रविवार, 21 जून 2020

"कबीर हैं कि मरते नहीं"
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 लेखक-सुभाष चंद्र कुशवाहा
 अनामिका प्रकाशन
 प्रयागराज

 जिस देश मे बुद्ध-कबीर पैदा हुआ हो, वो भला ग़ुलाम कैसे हो सकता है ? यह सवाल मेरे ज़ेहन में हमेशा पाबस्त रहा । कई क़िताबों को पढा कि जवाब मिले श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विजेंद्र स्नातक से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल तक, लेकिन सवाल सवाल ही रहा, जवाब की परिधि पार नही कर पाया। अभी हाल में प्रकाशित सुभाष चंद्र कुशवाहा की किताब "कबीर हैं कि मरते नहीं" में मेरे सवालों के जवाब परत दर परत मिलते गए कि आख़िर कबीर के रहते यह देश ग़ुलामी की जंजीरों में क्यो जकड़ा रहा ? वे कहते हैं कि, " यह धरती मनुष्यता विरोधियों के चंगुल में रही है...." यह सूत्रवाक्य की मेरे प्रश्नों का जवाब है शायद ।
 कबीर 1812 में ब्रिटेन में प्रकाशित हो चुके थे। भारत मे मुक़म्मल तौर पर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काम किया। इसके पहले तक के आलोचको ने कबीर को कवि मानने से ही इनकार कर दिया था। सोचिए, करीब 116 साल बाद भारत का कोई लेखक एक क़िताब का सम्पादन करता है जबकि उस देश को ग़ुलाम बनाने वाला ब्रिटेन 1812 से ही कबीर पर लिख रहा था और अपने अख़बारों में लगातार प्रकाशित कर रहा था। क़िताब 8 अध्याय में लिखी गयी है।
पहला अध्याय 'बिन अक्षर ज्ञान' में लेखक ने कबीर की विचारधारा और कबीर पर और लेखकों की दृष्टि को रेखांकित किया है। ज्यादातर अध्येताओं ने कबीर को वैष्णव- धारा का विचारक बताया है। लेखक ने इसका जोरदार खंडन किया है। लेखक लिखता है कि, "आलोचना की ऐसी शरारती प्रवृत्तियां, कुलीनतावाद की कोख से पैदा होकर प्रगतिशील तत्त्वों को चालाकी से निगलने का काम करती हैं।" अध्याय 2 और 3 क्रमशः कबीर का जन्म और मृत्यु वर्ष और कबीर कर माँ-बाप और धर्म की पहेली पर लेखक ने शोध-लेख प्रस्तुत किया है। कबीर के जन्म की पहेली को शर्की शासन काल के बिजली खान पठान के द्वारा बनवाए मक़बरा और गुरुनानक की मुलाकात और कुछ लिखित सन्दर्भ देते हुए, लेखक ने उनके जन्मतिथि और मृत्यु तिथि को आम सहमति तक लाने की कोशिश की है। तीसरे अध्याय में कबीर के माता-पिता और उनके धर्म पर 8 पृष्ठ खर्च किये हैं। किवदंती है कि कबीर एक कुंवारी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे जिसको लेखक अपने चुटीले-तर्क से उक्त कथानक को धूल की तरह उड़ा देता है। और ब्रिटिश अख़बार शेफील्ड डेली टेलीग्राफ के हवाले से लेखक बताते है कि कबीर के माता-पिता मुसलमान थे और जुलाहे थे। लेखक ने कबीर के ही कही गयी बात का उल्लेख करते है--'जाति जुलाहा मतिकौ धीर, हरषि-हरषि गुन रमैं कबीर' या 'तू बाह्मन में काशी का जुलाहा' कबीर की जाति को लेकर भी लेखक ने हजारीप्रसाद द्विवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल का सन्दर्भ दिया है। लेखकद्वय कबीर को जुलाहा या कोरी जाति का ही मानते हैं।
अध्याय 4 में रामानंद स्वामी उनके गुरु थे या नही, इसपर लेखक की दृष्टि साफ है। वे कहते है कि, " अगर किवदंतियों के आधार पर यह मान भी लिया जाए कि कबीर रामानंद के समकालीन थे, जैसा कि हिंदी के प्रायः सभी आलोचक मानते हैं, तो क्या ब्राह्मण, वेद, वर्णव्यवस्था और अवतारवाद के खिलाफ़ कबीर के विचार यह साबित करने के लिए काफी है कि रामानंद उनके गुरु कदापि नही थे.."
 सबसे महत्वपूर्ण 5 वां अध्याय है जिसमे लेखक ने 'उन्नीसवीं सदी के विदेशी अख़बारों में कबीर' है। सम्भवतः इस दृष्टिकोण से कबीर को किसी ने नही लिखा है। कबीर के बारे में ब्रिटेन के अख़बारो में जितना छपा है उतना शायद तब, किसी अन्य समाज सुधारक के बारे में नही छपा। सर डब्लू डब्लू हंटर ने कबीर पर काम करते हुए उन्हें पन्द्रहवी सदी का "भारतीय लूथर" कहा है। ब्रैडफोर्ड आब्जर्वर, एलेन्स इंडियन मेल, Armgh Guardian, मॉर्निंग एडवरटाइजर, द वालारो टाइम्स एंड माइनिंग जनरल तथा आस्ट्रेलियाई अखबार एडवोकेट मेलबर्न आदि-आदि अख़बारो-पत्रिकाओं का उल्लेख किया गया है। विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए आपको क़िताब पढ़नी चाहिए।
 6 वां और 7 वां अध्याय कबीर पर गोरखनाथ का प्रभाव और कबीर के पारिवारिक किवदंतियां-कथाओं का वर्णन लेखक ने किया है।
8 वां अध्याय 'कबीर के विचार' 5 वें अध्याय के बाद सबसे प्रमुख अध्याय है। लेखक ने कबीर पर अद्वैत, बौद्धों, सिद्धों, सूफियों और नाथों का प्रभाव पड़ा। इसको साबित करने के लिए लेखक ने कबीर की बानियों को ही सामने रखकर सिद्ध किया है। कबीर को देखने-पढ़ने और समझने के लिए एक नए दृष्टिकोण से लिखी गयी किताब है।

