राप्त नहीं थी। 


करीब 27 वर्ष की उम्र में अय्यंकाली ने एक ऐसा कदम उठाया, जो केरल ही नहीं, दुनिया के इतिहास में दर्ज करने वाला बन गया। केरल में मुख्य रास्तों पर दलितों को चलने की मनाही थी, अय्यंकाली ने 1891 में दलितों के लिए वर्जित सड़कों पर बैलगाड़ी दौड़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने बैलगाड़ी तैयार कर उन रास्तों पर दौड़ाई, जिस पर उनके पूर्वज चलने की सोच भी नहीं सकते थे। नंबूदरी ब्राह्मण और ब्राह्मण के बाद खुद सबसे श्रेष्ठ समझने वाले नायरों को लगा जैसे यह बैलगाड़ी सड़कों को न रौंद कर, उनकी छाती को रौंद रही हो और वे लाठी-डंडों के साथ उनके ऊपर टूट पड़े।


लेकिन अय्यंकाली भी तैयारी करके निकले थे, उन्होंने हमलावरों से निपटने के लिए अपने पास पहले से रखी कटार ( खुखरी) निकाल मैदान में कूद पड़े। बुजदिल हमलावर भाग खड़े हुए। इस तरह अय्यंकाली ने सवर्णों के जातीय श्रेष्ठता के अभिमान को मिट्टी में मिला दिया। उन्होंने  ब्राह्मणवाद की करीब हर उस व्यवस्था को चुनौती दी, जो दलितों को मनुष्य होने के दर्जे से वंचित करती थी और उन्हें अपमानित करती थी। 


असाक्षर, लेकिन आधुनिकता की चेतना एवं संवेदना से लैश अय्यंकाली ने बहुजन पुनर्जागरण के जनक ज्योतिबा फुले की तरह शिक्षा को मुक्ति का द्वार माना। उन्होंने 1904 में दलितों के लिए पहले स्कूल की नींव रखी, लेकिन सवर्णों के यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने उनके स्कूल को दो बार जला दिया, लेकिन वे हार मानने वाली मिट्टी के नहीं बने थे, आखिर उन्होंने त्रावणकोर में दलितों का पहला स्कूल खोल ही दिया। 


दुनिया के इतिहास में शायद कोई ऐसी दूसरी घटना घटी, जब मजदूरों ने शिक्षा के अधिकार को लागू कराने के लिए हड़ताल किया हो। शिक्षा के अधिकार को लागू कराने के लिए अय्यंकाली के नेतृत्व में दलितों ने सवर्णों के खेतों में काम करना बंद कर दिया। नायरों ने इस हड़ताल को तोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन अय्यंकाली के कुशल नेतृत्व के चलते हड़ताल सफल हुई और दलितों को स्कूलों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त हो गया। यह हड़ताल करीब एक वर्ष ( 1907-1908) तक चली।


नायर शास्त्र सम्मत वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्र थे, लेकिन आर्थिक-सामाजिक हैसियत में उत्तर भारत के सवर्णों ( राजपूतों) की स्थिति में थे, अय्यंकाली की सीधी टकराहट सबसे अधिक नायरों से हुई, वही ब्राह्मणवाद की अगली पंक्ति के सबसे मजबूत दीवार बनकर उनके सामने खड़े होते थे। शिक्षा के अधिकार को व्यवहार में उतारने के लिए अय्यंकाली पुजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नायर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया। अय्यंकाली हार मानने वाले नहीं थे, उन्होंने दलित बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार व्यवहार में हासिल करके ही दम लिया।


वर्जित सड़कों पर चलने और शिक्षा का अधिकार हासिल करने के बाद अय्यंकाली ने दलित महिलाओं की गरिमा और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष शुरू किया। जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है कि दलित महिलाओं को नंबूदरी ब्राह्मणों की व्यवस्था के अनुसार अपना स्तन ढकने का अधिकार नहीं था और यदि वह ढकने की कोशिश करती, तो उन्हें टैक्स देना पड़ता था। यह टैक्स उनके स्तन के आकार के आधार पर तय होता है। इस मानव गरिमा विरोधी व्यवस्था के खिलाफ अय्यंकाली ने संघर्ष का  बिगुल फूंक दिया।


1915 में उन्होंने दलित एवं आदिवासी स्त्रियों का आह्वान किया कि वे इस घिनौनी व्यवस्था को चुनौती देते हुए, अपने स्तन ढकें और ब्लाउज पहने। उनके आह्वान पर हजारों दलित-आदिवासी महिलाओं ने ऐसा किया। महिलाओं द्वारा ऐसा करने पर  तथाकथित ऊंची जातियों में खलबली मच गई। ऊंची जातियों ने दलितों के घरों पर हमला बोल दिया। कई दलित महिलाओं के स्तन उच्च जातियों के लोगों ने काट डाले। उनके परिवार के सदस्यों को आग के हवाले कर दिया। फिर भी महिलाएं पीछे नहीं हटीं, न अय्यंकाली पीछे हटे। 


अय्यंकाली का जीवन दलितों के लिए निरंतर संघर्ष करते हुए बीता, एक संघर्ष खत्म नहीं होता कि दूसरा शुरू हो जाता, क्योंकि वे दलितों को वो सभी अधिकार दिलाना चाहते थे, जिनसे उन्हें वंचित रखा गया था। दलितों को मुख्य बाजारों में प्रवेश का भी अधिकार नहीं था। उन्होंने अपने साथियों के साथ उन बाजारों में प्रवेश किया। इस बार भी सवर्णों ने दलितों पर लाठी-डंडे और अन्य हथियारों के साथ हमला बोल दिया। दलितों ने भी इस बार करारा जवाब दिया। जगह-जगह हिंसक झड़पें हुईं। अय्यंकाली के नेतृत्व में दलित समाज का स्वाभिमान जाग चुका था। आत्मसम्मान और गरिमा के साथ जीने के लिए दलित अय्यंकाली के नेतृत्व में हर तरह संघर्ष के लिए तैयार थे, जिसमें स्त्री-पुरूष दोनों शामिल थे।


शिक्षा और समान अधिकार हासिल करने के लिए संगठन जरूरी है, इसका अहसास अय्यंकाली को बखूबी था। उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’ (गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की। सभी दलित जातियों के लोग इसकी सदस्यता ले सकते थे। संगठन का उद्देश्य दलितों को अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा और गरीबी से मुक्ति हासिल कराना और जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता का अधिकार प्राप्त करना था। सवर्णों के हमलों के डर से पहले इस संगठन की गुप्त बैठकें होती थीं, लेकिन बाद में खुले में भी बैठकें होने लगीं।


 

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जिसका काफी हद तक आधुनिकीकरण हुआ है और वहां एक आधुनिक नागरिक समाज का निर्माण हुआ है। वहीं यह भी सच है कि वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृ सत्ता के बहुत सारे अवशेष आज भी शेष भारत की तरह केरल में भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। इसके बावजूद भी केरल भारत का सबसे आधुनिकीकृत प्रदेश है और शीर्ष आधुनिक देशों से बहुत सारे मामलों में बराबरी करता है। मानव विकास सूचकांक में भारत के सभी प्रदेशों में शीर्ष पर है और दुनिया के शीर्ष देशों की बराबरी करता है। कोविड-19 से निपटने के मामले में भी केरल मॉडल की दुनिया भर में चर्चा हो रही है।


ऐसा केरल एक दिन में नहीं बना है, न ही किसी एक व्यक्ति के प्रयास से बना है। यह सर्वविदित है कि जब किसी देश या प्रदेश के समाज में एक गहरी उथल-पुथल मचती है और वह अपने मध्यकालीन जड़ विचारों से मुक्त होता है तथा आधुनिक बौद्धिक, तार्किक एवं विवेक संगत विचारों को अपनाता है, तभी वह एक आधुनिक देश या प्रदेश बनता है।


किसी देश-प्रदेश के आधुनिक उन्नत एवं समृद्ध देश-प्रदेश में तब्दील होने के लिए वहां के लोगों के मन-मस्तिष्क में बुनियादी बदलाव और उनके सोचने-देखने के तरीके का मानवीय एवं वैज्ञानिक होना जरूरी होता है। यानि उनकी विश्व-दृष्टि बदलनी चाहिए। इसके साथ ही वहां के सामाजिक-आर्थिक संबंधों में परिवर्तन आना चाहिए, जिसके अनुसार ही अक्सर वहां की राजनीति अपना आकार ग्रहण करती है। यह सब कुछ मिलकर एक ऐसे नागरिक समाज का निर्माण करते हैं, जिसे आधुनिक समाज कहा जा सकता है। भारत में केरल एक ऐसा ही प्रदेश है। इस संबंध में सारे उपलब्ध तथ्य इसके साक्षी हैं।


केरल के आधुनिक और मॉडल राज्य बनाने की नींव श्रीनारायण गुरु ने डाली थी, जिसे केरल के पहले दलित विद्रोही अय्यंकाली ने विस्तार एवं नई उंचाई दी। 18 जून, 1941 को अय्यंकली ने अंतिम विदा ली।


संदर्भ- 


1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, 

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अय्यंकाली कंट्रीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ त्रावणकोर दलित्स, 2018 

3-कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकाली, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, 

4- अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक – ओमप्रकाश कश्यप ( लेख)


( जनचौक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

स्त्री

 ज़्यादातर सहमत. 


Nishtha की वॉल से 


आसान नहीं होता 

प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करना,

क्योंकि 

उसे पसंद नहीं होती जी हुजूरी,

झुकती नहीं वो कभी 

जबतक न हो  

रिश्तों में प्रेम की भावना।


तुम्हारी हर हाँ में हाँ 

और 

ना में ना कहना वो नहीं जानती, 

क्योंकि 

उसने सीखा ही नहीं झूठ की डोर में रिश्तों को बाँधना,

वो नहीं जानती 

स्वांग की चाशनी में डुबोकर अपनी बात मनवाना,

वो तो जानती है 

बेबाक़ी से सच बोल जाना।

 

फ़िज़ूल की बहस में पड़ना 

उसकी आदतों में शुमार नहीं,

लेकिन 

वो जानती है,

तर्क के साथ अपनी बात रखना।


वो 

क्षण-क्षण गहने- कपड़ों की माँग नहीं किया करती, 

वो तो सँवारती है 

स्वयं को अपने आत्मविश्वास से, 

निखारती है 

अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी मुस्कान से।


तुम्हारी गलतियों पर 

तुम्हें टोकती है,

तो तकलीफ़ में तुम्हें 

सँभालती भी है।

उसे 

घर सँभालना बख़ूबी आता है,

तो 

अपने सपनों को पूरा करना भी।


अगर नहीं आता 

तो 

किसी की अनर्गल बातों को मान लेना।


पौरुष के आगे 

वो नतमस्तक नहीं होती,

झुकती है 

तो तुम्हारे निःस्वार्थ प्रेम के आगे।

और 

इस प्रेम की ख़ातिर 

वह अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है।

हौसला हो निभाने का 

तभी ऐसी स्त्री से प्रेम करना, 

क्योंकि 

टूट जाती है वो धोखे से, 

छलावे से, 

पुरुष अहंकार से,

फिर 

जुड़ नहीं पाती किसी प्रेम की ख़ातिर...


