बुधवार, 21 दिसंबर 2011

                                                        अंग्रेजी -माता का प्रसाद  किसके लिए 
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर -खीरी में एक मंदिर का निर्माण चर्चा में है.वैसे तो देश भर में रोज-ब-रोज कही न कही धर्मं स्थलों का निर्माण हो रहा है लेकिन जिस मंदिर का निर्माण लखीमपुर में हुआ उसमे था क्या की वह इतना चर्चित एव विवादित हुआ.
दलित विमर्श के जरिये चर्चा में आए दलित विचारक चन्द्रभान प्रसाद ने इस तथाकथित मंदिर का निर्माण करवाया है.आश्चर्य होता है की जब बहुसंख्यक दलित विचारक मंदिरों को अन्धविश्वास का प्रतीक मानते है तो एक चर्चित दलित बुद्धिजीवी मंदिर क्यों बनवा रहा है? एक दलित कवि ने लिखा है -
                                                     
                                                        एसा क्यों होता है
                                                        कि
                                                        किसी धर्मस्थल से गुजरते हुए
                                                        अक्सर मेरा सर झुक जाता है
                                                       श्रद्धा से,नहीं
                                                       शर्म से .

चन्द्रभान प्रसाद तर्क दे सकते है कि मैंने किसी देवी-देवता का मंदिर नहीं बनवाया बल्कि अंग्रेजी माता का मंदिर बनवाया है.वे ये भी कह सकते है कि यह किसी काल्पनिक देवी-देवता कि पूजा हेतु बना मंदिर नहीं है,बल्कि आज कि यथार्थ देवी अंग्रेजी माता का मंदिर है.अच्छा तो यह होता कि प्रसाद जी अंग्रेजी माता के मंदिर के स्थान पर कोई येसी शैक्षिक संस्था बनाते जिसमे दलितों को विशेष रूप से अंग्रेजी का ज्ञान करवाया जाता ताकि अंतर्राष्ट्रीय भाषा को जॉब-कयुनिकेशन के रूप में सीखने में आसानी होती.डॉ. तुलसी राम अपने एक हालिया बयान में कहते है कि "मंदिर कि संस्कृति बड़ी डेंजरस होती है,अंधविश्वास फैलाती है.आप अंग्रेजी देवी की स्तुति करेगे तो जाहिर है की यह देवी-देवतावों पर भी लागू होगी.आप एक मंदिर में जा रहे है तो दुसरे मंदिर में भी उसका reflection  होगा.मंदिर का निर्माण रैशंलिज्म के खिलाफ है, यह तर्क पर आधारित समाज की स्थापना को धक्का पहुचाता है"
चर्चा ये भी है की चन्द्रभान प्रसाद अंग्रेजी -माता का मंदिर बनवाने के साथ-साथ प्रति वर्ष २५ अक्टूबर को मैकाले का जन्मदिन भी मनाते है.यह तो और भी खतरनाक बात है-मुहावरे की भाषा में कहे तो यह 'कोढ़ में खाज 'वाली बात हुई. चन्द्रभान प्रसाद जिस मैकाले और अग्रेजिअत के पैरोकार है,आइये पहले उस मैकाले को समझे-१८वी शताब्दी का भारत मूलतः सामंतवादी समाज था,जिसमे मजबूत वर्गों के सामने अनेक कमजोर वर्ग एव जातिया/उपजातिया उपस्थित थी. आरम्भ से ही भारतीय शासको या शिक्षा प्रदान करने वाली जिमेदार वर्ग ने सुधि नहीं ली. १९वी शताब्दी के आरम्भ तक भारत में शिक्षा नाममात्र की थी और जो थी भी वह भी कुछेक प्रभावशाली लोगो के लिए.अग्रेजो के आने के बाद शिक्षा देने की प्राचीन प्रणाली और नवीन प्रणाली के बीच आपस में वैचारिक संघर्ष हुआ और इस संघर्ष में नवीन प्रणाली यानी आधुनिक शिक्षा पद्धति जिसका आधार अग्रेजी थी,की जीत हुयी और इस पद्धति के मुख्य सिद्धांतकार थे-मैकाले. उसी समय लार्ड मैकाले १८३४ में गवर्नर जनरल की कार्यकारणी में विधि सदस्य के रूप में भारत आये थे.तत्कालीन लार्ड विलियम बैंटिक ने उन्हें बंगाल की 'लोक शिक्षा समिति'का मुखिया नियुक्त किया.बैंटिक ने उन्हें '१८१३ के आज्ञापत्र'की शिक्षा सम्वन्धी धारा की व्याख्या करने को कहा. आपको बताता चलू की १८१३ के चार्टर अधिनियम के द्वारा ही भारत में मिशनरियों को धर्म प्रचार और शिक्षण कार्य करने की स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी .मैकाले भारतीय आयुर्वेद ,विज्ञानं .भूगोल इतिहास ,ज्यामिति को बकवास मानते थे, उनका एक कथन सबको मालुम है-यूरोपीय पुस्तकालय की एक आलमारी भारत तथा अरब के सम्पूर्ण साहित्य के बराबर मूल्यवान है."मैकाले को न तो संस्कृत का ज्ञान था और न अरबी का ही परन्तु इसके बावजूद उन्होंने इस प्रकार की घोषणा करने में जरा भी संकोच नहीं किया.अपने प्रस्तावों में मैकाले की योजना थी,एक एसा वर्ग बनाया जाये जो रंग तथा रक्त से भारतीय हो लेकिन प्रवृति,विचार ,नैतिकता और बुद्धि से अग्रेज भक्त हो '?
चन्द्रभान प्रसाद जिस अग्रेजी भाषा और संस्कृति के समर्थक है,उसका इतिहास उन्हें पता नहीं है और यदि पता है भी तो उस इतिहास की अंतर्वस्तु को समझने में वे असफल है. 
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'                                                                                                                                        क्रमशः


                                                  

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