रविवार, 22 सितंबर 2024

क्या भक्ति आंदोलन विफल हुआ ?

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क्या भक्ति आन्दोलन विफल हुआ?
(कँवल भारती)

हिंदी आलोचना में “भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य” मैनेजर पाण्डेय की एक चर्चित किताब मानी जाती है, जो उनके अनुसार उनके पीएचडी थीसिस का संक्षिप्त और संशोधित रूप है। इस पुस्तक के केन्द्र में, यद्यपि, सूरदास का काव्य है, पर भक्ति पर चर्चा के दौरान उसमें जायसी, कबीर, मीरा और तुलसी आदि कवि भी आ गए हैं, और कुछ अन्य विषयों का भी, जो उससे सम्बन्धित हैं, निरूपण हो गया है। इस पुस्तक का पहला अध्याय “भक्ति काव्य और हिंदी आलोचना” है, जो महत्वपूर्ण और विचारणीय है। इस अध्याय में पाण्डेय जी ने पंडित रामचंद्र शुक्ल की कुछ स्थापनाओं से असहमति व्यक्त की है, हालाँकि खंडन नहीं किया है, पर अधिकांश से उनकी सहमति है। इस अध्याय को पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पंडित मैनेजर पाण्डेय पर पंडित रामविलास शर्मा का प्रभाव ज्यादा है। जैसे ‘परम्परा का मूल्यांकन’ में पंडित रामविलास शर्मा ने सब धान सत्ताईस सेर तौल दिए हैं, वैसे ही मैनेजर पाण्डेय ने निर्गुण, सगुण, कबीर, मीरा, तुलसी सबको गडमड करके भक्त की श्रेणी में डाल दिया है। इस अध्याय में कबीर और निर्गुण आदि के संबंध में कुछ बातों से घोर आपत्ति है, जिनकी आलोचना जरूरी है. 
कुछ तथ्य आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं : 
1. पाण्डेय जी लिखते हैं : ‘यह कौन नहीं जानता कि कबीर, रैदास, सेन, घना आदि निर्गुण संतों के गुरु रामानंद सगुण भक्त थे।’ (पृष्ठ 46) सवाल है कि अगर गुरु सगुण है, तो उसके ये चेले निर्गुण क्यों हो गए? चेलों को भी सगुण होना चाहिए था। रामानंद का चेला बनने के बाद उनके नाम कबीरानन्द, रैदासानंद, सेनानन्द और घनानन्द क्यों नहीं हुए, जैसी कि ब्राह्मणों में गुरु-शिष्य परम्परा है, और रामानंद के अन्य ब्राह्मण शिष्यों के ऐसे नाम मिलते भी हैं, जैसे, आत्मानन्द, सुखानन्द, भावानन्द, सुरसुरानन्द, अनभानन्द, नित्यानंद, योगानंद; और ये सभी संत सगुण भी हैं। अगर कबीर के गुरु रामानंद होते, तो कबीर का नाम भी कबीरानंद रखा गया होता, और दोनों के विचार भी समान होते। लेकिन यहाँ तो उल्टा है। गुरु मूर्ति-पूजक है, पर शिष्य मूर्ति-भंजक है; गुरु वेद-शास्त्र का मंडन करता है, पर शिष्य खंडन करता है; गुरु दक्षिण चलता है, पर शिष्य बाएं चलता है। पाण्डेयजी किस आधार पर कबीर को रामानंद का शिष्य कहते हैं? जवाब है, उसी आधार पर, जिस आधार पर सारे ब्राह्मण कहते हैं। लगता है, पांडेयजी ने इतिहास की कसौटी पर भी इसे परखने की कोशिश नहीं की, वरना जान लेते कि रामानंद की मृत्यु के समय कबीर की क्या अवस्था रही होगी? 
2. पाण्डेयजी लिखते हैं : ‘सूर के काव्य में प्रेम कबीर से अधिक स्वाभाविक और जायसी से अधिक लौकिक है। सूर को कबीर की तरह वात्सल्य और माधुर्य की अभिव्यक्ति के लिए बालक तथा बहुरिया बनने की आवश्यकता नहीं है।’ (39) बात सही है, पर पांडेयजी ने इसकी व्याख्या नहीं की। जायसी और सूर दोनों ने किस्से-कहानियों का काव्य लिखा है। जायसी के काव्य का आधार एक लोककथा है, तो सूर ने कृष्ण चरित्र और उनकी रासलीला को अपने काव्य का आधार बनाया है। यह वह प्रेम नहीं है, जिसे कबीर स्थापित करते हैं। कबीर का प्रेम मनुष्य से मनुष्य का प्रेम है, वह मानवीय है। दूसरी बात यह कि कबीर कहाँ बहुरिया बनेंगे और क्यों बनेंगे? यह कबीर के उस पद का गलत पाठ है, जिसमें ‘बहुरिया’ शब्द आया है. उसे ठीक से ब्राह्मण आलोचकों ने समझा ही नहीं कि किसका मंगलचार है, और कौन बहुरिया है? और कौन ब्याह चले हैं? कबीर का वह पद उस स्थिति का चित्रं करता है, जब एक विधवा स्त्री को सती करने के लिए ले जाया जा रहा है। (देखिए, मेरी किताब ‘कबीर का ज्ञानोदय)
3. पांडेयजी का मत है : ‘स्वच्छंद प्रेम के उन्मुक्त गायक सूर के काव्य में कहीं भी जाति और वंश के प्रभुत्व का समर्थन तो क्या, स्वीकार भी नहीं है। सूर का काव्य समाज और शास्त्र की सभी रूढ़ियों से स्वतंत्र है।’ (पृष्ठ 46) यह मैनेजर पाण्डेय का मिथ्या ज्ञान है। सूर के काव्य में जाति और वंश के क्या, गोत्र और वर्ण तक का ज़िक्र है। यथा : ‘पूरन ब्रह्म सकल अबिनासी ताके तुम हौ ज्ञाता, रेख, न रूप, जाति, कुल, नाहीं जाके नहिं पितु माता।’ निर्गुण के विरुद्ध सगुण की स्थापना में सूर तुलसी से भी आगे हैं। सूर ने कृष्ण की लीलाओं, नाम-महात्म्य, राधा-कृष्ण और गोपियों के प्रणय प्रसंगों का वर्णन करके निर्गुण की अवधारणा पर ही प्रहार किया है। सम्पूर्ण भ्रमर-गीत निर्गुण और सगुण का संवाद ही है, जो उद्धव के द्वारा गोपियों और कृष्ण के बीच चलता है। इस पद में कृष्ण उद्धव से कहते हैं—तुम तो उस ब्रह्म के ज्ञाता हो, जिसके न माता है, न पिता है, न रूप है, न रंग है, न जाति है और न कुल है। मतलब साफ़ है, वह ब्रह्म या ईश्वर ही क्या, जिसका कोई वर्ण, कुल और जाति न हो? और यह कुल, वर्ण और जाति भी उच्च होनी चाहिए। गोपियाँ जवाब देती हैं : ‘जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै, दाख छांड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहें? सूरदास प्रभु गुनहि छांड़ि कै को निर्गुन निर बैहै?’ यहाँ सूरदास ने निर्गुण को ठगने का सौदा कहा है और उसे नीम का कड़वा फल बताया है। दरअसल उद्धव कृष्ण और गोपियों की यह पूरी कथा काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल निर्गुण आन्दोलन को विफल करना था। ध्यान रहे कि उद्धव गोपियों को कथा सुनाते हैं, जो निम्न जातियों की हैं। और निम्न जातियों में ही कबीर की निर्गुण क्रांति का प्रभाव था। सूर का यह पद देखिए, जिसमें गोपियाँ अपने को वर्णहीन लघु जाति का बताती हैं—
हम तो दुहूं भाँति फल पायो
जो ब्रजनाथ मिले तो नीको, नातरू जग जस गायो 
कहं वै गोकुल की गोपी, सब बरनहीन लघु जाती
कहं वै कमला के स्वामी संग मिल बैठी इक पांति
निगम ध्यान मुनिजन अगोचर ते भए घोष निवासी
ता ऊपर अब सांच कहो थौं मुक्ति कौन की दासी
जोक कथा पा लागों ऊधो, ना कहु बारम्बार
सूर स्याम तजि और भजे जो ताकी जननी छार
इस पद में कहा गया है कि जो कृष्ण को छोड़कर अन्य का भजन करता है, उसकी माता को धिक्कार है। इसमें निर्गुण दर्शन के शब्द ‘मुक्ति’ का भी यह कहकर उपहास उड़ाया गया है कि यह किसकी दासी है? ‘दासी’ शब्द पर विचार कीजिए। यह प्रतिक्रांति का शब्द है, क्रांति का नहीं. सूरदास स्वामी और दास की ब्राह्मणवादी संस्कृति से आते थे। इसीलिए उनके काव्य में कुल, जाति और वर्ण के शब्द बार-बार आते हैं।
सूर के काव्य पर इस दृष्टि से विचार किए जाने की जरूरत है कि सूर का काव्य पूरी तरह कल्पना की उड़ान है और उसमें कुछ भी ऐतिहासिकता नहीं है। वह केवल दलित वर्गों में निर्गुण दर्शन की क्रान्ति को रोकने के मकसद से नाम, रूप, लीला, धाम की वैष्णवी भक्ति को स्थापित करने के लिये रचा गया है। एक पद में सूर गोपियों के मुख से सीधे सवाल करते हैं--
निर्गुण कौन देस को बासी?
मधुकर, हंसि समुझाय सौंह दै बूझति साँच, न हांसी।
कौ है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस कै अभिलाषी।
यह एक कवि की नहीं, बल्कि ब्राह्मण की समस्या है कि वह निर्गुण को अभारतीय मान रहा है और पूछ रहा है कि वह किस देश का वासी है? उसका सगुण ईश्वर भी वह है, जिसके माता-पिता हों, और जिसका वर्ण उच्च हो, तथा जो पत्नी और दासी रखता हो। ध्यान रहे कि भारतीय दर्शन में निर्गुण पूरी तरह दलित सन्तों की नयी खोज थी, जो ब्राह्मणों के अवतारवाद और आवागमन के मायाजाल से आम-आदमी की मुक्ति का मार्ग था। 
सूर-काव्य के सम्बन्ध में इस दृष्टि से भी विचार करने की जरूरत है कि भ्रमर गीत नारी अस्मिता के साथ क्रूर खिलवाड़ करते हैं। ये नारियाँ भी निम्न जातियों की हैं, जिन्हें कृष्ण के प्रणय में पागल दिखाया गया है। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि कृष्ण के प्रेम में ब्राह्मण स्त्रियाँ पागल क्यों नहीं हुईं? ठाकुरों की स्त्रियाँ पागल क्यों नहीं हुई?
क्या यह अहीर स्त्रियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ नहीं है? एक कृष्ण का इतनी स्त्रियों के साथ रास रचाना ब्राह्मण चिन्तन के लिये भले ही ठीक हो, पर दलित चिन्तन तो इसे दलित स्त्रियों का चरित्र हनन ही कहेगा। ब्रज की सारी गोपियाँ, जो अहीर स्त्रियाँ हैं, कृष्ण के साथ रात-भर रास रचाती हैं, और एक भी द्विज स्त्री उसमें शामिल नहीं है। इसका क्या अर्थ है? कोई बंशी बजाये और उसे सुनकर सारी दलित स्त्रियाँ रास रचाने पहुँच जायें, क्या यह सम्पूर्ण दलित स्त्रियों के लिये अपमानजनक नहीं है? और, ब्राह्मण चिन्तन इस अस्मिता-हनन पर मुग्ध है, तो शर्म की बात है।
मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है : ‘‘सगुण काव्य-धारा की सीमा बताने के लिए मुक्तिबोध ने यह सवाल किया है, ‘क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि रामभक्ति शाखा के अंतर्गत एक भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया?’ यह तथ्य है.” (पृष्ठ 46-47) पांडेयजी ने इस तथ्य की पड़ताल नहीं की, बल्कि इसके खंडन में यह कहा कि इसका कारण उच्च जातीय वर्गों का वर्चस्व नहीं है। लेकिन मुख्य प्रश्न तो यह है कि रामभक्ति की धारा थी कहाँ? एकमात्र तुलसीदास ही इस धारा में दिखाई देते हैं। क्या एक कवि से कोई काव्य-धारा बनती है? हाल ही में मैं राजेन्द्र प्रसाद सिंह का लेख पढ़ रहा था कि कोई काव्य-धारा कम से कम पचास-साठ कवियों से बनती है। क्या रामभक्ति शाखा में, उच्च जातियों के ही सही, पचास-साठ कवियों के नाम मिलते हैं? राजेन्द्र प्रसाद सही कहते हैं कि रामभक्ति की काव्य-धारा जबरदस्ती की धारा है। ऐसी कोई धारा चली ही नहीं। चूँकि निम्नजातीय शूद्र वर्गों में निर्गुणवाद का प्रभाव था, इसलिए कृष्णभक्ति की शाखा में भी निम्नजातीय शूद्र वर्गों के कवियों की संख्या नगण्य है। यह निर्गुणवाद की बहुत बड़ी क्रांति थी, जो कबीर के बाद की सदियों में भी ब्राह्मणों की चिंता बनी हुई थी। इसके विरुद्ध प्रतिक्रांति में पहले तो ब्राह्मणों द्वारा निर्गुण और सगुण की एकता के प्रयास किए गए। ऐसे प्रयास कबीर के समय में ही शुरू हो गए थे और कबीर को कहना पड़ा था—‘गुन में निर्गुन निर्गुन में गुन, सुन सुन आवे हांसी’; और उसके बाद पूरी योजना के साथ सगुण राम और कृष्ण को स्थापित किया गया। सवाल राम और कृष्ण का नहीं था, बल्कि उनके बहाने सगुणवाद को कायम करना था, जिसके साथ वर्णव्यवस्था और परलोक का सिद्धांत जुड़ा हुआ था। इसलिए सगुणवाद के द्वारा ब्राह्मणवाद के पुनरुद्धार का काम किया गया था।
इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध ने शूद्र-चेतना का प्रश्न उठाया था। पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध के इस प्रश्न को हवा में उड़ा दिया। उन्होंने प्रतिप्रश्न किया : “आधुनिक प्रगतिशील आन्दोलन के अंतर्गत भी कोई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया।” 
दोनों प्रश्न अलग-अलग हैं. मुक्तिबोध का प्रश्न ‘शूद्र-चेतना’ का प्रश्न है, जबकि पांडेयजी का प्रश्न ‘शूद्र-उपेक्षा’ का प्रश्न है। आधुनिक प्रगतिशील आन्दोलन के अंतर्गत कोई महत्वपूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया, यह इतिहास लिखने वालों की सोच को दर्शाता है। इस सोच में प्रगतिशील आन्दोलन के निम्नजातीय शूद्र कवियों की उपेक्षा की गई, जबकि पचासियों शूद्र कवियों की कविताएँ चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने ही अपने प्रकाशन से छापीं थीं। किन्तु रामभक्ति शाखा के अंतर्गत निम्नजातीय शूद्र वर्ग का एक भी कवि इसलिए नहीं है, क्योंकि उनकी चेतना निर्गुण के साथ जुडी थी, दशरथ-नन्दन सगुण राम के साथ नहीं।
