मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

CHHTISGARH YATRA

           आदिवासी बाहुल्य खोपा गांव में घूमने के दौरान पता चला की यहाँ पर एक सिद्ध देवी का एक खुला मंदिर भी है।जाकर देखा तो यह एक खुला मैदान रुपी मंदिर था जहाँ पर चारो तरफ खून और शराब के सबूत बिखरे पड़े थे।
मंदिर के मुख्य द्वार पर दो अन्धे आदिवासी हाथ फैलाए छत्तीसगढ़ी बोली में भीख मांग रहे थे ,पूछने पर यह अपने आप को देवी का भक्त बताने लगे।
        मुख्य द्वार से कुछ कदम आगे जाने पर एक बैगा(पुजारी) आपके द्वारा लाये गए पूजा सामग्री को लेकर मंदिर की एक अन्य मूर्ति पर चढ़ावा चढ़ा देता देता है।
                                   येही मुख्य देवी है जिनकी पूजा करने लोग दूर-दूर से आते है
       इनका नाम सुखे लाल है जो मुख्य पुजारी यानि की बैगा है।जब मैंने इनके बारे में पूछा तो इन्होने अपने को बेगा बहादुर बताया।यह लगातार भुनभुना रहे थे जैसे कोई मंत्र पढ़ रहे हो।कुछ वर्ष तक आदिवासियो की पूजा प्रणाली में ब्रह्माणी तत्व नहीं दीखते थे लेकिन अब इसकी भरमार है।इसका कारण मेरी समझ से यह है कि पहले यहाँ पर केवल आदिवासी आते थे लेकिन अब भारी मात्रा में गैरआदिवासी भी यहाँ पर सर झुकाने और बलि देने आते है।
        पत्थरों पर चारो तरफ दूध,शराब और खून इस कदर बिखरा हुआ मिलेगा।सोचने लगा की भला यह कौन सी देवी है जो एक ही साथ दूध,शराब और खून का भक्षण करती है।
         जब पंहुचा तो एक नौजवान जोड़ा अपने उज्जवल भविष्य के लिए बलि दे रहा था,सामने एक सिर विहीन बकरा छटपटा रहा था और उसके गर्दन से खून पिचकारी की तरह निकल रहा था। दृश्य देख कर मै  थोड़ी देर के लिए बिचलित हो गया।
        अभी कुछ ही देर हुआ था की एक और बलि के लिए बकरा आ गया।इस फोटो में आपको कन्हई राम दिख रहे है जिनका काम काम है आने वाले बकरे की बलि देने में सहायता करना।
           बैगा के दूसरे साथी,जिनका काम है बकरे की गर्दन को उडाना और इस तरह उड़ाना की ज्यादा से ज्यादा गर्दन का हिस्सा खोपड़ी से लगा रहे।बताता चलू कि औसतन दिन भर में 20-25 बकरे कटते है और यह सभी गर्दन पर अधिकार बैगा और उसके साथियो का होता है। खराब सौदा नहीं है क्यों ?
                                                     बकरे की गर्दन पर फरसा साधते हुए
                 ...................और धर्म के नाम पर बलिदान .............वाह रे ईश्वर और उनके भक्त।
              येही वह देवी है जो जिनकी पूजा रक्त मांस ,शराब से किया जाता है।जब मैंने देवी को गौर से देखा तो लगा की यह किसी मंदिर का कोई टूटा हुआ भाग है जिसको खोपादेवी(दही रानी )के नाम से अभिसिप्त कर दिया गया है।
           खोपा देवी का चेहरा जिस पर इतना सिन्दूर लगा दिया गया है कि वास्विकता का  पता ही नहीं चलता की यह वास्तव में है क्या ?

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