 -  *डोमिनेर* 

( पोलैंड की प्रसिद्ध कवयित्री )

ग्रीक भारतीय राजा मिनेण्डर और उसके सिक्के

 यूनानी बौद्ध शासक मिनांडर के सिक्के 


   'मिलिंद पन्हो ' जैसी तर्क और विद्वत्ता की बेमिसाल पुस्तक में राजा मिलिंद और भदन्त नागसेन का संवाद है। 

  ....डाॅ बाबासाहेब आंबेडकर ने उनकी उत्तुंग विद्वता का सम्मान करते हुए उनके नाम से औरंगाबाद में मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना की थी। 


सिक्कों के संग्राहक  : Georgios Bankanotakis 

                                      (Greece )


गुरुवार, 26 अगस्त 2021

गेल ओम्वेट

 बहुजन आंदोलन की प्रतिनिधि इतिहासकार: गेल ओमवेट 


गेल ओमवेट भारत के, विशेषकर आधुनिक भारत के बहुजन आंदोलन की एक प्रतिनिधि इतिहासकार थीं। मेरा आधुनिक बहुजन आंदोलन से अर्थ ज्योतिराव फुले ( 11 अप्रैल 1827-28 नवंबर 1890) से लेकर डॉ. आंबेडकर ( 14 अप्रैल 1891-6 दिसंबर 1956) के नेतृत्व में चले बहुजनों ( पिछड़े-दलितों) के मुक्ति के आंदोलन से है, जिसका नेतृत्व शूद्र या अतिशूद्र कही जाने वाली वर्ण-जाति में पैदा हुए नायक कर रहे थे। जो मुख्यत: ब्राह्मणवाद ( भारत में ब्राह्मणवाद ही सामंतवाद है) से मुक्ति का आंदोलन था। जैसे गांवों की तथाकथित उच्च जातियां दक्खिन टोले को हेय या उपेक्षित दृष्टि से देखती हैं, वैसे ही आधुनिक भारत के इतिहाकार आधुनिक बहुजन आंदोलन और उसके नायकों को देखते थे। ऐसा करने वालों में दक्षिणपंथी और उदारपंथी (राष्ट्रवादी) इतिहासकारों के साथ भारतीय वामपंथी इतिहासकार भी शामिल थे।


आधुनिक भारत के सबसे प्रतिष्ठित इतिहासकार सुमित सरकार की सबसे मान्य और चर्चित किताब ‘आधुनिक भारत (1885-1947) भी इसमें शामिल है। वामपंथी इतिहासकारों में और अधिक वामपंथी माने जाने वाले अयोध्या सिंह ने तो अपनी किताब ‘भारत का मुक्तिसंग्राम’ में तो डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन को जी भरकर गालियां दी हैं, यहां तक कि डॉ. आंबेडकर पर व्यक्तिगत तौर पर हमला करते हुए, वह सबसे भद्दी गाली दी है, जिसे पढ़कर किसी भी न्याय प्रिय व्यक्ति का खून खौल जाए। जहां सुमित सरकार ने बहुजन आंदोलन की उपेक्षा किया, वहीं अयोध्या सिंह ने उसे गालियां दीं। हां बाद में शेखर बंद्योपाध्याय ने अपनी किताब ‘पलासी से विभाजन तक-आधुनिक भारत का इतिहास’ में बहुजन आंदोलन को कुछ हद जगह दी, लेकिन यह जगह हाशिए की ही जगह है।


गेल ओमवेट पहली इतिहासकार थीं, जिन्होंने अपने इतिहास के केंद्र में आधुनिक बहुजन आंदोलन को रखा। इतिहास की विडंबना देखिए बहुजन आंदोलन का प्रतिनिधि इतिहाकार कोई भारतीय नहीं हुआ, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा हुई एक महिला हुईं। यह संयोग नहीं है, इसका ठोस कारण है। वह ठोस कारण यह है कि भारत के जितने नामी-गिरामी आधुनिक भारत के इतिहासकार हुए, वे तथाकथित अपरकास्ट और अपर क्लास के थे। उनकी सामाजिक-आर्थिक, विशेषकर सामाजिक पृष्ठभूमि ने उन्हें गांधी या क्रांतिकारियों के नेतृत्व में चल रहे ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के संघर्ष के समानांतर चल रहे, ब्राह्मणवाद (भारतीय सामंतवाद) से मुक्ति के आंदोलन को, क्रांतिकारी या प्रगतिशील आंदोलन मानने ही नहीं दिया, बल्कि उसे ब्रिटिश सत्ता द्वारा पोषित उपनिवेशवाद परस्त आंदोलन ठहरा दिया या उस पर चुप्पी लगा ली।


वे डॉ. आंबेडकर की यह बात समझ ही नहीं पाए कि भारत का तथाकथित अपरकास्ट ब्रिटिश सत्ता का गुलाम है और अंग्रेजों से अपनी आजादी के लिए लड़ रहा है, लेकिन दलित-बहुजन इसी अपरकास्ट के गुलाम हैं यानि गुलामों के गुलाम हैं और ब्रिटिश सत्ता के गुलाम अपरकास्ट अपनी आजादी तो चाहते हैं, लेकिन वे अपने गुलामों ( शूद्र, अतिशूद्र और महिलाओं) को किसी भी सूरत में आजादी नहीं देना चाहते हैं। गेल ओमवेट ने गुलामों के गुलाम समुदाय (बहुजनों) के संघर्षों का इतिहास लिखने का बीड़ा उठाया और उसे हर कीमत चुका कर पूरा किया और इस काम में अपनी पूरी जिंदगी खपा दी। मौत से पहले तक वह यही कार्य कर रही थीं।


उनकी पहली किताब ‘कल्चरल रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसायटी: द नान ब्राह्मण मूंवमेंट इन वेस्टर्न इंडिया’ है। दरअसल उन्होंने इसी विषय पर कैलिफोर्निया स्थित बर्कले विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पीएच-डी की थी। जो बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई। एक ओर जहां बंगाल अपरकास्ट-अपर क्लास के नेतृत्व में चले पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन या आधुनिकीकरण के आंदोलन का गढ़ था, तो महाराष्ट्र (पश्चिमी भारत) शूद्र-अतिशूद्र कही जानी वाली जातियों के नायक-नायिकाओं के नेतृत्व में चले सुधार, पुनर्जागरण और आधुनिकीकरण का केंद्र था। बंगाल के आंदोलन को डॉ. आंबेडकर ने परिवार सुधार आंदोलन की ठीक ही संज्ञा दी है, जबकि महाराष्ट्र में ज्योतिराव फुले-सावित्रीबाई फुले, शाहू जी महाराज और बाद में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में चला आंदोलन वर्ण-जाति और पितृसत्ता के खात्मे के खिलाफ एक व्यापक क्रांतिकारी सामाजिक सुधार या पुननर्जागरण का आंदोलन था। गेल ओमवेट ने अपनी पहली किताब (थीसिस) में ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले और बाद में शाहू जी महाराज के नेतृत्व में चले बहुजन आंदोलन और उसके परिणामों एवं प्रभावों का विस्तार से लेखा-जोखा लिया है। यह उनका पहला काम था, जिसमें भावी बहुजन इतिहासकार के बीज छिपे हुए थे, जिस बीज ने बाद में विशाल बरगद का रूप लिया, जिसका नाम गेल ओमवेट था।


बाद में गेल ओमवेट ने भारत को अपना घर बना लिया, महाराष्ट्र के चर्चित एक्टिविस्ट-बुद्धिजीवी भरत पटणकर को अपना जीवन साथी चुना और दोनों ने खुद को एक न्यायपूर्ण भारत के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया। दोनों को यह अच्छी तरह पता था कि उत्पादक और मेहनतकश बहुसंख्यक बहुजनों ( शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं, जिसमें बहुजन धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं) के मुक्ति के बिना एक आधुनिक, समतामूलक, न्यायपूर्ण, बंधुता आधारित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता है, जहां समृद्धि पर सबका समान हक हो। जहां उच्च शिक्षित, प्रखर मेधा और अद्वितीय प्रतिभा के धनी भरत पटणकर ने जमीनी संघर्षों को अपना मुख्य कार्य-क्षेत्र बनाया और अकादमिक दुनिया से खुद को बाहर रखा, वहीं गेल ओमवेट ने बहुजन इतिहास लेखन को अपना मुख्य कार्य-क्षेत्र बनाया। उन्होंने इतनी सारी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिसने आधुनिक भारत को देखने-समझने का नजरिया बदल दिया और अपने समकालीन बहुजन आंदोलन को वैचारिक दिशा दी।


कारण नहीं है, मान्यवर कांशीराम बार-बार अपने लेखन में गेल ओमवेट की बड़े आदर से चर्चा करते हैं, कांशीराम की इतिहास दृष्टि के निर्माण में सबसे निर्णायक भूमिक गेल ओमवेट की रही है, यह बात केवल कांशीराम के संदर्भ में ही लागू नहीं होती है, अधिकांश बहुजन एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों ने गेल ओमवेट की किताबों, लेखों को पढ़कर और भाषणों को सुनकर अपनी इतिहास दृष्टि का निर्माण किया है।


गेल ओमवेट ने आधुनिक बहुजन इतिहास के वैशिष्ट को रेखांकित करने के लिए कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनमें ‘दलित और प्रजातांत्रिक क्रांति- उपनिवेशीय भारत में डॉ. आंबेडकर एवं दलित आंदोलन’, और ‘आंबेडर प्रबुद्ध भारत की ओर’ शामिल हैं। जाति के सवाल की जड़ों की तलाश में उन्होंने ‘अंडरस्टैंडिंग कास्ट, फ्राम बुद्धा टू आंबेडकर एडं वियांड’ और ‘ भारत में बौद्ध धम्म, ब्राह्मणवाद और जातिवाद को चुनौती’ लिखी। बहुजन नायकों-चिंतकों के न्यायपूर्ण, समता एवं बंधुता पर आधारित भारत के स्वप्न को रेखांकित करने के लिए उन्होंने ‘सीकिंग बेगमपुरा, द सोशल विजन ऑफ एंटीकास्ट इंटरलेक्टुअल’ जैसी किताब लिखी। गेल की अब तक करीब 25 किताबें प्रकाशित हैं और कई सारी किताबों पर वह अभी काम कर रही थीं। वे जहां एक ओर बहुजनों के लिए निरंतर बौद्धिक संपदा सृजित कर रही थीं, वहीं वह बहुजन एवं श्रमिकों के आंदोलनों में सक्रिय हिस्सेदारी भी करती थीं।