पांडेयजी लिखते हैं : “भक्ति आन्दोलन की दोनों धाराओं के बीच एकता की पहिचान का पहला व्यवस्थित प्रयास नाभादास के ‘भक्तमाल’ में है।” उनके अनुसार नाभादास शूद्र समुदाय से आए हुए सगुण रामभक्त थे। “उनके भक्तमाल में निर्गुण-सगुण, ब्राह्मण-शूद्र, स्त्री-पुरुष—सभी तरह के भक्तों के लिए सम्मानजनक जगह है।” (पृष्ठ 48) ‘भक्तमाल’ अथवा ‘भक्त-कल्प-द्रुम’ ब्राह्मणों का प्रायोजित ग्रन्थ है, भले ही इसके लेखक नाभादास शूद्र हों। किन्तु, यही वह ग्रन्थ है, जिसने निर्गुण-सगुण का गुड़-गोबर एक कर दिया है। यह एकता का व्यवस्थित प्रयास नहीं है, जैसा कि पाण्डेयजी का मत है, बल्कि यह निर्गुण कवियों को रामानंद का चेला बनाकर वैष्णवी रंग में रंगने का ब्राह्मणी उपक्रम है, जो नाभादास के माथे डाला गया। इसी प्रायोजित ब्राह्मणी ग्रन्थ से कबीर, रैदास आदि निर्गुण कवियों को रामानंद का शिष्य बनाने का काम शुरू हुआ। कबीर और रैदास के जीवन के साथ पूर्वजन्म की कहानियां जोड़ने का काम भी इसी ग्रन्थ ने किया। इसी ग्रन्थ के आधार पर बाद के ब्राह्मणों ने कबीर आदि निर्गुण संतों के जीवन-चरित्र लिखे, जिनमें उन्हें रामानंद का शिष्य और पूर्वजन्म का ब्राह्मण बताया गया। अगर ‘भक्तमाल’ न लिखा गया होता, तो कबीर-रैदास आदि कवियों के साथ रामानंद का नाम कभी नहीं जुड़ता, ‘संत वाणी संग्रह’ भी इसी ग्रन्थ के अनुकरण पर तैयार किया गया था। 
अब हम भक्ति आन्दोलन की विफलता पर बात करेंगे। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं : “भक्ति-आन्दोलन पर समग्र रूप से विचार करने वाले किसी भी व्यक्ति के सामने यह प्रश्न जरूर खड़ा होगा कि वह आन्दोलन विफल क्यों हुआ?” क्या वास्तव में भक्ति आन्दोलन विफल हुआ? मेरा उत्तर है नहीं। भक्ति आन्दोलन विफल हुआ ही नहीं। अगर कोई आन्दोलन विफल हुआ, तो वह निर्गुण आन्दोलन है। निर्गुण और सगुण दोनों अलग-अलग आन्दोलन हैं। इन दोनों को एक समझने की कोशिश करना इतिहास का कुपाठ करना है। मुक्तिबोध ने इसे सही पकड़ा है। पाण्डेयजी के अनुसार, वे यही प्रश्न करते हैं : “क्या कारण है कि निर्गुण भक्तिमार्गीय जातिवाद आन्दोलन सफल नहीं हो पाया।” हालाँकि निर्गुणवाद भक्तिमार्गीय नहीं था, और न जातिवादी था। उसने जातिवाद और वर्णव्यवस्था का खंडन किया था, और समता तथा बन्धुता पर आधारित समाज की कल्पना की थी। लेकिन मुक्तिबोध का प्रश्न सही है कि निर्गुण आन्दोलन सफल क्यों नहीं हो सका? वे पूरे भक्ति आन्दोलन के विफल होने की बात नहीं कहते हैं, केवल निर्गुण आन्दोलन के विफल होने की बात करते हैं। सच भी यही है। अगर भक्ति आन्दोलन असफल होता, तो सगुण आन्दोलन कैसे जीवित है? उसे भी मर जाना चाहिए था। पर सगुण भक्ति का आन्दोलन न सिर्फ सफल हुआ, बल्कि आज इतने उत्थान पर है कि करोना के संकट में भी, राम का भव्य मंदिर बन रहा है। 
अब दूसरा प्रश्न कि निर्गुण आन्दोलन विफल क्यों हुआ, जबकि यह 15वीं और 16वीं सदी तक निम्नजातीय शूद्र वर्गों का धर्म रहा था? स्पष्ट है कि निर्गुण के विरुद्ध ब्राह्मणों की जबर्दस्त प्रतिक्रांति हुई थी। पाण्डेयजी लिखते हैं कि ‘मुक्तिबोध निर्गुण की असफलता और अंत का कारण सगुण को मानते हैं।’ वे सही मानते हैं। पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध के इस कथन को उद्धृत किया है : “जो भक्ति आन्दोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सास्कृतिक आकांक्षाएं बोलती थीं, उसका मनुष्य सत्य बोलता था, उसी भक्ति आन्दोलन को उच्चवार्गियों ने आगे चलकर अपनी तरह का बना दिया, और उससे समझौता करके, फिर उस पर अपना प्रभाव कायम करके और अनन्तर जनता के अपने तत्वों को उनमें से निकालकर उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।” आगे पाण्डेयजी ने मुक्तिबोध का यह कथन उद्धृत किया है कि “साहित्य के क्षेत्र में उच्च वर्गों का प्रधानभाव श्रृंगार (है, जिससे) विलास का प्रभावशाली विकास हुआ; इसलिए भक्तिकाव्य की प्रधानता जाती रही है।” जैसे ताश के खेल में इक्का महत्वपूर्ण होता है। उसी तरह इस विमर्श में पाण्डेयजी को ‘इक्के’ के रूप में नामवर सिंह का यह कथन मिल गया कि सगुण कवियों के श्रृंगार पर सामंती प्रभाव नहीं है। बस पाण्डेयजी को तुरंत इलहाम हो गया : “दोष श्रृंगार में नहीं, मुक्तिबोध की दृष्टि में है।” (पृष्ठ 49) लेकिन मुक्तिबोध ने श्रृंगार को, सामंती प्रभाव का नहीं, उच्च वर्गों का प्रधानभाव कहा है।
लेकिन पाण्डेयजी को नामवर सिंह का यह मत ठीक नहीं लगता कि ‘सगुण-काव्य की मुख्य कमजोरी शास्त्र-सापेक्षता है’। वे शास्त्रवाद के समर्थन में सवाल करते हैं कि ‘आखिर सगुण-काव्य में शास्त्र-सापेक्ष क्या है—सूर का वात्सल्य और श्रृंगार? मीरा का प्रेम और विद्रोह? या तुलसी का आत्मनिवेदन और आत्मसंघर्ष?’ फिर वे पूछते हैं : ‘क्या यह सब शास्त्र-सापेक्ष और लोक-विमुख है?’ लोक एक ऐसा शब्द है, जिसे सब अपने-अपने हिसाब से प्रयोग करते हैं। लोक का मतलब सिर्फ संसार है, और संसार में शास्त्र-सापेक्ष और शास्त्र-निरपेक्ष सभी लोग होते हैं। लोक-विमुख क्या है? यह इस पर निर्भर करता है कि लोक किस मत के प्रभुत्व में है? जैसे वर्चस्ववादी सत्ता होती है, वैसे ही वर्चस्ववादी लोक भी होता है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि लोक में बहुमत किसका है-- शास्त्र-सापेक्ष लोगों का या शास्त्र-निरपेक्ष लोगों का? जाहिर है कि बहुमत शास्त्र-निरपेक्ष लोगों का नहीं है, बल्कि शास्त्र-सापेक्ष लोगों का है। शास्त्र का मतलब है, आवागमन और वर्णव्यवस्था का सिद्धांत। 
पाण्डेयजी लिखते हैं, ‘वैसे आधुनिक भारतीय भाषाओं के निर्माण और आधुनिक भारतीय साहित्य के विकास में भक्ति आन्दोलन की भूमिका को देखते हुए यह कहना सही नहीं होगा कि वह पूरी तरह विफल हो गया, लेकिन यह भी सच है कि उसका सामाजिक उद्देश्य पूरा न हो सका। भक्ति आन्दोलन के माध्यम से जनसाधारण की जो सामाजिक और सांस्कृतिक आकांक्षाएं प्रकट हुईं थीं, वे अधूरी ही रह गईं।’ (पृष्ठ 49) यहाँ पाण्डेयजी ने निर्गुण-सगुण दोनों को गडमड कर दिया है। प्रश्न है, किसका सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ--निर्गुण का या सगुण का? अगर निर्गुण का सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, तो बात समझ में आती है। वह सच में पूरा नहीं हुआ? क्योंकि, सगुण की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति ने निर्गुण की समतावादी क्रांति को उसी तरह खत्म कर दिया, जिस तरह पुष्यमित्र की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति ने बुद्ध की सामाजिक क्रांति को खत्म कर दिया था। लेकिन पाण्डेयजी अगर यह कहते हैं कि सगुण-भक्ति आन्दोलन का सामाजिक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, तो यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती, क्योंकि सगुण-भक्ति का आन्दोलन विफल नहीं हुआ। वह पूरी सफलता के साथ उत्तरोत्तर आगे बढ़ा, और लोक में ‘मंगल’ के रूप में स्थापित हुआ, जिस पर पंडित रामचन्द्र शुक्ल सबसे अधिक मुग्ध थे। 
पाण्डेयजी यह नहीं मानते कि सगुण आन्दोलन सफल हुआ है, पर उसकी विफलता का कोई प्रमाण भी वे नहीं देते। हालाँकि वे सगुण और निर्गुणधारा के संघर्ष को जानते हैं, पर सगुणधारा को निर्गुणधारा की विफलता का कारण नहीं मानते। वे बहुत ही भोला सा प्रश्न करते हैं, ‘अगर हम यह मान भी लें कि सगुणधारा ने निर्गुणधारा को समाप्त कर दिया, तो हमारे सामने एक और सवाल आ खड़ा होगा कि सगुणधारा को किसने समाप्त किया?’ अब इस भोलेपन का क्या जवाब दिया जाए? जब सगुणधारा समाप्त हुई ही नहीं, अविरल बह रही है, तो यह प्रश्न कहाँ मायने रखता है कि ‘सगुणधारा को किसने समाप्त किया?’ निर्गुणधारा अपने समय में जिस ब्राह्मण और मुल्ला के ख़िलाफ़ युद्धरत थी, वे उस काल के शासक वर्ग थे। शासक वर्ग केवल समाज की सत्ताधारी भौतिक शक्ति ही नहीं होता, बल्कि बौद्धिक शक्ति भी होता है। इस दृष्टि से दोनों तत्कालीन सत्ता के केन्द्र बने हुए थे। तब क्या कोई सोच सकता है कि सत्ता के इस बौद्धिक केन्द्र को निर्गुणधारा की वैचारिक क्रांति से कितना बड़ा खतरा रहा होगा? और इससे निम्नजातीय शूद्र कवियों की जान कितने खतरे में पड़ी होगी? तब किसने किसको खत्म किया होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं है। कमजोर व्यक्ति शब्दों से लड़ता है, और ताकतवर अपने सारे साधनों से लड़ता है। इसलिए, पूरा भक्ति आन्दोलन नहीं, जैसा कि पाण्डेयजी कहते हैं, बल्कि सिर्फ निर्गुण आन्दोलन सामंती और ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था के विरुद्ध खडा हुआ था। और उसी ने ‘अभिव्यक्ति के खतरे’ उठाए थे। उस अभिव्यक्ति में आग थी, जिसने ब्राह्मणवाद के मार्ग में अंगार बिखेर दिए थे। इसलिए निर्गुण को विफल होना ही था, क्योंकि वह शासित जातियों का आन्दोलन था, और वह जिसके विरुद्ध खड़ा हुआ था, वह ताकतवर शासक वर्ग था। लेकिन पाण्डेयजी का कहना है कि ‘केवल साहित्य के सहारे समाज को बदलने की आकांक्षा का अंत प्राय: असफलता में होता है।’ (पृष्ठ 50) कम-से-कम मैं तो यह सिद्धांत नहीं मानता। यह तो साहित्य की भूमिका को ही नकारना हुआ। क्या भक्ति-साहित्य ने समाज को नहीं बदला? क्या रामचरितमानस ने हिन्दू जनता पर कोई प्रभाव नहीं डाला? क्या ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने लाखों लोगों को ‘आर्यसमाजी’ नहीं बनाया? क्या जोतिबा फुले और डा. आंबेडकर के साहित्य ने दलित वर्गों में क्रांति नहीं की? अगर निर्गुण-काव्य ने निम्न वर्गों पर गहरा प्रभाव न डाला होता, तो क्या वह ब्राह्मणवाद के लिए खतरा बनता? क्या तुलसीदास और सूरदास उसका खंडन करते? लेकिन तथ्य यह भी है कि जिस पौधे को खाद-पानी नहीं मिलता है, वह मर जाता है। इसी तरह वे विचार भी मर जाते हैं, जिनका प्रचार नहीं किया जाता है। विचार वही अमर होते हैं, जिनको अमर बनाने के लिए पाला-पोसा जाता है। निर्गुण को वह खाद-पानी नहीं मिला, जो सगुण को मिला। सगुण-दर्शन शासक वर्ग के हित में था, इसलिए शासक वर्ग ने उसे सारे साधनों से पाला-पोसा।
अध्याय के अंत में पाण्डेयजी ने लिखा है कि ‘कबीर ने जीवन-भर जिन धार्मिक और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया, उन्हीं में कबीर को कैद करने की कोशिश कबीरपंथियों ने की है।’ पाण्डेयजी, यही तो प्रतिक्रांति है, जो ब्राह्मणों ने ‘कबीर-पंथ’ बनाकर की। कबीर चौरा (बनारस) और छत्तीसगढ़ के मठ किसने बनाए? वे कबीर के निम्नजातीय अनुयायियों ने नहीं बनाए, बल्कि द्विजों ने बनाए। बनारस का मठ वहाँ के राजा चेत सिंह ने बनाया था, और वे ही उसके आजीवन संरक्षक रहे थे। उस मठ के सभी महंत ब्राह्मण रहे। इसी तरह छत्तीसगढ़ मठ का निर्माण वैश्य जाति के धर्मदास ने कराया था, जिसकी गुरु गद्दी उसके वंश के पास है। इतनी बड़ी प्रतिक्रांति बगैर धन और ताकत के नहीं हो सकती। मठ कायम करने के लिए धन और संसाधन चाहिए, जो निम्नजातीय अनुयायियों के पास नहीं थे, बल्कि द्विजों के पास थे। द्विजों ने ये मठ निर्गुणधारा का ‘सत्यानाश’ करने के लिए बनाए थे। यह प्रतिक्रांति 17वीं और 18वीं शताब्दी में हुई थी। यानी सूर और तुलसी के काल में निर्गुणधारा अपने पूरे उत्थान पर थी। पाण्डेयजी कहते हैं, “कबीरपंथ में कबीर के विचारों की दुर्गति के इतिहास से साबित होता है कि कोई क्रांतिकारी विचारधारा विरोधियों की आलोचनाओं से नहीं मरती; वह इतिहास-प्रक्रिया से बेखबर अनुयायियों की अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्वाकांक्षा से मरती है।’ नहीं पाण्डेयजी, क्रान्ति की विचारधारा प्रतिक्रांति से मरती है। अगर अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्वाकांक्षा से विचारधारा मरती होती, तो सबसे पहले ब्राह्मणवादी मनु की विचारधारा मरती।
(जुलाई 22, 2020)

