रविवार, 11 अप्रैल 2021
शनिवार, 27 मार्च 2021
भगत सिंह के मुखबिर
शहीदों के हत्यारे
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शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के बाद आंदोलन को धोखा देनेवालों, जेल के अधिकारियों तथा रात के अँधेरे में शहीदों के शव को जलानेवाले पुलिस अधिकारियों को ब्रिटिश सरकार ने बड़े-बड़े ईनाम दिए थे. इन क्रांतिकारियों के निकट सहयोगी रहे हंसराज वोहरा की कहानी तो लोग जानते ही हैं कि इनकी गवाही शहीदों के फ़ाँसी का सबसे बड़ा आधार बनी थी. वोहरा ने आर्थिक लाभ लेने के बजाय लंदन में पढ़ाई का ख़र्च पंजाब सरकार से लिया. वापसी में सरकारी अधिकारी बने, फिर लाहौर के एक अख़बार के संवाददाता बने और बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अमेरिका में संवाददाता हुए. कई दशक बाद उन्होंने राजगुरु के भाई को पत्र में अपनी सफ़ाई देने की कोशिश की, पर यह भी लिखा कि वह दौर उन्हें आक्रांत करता है और उनकी इच्छा है कि लोग उन्हें बिसार दें.
क्रांतिकारी से सरकारी गवाह बने जयगोपाल को बीस हज़ार रुपए मिले, जबकि दो अन्य गवाहों (ये भी क्रांतिकारी रहे थे)- फणीन्द्र घोष और मनमोहन बनर्जी को बिहार के चंपारण में पचास-पचास एकड़ ज़मीन मिली. विभिन्न ओहदों के जेल अधिकारियों- एफ़ए बारकर, एनआर पुरी और पीडी चोपड़ा को प्रोन्नति और मेडल हासिल हुए. फ़ाँसी देखकर रोनेवाले जेल उपाधीक्षक अकबर खान को पहले निलंबित किया गया, खान बहादुर की पदवी छीनी गयी, लेकिन बाद में नौकरी पर रख लिया गया.
लाहौर षड्यंत्र केस के जाँच अधिकारी शेख़ अब्दुल अज़ीज़ को विशेष प्रोन्नति मिली. ये सारी जानकारियाँ देते हुए पंजाब के पुलिस अधिकारी आरके कौशिक ने कुछ साल पहले के एक लेख में बताया है कि अज़ीज़ का मामला दो सौ साल की ब्रिटिश हुकूमत का अकेला मामला है, जिसमें हेड कान्स्टेबल के रूप में भर्ती हुआ आदमी डीआइजी होकर सेवानिवृत्त हुआ था. अज़ीज़ के बेटे को उसी साल डीएसपी भी बना दिया गया था. इसके अलावा उसे पचास एकड़ ज़मीन भी मिली थी.
लाहौर के एसएसपी हैमिल्टन हार्डिंग को भी पुरस्कार मिला. शहीदों के शव को जलानेवाले अधिकारी सुदर्शन सिंह, अमर सिंह और जेआर मॉरिस तथा इस काम में शामिल तमाम पुलिसकर्मियों को भी प्रोमोशन और पुरस्कार मिले. लाहौर व कसूर के प्रशासनिक अधिकारियों- पंडित श्री किशन, शेख़ अब्दुल हामिद और लाला नाथू राम- को भी ओहदे और मेडल मिले.
अब फ़ाँसी देनेवाले जल्लादों को क्या कोसना! उन्हें तब भी और अब भी बहुत मामूली रक़म मिलती है. बहरहाल, कौशिक साहब ने बताया है कि शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के जल्लाद काला मसीह के बेटे तारा मसीह ने बहुत सालों बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फ़ाँसी दी थी
प्रकाश के रे.