बामसेफ और मान्यवर कांशीराम एवं बहुजन एक्टिविस्टों एवं बुद्धिजीवियों से उनका जीवंत नाता था। वे एक ओर वर्ण-जाति से मुक्त भारत के लिए लिखकर और जमीन पर संघर्ष कर रही थीं,  महिला मुक्ति का प्रश्न उनके लिए उतना अहम था। उस मोर्चे पर भी समान रूप में सक्रिय थीं। उन्होंने अपनी जीवन साथी भरत पटणकर के साथ मिलकर श्रमिक मुक्ति दल भी बनाया। वह विस्थापन के शिकार लोगों के लिए निरंतर संघर्ष करती रहीं। उनका लेखन एवं संघर्ष एक न्यायपूर्ण भारत के लिए था। वे वर्ण-जाति एवं पितृसत्ता के खिलाफ लिखने और संघर्ष करने के साथ ही निरंतर मेहनकशों के संघर्षों में भी हिस्सेदारी करती रहीं।

इतिहास को देखने की उनकी पद्धति मार्क्सवादी थी, स्वाभाविक है कि वह वर्ग के सवाल को कभी दरकिनार नहीं कर सकती थीं, न ही किया। उनके लेखन को पढ़ने वाला कोई भी गंभीर पाठक यह सहज पकड़ सकता है कि कैसे वह मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि का उपयोग जाति-वर्ग और पितृसत्ता के रिश्ते को समझने और उसका समाधान खोजने के लिए करती थीं। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि और भारतीय वामपंथियों की इतिहास दृष्टि एक दूसरे का पर्याय नहीं हैं, भारतीय वामपंथी इतिहास दृष्टि अपरकास्ट की वैचारिक छाया एवं मूल्य बोध से आज तक निकल नहीं पाया, वह यांत्रिक तरीके से वर्ण-जाति और पितृसत्ता के प्रश्न पर सोचता रहा और यूरोप का प्रतिबिंब यहां देखता रहा। गेल ओमवेट ने मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि का बखूबी भारत को समझने के लिए इस्तेमाल किया और ज्योतिराव फुले, शाहू जी, डॉ. आंबेडकर, रैदास और बुद्ध की क्रांतिकारी परंपरा को भारत की क्रांतिकारी पंरपरा के रूप में रेखांकित किया। ऐसा वे इसलिए कर पाईं, क्योंकि उनकी आंखों में जातिवादी चश्मा नहीं लगा था और न ही पार्टी लाइन पर लिखने की कोई सांगठिन-वैचारिक मजबूरी  थी। गेल भारत को भारत के भीतर से समझने और इसकी क्रांतिकारी-प्रगतिशील धारा रेखांकित करने की आजीवन कोशिश करती रहीं। उनकी किताबें, लेख और भाषण इसके सबूत हैं।


उनका अकादमिक कैरियर भी शानदार था। वह पुणे विश्वविद्यालय में फुले-आंबेडकर चेयर की हेड रहीं, इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज, कोपेनेहेगन में प्रोफेसर रहीं, वह इंदिरा गांधी ओपेने यूनिवर्सिटी के डॉ. आंबेडकर चेयर की अध्यक्ष रहीं, वह नेहरू मेमोरियल म्यूजियम (नई दिल्ली) से भी संबद्ध रहीं। उनका जन्म 2 अगस्त 1941 को मिनिआपोलिस (संयुक्त राज्य अमेरिका) में हुआ था। बाद में उन्होंने भारत की नागरिकता ग्रहण कर लिया। वे सेवानिवृत्ति के बाद महाराष्ट्र के सांगली जिले में स्थित कासेगांव में अपने जीवन साथी भरत पटणकर के साथ रह, रही थीं। 25 अगस्त 2021 को 81 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।


भारत, विशेषकर भारत के बहुजन समाज ने एक ऐसी  मेधा को खो दिया, जिसके लिए इतिहास लेखन, समाजशास्त्रीय अध्ययन और अध्यापन दुनिया को न्यायपूर्ण और सबके लिए खूबसूरत बनाने का माध्यम था। ऐसी शख्सियत का न रहना वैसे तो पूरी मानव जाति की क्षति है, लेकिन भारत के बहुजनों ने अपना प्रतिनिधि इतिहाकार खो दिया, जिसने बहुजन चिंतन परंपरा, बहुजन वैचारिकी, बहुजन नायकों, बहुजनों के इतिहास और बहुजनों के स्वप्न से पूरी दुनिया को परिचित कराया। ऐसी महान विदुषी गेल ओमवेट को शत्-शत् नमन। हम आपकी किताबों में आप से रूबरू होते रहेंगे और आप से देखने की साफ दृष्टि और जनपक्षधर संवेदना ग्रहण करते रहेंगे और आपकी तथ्य के प्रति, सत्य के प्रति और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को अपने लिए रोशनी की तरह उपयोग करेंगे।


( जनचौक में प्रकाशित)


https://janchowk.com/pahlapanna/renowned-historian-gail-omvet-is-no-more/





मंगलवार, 24 अगस्त 2021

सावित्री बनाम सरस्वती

 सावित्री बनाम सरस्वती

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हिन्दू-ब्राह्मणी माइथोलॉजी में सरस्वती को 'ज्ञान की देवी' माना गया है। सैकड़ो साल से इस देश मे ज्ञान के प्रतीक के तौर पर सरस्वती को प्रतिष्ठित किया जाता रहा और अब भी सामान्य जन सरस्वती को ही 'गॉडेस ऑफ नॉलेज' मानते हैं. विद्यालयों-कॉलेजेज-यूनिवर्सिटीज को सरस्वती का मंदिर आज भी  कहते हैं.  और तो और साहित्यिक-सामाजिक गोष्ठियों में भी सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर पर फूल-माला और दीया-मोमबत्ती जलाने की परंपरा आम तौर पर होता ही है.


सरस्वती ब्रह्मा की अति सुंदर पुत्री थी. उनके पिता और सरस्वती के बीच कई प्रकार की पौराणिक कहानियां अनुस्यूत हैं. प्राचीन समाज मे नैतिकता का पैमाना जैसा कि आज है तब नही रहा होगा. इस आधार पर ब्रह्मा-सरस्वती के संबंध को नाजायज या अनैतिक नही कहा जाना चाहिए. ऐसा दुनिया के सभी प्राचीन समाजों में होता रहा है। 


ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट, प्राचीन मध्य एशिया का समाज, जहाँ से इस्लाम का उद्भव हुआ. मिस्र, रोमन समाज मे भी कई ऐसी परम्पराए थी कि आज आधुनिक समाज की  नैतिकता का पैमाना के  संदर्भ में देखे तो अनैतिक लगेगा.


प्रश्न है कि सरस्वती को ज्ञान की देवी क्यो और किस आधार पर कहा जाता है ?  जबकि पूरे हिन्दू आख्यानों में सरस्वती का ज्ञान-शिक्षा या शिक्षण से कोई भी संबंध नही दिखता . 


सरस्वती की तस्वीर में  जो पुस्तक दिखाई जाती है वह भी प्राचीनता की कसौटी पर खरा नही उतरता  क्योंकि कागज का आविष्कार बहुत बाद में हुआ और वह भी आर्यावर्त के बाहर, चीन में पहली सदी बाद हुआ था . यानि कि सरस्वती की जो तस्वीर हम देखते हैं वह भी बहुत बाद कि कल्पना है. 


अब आते हैं शिक्षा के देवी ने आख़िर शिक्षा में क्या काम किया ?  क्या उन्होंने कोई ग्रंथ लिखा ? क्या उन्होंने कोई पाठशाला खोला ? क्या उन्होंने समाज के किसी भी हिस्से को शिक्षा का अलख ही जगाया ?  इसका जवाब है-- "नही"


पूरे हिन्दू आख्यानों में सरस्वती को किसलिये याद किया गया  ? 

जो आख्यान है वो इस प्रकार है -- "एक बार कुंभकर्ण को इंद्र की गद्दी पाने की इच्छा जगी .  इन्द्रासन को पाने के लिए वो भगवान शिव की तपस्या करने लगा . कठोर तपस्या करते देख ब्रह्मा परेशान हो गए . आख़िर एक राक्षस इंद्र की गद्दी कैसे दिया जाए । ब्रह्मा जानते थे कि शिव भोले है और उसकी तपस्या से शिव पिघल जायेगे और इंद्र की गद्दी पर एक अनार्य राक्षस बैठ जाएगा . तब उन्होंने अपनी पुत्री सरस्वती को याद किया और अपनी परेशानी को बताया.  सरस्वती ने उनकी परेशानी को झट से दूर कर दिया . 


कुम्भकर्ण की तपस्या से खुश होकर  शिव आए और  कुम्भकर्ण ने जैसे ही शिव से  "इन्द्रासन" मांगने के लिए मुँह खोला वैसे ही सरस्वती कुम्भकर्ण की ज़ुबान पर बैठ गईं और "इन्द्रासन" के जगह "निद्रासन" बोल दिया.  यानि सरस्वती ने अपने पूरे जीवन मे ज्ञान से संबंधित यही काम किया. यही धोखेबाजी का इतिहास है सरस्वती का .


अब आइए, आधुनिक ज्ञान की देवी सावित्रीबाई फुले की---

एक अनपढ़ बालिका कैसे "ज्ञान की देवी" बन गई ?  एक साधारण घर के बेटी जब जोतिबा के घर बहू बनकर गई तब जोतिबा ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया और भारत की पहली बालिका विद्यालय फुले दंपत्ति ने खोला. इस तरह उन्होंने कई विद्यालय खोले और पूरे पुणे में ज्ञान की रोशनी से प्रकाशित कर दिया.

उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय स्थल बनवाए जिसमे कुंवारी- विधवा महिलाएं अपने बच्चे को जन सकती थी. 


ज्ञान की इस रोशनी को फैलाने में  फुले दंपत्ति को  जो तकलीफ़ और परेशानियां उठानी पड़ी वह किसी सामान्य व्यक्ति के लिए सहना आसान नही था.