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ताज

ताज तेरे लिए इक मजहर-ए-उल्फत ही सही
तुझको इस वादी-ए-रंगी से अक़ीदत ही सही
मेरे महबूब कही और मिलाकर मुझसे।

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबो का गुजर क्या मानी
सब्त जिस राह में हो सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी 

मेरी महबूब ! पस-ए-पर्दा-ए-तशहीर-ए-वफ़ा

तूने सतवत के निशानों को देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक़ मकानों को तो देखा होता।।

साहिर लुधियानवी

गुरुवार, 12 जनवरी 2023

बद्रीनाथ और केदारनाथ वास्तव में एक बौद्ध मठ और विहार हैं

शंकराचार्य ने जो काम नेपाल में किया, वही काम कुमायूं और गढ़वाल में भी किया। उन्होंने बौद्धों को बाहर निकाल दिया और ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया।

डैनियल राईट ने अपनी किताब  "हिस्ट्री ऑफ़ नेपाल"  तथा रिज डेव्हिड्स ने अपनी किताब "बुद्धिस्ट इंडिया" में स्पष्ट तौर पर बताया है कि, केदारनाथ और बद्रीनाथ बौद्ध स्थल है। आदि शंकराचार्य ने सन 820 ईसवी के आसपास केदारनाथ और बद्रीनाथ में स्थित बुद्ध-मूर्तियों को उठाकर नजदीक के जलाशय (नारद कुंड) में फेंक दिया था। केदारनाथ तथा बद्रीनाथ बौद्ध विहारों को शैव मंदिरों में परिवर्तित कर दिया था|  इतना ही नहीं, बल्कि शंकराचार्य ने महाराष्ट्र से जोशी ब्राह्मणों को वहाँ पर बसाया था।

राहुल सांकृत्यायन ने अपनी "मेरी जीवन यात्रा" और  कई अन्य पुस्तकों के केदारनाथ और बद्रीनाथ को बुद्धिस्ट विहार बताया है। 

"मेरी जीवन यात्रा" के भाग 4 में पृष्ठ 40 में राहुल लिखते हैं--"19 मई को निर्वाण दर्शन करना था। सवेरे करीब 7 बजे मैं मंदिर के करीब पहुँच गया। गर्भगृह में नंबूदरी रावल और उनके सहायक डिमरी पुजारी को छोड़ और कोई नही जा सकता, न कोई मूर्ति को हाथ लगा सकता । ......स्नान  कराने के लिए मूर्ति नंगी कर दी गई थी। इसी को निर्वाण दर्शन कहते हैं। मूर्ति काले पत्थर की थी। आंख नाक मुँह लिए एक बड़ा पत्थर का खंड मालूम होता है , किसी ने तराशकर निकाल दिया है। लेकिन इसे तराशा नही कहना चाहिए, शायद हथौड़े से जान-बूझकर तोड़ा गया है या पत्थरो में फेकते यह हिस्सा निकल गया। ..  पद्मासनस्थ मूर्ति के इस हाथ की हथेली पैरो पर थी। मूर्ति पदमानस्थ भूमि स्पर्श मुद्रायुक्त बुद्ध की है, इसमें मुझे कोई संदेह नही। मैंने सारनाथ और अन्य जगह इस तरह की मूर्तियां देखी हैं।  नीचे अलकनंदा के साथ सटे हुए नारद-कुंड में और भी मूर्तियां हैं।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

Democritus और plato

ये जो हँसोड़ तस्वीर दिख रही है यह किसी मशखरे की नही, एक दार्शनिक Democritus की है जिसने आज से कोई 2400 साल पहले एटॉमिक थ्योरी दिया था।

Democritus ग्रीस का एक नगर अब्देरा का रहवासी था और अपनी बात मजाकिया अन्दाज में कहने का हामी था। अपनी गंभीर से गंभीर बात भी यह मजाकिया अंदाज में कह दिया करता था। दरअसल ग्रीस का अब्देरा नगर इसी तरह के लोगो का शहर माना जाता रहा। 
प्राचीन दुनिया और यूनान में यह माना जाता था कि दुनिया चार तत्वों से मिलकर बना है और यह चार तत्व हैं-- आग,पानी, हवा और मिट्टी । 

लेकिन इस हँसोड़ दार्शनिक ने यह मानने से इनकार कर दिया और एक अपनी नई थ्योरी दी।  
उसने बताया कि यदि सेब या किसी अन्य वस्तु को  बेहद छोटे टुकड़े में भी कर दिया जाय तबभी उसका मूल गुण जस का तस रहेगा। यानी कि किसी भी वस्तु या तत्व को बेहद छोटे सूक्ष्म टुकड़े में तोड़ा जा सकता है और यह अंतिम टुकड़ा भी अपने मूल तत्व से अलग नही होगा। उसमे वे सभी गुण होंगे।   उसने इस बेहद सूक्ष्म टुकड़े को a-tomos( अ-टिमोस) कहा। A मतलब "नही" और Tomos का मतलब "जिसे तोड़ा नही जा सकता।"

लेकिन तत्कालीन दार्शनिक प्लेटो ने इसका जबरदस्त विरोध किया और ग्रीस के बौद्धिक समाज मे Democritus को गलत साबित करने पर मजबूर कर दिया। प्लेटो और उसके पहले से प्रचलित सिद्धांत यानी यह "दुनिया मूलतः चार तत्व से बनी है" को ही मान्य सिद्धान्त माना जाता रहा।  आने वाले 2200 सालो तक democritus को किसी ने याद तक नही किया।
लेकिन 1808 में अचानक democritus का सिद्धांत वैज्ञानिक दुनिया मे चर्चा का विषय बन गया। 1766 में एक पशुपालक के घर एक बालक पैदा हुआ जिसका नाम था- John Dalton, 
1808 में जॉन ने पाया कि all matter is made of ATOM और यह एटम अविभाज्य और अविनासी है और दिए गए तत्व के सभी परमाणु द्रव्यमान और गुणों में समान होते हैं।

 प्लेटो ने अपने समकालीन विद्वान दार्शनिक मित्र Democritus को  कभी गंभीरता से नही लिया और उसको गलत साबित करने के लिए जनमानस-धर्म और सत्ता का भरपूर प्रयोग करके उसे गलत साबित तो कर दिया लेकिन 2200 साल प्लेटो अंततः गलत साबित हुए।

एक शे'र याद आ रहा है--

समझे थे हम जो दोस्त तुझे ऐ मियां ग़लत
तेरा नही है जुर्म हमारा गुमाँ ग़लत।

सोवियत में बुद्ध

प्रसिद्ध सोवियत लेखक G.Bongard और A. Vigasin ने अपनी क़िताब The image of india, A study of Ancient Civilizations in the USSR में लिखते हैं--१२ वीं सदी में रूस में  'बर्लाम और जोआसफ़ की कथा'  बहुत लोकप्रिय थी। सुविदित है कि यह कहानी बुद्ध की जीवनी का रूपांतरण है और जोआसफ़ नाम भारतीय शब्द बोधिसत्व से (बुदास्फ रूप के माध्यम से) बना है। ईसवी संवत के आरम्भ में बोधिसत्व की कथा मध्य एशिया में काफी लोकप्रिय थी।

वे आगे लिखते हैं, "  ससानिद वंश के विख्यात राजा नौशेरवां ने बोधिसत्व की कथा को पहलवी भाषा मे अनुवाद कराया था।

कालांतर में पहलवी भाषा मे लिखा गया बर्लाम और जोआसफ़ कि कथा का रूपांतरण कहीं खो गया परंतु इसका अरबी रूपांतरण उपलब्ध है, जो 8 वीं सदी में हुआ था। कालांतर में रूस में जोआसफ़ के बारे में एक सर्वाधिक लोकप्रिय भजन रचा गया। जिसमें बताया गया कि कैसे भारतीय राजा "अवेनीर" के पुत्र ने अंधा, कोढ़ी दंतहीन बूढ़ा देखा और लोगो का दुःख देखकर रोने लगा और स्वयं भिक्षुक बन गया।

1681 में छपे इस कथा के संस्करण के लिए 17वीं सदी के विलक्षण रूसी चित्रकार सिमोन उशाकोव ने उत्कीर्णन चित्र बनाए थे। रूस के शाही थिएटर में सबसे पहले जो कथा मंचित की गई वह जोआसफ़ यानी बोधिसत्व की कथा ही थी।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

कपिलवस्तु

बात तीस साल पहले की है। 1988 में बस्ती जिले के उत्तरी भाग को अलग कर उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थ नगर जिले की स्थापना हुई थी। इसका कारण यह था कि पुरातत्व विभाग ने वास्तविक कपिलवस्तु की पुरातात्विक पहचान कर ली थी और कपिलवस्तु गोतम बुध उर्फ सिद्धार्थ की नगरी थी। इसलिए जिले का सिद्धार्थ नगर नाम इतिहास के प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित है।

आज सिद्धार्थ नगर जिले में जो पिपरहवा है, वही सिद्धार्थ की नगरी कपिलवस्तु है। पिपरहवा की पहली जानकारी एक ब्रिटिश इंजीनियर तथा पिपरहवा क्षेत्र के जमींदार डब्ल्यू. सी. पेपे को मिली थी और वो जमीन पेपे के पास थी।

वो जनवरी का महीना था और 1898 का साल था, जब पिपरहवा में विशाल स्तूप की खोज हुई थी। स्तूप से एक पत्थर का कलश मिला। कलश पर ब्राह्मी में अभिलेख था, जिस पर लिखा था - सलिल निधने बुधस भगवते अर्थात अस्थि - पात्र भगवत बुध का है। 19 जनवरी, 1898 को डब्ल्यू. सी. पेपे ने नोट बनाकर इस अभिलेख को समझने के लिए वी. ए. स्मिथ को भेजा था। पहली तस्वीर पिपरहवा के विशाल स्तूप की है और दूसरी तस्वीर में वो अभिलेखित कलश है।

दिन, महीने, साल बीते। बात 1970 के दशक की है। पुरातत्व विभाग ने पिपरहवा की क्रमबद्ध खुदाई कराई। फिर तो विशाल स्तूप के अगल - बगल चारों ओर पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में अनेक संघाराम मिले। पूर्वी संघाराम, पश्चिमी संघाराम, उत्तरी संघाराम, दक्षिणी संघाराम इसे तस्वीरों में आप देख सकते हैं। पूरा पिपरहवा संघारामों से पटा हुआ था। यह कपिलवस्तु का धार्मिक - शैक्षणिक क्षेत्र था।

यह कपिलवस्तु है और वास्तविक कपिलवस्तु है। इसका पुरातात्विक प्रमाण भी मिल गया। खुदाई में मिली मिट्टी की मुहरों पर लिखा है कि कपिलवस्तु का विहार यही है। आप उन मिट्टी की मुहरों को तस्वीर में देख सकते हैं। कहीं कपिलवस्तु और कहीं महा कपिलवस्तु लिखा है।

आप देख रहे हैं कि पिपरहवा का क्षेत्र विहारों, स्तूपों से भरा है तो फिर कपिलवस्तु के लोग कहाँ रहते थे? बस पिपरहवा से कोई 1 कि. मी. की दूरी पर गनवरिया है। यह कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था। यहीं गणराज्य के लोग रहते थे। आखिरी तस्वीर उसी गनवरिया की आवासीय संरचना की है।

पिपरहवा जो कपिलवस्तु का धार्मिक क्षेत्र था, बोधिवृक्ष पीपल नाम को सार्थक करता है और गनवरिया जो कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था, गण नाम को सार्थक करता है। यह पूरबी बोली के नाम हैं, जिसमें " ल " का उच्चारण " र " और " ण " का उच्चारण " न " होता है। इसीलिए पीपल / पीपर से पिपरहवा/ पिपरिया संबंधित है और ( शाक्य ) गण / गन से गनवरिया संबंधित है। .. RP Singh

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

हिंदुओ में क्या बाल विवाह मध्यकाल में आरंभ हुआ ????

 हिंदुओं में लड़कियों के बाल विवाह का आरंभ क्या मध्यकाल में हुआ?

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हमें यही बताया जाता रहा है कि हिंदुओं में लड़कियों का बाल-विवाह मुसलमान आक्रांताओं के भय से मध्यकाल में आरंभ हुआ। यह मान्यता घृणा के कारण गढ़े गए अनेक ‘मिथकों’ में से एक है; क्योंकि हमारे शास्त्र दूसरी ही बात कहते हैं।

विवाह के मुख्य रूप से तीन उद्देश्य बताए गए हैं: घरेलू बलि अनुष्ठान कर्मों के माध्यम से धर्म का उन्नयन; संतानोत्पत्ति से वंशवृद्धि एवं मृत्योपरांत पूर्वजों के सुखमय जीवन की सुनिश्चितता; और रतिसुख। 

आदि काल में सामान्य रूप से स्त्रियों की शादी वयस्क होने के बाद हुआ करती थी। आरंभिक वैदिक काल में शादी के बाद भी वे स्वतंत्र थीं। ऋग्वेद में यदि पति जुआरी और नशेड़ी हो तो पत्नी को उसे छोड़कर किसी दूसरे पुरुष के पास चले जाने का उदाहरण मिलता है। इसके अलावा इसमें पति के मरने के बाद पत्नी के सामान्य जीवन बिताने की आजादी का भी उल्लेख है।

बाद में परिस्थियाँ बदल जाती हैं। स्मृतियों में वर की न्यूनतम आयु 20 और वधू की वय:संधि (10-14) से तुरत पहले की आयु बताई गई है। कट्टरपंथी वर्ग का संतानप्रेम कितना बढ़ गया था, उसे बौधायन सूत्र (संकलन काल – 800-600 ईसा पूर्व) में निहित इस घोषणा से समझा जा सकता है- जो पिता अपनी बच्ची का विवाह रज:स्राव से पहले नहीं करेगा, वह भ्रूण-हत्या (हत्या से भी बड़े अपराध) का भागी होगा और जब तक उसका विवाह नहीं कर दिया जाता, हर रज:स्राव के बाद उसके इस अपराध की संख्या बढ़ती जाएगी। 

यह आम धारणा थी कि विवाह के समय वधू की उम्र वर की उम्र से एक तिहाई हो तो वह आदर्श विवाह है; अर्थात 24 साल के वर को आठ साल की ‘स्त्री’ से विवाह करना चाहिए। (मनुस्मृति, अध्याय-8, श्लोक-93)। इसी अध्याय के एक श्लोक (89) में यह भी है कि ऋतुमती होने के तीन वर्षों तक पिता द्वारा उसके लिए वर निश्चित करने की प्रतीक्षा करे; किंतु इस अवधि में पिता के सफल न होने पर लड़की स्वयं अपने लिए योग्य व्यक्ति से विवाह कर ले।

वाल्मीकि रामायण में विवाह के समय सीता की आयु को लेकर चार बार में दो किस्म की बातें कही गई हैं। पहली बार बालकांड में जनक विश्वामित्र से कहते हैं, ‘भूतल से प्रकट हुई वह कन्या क्रमश: बढ़कर सयानी हुई’ (भूतलादुत्थितां सा तु व्यवर्धत ममात्मजा)। अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह दृढ़ निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका व्याह करूँगा। ….दिनों-दिन बढ़ने वाली पुत्री को कई राजाओं ने आकर माँगा। परंतु …वे लोग शिवजी का धनुष हिलाने में समर्थ नहीं हो सके। … यही कारण है कि मैंने आज तक किसी को अपनी कन्या नहीं दी।’(सर्ग- 66)। 

स्पष्ट है कि सीता के सयानी होने के (एक-दो साल) बाद ही धनुष तोड़ने पर राम से विवाह हुआ होगा। 

दूसरी बार, अयोध्याकांड के अंतिम दो सर्गों में अत्रि के आश्रम में सीता-अनसूया संवाद में सीता का कथन है, ‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गई, तब वे बड़ी चिंता में पड़ गए’ (पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता)। 