लेखक ने बहुत मेहनत किया है। ब्रिटिश लाइब्रेरी, बिटिश, अमेरिकन, ऑस्ट्रेलियाई और जर्मन अख़बार को छान मारा है। आप इस क़िताब में संदर्भित ग्रन्थ की सूची देखकर ही समझ सकते हैं। क़िताब की छपाई बेहतर है लेकिन कही-कही मुद्रण में कमी है। प्रकाशक का ध्यानाकर्षित करना चाहता हूँ कि क़िताब का मूल्य अंतिम पृष्ठ पर 200/-रु और अंदर के पृष्ठ पर 150/- रु अंकित है। इसको स्पष्ट करना चाहिए।



अंततः कहा जा सकता है कि यह किताब संग्रहणीय है। आम पाठकों के साथ-साथ गंभीर अध्येताओं और शोधकर्ताओं को यह क़िताब जरूर पढ़नी चाहिए।     

बुधवार, 3 जून 2020

आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्मवादि वेदांत की मूर्खता को बार बार समझना होगा। यह भी समझना होगा कि बौद्ध धर्म की मूल देशना को चुराकर उन्होंने थोड़ी देर के लिए वाहवाही लूट ली लेकिन पाखण्ड का ऐसा दलदल निर्मित कर दिया जिसमे से आज तक हम नहीं निकल पाये हैं। बुद्ध ने कहा था कि कोई आत्मा नहीं कोई परमात्मा नहीं और कोई पुनर्जन्म नहीं है। शरीर सहित स्व या आत्म भी अन्य उपादानों या घटकों के मिलन से बनती है और उन्ही घटकों में बिखर जाती है। फिर इन बिखरे हुए शरीर और मनों के टुकड़े (विचार) हजारों अन्य टुकड़ों में मिल जाते हैं। इन टुकड़ों के विराट समुच्चय में से मुट्ठी भर टुकड़े फिर संगठित होकर एक अगले गर्भ में एक नया शरीर और मन या स्व बनाते हैं। यही अगला जन्म है। लेकिन यह उस पुराने व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं है। ये बहुत गहरी बात है इसे ध्यान से समझना होगा। यही बौद्ध धर्म का केंद्र है। स्व या व्यक्तित्व को ही आत्मा कहा गया है, उसी को बुद्ध ने नकारा है। न कोई स्वतन्त्र और आत्यंतिक व्यक्तित्व होता है न ही उसकी निरन्तरता होती है। जैसे एक पेड़ मरता है तो उसके शरीर की खाद पर दुसरे पेड़ पैदा हो जाते हैं या उस पेड़ को खाकर दूसरे जीव जन्म लेते हैं। लेकिन ये उस पेड़ का पुनर्जन्म नहीं है। एक जीवन से दूसरा जीवन आ रहा है लेकिन यह पहले व्यक्तित्व की निरन्तरता नहीं है। दूसरा व्यक्ति और उसका आभासी व्यक्तित्व एकदम नया है। यह पुनर्जन्म नहीं सिर्फ नया जन्म है। संघातों से उत्तपन्न इस शरीर और मन या स्व की वास्तविकता को गहराई से देख लें तो जीवन, शरीर, मन, घटनाओं और समय से तादात्म्य टूटने लगता है और दुःख का निराकरण होने लगता है। अब चूँकि कोई स्व या व्यक्तित्व मूल रूप से कही है ही नहीं इसलिए उससे मुक्ति संभव है। आभास से ही मुक्ति संभव है। वास्तविक से कोई मुक्ति संभव ही नहीं। अगर आत्मा