अब आप तय करें कि "ज्ञान की देवी" किसे मानें ???

राम स्वरूप वर्मा और रामचरित मानस

 रामचरितमानस और राम के बारे में क्या थी महामना रामस्वरूप वर्मा की राय?

  जयंती ( 22 अगस्त) पर नमन के साथ


(रामचरितमानस के वर्ण-जातिवादी और स्त्री-विरोधी चरित्र को उजागर करने के बाद वर्मा जी विभिन्न बिंदुओं के तहत राम के असली चरित्र को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं- “पंडित तुलसीदासकृत रामचरितमानस में राम न मर्यादा पालक थे, न महापुरुष। वे शुद्ध रूप से जातिवादी, अधर्मी और उदात्त गुणों से हीन थे। वे ब्राह्मणद्रोहियों के दुश्मन और ब्राह्मणों के मन, वचन, कर्म से गुलाम थे। उन्होंने दूसरों को भी ब्राह्मणों की गुलामी करने का उपदेश दिया और स्वयं भी उसके लिए सारे कुकर्म किए। (‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?’, रामस्वरूप वर्मा, पृ.43)


भारत में चिंतन की दो स्पष्ट धाराएं रही हैं। एक द्विज और दूसरी बहुजन। दूसरे शब्दों में कहें, तो किसी भी चीज को देखने की भारत में दो बिलकुल विपरीत विश्वदृष्टियां रही हैं – एक बहुजन विश्वदृष्टि और दूसरी ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टि। रामकथा और राम पर आधारित महाकाव्यों के संदर्भ में भी दोनों दृष्टियां निरंतर टकराती रही हैं।


आर्य-द्विज ब्राह्मणवादी परंपरा के आदर्श नायक दशरथ पुत्र राम हैं और उन पर सबसे बड़े महाकाव्य वाल्मीकि की रामायण और उत्तर भारत में तुलसी की रामचरितमानस है। जहां एक ओर द्विज अध्येता, लेखक और पाठक राम को आदर्श नायक और रामायण एवं रामचरितमानस को महान महाकाव्य मानते रहे हैं वहीं दूसरी ओर बहुजन नायकगणों की दृष्टि में दशरथ पुत्र राम और उन पर आधारित महाकाव्य, बहुजनों पर द्विजों के वर्चस्व के उपकरण हैं। 


यह अकारण नहीं है कि करीब-करीब सभी बहुजन नायकों ने राम और उनकी रामकथा पर लिखा है और बताया है कि कैसे राम न तो ईश्वर हैं, न आदर्श नायक और ना ही कोई धार्मिक व्यक्तित्व। बहुजन नायकों का यह भी कहना है कि वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस आर्य-ब्राह्मण श्रेष्ठता और बहुजनों पर द्विजों के वर्चस्व की स्थापना के लिए लिखे गए ग्रंथ हैं। ये किसी भी तरह से धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, जैसे बुद्ध के त्रिपिटक, बाइबिल और कुरान हैं।


 

रामकथा के बारे में ई.वी.रामसामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर, पेरियार ललई सिंह यादव, स्वामी अछूतानंद, चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’, अमर शहीद जगदेव प्रसाद, संतराम बी.ए., मोतीराम शास्त्री, रजनीकांत शास्त्री, भदन्त आनंद कौशल्यायन, कंवल भारती और तुलसीराम आदि चिंतकों-लेखकों ने विस्तार से लिखा है। इन सभी ने एक स्वर से रामायण और राम को शूद्रों (पिछड़ों), अतिशूद्रों (दलितों), महिलाओं और आदिवासियों पर वर्चस्व कायम करने की विचारधारा वाला काल्पनिक चरित्र और ग्रंथ कहा है तथा यह भी बताया है कि कैसे अनार्यों को ही राक्षस-राक्षसी कहकर राम ने उनका कत्लेआम किया। पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’, डॉ. आंबेडकर ने ‘राम और कृष्ण की पहेली’ (‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ किताब में), स्वामी अछूतानंद ने ‘रामराज्य न्याय’, चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ ने ‘ईश्वर और उनके गुड्डे’, पेरियार ललई सिंह यादव ने ‘शंबूक बध’, मोतीराम शास्त्री ने ‘रावण तथागत’, रजनीकांत शास्त्री ने ‘हिंदू जाति का उत्थान और पतन’, भदन्त आनंद कौशल्यायन ने ‘राम की कहानी राम की जुबानी’, कंवल भारती ने ‘त्रेता युग का महा हत्यारा’, और तुलसीराम ने ‘क्या अयोध्या बौद्ध नगरी थी?’ में रामकथा व राम के पिछड़े, दलित, आदिवासी तथा महिला विरोधी चरित्र को उजागर किया है।


गाय-पट्टी (हिंदी प्रदेश) में रामकथा का सबसे मुख्य ग्रंथ तुलसीदास कृत रामचरितमानस है। गाय-पट्टी के बहुजन नायक रामस्वरूप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998) ने अपनी एक किताब ‘ब्राह्मण महिमा, क्यों और कैसे’ में राम और रामचरितमानस के वर्ण-जातिवादी स्वरूप और स्त्री विरोधी चरित्र पर विस्तार से लिखा है। यह किताब रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित अर्जक संघ द्वारा प्रकाशित है। वर्मा जी ने यह किताब रामचरितमानस लिखे जाने के चार सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार द्वारा रामचरितमानस चतुष्शताब्दी समारोह मनाने और उस समारोह का मुख्य अतिथि तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि को बनाने और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा इसकी अध्यक्षता करने के निर्णय के खिलाफ लिखा था। 


दरअसल, इस आयोजन के खिलाफ वर्मा ने तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित कई लोगों को पत्र लिखे थे। यह किताब उन्हीं पत्रों का संग्रह हैं। इसके पहले उन्होंने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी द्वारा इस समारोह के लिए एक लाख रूपए देने के निर्णय के खिलाफ ‘मर्यादा पुरूषोत्तम या ब्राह्मण गुलाम’ शीर्षक एक लेख 4 जून, 1973 को लिखा। फिर 8 अगस्त, 1974 को उन्होंने ‘ क्या रामचरितमानस एक धार्मिक ग्रंथ है?’ शीर्षक से एक लेख उस समय लिखा, जब 1974 में ही उत्तरप्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में एक विधायक द्वारा रामचरितमानस के पन्ने फाड़ने पर द्विजों द्वारा हंगामा किया गया। एक तीसरा लेख उन्होंने तब लिखा, जब 24 दिसंबर, 1974 को तमिलनाडु में उत्तर भारत की रामलीला और उसमें रावण को जलाने का विरोध करते हुए रावण लीला का आयोजन हुआ और उसमें रावण की जगह राम, लक्ष्मण और सीता के 19 फीट ऊंचे पुतले जलाए गए। इसके बाद उत्तर भारत में द्विजों ने काफी हो-हल्ला मचाया। इसका जवाब देते हुए रामस्वरूप वर्मा ने 15 मार्च, 1975 को ‘राम-रावण काल्पनिक पात्र’ शीर्षक से एक लेख लिखा। 

राम के चरित्र को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए किए जा रहे रामचरितमानस चतुष्शताब्दी समारोह का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा कि भारतीय संविधान समता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है, सरकार वर्ण-जाति व्यवस्था और स्त्री-पुरूष गैर-बराबरी को समर्थन देने वाली रामचरितमानस का प्रचार-प्रसार करके संविधान विरोधी कार्य कर रही है। वर्मा जी का मानना था कि हिंदी क्षेत्र में पंडित तुलसीदास का रामचरितमानस ब्राह्मणवाद का सबसे प्रबल प्रचारक है और यह ग्रंथ ब्राह्मणों की महिमा को बढ़ाने और कायम करने के लिए लिखा गया है। इसके प्रमाण के तौर वे रामचरितमानस की बहुत सारी पंक्तियां भी अपने लेखों में उद्धृत करते हैं। जैसे-

पूजिय बिप्र सकल गुणहीना। शूद्र न गुणगन ज्ञान प्रवीना।।

सापत ताड़त परूष कहन्ता। बिप्र पूज्य अस गावहिं सन्ता।।

पुन्य एक जग महुं नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र करि पूजा।।

सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपट करइ द्विज सेवा।।

मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटिकुल भूसूर रोषू।। (उद्धृत, ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे? रामस्वरूप वर्मा, पृ.16)


इस अंश में उद्धृत पहली चौपाई में कहा गया है कि ब्राह्मण गुणहीन भी हो, तो भी उसकी पूजा करनी चाहिए और शूद्र गुणवान एवं विद्वान हो तब भी उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए। दूसरी चौपाई इससे भी आगे बढ़कर कहती है कि संतों के अनुसार, यदि ब्राह्मण श्राप देता है, प्रताड़ित करता है और कठोर वचन कहता है, तब भी पूजनीय होता है। तीसरी चौपाई कहती है कि ब्राह्मण के अलावा संसार में कोई दूसरा पूजनीय नहीं होता है, ब्राह्मण की मन, वचन और कर्म से पूजा करनी चाहिए। चौथी चौपाई द्विजों (जनेऊधारियों) का गुणगान करते हुए कहती है कि ऐसे व्यक्ति पर ऋषियों और देवताओं की कृपा रहती है, जो सारे कपट त्याग द्विजों की सेवा करते हैं और चौथी चौपाई कहती है कि ब्राह्मण के संतुष्ट होने से कल्याण होता है और उनके नाराज होने से करोड़ों कुल नष्ट हो जाते हैं। ऐसे अनेक दोहों और चौपाईयों से रामचरितमानस भरा पड़ा है, जो बार-बार यह रेखांकित करता हैं कि ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ है। 


स्वयं रामचंद्र भी सोते-जागते, हर कार्य करने से पहले ब्राह्मणों  के चरणों की याद करते रहते हैं, उन्हें सिर नवाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं-

सुमिरि शम्भु गुरु बिप्रपद। किए नींद वश नैन।

बन्दि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता। ( बालकांड, 358)

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।( लंकाकांड, 90)

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुल नाथा।। ( उत्तरकांड, 5)