तीसरी बार ब्राह्मण अतिथि बनकर आए रावण के पूछने पर सीता अपना परिचय देते हुए कहती हैं, ‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी (महाराज दशरथ) के महल में पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं।….. (राम के अभिषेक के समय) मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था पचीस साल से ऊपर थी और मेरे जन्मकाल से लेकर वनगमन-काल तक मेरी अवस्था वर्षगणना के अनुसार अठारह साल की हो गई थी (अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते)। (अरण्यकांड, सर्ग 47, श्लोक 9-10)। 

इस कथन के अनुसार विवाह के समय सीता की अवस्था छह साल की थी।

चौथी बार का प्रसंग युद्धकांड का है जब राम सीता के चरित्र पर लांछन लगाते हुए उन्हें अस्वीकार कर के अन्यत्र चले जाने को कहते हैं। राम के आरोप भरे कड़वे कथन के उत्तर में सीता कहती हैं कि ‘बाल्यावस्था में आपने मेरा पाणिग्रहण किया है, इसकी ओर भी ध्यान नहीं दिया। आपके प्रति मेरे हृदय में जो भक्ति है और मुझमें जो शील है, वह सब आपने एक साथ भुला दिया (न प्रमाणीकृत: पाणिर्बाल्ये मम निपीडित:। मम भक्तिश्च शीलं च सर्वं ते पृष्ठत: कृतम्॥) यदि युद्धकांड में दुखी सीता की राम के सम्मुख कही गई बात को सत्य मानें तो उनका विवाह बाल्यकाल में हो गया था।

बाल-विवाह में वृद्धि के लिए कोई ठोस कारण नहीं मिलते। कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमानों के डर से माता-पिता अपनी पुत्रियों का विवाह बचपन में कर दिया करते थे और अपनी पत्नियों को घर में बंद कर दिया करते थे। किंतु ऊपर के दृष्टांतों से स्पष्ट है कि ये दोनों प्रथाएँ पहले से मौजूद थीं। अत: इसे कारण मानना उचित नहीं जान पड़ता। 

‘धार्मिक आग्रह (संतानोत्पत्ति की जरूरत) हमेशा से रहा है। शास्त्रों के अनुसार कामुकता ने भी अपनी भूमिका निभाई हो सकती है। स्त्री को प्राकृतिक रूप से कामुक माना जाता था। एक अविवाहित लड़की युवारंभ होने के साथ ही अपना प्रेमी ढूंढ़ने लगेगी, यह डर माता-पिता को लगा रहता था। हालाँकि माता-पिता उसकी कठोरतापूर्व रखवाली करते थे, किंतु अगर एक बार कौमार्य भंग हो जाय तो उसका विवाह होना असंभव होगा और माता-पिता को उसका भरण-पोषण का भार वहन करना पड़ेगा तथा अपमान झेलना होगा, यह डर लगा रहता था। माता-पिता के लिए लड़की उनके लिए भार समान थी।’ (ए एल बाशम, The Wonder, that was India, पेज-168)। 

अनसूया से सीता ने आगे जो कहा था, उसे इसके प्रमाण में उद्धृत किया जा सकता है कि लड़की भार के समान थी, ‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गई, तब इसके लिए वे चिंता में पड़ गए। जैसे कमाए हुए धन का नाश हो जाने से निर्धन मनुष्य को बड़ा दुख होता है, उसी प्रकार मेरे विवाह की चिंता से वे बड़े दुखी हुए। संसार में कन्या के पिता को, वह भूतल पर इंद्र के ही तुल्य क्यों न हो, वर पक्ष के लोगों से, वे अपने समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों, प्राय: अपमान उठाना पड़ता है।’ 

**नारायण सिंह

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

शब्दो की आवाजाही

मौर्यों का जमाना था। भारत और यूनान के बीच आवाजाही थी। तब ग्रीक और प्राकृत शब्दों का मेलजोल भी था।

ग्रीक में एक शब्द " एंड्रो - दमस " ( Andro - Damas ) का प्रचलन है। एंड्रो - दमस में दो शब्दों का मेलजोल है। एंड्रो ग्रीक का और दमस प्राकृत का शब्द है। ग्रीक में एंड्रो का अर्थ पुरुष तथा प्राकृत में दमस का अर्थ जीतने वाला होता है। एंड्रो - दमस का अर्थ " जीतने वाला पुरुष " हुआ।

चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रो - कोट्टस ( Andro- Cottus ) क्यों कहा जाता है?

एंड्रो - कोट्टस में दो शब्दों का मेलजोल है। एंड्रो ग्रीक का और कोट्टस प्राकृत का शब्द है। ग्रीक में एंड्रो का अर्थ पुरुष तथा प्राकृत में कोट्टस का अर्थ किले वाला होता है। एंड्रो - कोट्टस का अर्थ " किले वाला पुरुष " हुआ।

चंद्रगुप्त मौर्य को यूनानियों ने " किला - पुरुष " यूँ ही नहीं कहा है। पाटलिपुत्र की किलेबंदी ऐसी कि पक्षी भी पर नहीं मार सके। किलेबंदी को देखकर मेगस्थनीज चकित थे।

मेगस्थनीज ने लिखा कि पाटलिपुत्र की किलेबंदी ऐसी कि नगर के चारों ओर मोटी लकड़ी की दीवार थी। दीवार के बीच - बीच में मोर्चे बने थे और चारों ओर 60 फीट गहरी एवं 600 फीट चौड़ी खाई थी। दीवार में 64 दरवाजे तथा 570 बुर्ज थे।

क्लियोपेट्रा








 

मंगलवार, 23 नवंबर 2021

आर्यो का घोड़ा

 आर्यों के घोड़े

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क्या सिंधु घाटी सभ्यता के लोग घोड़ों के बारे में जानते थे?


ऊपर से देखने पर यह बड़ा साधारण-सा सवाल मालूम होता है। इसके राजनैतिक आशयों से अपरिचित कोई भी व्यक्ति यही कह बैठेगा कि शायद हाँ या शायद ना लेकिन आख़िर इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है? किंतु एक बहुत महत्वपूर्ण समीकरण इधर इससे जुड़ गया है। भारत में जाति का चिंतन सामुदायिक रूप से केंद्रीय महत्व का रहा है, किंतु जबसे जाति राजनीतिक पूँजी बनी है, सिंधु सभ्यता के घोड़ों का प्रश्न विस्फोटक सम्भावनाओं से भर गया है।


कारण यह कि सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त होने वाली मुहरों, सीलों और शिल्प में कहीं भी अश्वों के दर्शन नहीं होते, जबकि उस सभ्यता ने वृषभों और महिषों का विपुल-चित्रण किया है। इसके समक्ष फिर ऋग्वेद की ऋचाएँ हैं, जो अश्वों के वर्णनों से भरी पड़ी हैं। वास्तव में घोड़ा वैदिक सभ्यता का महत्वपूर्ण पशु था, जबकि सिंधु सभ्यता में बैल और सांड़ अधिक लोकप्रिय थे, वहीं टोटेम के रूप में एकशृंगी (यूनिकॉर्न) को सर्वाधिक चित्रित किया जाता था। जिन लोगों की रुचि यह सिद्ध करने में है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वैदिक सभ्यता के लोगों से भिन्न थे, वो इसे विभेद के एक महत्वपूर्ण बिंदु की तरह प्रस्तुत करते हैं। इसमें आगे वो यह जोड़ देते हैं कि जब आर्य यूरेशिया या मध्येशिया से अपने घोड़ों या अश्व-जुते रथों पर सवार होकर आए तो उन्होंने अपनी गति, वेग और आक्रामकता से सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को हतप्रभ कर दिया और उन्हें तितर-बितर हो जाने पर विवश कर दिया। यह आर्य-इन्वेशन थ्योरी कहलाती है। यह नई स्थापना नहीं है, किंतु इधर इसके ध्वजवाहक श्री टोनी जोसेफ़ बन गए हैं, जिन्होंने 'अर्ली इंडियंस' शीर्षक से एक पुस्तक लिखकर इस थ्योरी के पक्ष में नए डीएनए-आधारित तर्क दिए हैं।


दूसरी तरफ़ वे हैं, जो मानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग ही आर्य या वैदिक थे, सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता के बीच कोई विभेद या अंतराल नहीं है और इतना ही नहीं, वास्तव में कालक्रम में वैदिक संस्कृति सिंधु सभ्यता से पहले ही अस्तित्व में आ चुकी थी। वो इस प्रश्न का सामना नहीं करना चाहते कि अगर ऐसा था तो बीसवीं सदी में मोहेंजोदारो व अन्य नगरों के उत्खनन से पहले तक सिंधु घाटी सभ्यता भारत की पौराणिक-स्मृति से पूरी तरह से विलुप्त क्यों थी? यह घोड़ों वाला तर्क भी उन्हें दुविधा में डालता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों के पास से घोड़ों की कोई भी सूचना क्यों बरामद नहीं होती। यही कारण था कि जब उत्तरप्रदेश के बागपत ज़िले में गंगाघाटी के गांव सनौली से 4000 वर्ष पुराने तीन रथ उत्खनन में प्राप्त हुए तो हड़प्पा सभ्यता को आर्य-सभ्यता मानने वालों में हर्ष की लहर दौड़ गई। उनका यह मानना है कि सनौली सिंधु घाटी सभ्यता का पुरातात्विक केंद्र था और वहाँ से रथ का मिलना यह सिद्ध करता है कि हड़प्पा संस्कृति के लोग घोड़ों से सर्वथा अपरिचित नहीं थे। सनौली के रथ उन्हें विजयरथ सरीखे प्रतीत हुए हैं। आर्य-इन्वेशन थ्योरी के प्रतिपादकों ने अपने बचाव में इतना भर कहा है कि इन रथों के वाहक बैल भी हो सकते थे।


श्री भगवान सिंह ने अपनी पुस्तक 'हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य' में बलपूर्वक यह कहा है कि घोड़ा हड़प्पावासियों के लिए अपरिचित नहीं था। वैसा उन्होंने हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त घोड़ों की अस्थियों के आधार पर कहा है। इसकी काट में टोनी जोसेफ़ ने 'अर्ली इंडियंस' में तर्क दिया है कि हड़प्पा के लोग जब मेसापोटामिया को हाथी, भैंसे, मोर का निर्यात करते थे तो बदले में कदाचित् उन्होंने घोड़ों का आयात भी किया होगा- किंतु घोड़े की जो केंद्रीय भूमिका वैदिक सभ्यता में है, उसका लेशमात्र भी हड़प्पा सभ्यता में नहीं है। टोनी जोसेफ़ के अनुसार भारत में पालतू घोड़ों की बहुतायत ईसा पूर्व 1900 के आसपास देखी जाती है, जो कि परवर्ती-हड़प्पा कालखण्ड है और वेद हड़प्पा काल के बाद रचे गए थे। उधर श्री भगवान सिंह एक रोचक स्थापना देते हैं। वे कहते हैं कि वैदिक जनों ने अश्व से पहले गर्दभ को पालतू बनाया था और आरम्भ में गर्दभ को ही अश्व कहा जाता था। अश्विनीकुमारों का वाहन इसीलिए गर्दभ है। गर्दभ के लिए अंग्रेज़ी का शब्द 'ऐस' भी 'अश्व' का अपभ्रंश उन्होंने माना है और प्रकारान्तर से जेंद भाषा के 'अस्प', लातीन के 'एकुअस', ग्रीक के 'इप्पोस' और अंग्रेज़ी के 'हॉर्स'- सभी की उत्पत्ति अश्व से ही स्वीकारी है। 'इन सर्च ऑफ़ द क्रैडल ऑफ़ सिविलाइज़ेशन' नामक एक अन्य पुस्तक- जो आर्य-इन्वेशन सिद्धांत का विरोध करती है- की लेखक-त्रयी फ्रॉले-फ़्यूरष्टाइन-काक ने कहा है कि अव्वल तो भारत में पुरा-पाषाण गुफाओं में घोड़े के भित्तिचित्र पाए गए हैं। दूसरे उन्होंने पूछा है कि भला कौन-सी यायावर जाति रथों पर सवार होकर किसी सभ्यता पर आक्रमण करती है? रथ तो नागरिक-सभ्यता का वाहन हैं, बंजारों की गाड़ी नहीं है। यानी प्राचीन भारतीय इतिहास में घोड़ों की भूमिका को लेकर यह एक बहुत ही मज़ेदार बहस चल रही है।


भारत में जाति का प्रश्न अब मनोवैज्ञानिक महत्व का बन गया है, क्योंकि जो भारत का मूलनिवासी होगा, उसी का देश के संसाधनों पर पहला अधिकार होगा- यह अनकही धारणा चुपचाप सामूहिक अवचेतन में रोप दी गई है। आर्य-द्रविड़ या सवर्ण-दलित द्वैत के मूल में भी अब वर्चस्व का युद्ध आ गया है। यही कारण है कि दलित-चिंतकों ने धोलावीरा को यूनेस्को द्वारा विश्व-धरोहर स्वीकारे जाने की व्याख्या द्रविड़ों की श्रेष्ठता के उद्‌घोष की तरह की है, क्योंकि वो सिंधु घाटी को अनार्य-सभ्यता की तरह देखते हैं। वहीं सवर्ण-गौरव के प्रवक्ताओं ने इसे वैदिक संस्कृति के सातत्य में देखते हुए गर्व से सीना फुलाया है। जो इस युद्ध से चकित किंतु तटस्थ या कदाचित् निर्लिप्त हैं- जैसे कि इन पंक्तियों का लेखक- वो नेपथ्य में खड़े होकर यह सब देख रहे हैं और मन ही मन सोच रहे हैं कि आज से चार या पाँच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे कौन थे, और कहाँ से आए थे, उससे अब आख़िरकार हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ना है? हममें से बहुतेरों को तो यही नहीं पता कि आज से पाँच या छह पीढ़ी पहले या अठारहवीं या उन्नीसवीं सदी में हमारे पुरखे क्या कर रहे थे, किन लोगों से उनका मेल-मिलाप था, रक्त में कब-कहाँ-कैसे मिलावट हुई। यह रक्त की शुद्धता का विचार हमारे देश की बड़ी बुराइयों में से है कि चाहे जो हो जाए, रक्त की मिलावट नहीं होनी चाहिए और जातियों की यथास्थिति (जिसे अंतर्जातीय विवाह-सम्बंधों से चुनौती मिलती है) बनी रहनी चाहिए। 


जबकि अंतिम निष्कर्ष में तो आज समूची पृथ्वी की मनुष्य-जाति जिस सेपियंस-वर्ग से ताल्लुक़ रखती है, उनका उदय निर्विवाद रूप से पूर्वी-अफ्रीका में दो लाख साल पहले हुआ था। इससे तीनेक लाख साल पहले यूरोप और मध्येशिया में निएंडरथल्स विकसित हुए थे। आज जब भारत में आर्य-द्रविड़ का प्रश्न ज्वलंत बना हुआ है, तब संसार में सेपियंस-निएंडरथल-द्वैत चर्चाओं के दायरे में है- जो कि देखा जाए तो एक अधिक व्यापक-महत्व का प्रश्न है। इसकी निष्पत्ति यह है कि सेपियंस ने कोई 30 हज़ार साल पहले निएंडरथल्स का भले सर्वनाश कर दिया था, लेकिन इन दोनों जातियों के बीच क्रॉस-ब्रीडिंग हुई थी और आज भी दुनिया के ग़ैर-अफ्रीकी मनुष्यों में 1 से 4 प्रतिशत तक निएंडरथल-जीनोम पाए जाते हैं। यानी हममें से बहुतों के पैतृक या मातृकाएँ कदाचित् निएंडरथल रहे होंगे। लेकिन बात वही है कि इससे भी आज क्या फ़र्क़ पड़ता है। दुनिया तो आगे की तरफ़ देख रही है और होमो सेपियंस के बजाय होमो देअस की बात कर रही है। आने वाले सौ सालों में पृथ्वी पर मनुष्य-जाति का अस्तित्व रहेगा या नहीं और रहेगा तो किस रूप में- आज के समय का सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है।


भारत के मूलनिवासी कौन थे- इस प्रश्न का अकादमिक महत्व अलबत्ता तब भी यथावत रहेगा- प्रबुद्ध जिज्ञासुजन इस बारे में सच्चाई जानना चाहेंगे। फ़र्क़ यही है कि सिंधु घाटी सभ्यता के वैदिक सिद्ध होने से वो ना गर्व से भर उठेंगे और ना ही उसके अनार्य सिद्ध होने से वे लज्जा से चेहरा लाल कर बैठेंगे या अपमानित महसूस करेंगे (जैसा कि राखीगढ़ी से प्राप्त एक कंकाल की डीएनए-जाँच से प्राप्त साक्ष्यों के द्वारा संकेत किया गया था कि उसमें द्रविड़-जीन्स की बहुलता है, बनिस्बत यूरेशियन-जीन्स के- इस पर इंडिया टुडे द्वारा एक आमुख कथा प्रस्तुत की गई थी)। वास्तव में, ना इसमें गौरव करने जैसा कुछ है, ना लज्जित होने जैसा कुछ है- क्योंकि सभ्यताओं की यात्राएँ मिश्रित-रक्त की यात्राएँ हैं, और किसी का भी ख़ून सौ फ़ीसद शुद्ध नहीं होता। कह लीजिये कि सभ्यताएँ गतिशील होती हैं- अश्वों की तरह!