सोमवार, 8 मार्च 2021
रविवार, 19 जुलाई 2020
रविवार, 21 जून 2020
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लेखक-सुभाष चंद्र कुशवाहा
अनामिका प्रकाशन
प्रयागराज
जिस देश मे बुद्ध-कबीर पैदा हुआ हो, वो भला ग़ुलाम कैसे हो सकता है ? यह सवाल मेरे ज़ेहन में हमेशा पाबस्त रहा । कई क़िताबों को पढा कि जवाब मिले श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विजेंद्र स्नातक से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल तक, लेकिन सवाल सवाल ही रहा, जवाब की परिधि पार नही कर पाया। अभी हाल में प्रकाशित सुभाष चंद्र कुशवाहा की किताब "कबीर हैं कि मरते नहीं" में मेरे सवालों के जवाब परत दर परत मिलते गए कि आख़िर कबीर के रहते यह देश ग़ुलामी की जंजीरों में क्यो जकड़ा रहा ? वे कहते हैं कि, " यह धरती मनुष्यता विरोधियों के चंगुल में रही है...." यह सूत्रवाक्य की मेरे प्रश्नों का जवाब है शायद ।
कबीर 1812 में ब्रिटेन में प्रकाशित हो चुके थे। भारत मे मुक़म्मल तौर पर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काम किया। इसके पहले तक के आलोचको ने कबीर को कवि मानने से ही इनकार कर दिया था। सोचिए, करीब 116 साल बाद भारत का कोई लेखक एक क़िताब का सम्पादन करता है जबकि उस देश को ग़ुलाम बनाने वाला ब्रिटेन 1812 से ही कबीर पर लिख रहा था और अपने अख़बारों में लगातार प्रकाशित कर रहा था। क़िताब 8 अध्याय में लिखी गयी है।
पहला अध्याय 'बिन अक्षर ज्ञान' में लेखक ने कबीर की विचारधारा और कबीर पर और लेखकों की दृष्टि को रेखांकित किया है। ज्यादातर अध्येताओं ने कबीर को वैष्णव- धारा का विचारक बताया है। लेखक ने इसका जोरदार खंडन किया है। लेखक लिखता है कि, "आलोचना की ऐसी शरारती प्रवृत्तियां, कुलीनतावाद की कोख से पैदा होकर प्रगतिशील तत्त्वों को चालाकी से निगलने का काम करती हैं।" अध्याय 2 और 3 क्रमशः कबीर का जन्म और मृत्यु वर्ष और कबीर कर माँ-बाप और धर्म की पहेली पर लेखक ने शोध-लेख प्रस्तुत किया है। कबीर के जन्म की पहेली को शर्की शासन काल के बिजली खान पठान के द्वारा बनवाए मक़बरा और गुरुनानक की मुलाकात और कुछ लिखित सन्दर्भ देते हुए, लेखक ने उनके जन्मतिथि और मृत्यु तिथि को आम सहमति तक लाने की कोशिश की है। तीसरे अध्याय में कबीर के माता-पिता और उनके धर्म पर 8 पृष्ठ खर्च किये हैं। किवदंती है कि कबीर एक कुंवारी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे जिसको लेखक अपने चुटीले-तर्क से उक्त कथानक को धूल की तरह उड़ा देता है। और ब्रिटिश अख़बार शेफील्ड डेली टेलीग्राफ के हवाले से लेखक बताते है कि कबीर के माता-पिता मुसलमान थे और जुलाहे थे। लेखक ने कबीर के ही कही गयी बात का उल्लेख करते है--'जाति जुलाहा मतिकौ धीर, हरषि-हरषि गुन रमैं कबीर' या 'तू बाह्मन में काशी का जुलाहा' कबीर की जाति को लेकर भी लेखक ने हजारीप्रसाद द्विवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल का सन्दर्भ दिया है। लेखकद्वय कबीर को जुलाहा या कोरी जाति का ही मानते हैं।
अध्याय 4 में रामानंद स्वामी उनके गुरु थे या नही, इसपर लेखक की दृष्टि साफ है। वे कहते है कि, " अगर किवदंतियों के आधार पर यह मान भी लिया जाए कि कबीर रामानंद के समकालीन थे, जैसा कि हिंदी के प्रायः सभी आलोचक मानते हैं, तो क्या ब्राह्मण, वेद, वर्णव्यवस्था और अवतारवाद के खिलाफ़ कबीर के विचार यह साबित करने के लिए काफी है कि रामानंद उनके गुरु कदापि नही थे.."