इस प्रकार जहां एक ओर रामचरितमानस ब्राह्मणों-द्विजों की श्रेष्ठता को स्थापित करती है, वहीं दूसरी ओर गैर-ब्राह्मणों को बार-बार नीच ठहराती है। रामस्वरूप वर्मा तत्कालीन राष्ट्रपति और तत्कालीन प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए लिखते हैं कि संविधान की समता की भावना के पूर्णतया विपरीत रामचरितमानस जहां एक ओर ब्राह्मणों-द्विजों को गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं की तुलना में श्रेष्ठ ठहराती है, वहीं गैर-ब्राह्मणों एवं महिलाओं को नीच कहती है। तुलसी की नजर में गैर-ब्राह्मण और महिलाएं एक ही कोटि की हैं। इसकी पुष्ट करने के लिए वर्मा जी तुलसी की निम्न चौपाई उद्धृत करते हैं-


ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी (रामचरितमानस, सुंदरकांड, 59)

रामचरितमानस में जगह-जगह गैर-ब्राह्मण जातियों का नाम लेकर भी उन्हें अधम और नीच कहा गया है। जैसे- 

जे वर्णाश्रम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।

आभीर, यवन, किरात, खस। स्वपचादि अति अघरूप जे।। (उद्धृत, रामस्वरूप वर्मा बालबोधिनी टीका, उत्तरकांड, पृ.1041)

अर्थात तेली, कुम्हार, भंगी, बहेलिया, कोल, कलवार अधम वर्ण के लोग हैं, ये पापी कौमें हैं। इसके साथ रामचरितमानस यह भी कहती है कि अहीर, मुसलमान और किरात अत्यंत पतित हैं।


केवट जाति को रामचरितमानस में देवताओं के मुंह से नीच कहलावा गया है-

यहि सम निपट नीच कोउ नाहि। बड़ वशिष्ठ सम को जग माहि। (अरण्यकांड, पृ.492)


खुद निषाद को मुख से भी उसे नीच कहलवाया गया है- 

लोक वेद सब भांतिहि नीचा। जासु छांह छुई लेइय सींचा। (अरण्यकांड, 462)

रामराज्य की सबसे बड़ी खूबी तुलसीदास वर्णाश्रम धर्म का पालन बताते हैं-

वर्णाश्रम निज-निज धरम निरत वेद पथ लोग। (रामस्वरूप वर्मा, पृ.18)

इस पर टिप्पणी करते हुए रामस्वरूप वर्मा लिखते हैं कि तय सी बात है कि रामराज्य में यदि वर्णाश्रण धर्म का ही पालन हो रहा था, तो उसमें सबसे ज्यादा फायदा ब्राह्मणों को था।


तुलसीदास के रामचरितमानस के अनुसार जहां वर्णाश्रम धर्म का पालन रामराज्य की सबसे बड़ी विशेषता है, वहीं शूद्र द्वारा द्विजों की बराबरी करना, अपने ज्ञान पर गर्व करना और द्विजों से यह कहना कि हम तुमसे कम नहीं है, कलयुग का सबसे बड़ा लक्षण है-

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन। हम तुम्हते कछु घाटि।।

जानइ ब्रह्म सो विप्रवर। आंखि देखावहिं डाटि।। ( उत्तरकांड, 1013)

ऐसी बहुत सारी चौपाईयों और दोहों के उदाहरण देकर रामस्वरूप वर्मा यह प्रमाणित करते हैं कि रामचरितमानस मूलत: ब्राह्मणों के वर्चस्व को स्थापित करने एवं बनाए रखने के लिए लिखी गयी है।


रामचरितमानस के ब्राह्मणवादी चरित्र और गैर-ब्राह्मणों, गैर-द्विजों के वर्ण-जाति के आधार पर घृणा की विस्तार से विवेचना करने के बाद रामस्वरूप वर्मा रामचरितमानस की स्त्री विरोधी मानसिकता को उजागर करते हैं।रामचरितमानस  के रचनाकार तुलसीदास, जैसा कि ऊपर जिक्र किया जा चुका है, शूद्रों के साथ महिलाओं को भी प्रताड़ित करने की वकालत करते हैं। तुलसीदास पूरी तरह महिलाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि जैसे बहुत तेज बरसात होने पर खेतों की मेड़ टूट जाते हैं, उसी तरह से स्वतंत्र होने पर नारियां बिगड़ जाती हैंं-

महावृष्टि चलि फूट कियारी। जिमि स्वतंत्र होई विगरहि नारी।। ( उद्धृत, रामस्वरूप वर्मा, पृ.11)


इस पर टिप्पणी करते हुए रामस्वरूप वर्मा लिखते हैं कि भारत का संविधान लिंग के आधार कोई भेदभाव नहीं करता, फिर आज के युग में ऐसे रामचरितमानस  की क्या जरूरत है जो नारी स्वतंत्रता की विरोधी हो। वे यह भी पूछते है कि जब पुरूष स्वतंत्र रह सकता है, तो स्त्री स्वतंत्र क्यों नहीं रह सकती?

इतना ही नहीं तुलसीदास ने महिलाओं को सभी दुखों का खान कहा है-

एक मूल बहु शूल प्रद। प्रमदा सब दुख खानि।। ( वही, पृ.12)


तुलसी ने महिलाओं को स्वभावत: अत्यन्त कामुक और व्यभिचारिणी कहा। यहां तक वह भाई, पिता और पुत्र के प्रति भी कामवासना से भर जाती हैं और खुद को व्यभिचार से रोक नहीं पाती हैं-

भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।

होहिं विकल सक मनहिं न रोकी। जिमि रविमणिं द्रव रविहिं विलोकी।। ( वही, पृ.14)

इतना ही नहीं, तुलसी यह भी घोषित कर देते हैं कि महिलाओं में आठ अवगुण तो हमेशा ही रहते हैं, इनसे कोई महिला मुक्त नहीं हो सकती है-

नारी स्वभाव सत्य कवि कहहीं। अवगुण आठ सदा उर रहहीं।।

साहस, अनृत चपलता माया। भय अविवेक अशौच अदाया।। ( वही, पृ.15)

ऐसी स्त्री विरोधी चौपाईयों को उद्धृत करके रामस्वरूप वर्मा ने रामचरितमानस के स्त्री विरोधी चरित्र को उजागर किया है।


रामचरितमानस के वर्ण-जातिवादी और स्त्री-विरोधी चरित्र को उजागर करने के बाद वर्मा जी विभिन्न बिंदुओं के तहत राम के असली चरित्र को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं- “पंडित तुलसीदासकृत रामचरितमानस में राम न मर्यादा पालक थे, न महापुरुष। वे शुद्ध रूप से जातिवादी, अधर्मी और उदात्त गुणों से हीन थे। वे ब्राह्मणद्रोहियों के दुश्मन और ब्राह्मणों के मन, वचन, कर्म से गुलाम थे। उन्होंने दूसरों को भी ब्राह्मणों की गुलामी करने का उपदेश दिया और स्वयं भी उसके लिए सारे कुकर्म किए। (‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?’, रामस्वरूप वर्मा, पृ.43)


( फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित)

सिद्धार्थ रामु


सोमवार, 23 अगस्त 2021

बौद्ध विषय पर लेख

 बौद्ध संस्कृति की परंपरा


आज जहाँ इराक है, वहाँ कभी सुमेरियन सभ्यता थी।


सुमेरियन सभ्यता का प्राचीन शहर ऊर था। यह समय - समय पर सुमेर की राजधानी थी।


राजधानी ऊर से भारत में बने चूने - मिट्टी के बर्तन मिले हैं। ऊर का सिंगारदान हड़प्पा जैसा है।


द्रविड़ भाषाओं में जो ऊर है, वहीं प्राकृत भाषा में वुर है, यहीं तंजावुर ( तंजौर ) में है। ऊर स्थानबोधक है।


बुद्ध के समय में बोध गया के निकट उरुवेला था। वह उरुवेला वर्तमान का गाँव उरेल है। सुमेरी भाषा से भारत की द्रविड़ भाषाएँ प्राचीन हैं।


सो सुमेरियन सभ्यता का ऊर भारत से लिया गया है। वो भी सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ने के बाद लिया गया है।


सिंधु घाटी सभ्यता का यह ऊर बुद्धकाल के गाँव उरुवेला से जुड़ता है।


स्वयं सुमेरियन सभ्यता ने भारत से अपनी राजधानी का नाम ऊर लिया था।


सुमेर का प्रसिद्ध नगर निप्पुर था। निप्पुर में पुर है। सुमेरी ऊर और पुर वहीं शब्द हैं, जो पूरे भारत के नगरों में व्याप्त हैं।


सुमेर जिसे कीलाक्षर में शुमेर लिखा जाता था, स्वयं अजमेर, बाड़मेर, आमेर आदि की याद दिलाता है।


बौद्ध कालीन कुसीनारा में जो " नारा " है, वह नगरबोधक है। यह नारा जब " नार " हुआ, तब महनार ( बिहार ) बना। यह नारा जब " नेर " हुआ, तब बीकानेर ( राजस्थान ) बना। यह नारा जब " नेरी " हुआ, तब शिवनेरी ( महाराष्ट्र ) बना। यह नारा जब " नी " हुआ, तब सिवनी ( म.प्र.) बना। यह नारा जब " न " हुआ, तब सिवान ( बिहार ) बना। ऐसे अनेक।


बिहार का न सिर्फ सिवान बल्कि सारन और चंपारन भी इसी " न " की कड़ी में है।


मध्यप्रदेश का न सिर्फ सिवनी बल्कि कटनी और बुधनी भी इसी " नी " कड़ी में है।


राजस्थान का न सिर्फ बीकानेर बल्कि जैसलमेर और अजमेर भी इसी " नेर " ( मेर ) की कड़ी में है।


सुमेरी लोग मूलतः कृषक और पशुपालक थे। गेहूँ और जौ की खेती करते थे। पशुपालक ऐसे कि उनकी भाषा में 200 शब्द सिर्फ भेड़ों से संबंधित हैं। शब्दों का बाहुल्य बताता है कि सुमेरी लोग भेड़ के चरवाहे थे। तब सिंधु घाटी सभ्यता काफी विकसित थी।


सिंधु घाटी के लोग कृषि युग से आगे जा चुके थे।  सिंधु घाटी के नगर पक्की हुई ईंटों के थे और ईंट भी स्टैंडर्ड साइज की थीं।


सुमेरी सभ्यता की ईंटें कच्ची, पक्की - अधपकी, अनियमित साइज की हैं। सिंधु घाटी के लोग सुमेरी लोग से हर क्षेत्र में आगे थे।


हड़प्पा लिपि में कोई 400 तो सुमेरी में 900 लिपि चिह्न थे। सुमेरी लिपि में अधिक चिह्नों का होना साबित करता है कि सुमेरी लिपि सिंधु घाटी से बैकवर्ड लिपि थी।


लिपिविज्ञान का सिद्धांत है कि ज्यों - ज्यों लिपि विकसित होती है, त्यों - त्यों लिपि चिह्नों की संख्या घटती जाती है।


फिर भी एल. ए. वैडेल जैसे इतिहासकार मानते हैं कि चार सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सुमेर लोग सिंधु घाटी में बस गए और उन्हीं ने अपनी लिपि का यहाँ प्रसार किए।


सही यह है कि सिंधु घाटी की सभ्यता को सुमेरी लोगों ने नहीं बल्कि सुमेरी लोगों की सभ्यता को सिंधु घाटी के लोगों ने प्रभावित किया है।


और अब तो नए शोध बताते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता जब विकसित थी, तब सुमेरियन सभ्यता का जन्म भी नहीं हुआ था।


                           2.