सोमवार, 1 नवंबर 2021

संस्कृत प्राचीन भाषा नही है।

 जैसा कि मैंने कहा कि संस्कृत एक भाषा के रूप में ईसा के बाद अस्तित्व में आई है।


आइए, इसे शिलालेखों से सिलसिलेवार जाँच करें।


इस सिलसिले में हमें सबसे पहले गांधार क्षेत्र में मौजूद तीसरी शती ई. पू. के शाहबाजगढ़ी शिलालेख का अध्ययन करना चाहिए।


सम्राट अशोक के शिलालेखों में जो " धम्म " है, वही शाहबाजगढ़ी में " ध्रम " है, यही ईसा के बाद रुद्रदामन के शिलालेख में संस्कृत का " धर्म " हो गया है।


सम्राट अशोक के शिलालेखों में जो " पियदसि " है, वही शाहबाजगढ़ी में " प्रियद्रशि " है, यही ईसा के बाद वाल्मीकि रामायण में " प्रियदर्शी " हो गया है।


अशोक के शिलालेख तीसरी शती ई. पू. के हैं। अब हमें दूसरी शती ई. पू. के शिलालेखों का अध्ययन करना चाहिए। इसके लिए हम बेसनगर का गरुड़ध्वज अभिलेख को लेते हैं। यह अभिलेख प्राकृत मिश्रित संस्कृत में है, जिसमें संस्कृत तत्व कम हैं। इस अभिलेख की अंतिम पंक्ति है - नेयंति दम - चाग अप्रमाद। यही वाक्यांश ईसा के बाद महाभारत में संस्कृत का " दमस्त्यागोप्रमादश्च " ( 5/43/23 ) हो गया है।


दूसरी शती ई. पू. के बाद हमें प्रथम शती का शिलालेख देखना चाहिए। इसके लिए हमें धन का अयोध्या अभिलेख की जाँच करनी चाहिए। यह अभिलेख भी प्राकृत और संस्कृत का मिश्रण है जैसे कि इसमें संस्कृत नियमानुसार " पुष्यमित्रात् " होना चाहिए, किंतु प्राकृत के  कारण " पुष्यमित्रस्य " लिखा है।


अभी तक ईसा से पहले के जितने भी शिलालेखों का अध्ययन किया गया, सभी प्रमाणित करते हैं कि ईसा से पहले बतौर भाषा संस्कृत का एक भी शिलालेख नहीं है, सभी प्राकृत के हैं और कुछ - कुछ  पिजिन संस्कृत जैसे हैं।


अब आइए, ईसा के बाद का रुद्रदामन के शिलालेख का अध्ययन करते हैं। इसमें बतौर भाषा संस्कृत मौजूद है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि बतौर भाषा संस्कृत का अस्तित्व ईसा से पहले नहीं था।


हमारे यहाँ उल्टा खूब चलता है। भाषावैज्ञानिकों ने बगैर सोचे - समझे बता दिए हैं कि ईसा के पूर्व के कुछ शिलालेख संस्कृत से प्रभावित हैं। दरअसल वे शिलालेख संस्कृत से प्रभावित नहीं हैं। ईसा से पहले संस्कृत भाषा थी ही नहीं, फिर प्रभावित होने की बात ही गलत है। सही बात यह है कि वह प्राचीन ईरानी और प्राकृत के मिश्रण से निर्माणाधीन थी, जिसे हम पिजिन संस्कृत कह रहे हैं।


आप ध्यान दीजिए ईसा के प्रथम शती और उसके कुछ आगे की भाषा को मिश्रित संस्कृत का काल कहा जाता है। इस मिश्रित संस्कृत में अनेक बौद्ध ग्रंथ लिखे गए जैसे ललितविस्तर, दिव्यावदान, अवदान शतक, लंकावतार, महावस्तु आदि। इनमें प्राकृत और संस्कृत का मिश्रण है। मगर भाषा मूलतः प्राकृत है, संस्कृत छौंक के रूप में है जैसे पुष्पेहि में प्रातिपदिक संस्कृत जैसा है, मगर विभक्ति प्राकृत जैसी है।


आप आसानी से निष्कर्ष दे सकते हैं कि जिसे हम मिश्रित संस्कृत कहते हैं, वह वस्तुतः मिश्रित प्राकृत है। यदि कालिदास ने नाटकों में निम्न वर्ग से प्राकृत और उच्च वर्ग से संस्कृत में संवाद समायोजित किए हैं तो यह कोई आश्चर्य नहीं।

Rajendra prasad sungh

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

ऋग्वेद और आर्य

 एसी. दास ने ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लिखा है कि आर्यों का मूल निवास ‘सप्तसिंधु'

या ‘पंजाब` में था। कुछ लोग जो आर्यों को बाहर से आया मानते हैं, वे भी बताते हैं ये लोग प्रथमत: सप्तसिंधु प्रदेश में बसे थे। एक संगत अनुमान यह है कि ऋग्वेद के अधिकांश भाग की रचना लगभग १५००-१२०० ई. पू. के बीच पंजाब में हुई, अथवा कम-से-कम इसमें उल्लिखित घटनाएं इस काल की हैं।१ पर पुरातात्त्विक साक्ष्य इसके समर्थन में नहीं हैं। गैरिक मृद्भांड की संस्कृति (ओ.सी.पी.) ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खाती है। इसका सबसे मोटा जमाव हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर अवस्थित जोधपुरा में देखा गया है। बावजूद इसके, इसे ऋग्वेदकालीन लोगों की कृति मानने में कई कठिनाईयां हैं। यह भी कि इस संस्कृति के आज तक ज्ञात लगभग एक सौ से अधिक स्थानों में से बहुत कम ही सप्तसैंधव क्षेत्र में हैं जो कि ऋग्वैदिक सभ्यता का केंद्र था। अधिकांशत: ये स्थल गंगा - यमुना दोआब में केंद्रित हैं।२ प्रत्येक नयी पुरातात्त्विक संस्कृति की खोज के साथ उसे ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से जोड़ने की होड़ लग जाती है, पर कोई भी पुरावशेष ऐसा कर नहीं पाता है। कुछ ऐसा ही असमीकरण ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से काले एवं लाल मृद्भांड की संस्कृति का भी है। ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खानेवाली तीसरी संस्कृति ताम्र निधियों की है जिसमें से लगभग आधी गंगा - यमुना दोआब में केंद्रित हैं। सप्तसिंधु से इनका भी वास्ता नगण्य है। इनका वास्ता पूरब में बंगाल और उड़ीसा से है, दक्षिण में आंध्र प्रदेश से है तथा पश्चिम में गुजरात और हरियाणा से है जबकि ऋग्वैदिक लोग पूरब में बंगाल और उड़ीसा तक पहुंचे भी नहीं थे। कुल मिलाकर ऋग्वैदिक जनों की पुरातात्त्विक पहचान की समस्या को सुलझाना कठिन है।३ अब जबकि पुरातात्त्विक साक्ष्य के मूल्य पर महाभारत और रामायण में प्रतिबिंबित ‘महाकाव्य युग` (एपिक एज) की कपोलकल्पित धारणा त्यागी जा रही है, तब क्यों और किस आधार पर आज भी इस कालखंड को भारतीय इतिहास में ‘ऋग्वैदिक इंडिया` कहा जाता है जबकि ‘ताम्र-पाषाण युग` की अवधारणा सर्वाधिक निरापद है।

२.

ऐसी कल्पना कुछ लोगों की है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में वस्तु-विनियम मुख्य था, पर सोनेे-चांदी के सिक्के भी थे। सोने के सिक्के ‘निष्क` कहे जाते थे। सातवलेकर ने ‘निष्क` का अनुवाद, सोने के सिक्के किया है जो सही मालूम होता है।४ चांदी के सिक्के ‘रजत` हो सकते हैं।५ यदि यह कल्पना ठीक है तो सवाल है कि ऋग्वेद में वर्णित सोने और चांदी के ये सिक्के किस कालखंड के हैं? भारत में प्राप्त सिक्के तो ईसा  पूर्व छठी सदी से पहले के नहीं हैं। धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिले हैं। आरंभ में सिक्के प्राय: चांदी के होते थे, हालांकि कुछ तांबे के भी मिले हैं। ये सिक्के आहत मुद्राएँ कहलाते हैं। सोने के सिक्के भारत में सबसे पहले हिंद - यूनानियों ने जारी किए।६ यदि ऊपर के वर्णन से सिक्के का इतिहास ग्रहण किया जाय तो साफ होगा कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कुछ चीजें बुद्ध और मौर्योत्तर काल में दिखाई पड़ती हैं। फिर ‘ऋग्वैदिक इंडिया` इसके पहले कब और कहां था? दावा तो यह भी है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लौह-प्रौद्योगिकी का ज्ञान था। ऐसा कि ऋग्वैदिक जनों ने एक महिला के कटे हुए पैरों की जगह लोहे की जांघ लगा दी थी७ जबकि इतिहास गवाह है कि लोहे का ज्ञान पाकिस्तान के गंधार क्षेत्र में १००० ई. पू. के आसपास हुआ था।८ बताया यह भी जाता है कि ऋग्वेद में अकेले कुएं के तेरह पर्याय आये हैं। यह भी कि अश्मचक्र (१०.१०१.७) पत्थर के घेरेवाले पक्के कुएं थे।९ पर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि घेरेदार कुएं सबसे पहले मौर्यकाल में गंगा घाटी में प्रकट हुए थे।१० तब क्या यह माना जाय कि ऋग्वेद में जिस ‘अश्मचक्र` की चर्चा है, वह मौर्यकालीन है? यदि नहीं तो आखिर वे कौन-से इंद्रवादी थे जिन्होंने बाद में कुएं को ‘मृग-हस्तिन` (हाथवाले पशु) की तरह जिज्ञासा से ‘इंद्रागार` (वर्षा के देवता इंद्र का घर) कहा था और जिनके देवता ‘इंद्रासन` कुएं में वास करते थे? यह भी कि यदि ऋग्वेद के सभी कूपवाची शब्द तरल हैं तो फिर ऐसे लचीले और बहुरूपिए शब्दों से इतिहास का निर्माण नहीं हो सकता है। कारण कि इतिहास ठोस तथ्यों और प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर लिखा जाता है।

३.

ऋग्वेद की सर्वाधिक चर्चा पुराणों में है।११ ये सभी के सभी अति प्राचीन होने का दावा करते हैं, परन्तु इनकी रचना या पुनर्रचना छठी से बारहवीं सदी के बीच हुई है।१२ प्राचीन काल के ये सभी पुराण मिथकों, आख्यानों और प्रवचनों से भरे हैं। ऐतिहासिक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र' को माना जाता है जिसमें वेदों का जिक्र है, पुराणों का भी है जबकि पुराण मौर्यकालीन नहीं हैं, बाद के हैं। ‘अर्थशास्त्र' में ‘चीनपट्ट` का उल्लेख, जिसका वर्णन प्राय: प्राचीन संस्कृत साहित्य में है, बाद की तिथि सूचित करता है, क्योंकि चीन स्पष्ट ही प्रारंभिक मौर्यों के क्षितिज के बाहर था और नागार्जुनीकोंडा के अभिलेखों के पहले किसी भी भारतीय अभिलेख में उसका उल्लेख नहीं पाया जाता है।१३ अशोक के अभिलेख, सबसे पुराने अभिलेख जो पढ़े जा चुके हैं, में ऋग्वेद-वेद का कोई उल्लेख नहीं है। चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में दूत बनकर आये मेगास्थनीज की ‘इंडिका` भी वेदों का कोई हवाला नहीं देती है। सर्वाधिक चौंकानेवाला तथ्य तो यह कहा जाना है कि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था। यदि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था तो इसे पश्चिमोत्तर भारत में होना चाहिए था जहां वैदिक संस्कृति का प्रभाव था और आगे भी कई सदियों तक रहा। वास्तविकता तो यह है कि बुद्ध की लड़ाई भारत में पहले से चले आ रहे विश्वासों और मान्यताओं के विरुद्ध थी। ऐसी ही लड़ाई ईरान में जरथु ने लड़ी थी जबकि वहां ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा नहीं है। तब यह शंका निर्मूल नहीं है कि बौद्धधारा वेदपूर्व थी।१४ निश्चय ही ‘तेविज्जसुत्त` (दीर्घनिकाय) का संवाद जिसमें वेदों का जिक्र है, क्षेपक है क्योंकि आरंभिक पालि बौद्धग्रंथों में इंद्र तथा ब्रह्मा को बुद्ध के उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुननेवालों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।१५ अभिलेख भी पीछे नहीं हैं। मद्रास में गुंटूर जिले से प्राप्त वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनीकोंडा अभिलेखों में (ईसा की तीसरी सदी) बुद्ध को इंद्र द्वारा पूजित अंकित है।१६

४.