सबसे महत्वपूर्ण 5 वां अध्याय है जिसमे लेखक ने 'उन्नीसवीं सदी के विदेशी अख़बारों में कबीर' है। सम्भवतः इस दृष्टिकोण से कबीर को किसी ने नही लिखा है। कबीर के बारे में ब्रिटेन के अख़बारो में जितना छपा है उतना शायद तब, किसी अन्य समाज सुधारक के बारे में नही छपा। सर डब्लू डब्लू हंटर ने कबीर पर काम करते हुए उन्हें पन्द्रहवी सदी का "भारतीय लूथर" कहा है। ब्रैडफोर्ड आब्जर्वर, एलेन्स इंडियन मेल, Armgh Guardian, मॉर्निंग एडवरटाइजर, द वालारो टाइम्स एंड माइनिंग जनरल तथा आस्ट्रेलियाई अखबार एडवोकेट मेलबर्न आदि-आदि अख़बारो-पत्रिकाओं का उल्लेख किया गया है। विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए आपको क़िताब पढ़नी चाहिए।
6 वां और 7 वां अध्याय कबीर पर गोरखनाथ का प्रभाव और कबीर के पारिवारिक किवदंतियां-कथाओं का वर्णन लेखक ने किया है।
8 वां अध्याय 'कबीर के विचार' 5 वें अध्याय के बाद सबसे प्रमुख अध्याय है। लेखक ने कबीर पर अद्वैत, बौद्धों, सिद्धों, सूफियों और नाथों का प्रभाव पड़ा। इसको साबित करने के लिए लेखक ने कबीर की बानियों को ही सामने रखकर सिद्ध किया है। कबीर को देखने-पढ़ने और समझने के लिए एक नए दृष्टिकोण से लिखी गयी किताब है।
लेखक ने बहुत मेहनत किया है। ब्रिटिश लाइब्रेरी, बिटिश, अमेरिकन, ऑस्ट्रेलियाई और जर्मन अख़बार को छान मारा है। आप इस क़िताब में संदर्भित ग्रन्थ की सूची देखकर ही समझ सकते हैं। क़िताब की छपाई बेहतर है लेकिन कही-कही मुद्रण में कमी है। प्रकाशक का ध्यानाकर्षित करना चाहता हूँ कि क़िताब का मूल्य अंतिम पृष्ठ पर 200/-रु और अंदर के पृष्ठ पर 150/- रु अंकित है। इसको स्पष्ट करना चाहिए।
अंततः कहा जा सकता है कि यह किताब संग्रहणीय है। आम पाठकों के साथ-साथ गंभीर अध्येताओं और शोधकर्ताओं को यह क़िताब जरूर पढ़नी चाहिए।
शनिवार, 6 जून 2020
बुधवार, 3 जून 2020
- संजय.. श्रमण..
रविवार, 31 मई 2020
कौन जात हो भाई?
"दलित हैं साब!"
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं और अलग की हुई थाली में आते हैं साब! मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या खाते हो भाई?
"जो एक दलित खाता है साब!"
नहीं मतलब क्या क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या पीते हो भाई?
"जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या मिला है भाई?
"जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या किया है भाई?
"जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया और
आते-जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया! किया है न साब!
आपके चुनाव का प्रचार..।
बच्चा लाल 'उन्मेष'
शुक्रवार, 29 मई 2020
गुरुवार, 28 मई 2020
शनिवार, 12 अक्टूबर 2019
आज जाने की जिद ना करो - फरीदा खान्नुम - टॉप गजल गीत
शनिवार, 31 मार्च 2018
गुरुवार, 22 मार्च 2018
सोमवार, 11 दिसंबर 2017
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
रविवार, 5 नवंबर 2017
सोमवार, 15 जून 2015
एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी। साईं बाबा की निमलित आँखे और ध्यानमग्नअवस्था से आस्था और शांति टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी नौकरी, शादी में आयी हुई अड़चनों को दूर में करने में बाबा की आशीर्वाद को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ? तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता " अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ। चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया। चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है. वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो बिखरी पड़ी है। मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । " उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह हो गया था । उनकी पत्नी चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!
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फोर्ट विलियम कॉलेज
फोर्ट विलियम कॉलेज ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...