गणित में शून्य का आगमन बौद्ध दर्शन से हुआ है। बगैर फिलासफी जीरो की खोज असंभव है।


गौतम बुद्ध के समकालीन बौद्ध दार्शनिक मंजूश्री और विमल कीर्ति के बीच जो संवाद हुआ था, वह शून्य को लेकर था।


यहीं से खुराक लेकर नागार्जुन ने दर्शन के क्षेत्र में शून्यवाद की स्थापना की थी।


बौद्ध दर्शन में जो शून्य है, वहीं अरबी में सिफ़र ( सिफ्र) है अर्थात खाली।


अरबी में जो सिफ़र है, वहीं लैटिन में जेफिरम है।


जो लैटिन में जेफिरम है, वहीं अंग्रेजी में जीरो है।


( Zephirum > Zepiro > Zeuero > Zero )


सुन्न जितना नैचुरल है, फर्टाइल है ...शून्य उतना ही आर्टिफिशियल है...शून्य में कोई उपसर्ग- प्रत्यय जोड़ने से ही शब्द - निर्माण संभव है जैसे शून्यता, शून्यवाद, जनशून्य आदि।


सुन्न फर्टाइल है ...सुन्न की शाखाएँ-प्रशाखाएँ दूर - दूर तक फैली हैं ...शरीर सुन्न होता है ... आदमी सन्न रह जाता है ....जगह सुनसान होती है ...सन्नाटा छा जाता है ...सबमें सुन्न है ....शून्य कहीं नहीं।


सुन्न मूल रूप से दर्शन का शब्द है ...मैथमैटिक्स के क्षेत्र में वहीं से आया है। यूरोप और अमेरिका के अनेक गणितज्ञों ने इस बात पर अपनी मुहर लगाई है।


सुन्न का प्रयोग न सिर्फ प्राचीन बौद्ध दर्शन में, बल्कि सिद्धों, नाथों और संतों के साहित्य में भी बड़े पैमाने पर हुआ है।


सुन्न, जिसे लोक जनता आज भी सुन्ना ( सिफर, 0 ) कहती है, हर हाल में प्राकृत धारा की खोज है, जिसमें शून्य की भूमिका शून्य है।


आइंस्टाइन से लेकर हाकिंग तक दुनिया के भौतिक विज्ञानी गुरुत्वाकर्षण, शून्य और समय को लेकर जो अभूतपूर्व काम कर चुके हैं, उसमें एक फाँक बची रही है और दुनिया के भौतिक विज्ञानी इसी फाँक को दूर करने की कोशिश करते रहे हैं।


इस कोशिश के दो अलग-अलग पक्ष आज भी बने हुए हैं, जिनमें से एक सुपर स्ट्रिग सिद्धांत है और दूसरा लूप क्वांटम ग्रैविटी है। लूप क्वांटम ग्रैविटी को अश्टेकर प्रोग्राम के नाम से भी जाना जाता है। अश्टेकर प्रोग्राम के सिद्धांतकार खुद अश्टेकर हैं।


अश्टेकर ने अपने सिद्धांत की विवेचना करते हुए लिखा है कि छठी सदी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध ने कहा था कि समय की अवधि शुद्ध रूप से परंपरागत धारणा है, समय और शून्य हमारे अनुभवों की सापेक्षता में अस्तित्वमान होते हैं, बुद्ध ने पुद्गल नैरात्म्य और विज्ञप्ति मात्रता जैसी अवधारणाओं के जो सूत्र दिए थे, उन पर भारत में किसी ने वर्तमान समय में काम नहीं किया।( आलेख : बुद्ध के पुनर्पाठ का समय, मुद्राराक्षस, पृष्ठ 103 )


बुद्ध का दर्शन और पश्चिम।


18 वीं और 19 वीं सदी में जर्मनी में जिस विज्ञानवादी दर्शन का विकास हुआ, उस पर बौद्ध विचारक असंग और वसुबंधु ने चौथी सदी में नागार्जुन के शून्यवाद के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम किया था।


जिस " ज्ञान - मीमांसा " को पश्चिम के दर्शनशास्त्र में सबसे बड़ी जगह मिली, उसका प्रतिपादन बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग ने किया था। वे बौद्ध दर्शन के बड़े नैयायिक और तर्कशास्त्री थे।


दिङ्नाग के शिष्य धर्मकीर्ति थे और न्यायशास्त्र में उन्होंने भी स्मरणीय काम किया था। धर्मकीर्ति को पश्चिम के दार्शनिकों ने इमैन्युएल कांट की संज्ञा दी थी।


दीपंकर श्रीज्ञान ने 11 वर्ष की अवस्था में गंभीर चिंतन शुरू कर दिया था।


रत्नकीर्ति और ज्ञानश्री मित्र ने तर्कशास्त्र पर काम किया था।


चौथी सदी के कुमारजीव ने वस्तुबोध की प्रक्रिया पर गंभीर वैचारिक लेखन किया था।


इन सारे ही दार्शनिकों को दक्षिण- पूर्वी एशिया से लेकर तुर्की और यूनान तक के देशों ने आमंत्रित किया था।


पश्चिम का दर्शनशास्त्र 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में शब्दार्थ दर्शन और उच्चतर गणित की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ अनेक नई मंजिलें तय कर चुका है।


मगर भारत के बौद्धों ने अपने विहारों में असंग से लेकर धर्मकीर्ति तक के काम को आगे क्यों नहीं बढ़ाए? वे बौद्ध धर्म के ऊपरी कलेवर को ही बौद्ध धर्म क्यों माने?


लगभग 8 वीं सदी से दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में बौद्धों का काम बिलकुल गायब है। ( आलेख : उत्तर देने का दाव अभी शेष, मुद्राराक्षस, पृष्ठ 54-55 )


                         3.


गौतम बुद्ध की वैज्ञानिक दिशा में सबसे बड़ी और मौलिक स्थापना कारण - कार्य सिद्धांत है। अर्थात कारण ही कार्य का जन्मदाता है। अकारण कुछ भी नहीं होता है और न हो सकता है।


गौतम बुद्ध ने जिस कारण - कार्य सिद्धांत की बुनियाद को छठी सदी ईसा पूर्व में डाला था, उसे समझने में यूरोप को पूरे दो हजार साल से भी अधिक समय लग गए।


पूरे यूरोप में इसे सबसे पहली बार सोलहवीं सदी में फ्रांसीस बेकन ( 1561 - 1626 ) ने लिखा और समझाया कि जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले घटनाओं का अध्ययन कारण सहित करना चाहिए, तब सिद्धांत बनाकर उन्हें प्रयोगात्मक जाँच करनी चाहिए।


बुद्धिज्म का जो थेर है, वहीं अंग्रेजी में थ्योरी है। इसीलिए बुद्ध की शिक्षाओं को सिद्धांत कहा जाता है।


यूरोप में जब कारण - कार्य के प्रति चेतना फ्रांसिस बेकन ने फैलाई, तब जाकर गैलिलियो, केपलर और न्यूटन पैदा हुए।


ज्ञान की दुनिया में बुद्ध बेमिसाल हैं।


दुनिया को 1, 2, 3 .... लिखने का तरीका बौद्ध सभ्यता ने सिखाया है।


बौद्ध सभ्यता की धम्म लिपि से लेखन में 1, 2, 3 ..... का विकास हुआ है।


सबसे पहले सातवीं सदी में इसे अरबों ने सीखा और हिंदसा ( हिंद देश से प्राप्त ) कहा।


अरबों से बारहवीं सदी में इसे यूरोप ने सीखा और अरेबिक कहा।


यूरोप में बारहवीं सदी के बाद जो वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति हुई, उसमें बौद्ध सभ्यता के 1, 2, 3 ......का बहुत बड़ा योगदान है।


रोमन अंकों के लेखन में जटिलता है। अरेबिक में सहजता है। अरेबिक ने जोड़ - घटाव की प्रक्रिया को सहज किया।


यही कारण है कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति 12 वीं सदी के बाद हुई, तब जब लोगों ने अरबों से अरेबिक सिखी।


हर सभ्यता बौद्ध सभ्यता नहीं होती!


                           4.


बौद्ध सभ्यता ने अनेक देशों को नाम दिए हैं, जिसका पता उन देशों को भी नहीं है।


भाषावैज्ञानिकों ने बताए हैं कि श्रीलंका का सिलोन ( Ceylon ) नाम पुर्तगालियों की देन है।


मगर ह्वेनसांग ने पुर्तगालियों के श्रीलंका में आने के सैकड़ों साल पहले ही लिख दिया है कि इसे आजकल " सिलन गिरि " भी कहते हैं।


पुर्तगालियों से पहले श्रीलंका के लिए " सिलन " नाम प्रचलित था, वहीं " सिलोन " है।


पालि की एक पारिभाषिक शब्दावली " सीलन " है। " सीलन " का सीधा- सीधा अर्थ होता है - " विनय ( विनयपिटक के नियम ) के अधीन रहना "।


श्रीलंका अभी भी बौद्ध देश है और ह्वेनसांग के समय में कहीं अधिक बुद्धप्रिय देश था। इसके अनेक प्रमाण हैं। जो बौद्ध ग्रंथ फाहियान को भारत में नहीं मिले, वो श्रीलंका में मिले।


विनय के अधीन तब श्रीलंका की अधिसंख्य आबादी रहती थी। तब यह ठीक जान पड़ता है कि इसी सीलन से सिलोन ( Ceylon ) का विकास हुआ है।


( नोट : - सिंहल द्वीप का एक नाम " सिलन गिरि " था। ह्वेनसांग की भारत - यात्रा, पृ. 403, ठा. प्र. शर्मा / सीलन का अर्थ " विनय के अधीन रहना " है। ( पालि - हिंदी कोश, पृ. 351, भ. आ. कौशल्यायन )