इतिहास का यह तथ्य गलत है कि पुष्यमित्र के स्मरणीय अश्वमेघ यज्ञ से उस ब्राह्मण प्रतिक्रिया का आरंभ होता है जिसकी पूर्णाहुति पांच शताब्दियों के बाद समुद्रगुप्त और उसके उत्तराधिकारियों के काल में होती है। सच यह है कि पुष्यमित्र ब्राह्मण-धर्म का पुनरुद्धारक नहीं था अपितु वह बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का संस्थापक था। इतिहास गवाह है कि मौर्य राजाओं ने ईरानी सामन्तों को अपनी सेवा में रखा था। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि अशोक मौर्य के राज्य में एक ईरानी सामंत तुषस्प काठियावाड़ का शासक था।१७ ऐसा ही ईरानी सामंत पुष्यमित्र शुंग था जो अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ का सेनापति था। डा. राजमल बोरा ने श्रीधर व्यंकटेश केतकर के हवाले से बताया है कि मगों का भारतीय इतिहास वेदकाल से पहले का है।१८ पुष्यमित्र शुंग ईरानी मग ब्राह्मण था। हरप्रसाद शास्त्री भी शुंगों को ईरानी मानने के पक्ष में थे। पता नहीं क्यों, बाद में उन्होंने यह फैसला वापस ले लिया था। इन्हीं मग ब्राह्मणों ने भारत में आकर सूर्य की एक विशेष पूजा चलायी थी। शुंग राजा इसलिए अपने नाम के साथ ‘मित्र` (सूर्य) लगाया करते थे। गुप्तकाल का ज्योतिषज्ञ वराहमिहिर भी मग ब्राह्मण था जो अपने नाम के आगे ‘मिहिर` (सूर्य) लगाया करता था। मौर्यों के खिलाफ शुंगों का विद्रोह बौद्धधारा के बदले वैदिक धर्म स्थापित करने का उपक्रम था। वैदिक धर्म के इन इंद्रवादियों को ईरान में जरथु ने खारिज कर दिया था जिसकी चर्चा ऋग्वेद के दसवें मंडल में है। बावजूद इसके यह माना जाता है कि ऋग्वेद का भारत में समय अवेस्ता से पहले है। दूसरी शती ई.पू. में भी ऋग्वैदिक स्तोत्रों का संकलन पूर्ण नहीं हुआ था।१९ जाहिर सी बात है कि पश्चिम एशिया के ‘इन्दर` पुराने हैं, पर भारत के संदर्भ में वर्ण-संकोचित ‘इंद्र` नये हैं।

५.

ईरान और भारतवर्ष को छोड़कर प्राचीनकाल में ‘आर्य` शब्द अनातोलिया की हित्ती भाषा में पाया जाता है। अनातोलिया के निकट बोगाजकोइ से, जो हित्ती राजाओं की राजधानी थी, कीलाक्षर इष्टिकाओं में सुरक्षित कुछ अभिलेख मिले हैं। हिंद - यूरोपीय भाषा में यह प्राचीनतम लिखित सामग्री है।२० इनका समय १४०० ई.पू. माना गया है। ऐसा माना जाता है कि आर्य संस्कृति की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता हिंद - यूरोपीय भाषा है।२१ बोगाजकोइ के इन अभिलेखों में तथाकथित ऋग्वैदिक देवताओं को हित्ती-मितन्नी राजाओं के संधि-साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कभी यह नहीं बताया गया है कि ऋग्वेद में बोगाजकोई से आये देवताओं की उपस्थिति है जबकि संभावना इसी की है। बोगाजकोई में ‘अग्नि` साक्षी नहीं हैं। अग्नि तो अवेस्तावादियों के देवता थे जिनकी धाक चंद्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में थी। बाद के मौर्य सम्राटों ने ईरानी केंचुल को उतार फेंकने की कोशिश की थी जिसका नतीजा बृहद्रथ-हत्याकांड के रूप में सामने आया। भारत में अग्नि शुंगों के काल में वेदों के माध्यम से स्थापित हुई। बोगाजकोइ के साक्षी-देवता इन्-द-र (इंद्र), उ-रु-वन (वरूण), मि-इत्-र (मित्र) और न-स-अत्-ति-इअ (नासत्यौ) हैं, जिसका कोष्ठक में दिये गये रूप वेदों का है। स्पष्ट है कि ऋग्वेद की भाषा में शब्दों के वर्ण-विलंबित रूपों का स्खलन हुआ है। वैदिक भाषा की प्रवृत्ति वर्ण-संकोच की ओर है। संस्कृत में यह वर्ण संकोच अपनी पराकाष्ठा पर है जिसमें पाणिनि ने अपना व्याकरण लिखा था। अवेस्ता ऐसे मामले में निश्चत रूप से वेदों के सापेक्ष पुराना ग्रंथ है। आवेस्तीक गाथाओं की भाषा ऋग्वेद की भाषा की अपेक्षा किसी भी दशा में कम आर्ष नहीं है अपितु कुछ दृष्टि से अधिक ही आर्ष है।२२ यदि जरथु बुद्ध के समकालीन थे तो यह तय है कि वेदों की रचना बुद्ध के बाद हुई है। शायद इसीलिए ‘ऋग्वैदिक इंडिया` मौर्यकालीन चित्र प्रस्तुत करता है। इसीलिए यह भी कि बोगाजकोइ के ‘इन्-द-र` से भारत के ‘इंद्र` नये हैं।

६.

‘ऋग्वैदिक इंडिया` में हजार खंभों के ऊपर हजार दरवाजे वाले घर हैं, सौ दीवारों वाले पत्थर के किले हैं, इंद्र की मूर्त्तियां हैं२३ जबकि पुरावशेष इनमें से किसी को स्वीकार नहीं करता है। उत्खननों से पता चलता है कि बहुत-सारे बड़े-बड़े नगर मौर्यकाल के हैं। मेगास्थनीज ने कहा है कि पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रसाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजप्रसाद। पत्थर के स्तंभों और भूलमुंडों के टुकड़े आधुनिक पटना नगर के किनारे कुम्हरार में पाये गये हैं जो ८० स्तंभोंवाले विशाल भवन के अस्तित्व का संकेत देते हैं।२४ इसके पहले इतने विशाल भवनों का कोई भी पुरातात्त्विक साक्ष्य भारत के किसी कोने से कहीं नहीं मिलता है। तब क्या ‘ऋग्वैदिक इंडिया` का मिथक मौर्यकाल से नहीं जुड़ता है? समय का तकाजा है कि अब वेदों के रचनाकाल के संदर्भ में मीमांसकों को उद्धृत करना बंद कर दिया जाए; जो बताते हैं कि सृष्टि की आयु के साथ वेदों की आयु भी दो अरब वर्ष के लगभग पुराना है। ऋग्वेद के तिथि-निर्धारण में खगोलविज्ञान का प्रयोग भी अविश्वसनीय है।२५ याकोबी और तिलक के अनुयायी अब वैदिक साहित्य में वर्णित नक्षत्रों के आधार पर ज्यातिष और वैदिक रचनाकाल में मनगढ़ंत रिश्ते कायम करना बंद करें। आज जबकि आधुनिक विज्ञान ने पुरावशेषों के काल-निर्धारण के काफी अच्छे तरीके खोज निकाले हैं तब अंतहीन युगचक्रों (मन्वंतरों) की काल-मापक पौराणिक दृष्टि से भारतीय इतिहास को मुक्त हो जाना चाहिए। आज का अध्ययन पुरावशेषों में फ्लोरीन की मात्रा के मापन, काठ कोयले की हड्डी में रेडियो-धर्मिता की मात्रा, भूचुंबकीय अवलोकन और वृक्ष-तैथिकी पर आधारित है तब सत्ययुग या कृतयृग की किसी विलुप्त स्वर्णयुग की कल्पना निरर्थक है।२६

७.

ऐसे तथाकथित गौरवपूर्ण तथा अतिरंजित ‘ऋग्वैदिक इंडिया` के मनगंढ़त किस्सों के साथ भारत की भाषा का एक प्रकार से जाली इतिहास जुड़ा हुआ है। वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत की सीढ़ी से उतरकर पालि की जमीन पर पैर रखना सर्वथा भ्रामक है। सही इसका उल्टा है। पालि भारत की प्राचीनतम ऐतिहासिक भाषा है। इसके साक्षी पुरावशेष हैं। भारत के पुराने अभिलेख पालि भाषा में हैं। पालि भारत की प्राचीनतम प्राकृत भाषाओं में से एक है और यह भी कि पालि भाषा वैदिक भाषा के अधिक निकट है और प्राकृत भाषाएं संस्कृत भाषा के।२७ ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख पालि भाषा में हैं। ये सबसे पुराने अभिलेख हैं जो पढ़े जा चुके हैं। अभिलेखों में संस्कृत भाषा ईसा की दूसरी सदी से मिलने लगती है जिसका व्यापक प्रयोग ईसा की चौथी-पांचवीं सदी में होता है। शक राजा रुद्रदामन ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लंबा अभिलेख १५० ई. में जारी किया था। शकों को संस्कृत पर गर्व था। शायद इसीलिए रूद्रदामन बड़े अभिमान से कहता है कि संस्कृत भाषा पर उसका अधिकार है। नासिक की बौद्ध गुफाओं के अतिसंस्कृतमय लेख भी शक दाताओं के हैं जबकि सातवाहनों ने अपने अभिलेख प्राकृत भाषा में खुदवाये थे। यह देशी और विदेशी राजाओं की भाषाई प्रतिद्वंद्विता है।२८

८.

संस्कृत के निर्माण में गंधार की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। ५२०-१८ ई. पू. के बहिस्तान शिलालेख इस बात का गवाह हैं कि ईरानियों का कब्जा गंधार पर था। जाहिर है कि ईरानी भाषा तब गंधार में प्रवेश कर चुकी थी जिसे भाषाविज्ञान में प्राचीन फारसी कहते हैं। यह भाषा वैदिक भाषा के करीब है। इसी भाषा में गंधार क्षेत्र की प्राकृतों का मिश्रण होने से संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ था। यदि भारत के प्राचीन भूगोल पर विचार करें तो ऐसा दिखलाई देता है कि जितना हम उत्तर-पश्चिम की दिशा की ओर जाते हैं संस्कृत और प्राकृत का अंतर कम होता जाता है। उदाहरणार्थ, गंधारी प्राकृत में संस्कृत में प्र,र्म,त्र जैसे बहुत-से संयुक्त-व्यंजन के रूप सुरक्षित हैं।२९ इसी गंधार में पेशावर के आसपास का क्षेत्र निया प्रदेश है। निया प्राकृत में श, ष और स तीनों ऊष्म व्यंजन हैं, यह भी कि इसमें क्र, ग्र, त्र, द्र, प्र, ब्र, भ्र, अविकृत रूप में मिलते हैं। कहना न होगा कि इसी प्रविधि का इस्तेमाल संस्कृत के निर्माण में कसकर किया गया था। शायद इसीलिए ‘अष्टाध्यायी` का पाणिनि पेशावर के निकट शलातुर का निवासी था।३० मध्य एशिया से आये विदेशी राजवंशों ने भारत में आकर संस्कृत भाषा पर इतना बल क्यों दिया, इसका रहस्य शायद खुल गया होगा। जिसे भाषाविज्ञान में संयुक्त व्यंजन कहा गया है, वह एक प्रकार से वर्ण-संकोच है। संस्कृत इसी वर्ण-संकोच की भाषा है। इस वर्ण-संकोच का सबसे बड़ा औजार ‘र` का बहुरूपिया रूप (व्र, वृ, र्व, र्, त्र, श्र, ऋ) था। ऐसी तकनीक वाली फैक्ट्री में एक बार देशी शब्दों के आ जाने से उनकी शक्ल संस्कृत वाली हो जाया करती थी। १४वीं-१५वीं सदी ई.पू. के आसपास अश्वशास्त्र पर हित्ती भाषा में एक रचना मिलती है जिसमें बहुत से ऐसे शब्द हैं जो संस्कृत के निकट हैं। ये शब्द संख्यावाची हैं। ऐसे शब्द देशांतरण के बावजूद कम बदलते हैं। इस रचना में अइक (एक), तेर (त्रि), पंज (पञ्च), सत्त (सप्त) और (नव) शब्दों का प्रयोग अंकों के लिए किया गया है।३१ संख्यावाची पांच के लिए आज भी पंजाबी और सिंधी में हित्ती भाषा का ‘पंज` प्रचलित है और सात के लिए ‘सत्त` का प्रचलन है। यह ‘सत्त` पालि और प्राकृत में भी हैं संस्कृत ‘सप्त` निश्चित रूप से संस्कृत के नये कानून के हिसाब से है। हिन्दी तेरह के समक्ष ‘त्रि` का भी वर्ण-संकोच स्पष्ट है। ऐसी प्रवृत्ति कश्मीरी में भी है। शायद इसीलिए कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो कश्मीरी का संबंध वैदिक संस्कृत से स्थापित करते हैं। ऐसे भी संस्कृत के पुराने लेखकों का संबंध कश्मीर से रहा है। मध्य एशिया, खास तौर से गंधार क्षेत्र से आयी संस्कृत भाषा के ये सब पद-चिन्ह हैं जिसका साक्ष्य अति प्राचीन का दावा करनेवाले संस्कृत के ग्रंथ सावधानी के बावजूद भी मिटा नहीं सके हैं। वह दिन दूर नहीं जिस दिन यह बताया जाएगा कि संस्कृत ‘आंग्ल` से अंग्रेजी का ‘इंग्लिश` बना है। संस्कृत के प्राय: तत्सम रूप वास्तव में देशी भाषाओं के तद्भव रूप हैं जिसे संस्कृत को मूलभाषा माने जाने की गलती से तद्भव मान लिया जाता है। जाहिर है कि नये कानून के औजारों से पुराने शब्दों को संस्कृत ने अपने कब्जे में लिया था। इसे लूट-खसोट, हड़प या परिमार्जन, जो भी कहेंं।

९.

इतिहासकारों का यह फैसला गलत है कि समृद्ध और शक्तिशाली विदेशी संस्कृत के जरिए अपने को भारतीय कुलीन-वर्ग में स्थापित करने का उपक्रम करते थे। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत विदेशी बाटमारों (भाषा के संदर्भ में रास्ता चलते लूट-पाट) की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई भौगोलिक रूप नहीं मिलता है। प्राकृतों के भौगोलिक रूप (महाराष्ट्री, शौरसेनी, गंधारी, मागधी) मिलते हैं। संस्कृत दूसरी भाषाओं से शब्दों की लूट-पाट की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई अपना भाषाई-भूगोल नहीं था। संस्कृत में प्राकृतों के शब्द-भंडार का संस्कृतिकरण हुआ है। यदि यह पूछा जाय कि संस्कृत किस भू-भाग की भाषा है तो इसका जवाब गोल-मटोल मिलेगा। यह कि संस्कृत वैदिक युग में समस्त मध्यदेश में फैली हुई थी। संस्कृत भाषा की यह अदृष्ट धारा वैदिक युग में मध्यदेश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ठीक वैसी ही प्रवाहित होती थी जैसे पौराणिक कथाओं में अदृष्ट सरस्वती की पवित्र धारा बहती थी जिसके तट पर आर्यों का प्रमुख उपनिवेश था। सरस्वतीवादियों को अब इस अस्तित्त्वविहीन नदी का पानी नापना बंद कर देना चाहिए। यदि इतने विशाल भू-भाग में संस्कृत बोली जाती थी तब १९२१ एवं १९७१ की जनगणना में संस्कृतभाषी लोगों की जनसंख्या क्रमश: ५५५ एवं १२८२ क्यों पायी गयी है?३२ क्या संस्कृतभाषी लोग जंगलों तथा पहाड़ों में रहने वाले असुविधाभोगी आदिवासियों की तरह विलुप्त हो गये हैं? संस्कृत का वर्चस्व को देखकर ऐसा तो कदापि नहीं लगता है। सच तो यह है कि मुट्ठीभर मध्य एशियाई विदेशियों ने मौर्योत्तर काल में निरंतर दबाव बनाते हुए गुप्तयुग में संस्कृत को राजभाषा बनवाया था जबकि प्राकृत में लिखित साहित्य को दरबारी क्षेत्र के बाहर संरक्षण प्राप्त था। गुप्तयुग में संस्कृत का साहित्य विशिष्ट वर्ग, दरबार, कुलीन वंश तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों से संबंधित व्यक्तियों से संबंधित था। नि:संदेह संस्कृत गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी, पर आम जनता की भाषा प्राकृत थी जो उस काल के नाटकों में प्रयुक्त द्वैध भाषा के सामाजिक संदर्भ से स्पष्ट होता है।३३ राजभाषा के मामले में मुगलकाल में यह इतिहास दुहराया जाता है जब ईरानी संस्कृति से प्रभावित दिल्ली के मुट्ठीभर अभिजनों ने फारसी को राजभाषा बनवाया था जबकि बाबर की मातृभाषा तुर्की थी। तुर्क सुलतानों का तुर्की तथा अफगानों की जबान पश्तो कभी भी यहां राजभाषा का दर्जा नहीं नहीं प्राप्त कर सकी।

१०.