चीन का प्राचीन नाम चाहे जो भी रहा हो, ईसा से कोई दो सदी पूर्व इस देश का नाम चीन / चाइना प्रचलित हुआ, यह वही समय है, जब बुद्ध का झान ( ध्यान ) चीन पहुँचा, जिसे चीनी भाषा में चान / चिआन कहा जाता है।


बुद्ध का झान जब चीन पहुँचा, तब उसका नाम चीन / चाइना प्रचलित हुआ। 


बुद्ध के चान / चिआन से चीन / चाइना के नाम का जरूर कोई संबंध है। यदि नहीं है तो विचार कीजिए कि दक्षिण - पूर्व एशिया को हिंद- चीन और मध्य एशिया के बड़े भू - भाग को चीनी - तुर्किस्तान क्यों कहा जाता है, जबकि प्राचीन काल में ये सब इलाक़े बौद्ध धर्म से जुड़े थे।


इसी प्रकार तिब्बत निवासी खुद अपने देश को बोद् के नाम से संबोधित करते हैं। यह बोद् क्या है? वहीं बुद्ध की ही एक उच्चारण - रीति है और जो भोट है, वह बोद् की तर्ज़ पर है तथा इसी भोट से भूटान बना है।


हड़प्पा और मुअनजोदड़ो में अन्नागार मिले हैं। हड़प्पा में राजमार्ग के दोनों ओर ऊँचे चबूतरों पर विशाल अन्नागार बने हुए थे।


अन्नागार की यह परंपरा पूर्व मौर्य काल और मौर्य काल में भी चलती रही। आश्चर्य कि ये भी सिंधु घाटी सभ्यता की तरह राजमार्ग पर ही बने।


सोहगौरा ताम्रपत्र में अन्नागार बनाए जाने का उल्लेख है। यह अन्नागार भी चौराहे पर बना था। इस अभिलेख में दो अन्नागारों के निर्माण का उल्लेख है, जिनमें तीन कमरों के होने की चर्चा की गई है।


सोहगौरा ताम्रपत्र गोरखपुर क्षेत्र के सोहगौरा नामक गाँव से मिला है। लगभग चौथी सदी ई. पू. का है। 


सबसे ऊपर बौद्ध धर्म के प्रतीक चिह्न हैं जैसे बोधिवृक्ष, स्तूप आदि। बोधिवृक्ष जो ताम्रपत्र पर सबसे पहले है, इसे बिहार सरकार ने अपना राज्यचिह्न बनाया है। दो प्रतीक कोष्ठागार के हैं जो भवन जैसे दिखाई पड़ रहे हैं। यह भवन वास्तुकला का अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करता है।


कोष्ठागार के दो भवन इसलिए कि ताम्रपत्र में दो कोष्ठागार ( अनाज संचयन हेतु ) आपत काल में जनहित के लिए बनाए जाने का उल्लेख है।


सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों में पक्की ईंटों से बने स्नानघर और शौचालय थे। शौचालय का निर्माण सिंधु घाटी सभ्यता की खास विशेषता है।


ईसा पूर्व 1200 में मिश्र में शौचालय मिलते हैं। प्रथम शताब्दी में रोमन सभ्यता में शौचालय मिलते हैं। ग्रीक में भारत से जो ज्ञान पहुँचा, रोमन सभ्यता में शौचालय का इस्तेमाल संभवत उसकी परिणति है।


सिंधु घाटी सभ्यता से शौचालय की यह परंपरा बौद्ध मठों तक पहुँचती है।


वैशाली म्यूजियम में एक टाॅयलेट पैन रखा है। यह वैशाली के कोल्हुआ की खुदाई से मिला था।


टाॅयलेट पैन पहली - दूसरी सदी का है। कोई 18 - 19 सौ साल पुराना है। यह एक बौद्ध मठ से मिला है।


टाॅयलेट पैन का व्यास 88 सेंमी और मोटाई 7 सेंमी है। पावदान की लंबाई 24 सेंमी और चौड़ाई 13 सेंमी है।


टाॅयलेट पैन टेराकोटा का बना है। लट्रीन और यूरिन के लिए अलग-अलग छेद हैं।


अनुमानतः यह भिक्षुणियों की मोनेस्ट्री का टाॅयलेट पैन है।


आज खुले में शौच से मुक्ति की बात हो रही है, तब विचार कीजिए कि इस दिशा में बौद्ध सभ्यता का क्या योगदान है।


                              5.


सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों की लेखन - कला कई मामलों में धम्म लिपि ( ब्राह्मी लिपि ) के लोगों की लेखन - कला से मिलती - जुलती है।


सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि और धम्म लिपि के कम से कम 10 लेटर एक जैसे हैं। ( चित्र - 36 )


इतना ही नहीं, सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि और तमिल ब्राह्मी लिपि के कम से कम 5 लेटर एक जैसे हैं। ( चित्र- 37 )


सिंधु घाटी की प्राक् बौद्ध सभ्यता और गौतम बुद्ध तथा उनके बाद की बौद्ध सभ्यता के बीच लेखन - कला में तालमेल है। परंपराएँ मरती नहीं हैं।


वे इतिहासकार जो मौर्यों की कारीगरी को ईरान में जाकर खोजते हैं, वे क्यों नहीं बताते हैं कि मौर्यों का शाही महल ईरान के सूसा और एकबटना के शाही महल से किस कारण अधिक सुंदर और शानदार था।


पाटलिपुत्र का शाही महल ईरान के शाही महल से अधिक सुंदर और शानदार था, यह बात न तो भारत और न ईरान के इतिहासकारों ने बताई है बल्कि यूनान के इतिहासकारों ने बताई है। पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं है।


अब अशोक कालीन रामपुरवा के बैल की मूर्ति को लीजिए, देखिए पूरा मूर्ति - विन्यास सिंधु घाटी के उस कूबड़दार वृषभ ( तथाकथित ) से मेल खाता है।


यदि कोई शक हो तो फिर मौर्य कालीन हाथी के उत्कीर्णन को देखिए, वो भी सिंधु घाटी सभ्यता के सीलों पर उत्कीर्ण हाथी से कैसे मेल खाता है।( चित्र - 38 )


भला जिस देश के पास सिंधु घाटी की विरासत हो, वह कहाँ  - कहाँ की जूठन खाता चलेगा?


सिंधु काल के प्रीस्ट किंग की मूर्ति तथा मौर्य काल की यक्षिणी की मूर्ति की तुलना कीजिए।


दोनों मूर्तियों की नाक टूटी हुई है और दोनों का एक - एक हाथ टूटा हुआ है। यह आकस्मिक हो सकता है।


मगर दोनों मूर्तियों के सिर पर जो गोलाकार शिरोभूषण है, वह आकस्मिक नहीं है, वह एक खास किस्म की सभ्यता के संकेतक है और वह सभ्यता है - बौद्ध सभ्यता।


मौर्य काल और सिंधु घाटी सभ्यता का काल - दोनों बौद्ध सभ्यता में भीगा हुआ काल है। इसीलिए दोनों काल की मूर्तियों में मौजूद गोलाकार शिरोभूषण की समानता आकस्मिक नहीं है। ( चित्र - 39 )


गुंबद ....एक प्रकार की अर्द्ध गोलाकार छत है। छत मनुष्य ने घर में रहने लिए बनाई है।


गुंबद को अंग्रेजी में Dome कहते हैं। Dome घर से जुड़ा है। इसलिए घरेलू को अंग्रेजी में Homestic नहीं, Domestic कहते हैं।


रूसी में दोम अर्थात घर, लैटिन में डोमस अर्थात घर। Dome अर्थात गुंबद घर से जुड़ा है। इसलिए गुंबद का इतिहास मानव सभ्यता में प्राचीन है।


मगर ईंट - पत्थरों से स्पष्ट तथा स्वतंत्र गुंबद बनाए जाने का स्पष्ट इतिहास हमें भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम बौद्ध परंपरा में मिलता है। आप इसे डबल गुंबद भी कह सकते हैं।


गुंबद बना स्तूप गुंबात स्तूप है। यह स्तूप पाकिस्तान की स्वात घाटी में बारीकोट से 9 किमी दक्षिण है। ( चित्र - 40 )


स्तूप के ऊपर गुंबद बना है। इसीलिए इस स्तूप को गुंबात स्तूप कहते हैं। गुंबात पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ गुंबद होता है।


भारतीय प्रायद्वीप में किसी इमारत पर स्पष्ट एवं डबल गुंबद बनाए जाने का यह पहला स्पष्ट प्रमाण है, जिसका निर्माण- काल ईसा की दूसरी सदी के बाद नहीं ले जाया जा सकता है।


भारत में मध्यकालीन इमारतें गुंबदयुक्त है तो यह बौद्ध स्थापत्य की देन है।


मध्यकाल में अष्टकोणीय इमारतें खूब बनी हैं। शेरशाह का मकबरा अष्टकोणीय है।


मुंडेश्वरी मंदिर भी अष्टकोणीय है।


बौद्ध स्थापत्य कला में अष्टकोणीय का अपना महत्व है। मनौती स्तूप की डिजाइन अष्टांगिक मार्ग के कारण अष्टकोणीय होती है। कुएँ भी अष्टकोणीय बने हैं। अष्टकोणीय कुआँ सासाराम में भी है, जिसे हथिया कुआँ कहा जाता है और बोध गया के क्षेत्र में भी हैं।


न केवल मनौती स्तूप बल्कि अन्य बड़े स्तूप भी अष्टकोणीय बनाए गए हैं। अष्टकोणीय स्थापत्य बौद्धों की देन है। अष्टांगिक मार्ग के प्रतीक स्वरूप बनाए गए हैं। बाद में अन्य संस्कृतियों के लोगों ने इस अष्टकोणीय स्थापत्य को अपना लिए।


धम्म चक्र का इतिहास पुराना है। सिंधु घाटी सभ्यता की सीलों पर छः तिलियों का धम्म चक्र मिल जाएगा। धोलावीरा के साइनबोर्ड पर भी छः तिलियों का धम्म चक्र है। ( चित्र - 41)


बुद्ध के समय में आठ तिलियों के धम्म चक्र बने। अशोक ने 24 और 32 तिलियों के धम्म चक्र का इस्तेमाल किए। 32 से अधिक तिलियों के भी धम्म चक्र बने।


धम्म चक्र प्रकार के स्तूप भी बने। संघोल के स्तूप उदाहरण हैं। धम्म चक्र प्रकार का स्तूप धोलावीरा में भी मिला है।


सिंधु घाटी की सभ्यता ने 6 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल लिपि में किया था।


गौतम बुद्ध ने 8 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल शिक्षा में किया था।