भारतीय भाषाओं में ऐसे शब्द नहीं मिलते हैं जो ब्राह्मण और क्षत्रिय के सजात शब्द हों, पर विश् (वैश्य) से मिलते-जुलते शब्द बहुसंख्यक हिंद - यूरोपीय भाषाओं में मिलते हैं।३४ जाहिर है कि भारत की वर्णमूलक संस्कृति ऐसे लोगों द्वारा लायी गयी है जिन्होंने संस्कृत के नियम-कानून बनाये हैं। वर्ण-संकोच की ऐसी भाषा जो आम जनता और सुविधाभोगी वर्ग के बीच फासला पैदा करके लूटने की सुविधा दे। ऐसी ही वर्ण-संकोचमूलक भाषा और वर्ण-विस्तारमूलक समाज के बलबूते गुप्तकाल को भारतीय इतिहास में आभिजात्य नजरिये से ‘स्वर्णयुग` कहा जाता है। एक ऐसा युग जिसमें ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक दान दिये जाते थे, मंदिर बनवाये जाते थे और महिलाएं सती हुआ करती थीं। सबसे चौंकानेवाली बात तो यह है कि इस काल में वर्ण-व्यवस्था पर आधारित ‘अमरकोश` लिखा जाता है। ऐसे समय में संस्कृत को राजभाषा बनाया जाना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। पर संस्कृत पुरानी भाषा नहीं है। पैशाची पुरानी है। चीन तुर्किस्तान के खरोष्ठी शिलालेखों में इसका पुरातात्त्विक साक्ष्य मिलता है।३५ भाषावैज्ञानिकों का फैसला है कि यह वैदिक संस्कृत के निकट की भाषा है।

११.

निष्कर्ष यह कि वैदिक भाषा ईरान की प्राचीन फारसी, पश्चिमोत्तर की पैशाची और भारत की पालि के लगभग समकालीन थी। इसे ज्यादा से ज्यादा ६०० ई.पू. के आसपास का माना जाना चाहिए। वैदिक भाषा का अगला पड़ाव संस्कृत है। यह संस्कृत ईरान की पहलवी, पश्चिमोत्तर की निया प्राकृत एवं भारत के मिश्रित बौद्ध संस्कृत के प्राकृतांश के लगभग समकालीन है। मिश्रित बौद्ध संस्कृत की भाषा पालि के बाद पहली सदी के आसपास की है जब पश्चिमोत्तर में संस्कृत का जन्म हो रहा था। एक ऐसी भाषा जिसके जनमने के बाद उसकी मां पैशाची मृतप्राय हो जाती है। पालि में संस्कृत का प्रवेश बाद में हुआ, इसलिए कि इसके पहले संस्कृत भाषा नहीं थी। इस भाषा का उदय ईसा की पहली सदी के आसपास होता है। इसीलिए फ्रैंके ने दिखाया है कि शिलालेखों की भाषा के रूप में संस्कृत प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रकट होती है।३६ जाहिर है कि संस्कृत की प्राचीनता सिर्फ साहित्यिक या कहें मनगढ़ंत है, तभी तो अमेरिकी भाषावैज्ञानिक ब्लूमफील्ड को आश्यर्च होता है।३७ बात एकदम साफ है कि वैदिक भाषा भी पालि और पैशाची प्राकृतों की तरह ईसा से पहले की एक प्राचीन प्राकृत है जबकि संस्कृत ईसा के आसपास की ‘साहित्यिक प्राकृतों` की तरह एक प्रकार से कृत्रिम भाषा है। आज की तारीख में पालि भारत की सबसे पुरानी ऐतिहासिक भाषा है। भाषा के जानकार अब वैदिक और लौकिक संस्कृत के बाद पालि का इतिहास लिखना बंद करें और ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा के साथ वैदिक भाषा को जोड़कर उसे पालि के पहले सिद्ध करने से बाज आएँ।


संदर्भ

१. दामोदर धर्मानंद कोसंबी : प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (चौथी आवृत्ति,१९९९); पृ. ९९

२. डी.एन झा एवं श्रीमाली : प्राचीन भारत का इतिहास : हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (द्वादश संस्करण,१९९३); पृ.१२०

३. रामशरण शर्मा : आर्य संस्कृति की खोज; सारांश प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली (पेपर बैंक संस्करण, २०००); पृ. ७५

४. रामविलास शर्मा : भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश; किताब घर, नई दिल्ली (प्रथम संस्करण, १९९९); पृ. ८२

५. भगवान सिंह : हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य; राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली (तृतीय संस्करण, १९९७); पृ. ११४

६. रामशरण शर्मा : प्राचीन भारत; राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली (पुनर्मुद्रण, १९९१); पृ. ११९-१४९

७. रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत; पृ. ३३

८. प्राचीन भारत, पूर्वोद्धृत; पृ. ८३

९. भगवान सिंह, पूर्वोद्धृत; पृ. १३९

१०. प्राचीन भारत, पूर्वोद्धृत; पृ. १३९

११. राणाप्रसाद शर्मा : पौराणिक कोश; ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी (द्वितीय संस्करण, १९८६); पृ.६९

१२. दामोदर धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत; पृ. ७०

१३. मजुमदार, रायचौधरी एवं दत्त : भारत का वृहत् इतिहास; मैकमिलन एण्ड कंपनी लिमिटेड, कलकत्ता (संस्करण,१९५४); पृ. १३५

१४. स्वपन कु बिस्वास : भारत के मूल निवासी और आर्य आक्रमण; ओरियन बुक्स, कलकत्ता (संस्करण, २००२); पृ. ८५

१५. दामोदर धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत; पृ.२२३

१६. राजबली पांडेय : भारतीय पुरालिपि; लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (संस्करण, २००४); पृ. १४०

१७. बी.डी. महाजन : प्राचीन भारत का इतिहास; एस. चंद एण्ड कंपनी लि., नई दिल्ली (संस्करण, १९८६); पृ. २४२

१८. राजमल बोरा : भारत की प्राचीन भाषाएं; हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (संस्करण, १९९९); पृ. २८

१९. बी.डी. महाजन, पूर्वोद्धृत; पृ. ९२

२०. टी. बरो/अनु. भोलाशंकर व्यास : संस्कृत भाषा; चौखंबा प्रकाशन, वाराणसी (पुनर्मुद्रण, १९९१); पृ. ११

२१. रामशरण शर्मा : भारत में आर्यों का आगमन; हिंदी माध्यम कार्यान्यक निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (पुनर्मुद्रण, २००३); पृ. १३

२२. टी. बरो, पूर्वोद्धृत; पृ. ६

२३. मजुमदार, रायचौधरी एवं दत्त, पूर्वोद्धृत; पृ. ३८

२४. प्राचीन भारत, पूर्वोद्धृत; पृ. १३७

२५. रोमिला थापर : आर्य : मिथक और यथार्थ; सफदर हाश्मी मेमोरियल ट्रस्ट, नई दिल्ली (पुनर्मुद्रित, २००२); पृ. ५९

२६. दामोदर धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत; पृ. ४२-४३

२७. इंद्रचंद्र शास्त्री : पालि भाषा और साहित्य; हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (संस्करण, १९८७); वक्तव्य

२८. ज्यूल ब्लाख/अनु. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय : भारतीय आर्य भाषा; हिंदी समिति, लखनऊ (संस्करण, १९७२); पृ. ४

२९. राजमल बोरा, पूर्वोद्धृत; पृ. ३७

३०. वासुदेवशरण अग्रवाल : पाणिनिकालीन भारतवर्ष; मोतीलाल बनारसीदारस, बनारस (संस्करण,२०१२ वि.); पृ. १४

३१. आर्य संस्कृति की खोज, पूर्वोद्धृत; पृ. ४३

३२. स्वपन कु बिस्वास, पूर्वोद्धृत; पृ. ११७

३३. आर. पिशल/अनु. हेमचंद्र जोशी : प्राकृत भाषाओं का व्याकरण; बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना (संस्करण, १९५८); पृ. ४४

३४. आर्य संस्कृति की खोज, पूर्वोद्धृत; पृ. ६५

३५. नेमिचंद्र शास्त्री : प्राकृत भाषा और साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; तारा बुक एजेन्सी, वाराणसी (पुनर्मुद्रण, १९८८); पृ. ९०

३६. पाण्डुरंग दामोदर गुणे/अनु. भोलानाथ तिवारी : तुलनात्मक भाषाविज्ञान; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (पुनर्मुद्रण, १९९६); पृ. १६५

३७. ब्लूमफील्ड/अनु. डॉ. विश्वनाथ प्रसाद : भाषा; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (संस्करण, १९६८); पृ. ६९

रविवार, 3 अक्टूबर 2021

गांधी का जंतर

 गांधी का जंतर ----


तुम्हें एक जंतर देता हूँ । जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहं तुमपर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आज़माओ :


"जो सबसे गरीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुंम उठाने का विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा , क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा ?  क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ?  यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा,  जिनके पेट भूखें हैं  और आत्मा अतृप्त है ?


तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहं समाप्त होता जा रहा है।"


                               मोहनदास करम चंद गांधी


शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

साहिर

 Qalame Sahir Ghalib ke naam


यह नज़्म 1968 में लिखी गई


इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,

तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।

तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,

अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।


सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,

अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।

उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,

यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।


जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,

उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।

आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,

मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।


जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,

उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,

उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।


ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,

कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।

जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,

मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।


यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,

हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।

गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,

हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।

                                                 साहिर

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

अल्लाह की बेटियां

 

630 ईस्वी से पहले ये तीनो अरब देशों में पूजनीय थी। इन्हें अल्लाह की बेटियां कहा जाता था।

अल लात

मिनात

और उज़्ज़ा

बुधवार, 8 सितंबर 2021

ब्राह्मणों का ऐतिहासिक उल्लेख

 कहाँ लिखा हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी है ?


जानना चाहते हो तो

पढिए निम्नलिखित पुस्तकें:-


1) मनुस्मृति

  श्लोक नं.२४


2) बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित

वैदिक आर्या का मूलस्थान (Arctic home in the Vedas)


३) मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा दि.२७ दिसंबर १९२४ का काँग्रेस अधिवेशन मे दिया हुआ अध्यक्षीय भाषण।


४) पंडित जवाहर लाल नेहरु का 

"पिता की ओर से पुत्री के नाम खत"


५) लाला लजतपराय द्वारा लिखित

 भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ २१-२२


६) बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित

 भारत वर्ष का इतिहास   पृष्ठ ६३  ओर ८७


७) पंडित श्यामबिहारी मिश्रा और सुखदेव बिहारी मिश्रा द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास,भाग १ पृष्ठ ६२ ओर ६३


८) पं.जनार्दन भट्ट एम.ए द्वारा लिखित

 -माधुरी मासिक - भारतीय पुरातत्व की नयी खोज १९२५ - पृष्ठ २७ ओर २९


९) पंडित गंगाप्रसाद द्वारा लिखित

जाति भेदी  पृष्ठ १० और २७


१०) रविँद्र दर्शन - सुख सनपात्री भंडारी पृष्ठ २१ ओर २२


११) भारतीय लिपीतत्व - नागेँद्रनाथ बसू. पृष्ठ ४७ ओर ५१


१२) प्राचीन भारत वर्ष की सभ्यता का इतिहास - रमेश चंद्र दत्त, भाग -१ पृष्ठ १७ ओर २९


१३) हिँदी भाषा की उत्पति - आचार्य महावीर द्विवेदी


१४) हिंदी भाषेचा विकास - बाबू श्यामसुंदर पृ. ३ ओर ७


१५) हिँदुत्व - पं.लक्ष्मीनारायण गर्दे, पृष्ठ - ८,९ ओर २९


१६) आर्योँ का आदिम निवास -पं.जगन्नाथ पांचोली.


१७) महाभारत मीमांसा - राय बहादूर चिंतामणी विनायक वैद्य.


१८) जाति शिक्षा - स्वामी सत्यदेव परिभ्राजक,पृष्ठ ८ ओर ९


१९) २९ वा अखिल भारतीय हिंदू महासमेलन रामानंद चटर्जी, मॉडर्न रिव्ह्यू का भाषण


२०) २९ नवंबर १९२६ के दिन आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का आज या नियतकालिन लेख। 


२१) देशभक्त सामाजिक का संपादकीय  लेख. पृष्ठ २९ फरवरी १९२४


२२) प्रेमा का वृंदावन मासिक - योगेशचंद्र पाल १९२७

पृष्ठ १३६ ओर १४३


२३) काका कालेलकर की *पिछडा वर्ग रिपोर्ट*


२४) धर्मशास्राचा इतिहास - पा.वा.काणे करना


 २५) हिंदू सभ्यता - राधाकृष्ण मुखर्जी, पृष्ठ ४१,४७ ओर ५९


२६) डी.डी.कोसंबी - प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता


२७) वोल्गा से गंगा - राहुल सांस्कृत्यायन


२८) ग्रीक ओरिजन्स ऑफ कोकणस्थ चित्पावन -प्रताप जोशी


२९) ना.गो.चाफेकर चित्पावन - पृष्ठ २९५


३०) वि.का.राजवाडे के मतानुसार ब्राम्हण विदेशी है। 


३१) स्वामी दयानंद सरस्वती -सत्यप्रकाश ग्रंथ


३२) टाईम्स ऑफ इंडिया का 2001 का DNA रिपोर्ट


३३) ऋग्वेद मे लिखा है की ब्राह्मण विदेशी है:-


34)आर्यां का मूळ वस्तीस्थान उत्तर ध्रुव.

-(आर्टीक्ट होम ईन द वेदाज)


35)हम ब्राह्मण लोग मध्य एशिया से भारत आये है  । 

(डिस्कव्हरी अॉफ इंडिया- पंडित जवाहरलाल नेहरु)


यह सब पढके (खासकर वेदों को) खुद ब्राह्मणों को भी समझ में आ जाएगा कि आर्यों का मूल निवास भारत में नही है।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

अय्यंकाली




 अय्यंकाली: केरल की दलित क्रांति के प्रतीक


    ( अय्यंकाली, जिन्होंने अपनी बैलगागाड़ी से नंबूदरी ब्राह्मणों एवं नायरों  वर्चस्व और अंहकार को कुचल दिया)


                        जन्मदिन ( 28 अगस्त) पर सादर नमन के साथ 


केरल के पहले दलित विद्रोही अय्यंकाली को याद करते हुए मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय लिखते हैं-

                      तुम्हीं ने जलाया था, प्रथम ज्ञानदीप

                      बैलगाड़ी पर सवार हो

                      गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

                      अपनी देह की यंत्रशक्ति से

                      पलट दिया था, कालचक्र को


आधुनिक युग ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलितों के विद्रोह का भी  युग है। इस युग में देश के अलग-अलग कोनों में दलित विद्रोह की लहर पर लहर उठती रही और आज भी उसका सिलसिला किसी न किसी रूप में चल रहा है, क्योंकि सामाजिक समानता के जिस स्वप्न के साथ ये विद्रोह शुरू हुए थे, वह अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है। दक्षिण भारत और पश्चिमोत्तर भारत में यह विद्रोह ज्यादा व्यापक और प्रभावी रहा है।


तमिलनाडु में इसका नेतृत्व आयोथी थास (20 मई 1845-1914) ने किया, तो महाराष्ट्र में इसका नेतृत्व डॉ. आंबेडकर ( 14 अप्रैल 1891-6 दिसंबर 1956) ने किया, जो बाद पूरे देश के दलितों के विद्रोह के मार्गदर्शक बने। केरल में इस विद्रोह का नेतृत्व अय्यंकाली ( 28 अगस्त 1863-18 जून 1941) ने किया है और उन्होंने वहां उथल-पुथल मचा दी। वहां के सामाजिक संबंधों में काफी हद तक आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया और अपनी बैलगाड़ी से सवर्णों के जातीय श्रेष्ठता बोध के अभिमान को रौंद दिया।


केरल में आधुनिकता की नींव डालने वाले पहले व्यक्ति श्रीनारायण गुरु (20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928) थे, लेकिन इस नींव पर विशाल भवन जिन लोगों ने खड़ा किया, उनमें दलित विद्रोही अय्यंकाली की निर्णायक भूमिका है। जिन्होंने केरल में समानता एवं न्याय की आधुनिक चेतना को सबसे निचले स्तर तक विस्तारित कर दिया। बहुतों के लिए यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि जो व्यक्ति न लिख सकता था और न पढ़ सकता था, उसने पढ़ने के अधिकार के लिए ऐसा आंदोलन चलाया हो, जिसकी दुनिया में शायद कोई दूसरी मिसाल न हो, जो व्यक्ति किसी तरह हस्ताक्षर करना सीखा हो, वह व्यक्ति आधुनिक केरल के निर्माताओं में सबसे अगली पंक्ति में खड़ा हो। इस मामले में अय्यंकाली से तुलना के संदर्भ में कबीर और रैदास याद आते हैं, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा से वंचित होने के बावजूद भी भारतीय मध्यकालीन बहुजन नवजागरण का नेतृत्व किया।


केरल में दलितों के ऊपर नंबूदरी ब्राह्मणों एवं नायरों ने ऐसी अनेक बंदिशें लाद रखी थीं, जिसकी कल्पना करना भी किसी सभ्य समाज एवं इंसान के लिए मुश्किल है। मुख्य सड़कों पर दलित चल नहीं सकते थे, बाजारों में वे प्रवेश नहीं कर सकते थे, स्कूलों के द्वार उनके लिए बंद थे, मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित था, अदालत के भीतर पांव रखने की उन्हें इजाजत नहीं थी, उनके मुकदमे अदालत के बाहर सुने जाते थे। महिलाएं और पुरुष कमर के ऊपर और घुटने के नीचे वस्त्र नहीं पहन सकते थे। महिलाएं यदि अपना स्तन ढकने की कोशिश करतीं, तो उन्हें टैक्स देना पड़ता था।


कई फीट की दूरी से उनकी छाया नंबूदरी ब्राह्मणों को अपवित्र कर सकती थी। इसी स्थिति को देखकर स्वामी विवेकानंद ने इसे जातियों का पागलपन कहा था। इस स्थिति को तोड़ने की केरल में पहली कोशिश श्रीनारायण गुरु ने की, लेकिन उनकी कोशिशों का ज्यादा फायदा दलितों से ऊपर की मध्य जातियों-विशेष कर इजावा जाति को मिला। हां उन्होंने उस चेतना को ज़रूर जन्म दिया और विस्तार किया, जिससे दलितों के बीच अय्यंकाली जैसा विद्रोही व्यक्तित्व जन्म लिया। 


28 अगस्त 1863 को अय्यंकाली का जन्म त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में  पुलाया जाति (दलित) में हुआ था। भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो दलित जाति में जन्म लिया हो और उसे जातीय अपमान का सामना न करना पड़ा हो, चाहे वह दुनिया के विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों से पढ़कर आए डॉ. आंबेडकर ही क्यों न हों। अय्यंकाली को जातीय अपमान का अनुभव बचपन में ही हो गया था, जब उनकी फुटबाल की गेंद एक नायर परिवार के अहाते में जा गिरी। अपमानित बालक शायद डॉ. आंबेडकर की तरह, लेकिन उनसे पहले इस जातीय अपमान से मुक्ति का संकल्प मन ही मन ले लिया।


हालांकि अय्यंकाली को भी ज्योतिबा फुले ( 11 अप्रैल 1827-28 नवंबर 1890) की तरह उनके पिता ने समझाया कि यही परिपाटी है, इसे स्वीकार करना होगा यानि जातीय अपमान स्वीकार करने और बर्दाश्त करके जीना सीखना होगा, लेकिन अय्यंकाली ने कुछ और ही ठान लिया था। आयोथी थास, स्वामी अछूतानंद ( 6 मई 1879-20 जुलाई 1933) और डॉ. आंबेडकर जैसे दलित विद्रोहियों के विपरीत अय्यंकाली को स्कूल जाना मयस्सर नहीं हुआ और उन्हें अक्षर ज्ञान नहीं मिल पाया। इसका कारण यह था कि न तो उनके पिता अंग्रेजों की सेना में थे और न ही त्रावणकोर राज्य के उस हिस्से में ईसाई मिशनरियों का कोई स्कूल था, क्योंकि सैनिक छावनी और मिशनरी स्कूल ही वे जगहें थीं, जहां दलितों की पहली पीढ़ी शिक्षित हुई थी या महाराष्ट्र जैसी जगहों पर ज्योतिबा फुले ने दलितों के लिए स्कूल खोला।


ऐसा कोई भी स्कूल अय्यंकाली को नसीब नहीं हुआ। उन्होंने अपने समकालीन और बाद के दलित नायकों से कुछ अलग ब्राह्मणवाद के खिलाफ सीधे  विद्रोह का रास्ता चुना और इसके चलते उन्हें और उनके साथियों को नायरों के हिंसक हमलों का सामना भी करना पड़ा, जिसका पुरजोर जवाब उसी तरह से अय्यंकाली और उनके साथियों ने दिया। इस सीधे विद्रोह का शायद एक कारण यह था कि त्रावणकोर राज्य में प्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश शासन नहीं था, वहां हिंदू राज्य था और उसका राजा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार राज करता था। ब्रिटिश सुधारों के चलते जो थोड़ी सी सांस लेने की गुंजाइश तमिलनाडु में आयोथी थास, महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर और उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूनानंद को मिली हुई थी, वह भी त्रावणकोणर में अय्यंकाली को प्राप्त नहीं थी। 


करीब 27 वर्ष की उम्र में अय्यंकाली ने एक ऐसा कदम उठाया, जो केरल ही नहीं, दुनिया के इतिहास में दर्ज करने वाला बन गया। केरल में मुख्य रास्तों पर दलितों को चलने की मनाही थी, अय्यंकाली ने 1891 में दलितों के लिए वर्जित सड़कों पर बैलगाड़ी दौड़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने बैलगाड़ी तैयार कर उन रास्तों पर दौड़ाई, जिस पर उनके पूर्वज चलने की सोच भी नहीं सकते थे। नंबूदरी ब्राह्मण और ब्राह्मण के बाद खुद सबसे श्रेष्ठ समझने वाले नायरों को लगा जैसे यह बैलगाड़ी सड़कों को न रौंद कर, उनकी छाती को रौंद रही हो और वे लाठी-डंडों के साथ उनके ऊपर टूट पड़े।


लेकिन अय्यंकाली भी तैयारी करके निकले थे, उन्होंने हमलावरों से निपटने के लिए अपने पास पहले से रखी कटार ( खुखरी) निकाल मैदान में कूद पड़े। बुजदिल हमलावर भाग खड़े हुए। इस तरह अय्यंकाली ने सवर्णों के जातीय श्रेष्ठता के अभिमान को मिट्टी में मिला दिया। उन्होंने  ब्राह्मणवाद की करीब हर उस व्यवस्था को चुनौती दी, जो दलितों को मनुष्य होने के दर्जे से वंचित करती थी और उन्हें अपमानित करती थी। 


असाक्षर, लेकिन आधुनिकता की चेतना एवं संवेदना से लैश अय्यंकाली ने बहुजन पुनर्जागरण के जनक ज्योतिबा फुले की तरह शिक्षा को मुक्ति का द्वार माना। उन्होंने 1904 में दलितों के लिए पहले स्कूल की नींव रखी, लेकिन सवर्णों के यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने उनके स्कूल को दो बार जला दिया, लेकिन वे हार मानने वाली मिट्टी के नहीं बने थे, आखिर उन्होंने त्रावणकोर में दलितों का पहला स्कूल खोल ही दिया। 


दुनिया के इतिहास में शायद कोई ऐसी दूसरी घटना घटी, जब मजदूरों ने शिक्षा के अधिकार को लागू कराने के लिए हड़ताल किया हो। शिक्षा के अधिकार को लागू कराने के लिए अय्यंकाली के नेतृत्व में दलितों ने सवर्णों के खेतों में काम करना बंद कर दिया। नायरों ने इस हड़ताल को तोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन अय्यंकाली के कुशल नेतृत्व के चलते हड़ताल सफल हुई और दलितों को स्कूलों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त हो गया। यह हड़ताल करीब एक वर्ष ( 1907-1908) तक चली।


नायर शास्त्र सम्मत वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्र थे, लेकिन आर्थिक-सामाजिक हैसियत में उत्तर भारत के सवर्णों ( राजपूतों) की स्थिति में थे, अय्यंकाली की सीधी टकराहट सबसे अधिक नायरों से हुई, वही ब्राह्मणवाद की अगली पंक्ति के सबसे मजबूत दीवार बनकर उनके सामने खड़े होते थे। शिक्षा के अधिकार को व्यवहार में उतारने के लिए अय्यंकाली पुजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नायर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया। अय्यंकाली हार मानने वाले नहीं थे, उन्होंने दलित बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार व्यवहार में हासिल करके ही दम लिया।


वर्जित सड़कों पर चलने और शिक्षा का अधिकार हासिल करने के बाद अय्यंकाली ने दलित महिलाओं की गरिमा और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष शुरू किया। जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है कि दलित महिलाओं को नंबूदरी ब्राह्मणों की व्यवस्था के अनुसार अपना स्तन ढकने का अधिकार नहीं था और यदि वह ढकने की कोशिश करती, तो उन्हें टैक्स देना पड़ता था। यह टैक्स उनके स्तन के आकार के आधार पर तय होता है। इस मानव गरिमा विरोधी व्यवस्था के खिलाफ अय्यंकाली ने संघर्ष का  बिगुल फूंक दिया।


1915 में उन्होंने दलित एवं आदिवासी स्त्रियों का आह्वान किया कि वे इस घिनौनी व्यवस्था को चुनौती देते हुए, अपने स्तन ढकें और ब्लाउज पहने। उनके आह्वान पर हजारों दलित-आदिवासी महिलाओं ने ऐसा किया। महिलाओं द्वारा ऐसा करने पर  तथाकथित ऊंची जातियों में खलबली मच गई। ऊंची जातियों ने दलितों के घरों पर हमला बोल दिया। कई दलित महिलाओं के स्तन उच्च जातियों के लोगों ने काट डाले। उनके परिवार के सदस्यों को आग के हवाले कर दिया। फिर भी महिलाएं पीछे नहीं हटीं, न अय्यंकाली पीछे हटे। 


अय्यंकाली का जीवन दलितों के लिए निरंतर संघर्ष करते हुए बीता, एक संघर्ष खत्म नहीं होता कि दूसरा शुरू हो जाता, क्योंकि वे दलितों को वो सभी अधिकार दिलाना चाहते थे, जिनसे उन्हें वंचित रखा गया था। दलितों को मुख्य बाजारों में प्रवेश का भी अधिकार नहीं था। उन्होंने अपने साथियों के साथ उन बाजारों में प्रवेश किया। इस बार भी सवर्णों ने दलितों पर लाठी-डंडे और अन्य हथियारों के साथ हमला बोल दिया। दलितों ने भी इस बार करारा जवाब दिया। जगह-जगह हिंसक झड़पें हुईं। अय्यंकाली के नेतृत्व में दलित समाज का स्वाभिमान जाग चुका था। आत्मसम्मान और गरिमा के साथ जीने के लिए दलित अय्यंकाली के नेतृत्व में हर तरह संघर्ष के लिए तैयार थे, जिसमें स्त्री-पुरूष दोनों शामिल थे।


शिक्षा और समान अधिकार हासिल करने के लिए संगठन जरूरी है, इसका अहसास अय्यंकाली को बखूबी था। उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’ (गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की। सभी दलित जातियों के लोग इसकी सदस्यता ले सकते थे। संगठन का उद्देश्य दलितों को अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा और गरीबी से मुक्ति हासिल कराना और जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता का अधिकार प्राप्त करना था। सवर्णों के हमलों के डर से पहले इस संगठन की गुप्त बैठकें होती थीं, लेकिन बाद में खुले में भी बैठकें होने लगीं।


 

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जिसका काफी हद तक आधुनिकीकरण हुआ है और वहां एक आधुनिक नागरिक समाज का निर्माण हुआ है। वहीं यह भी सच है कि वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृ सत्ता के बहुत सारे अवशेष आज भी शेष भारत की तरह केरल में भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। इसके बावजूद भी केरल भारत का सबसे आधुनिकीकृत प्रदेश है और शीर्ष आधुनिक देशों से बहुत सारे मामलों में बराबरी करता है। मानव विकास सूचकांक में भारत के सभी प्रदेशों में शीर्ष पर है और दुनिया के शीर्ष देशों की बराबरी करता है। कोविड-19 से निपटने के मामले में भी केरल मॉडल की दुनिया भर में चर्चा हो रही है।


ऐसा केरल एक दिन में नहीं बना है, न ही किसी एक व्यक्ति के प्रयास से बना है। यह सर्वविदित है कि जब किसी देश या प्रदेश के समाज में एक गहरी उथल-पुथल मचती है और वह अपने मध्यकालीन जड़ विचारों से मुक्त होता है तथा आधुनिक बौद्धिक, तार्किक एवं विवेक संगत विचारों को अपनाता है, तभी वह एक आधुनिक देश या प्रदेश बनता है।


किसी देश-प्रदेश के आधुनिक उन्नत एवं समृद्ध देश-प्रदेश में तब्दील होने के लिए वहां के लोगों के मन-मस्तिष्क में बुनियादी बदलाव और उनके सोचने-देखने के तरीके का मानवीय एवं वैज्ञानिक होना जरूरी होता है। यानि उनकी विश्व-दृष्टि बदलनी चाहिए। इसके साथ ही वहां के सामाजिक-आर्थिक संबंधों में परिवर्तन आना चाहिए, जिसके अनुसार ही अक्सर वहां की राजनीति अपना आकार ग्रहण करती है। यह सब कुछ मिलकर एक ऐसे नागरिक समाज का निर्माण करते हैं, जिसे आधुनिक समाज कहा जा सकता है। भारत में केरल एक ऐसा ही प्रदेश है। इस संबंध में सारे उपलब्ध तथ्य इसके साक्षी हैं।


केरल के आधुनिक और मॉडल राज्य बनाने की नींव श्रीनारायण गुरु ने डाली थी, जिसे केरल के पहले दलित विद्रोही अय्यंकाली ने विस्तार एवं नई उंचाई दी। 18 जून, 1941 को अय्यंकली ने अंतिम विदा ली।


संदर्भ- 


1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, 

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अय्यंकाली कंट्रीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ त्रावणकोर दलित्स, 2018 

3-कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकाली, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, 

4- अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक – ओमप्रकाश कश्यप ( लेख)


( जनचौक में प्रकाशित)

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