सम्राट अशोक ने 24 और 32 तिलियों वाला धम्म चक्र का इस्तेमाल शासन में किया था।


ऐसे ही धम्म चक्र का कदम सिंधु घाटी सभ्यता से मौर्य काल तक बढ़ते गया।


जब बुद्ध थे, तब पीपल को पूरा यूरोप नहीं जानता था .....सेंट्रल अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में तो पीपल 19 सदी के आखिरी दौर में पहुँचा।


बुद्ध के कई सदी बाद वनस्पतिविज्ञानियों ने पीपल का बटैनिकल नाम Ficus Religiosa रखा। यह नाम गौतम बुद्ध के कारण पड़ा।


पीपल का Sacred Fig नाम भी बुद्ध के कारण हुआ। अंग्रेजी में जो पीपल का नाम Bo Tree है, वह Bodhi Tree का संक्षिप्त रूप है। पीपल से वाकिफ न होने के कारण यूरोपीय भाषाओं में पीपल का कोई आॅरिजनल नाम नहीं है।


एशिया के वे देश बेहद ख़ुशनसीब हैं कि उन्हें पीपल से परिचय तब हो गया, जब वे धम्म के शरणागत हुए। गौतम बुद्ध के कारण पीपल को एशिया में पहचान मिली।


बुद्ध ने यह पीपल सिंधु घाटी की प्राक बौद्ध सभ्यता से अर्जित किए थे और उसे Tree of  Awakening ( बोधिवृक्ष ) की दुबारा ऊँचाई दी।


बुद्ध से पहले दीपंकर बुद्ध का बोधिवृक्ष यहीं पीपल था। वे चौथे बुद्ध थे और सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन थे।


साल 2019 में लखीसराय के सूर्यगढ़ा प्रखंड के रामपुर गाँव के पश्चिम स्थित भेलवा पोखर की खुदाई में काले पत्थर का यह बौद्ध स्मारक मिला है। ( चित्र - 42 )


बौद्ध स्मारक कोई 46 किलो का है। दो मंजिला है। प्रत्येक मंजिल पर 4 - 4 बुद्ध उकेरे गए हैं। कुल 8 बुद्ध की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।


यह संयोग नहीं बल्कि जान - बूझकर आठों उत्कीर्ण बुद्ध प्रतिमाओं का नाक - नक्शा ( हुलिया ) बिगाड़ा गया है ताकि प्रतिमा की शिनाख्त नहीं हो सके।


संयोग कहिए कि स्मारक के निचले हिस्से में दो पंक्तियों का अभिलेख है - ये धम्मा हेतुपप्भवा ...।


यह वहीं प्रसिद्ध सूक्ति है, जिसे बौद्ध साहित्य में अस्सजी - सारिपुत्त संवाद के रूप में जाना जाता है।


यह सूक्ति अस्सजी की है, जिसमें उन्होंने संक्षेप में सारिपुत्त को धम्म का सारांश बताए हैं।


वह सारांश यह है कि जो घटनाएँ कारण से पैदा होती हैं, तथागत ने घटनाओं के कारण बताए हैं और उनका रोकने का उपाय है, उसे भी बताए हैं।


दरअसल यह बौद्ध स्मारक महाबोधि मंदिर का भावानुवाद है, प्रतिकृति नहीं है।


दुनिया में आज भी महाबोधि मंदिर की कोई 39 प्रतिकृतियाँ मौजूद हैं और जो अमेरिका और चीन - जापान - कोरिया से लेकर नेपाल, बर्मा, श्रीलंका तथा थाईलैंड तक फैली हैं।


गौतम बुद्ध का कपिलवस्तु ठीक वैसा ही बसा हुआ था, जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो के नगर बसे हुए थे।


दो भागों में - एक रिहायशी क्षेत्र और दूसरा धार्मिक क्षेत्र।


कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र गनवरिया था और धार्मिक क्षेत्र पिपरहवा था। गनवरिया और पिपरहवा दोनों मिलकर कपिलवस्तु था। बुद्ध का घर गनवरिया के रिहायशी क्षेत्र में था।


हड़प्पा, मोहनजोदड़ो जैसे नगरों में भी रिहायशी क्षेत्र अलग था और धार्मिक क्षेत्र अलग था, जिसे पुरातात्विकों ने स्तूप क्षेत्र कहा है।


सिंधु घाटी सभ्यता की नगर - योजना से कपिलवस्तु की नगर - योजना का साम्य संभवत आकस्मिक नहीं है।


हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में पठियार गाँव के पास पठियार शिलालेख है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि विस्मयकारी लिपि में लिखे गए इस शिलालेख को कोई समझ नहीं पाया है।


लेकिन शिलालेख में नीचे और ऊपर सिर्फ दो पंक्ति लिखी हुई है। ऊपर की लिपि धम्म  और नीचे की लिपि खरोष्ठी है।


ऊपर लिखा है - वायलस पुकरिणी और नीचे लिखा है - राठि दारास वायलस पुकरिणी।


ऊपर का अर्थ हुआ - सार्वजनिक जलाशय और  नीचे का अर्थ हुआ - राष्ट्रिक दारा का सार्वजनिक जलाशय।


मगर लिपि में ही पठियार शिलालेख पर स्वस्तिक बना है। अनेक धम्म लिपि के अभिलेखों में स्वस्तिक मिलता है। आश्चर्यजनक रूप से स्वस्तिक की यह परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ती है। वहाँ भी स्वस्तिक मिलते हैं।


                          6.


अनेक बौद्ध घटनाएँ परिवर्तित रूप में बाद के साहित्य में मिलती हैं।


जैसा कि पालि साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध मथुरा से वेरंजा गए थे और अनेक लोगों ने माना है कि वेरंजा ही व्रज है।


वेरंजा उत्तर प्रदेश के ब्रजभाषा क्षेत्र के ब्रजमंडल में एटा से 16 किमी की दूरी पर उत्तर में है।


वेरंजा की पहचान अतिरंजी खेड़ा से की गई है। अतिरंजी खेड़ा की खोज कनिंघम ने 1861 - 62 में की थी।


अतिरंजी खेड़ा वर्तमान में काली नदी के किनारे है। काली नदी कन्नौज में कालिंदी के नाम से मशहूर है।


अर्थात वेरंजा कालिंदी नदी के किनारे था और हिंदी के मध्यकालीन कवियों ने स्मृति - अवशेष के रूप में ब्रज को कालिंदी नदी के किनारे बताया है।


रसखान ने लिखा -- कालिंदी कूल कदंब की डारन - अर्थात वे ब्रज के कदंब वृक्ष कालिंदी नदी के किनारे खड़े थे।


कवि गंग ने लिखा -- कालिदह कालिंदी -- अर्थात कालिंदी में कालिदह था। कालिदह तो काली नदी का दह ( नदी का गहरा भाग ) रहा होगा।


आज की काली नदी पहले की कालिंदी है। पर्शियन लेखकों ने कालिंदी का नाम काली नदी किया है और यह कवि गंग के समय में प्रचलित थी।


वर्तमान में यमुना का एक नाम कालिंदी है। मगर यमुना को कालिंदी नाम बाद के साहित्य में मिला है।


पहले के साहित्य में कालिंदी और यमुना अलग-अलग नदियाँ थीं। वाल्मीकि रामायण में दो नदियों का अलग-अलग उल्लेख है -- " कालिंदीं यमुनां रम्यां " ( 4. 40.21)।


आज का ब्रज यमुना नदी के किनारे है और तब का वेरंजा कालिंदी के तट पर था।


हिंदी साहित्य में गोपियों के विरह को बैठे ठाले का विलाप कहा गया है। कारण कि कृष्ण ब्रज से मथुरा चले गए थे और आज के ब्रज से मथुरा की दूरी कुछ मिनटों की है।


एक और उदाहरण।


घूमते - घूमते ह्वेनसांग गांधार क्षेत्र में पहुँचे,

फिर पुष्कलावती गए।


पुष्कलावती के पास एक स्तूप था। वह बोधिसत्व श्रमक की स्मृति में बना था। 


बोधिसत्व श्रमक वहीं रहकर अपने अंधे माता - पिता की सेवा करते थे।


एक दिन का वाकया है कि वे अपने अंधे माता-पिता के लिए फल लाने गए थे।


तभी एक राजा जो शिकार के लिए निकले थे, श्रमक को अनजाने में बिष - बाण से मार दिए।


श्रमक बोधिसत्व मरे नहीं बल्कि उनका घाव औषधि से ठीक हो गया।


माता - पिता की सेवा करनेवाले बोधिसत्व श्रमक की स्मृति में वह स्तूप बना था। यहीं बुद्धिज्म है।


श्रमक का यह इतिहास पढ़कर जाने क्यों पुराणों के श्रवण कुमार याद आए।


( ह्वेनसांग के यात्रा- वृतांत से साभार )


अनेक जगहों पर बुद्ध की मूर्तियाँ दूसरे नामों से भी पूजी जाती हैं - कहीं मोरवा बाबा हैं, कहीं तेलिया मसान हैं तो कहीं दूसरे धर्म के देवी - देवता में रूपांतरित हो गए हैं।


कहीं - कहीं एक बुद्ध विरोधी परंपरा बनाकर भी बौद्ध- स्थलों को तोड़ने- फोड़ने की कवायद हुई है।


एक उदाहरण प्रस्तुत है।


बोज्जनकोंडा एक बौद्ध स्थल है। यह आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के संकरम ( संघाराम ) में स्थित है। मकर संक्रांति के अगले दिन यहाँ " कनुमा दिवस " मनाए जाने की परंपरा है।


कनुमा दिवस के मौके पर यहाँ सैकड़ों लोग जुटते हैं। बड़े उत्तेजित भाव से पत्थरों की बौछार करते हैं। बौद्ध स्थल के ही पत्थरों को उखाड़ कर बौद्ध स्थल पर ही फेंकते हैं।


दानव मानकर फेंकते हैं और बौद्ध स्थल नष्ट-भ्रष्ट करते हैं। विगत कुछ सालों से यह पुरानी परंपरा लगभग बंद हो चुकी है। बावजूद इसके वहाँ इस साल 2020 में भी जिला प्रशासन मुस्तैद था।


अलेक्जेंडर रीम ने 1906 में खुदाई की थी। तब पत्थर फेंकने का रिवाज नहीं था। संभवतः 1920 के दशक में यह रिवाज प्रचलित हुआ।


अफसोस कि 1920 के दशक में जब पूरा देश अंग्रेजों को बाहर निकालने में लगा था, तब कुछ लोग 1920 के ही दशक में बुद्ध की यह दुर्गति कर रहे थे।

Rajendra Prasad Singh



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