अजर अमर और सनातन है तो मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण संभव ही नहीं है। अजर अमर को कैसे नष्ट किया जा सकता है? लेकिन वेदांत ने निर्वाण को प्रचलित मोक्ष या परमात्मा से मिलन के अर्थ में चुरा लिया और अनत्ता के दर्शन को मोह माया के निषेध के दर्शन की तरह रंग दिया। बुद्ध ने अनत्ता या शून्य को परम् मूल्य दिया था। अर्थात स्व या व्यक्तित्व नहीं है - ऐसा जान लेना निर्वाण है। इसी बात को वेदान्तियों ने चुराया और "मैं और मेरे से मुक्ति" को मोक्ष बताया। अब वेदांत की मूर्खता देखिये। कहते हैं मैं और मेरे से यानि व्यक्तित्व और आत्म भाव से मुक्ति ही मोक्ष है। फिर ये भी कहते हैं कि एक स्वतन्त्र अजर अमर आत्मा भी होती है। अब इन दोनों बातों को ध्यान से देखिये। एक तरफ आत्मभाव से मुक्ति की सलाह दे रहे हैं और दुसरी तरफ इसी आत्म को अजर अमर भी बता रहे हैं इस तरह आत्मभाव को - मैं और मेरे को मजबूत भी कर रहे हैं। अगर आत्म अजर अमर है तो उससे मुक्ति की जरूरत क्यों है? और अजर अमर से छुटकारा क्यों चाहिए? फिर आगे ये भी कहते हैं कि परमात्मा में आत्मा विलीन हो जाती है तो मोक्ष हो जाता है।अब जो चीज किसी दूसरी चीज में विलीन हो सकती है वो अजर अमर कैसे हुई? वेदांती स्पाइडर मेन अपने ही जाल में उलझ मरा है। इसीलिये इस मुल्क में एक सांस में एक तर्क देते हैं दूसरी सांस में विरोधी तर्क देते हैं। ये अनुलोम विलोम हजारों साल से चल रहा है। बेहतर हो कि बुद्ध को सीधे सीधे समझ लिया जाए। वेदांत की कन्फ्यूज्ड शिक्षाओं और आत्मा परमात्मा की जगह अब बुद्ध के शून्य और अनत्ता को आ जाना चाहिए। समय परिपक्व हो गया है।
 - संजय.. श्रमण..

रविवार, 31 मई 2020

छिछले प्रश्न गहरे उत्तर ----------------------------------

कौन जात हो भाई?
"दलित हैं साब!"
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं और अलग की हुई थाली में आते हैं साब! मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या खाते हो भाई?
"जो एक दलित खाता है साब!"
नहीं मतलब क्या क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या पीते हो भाई?
"जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।


क्या मिला है भाई?
"जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या किया है भाई?
"जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया और
आते-जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया! किया है न साब!
आपके चुनाव का प्रचार..।

बच्चा लाल 'उन्मेष'

शुक्रवार, 29 मई 2020

क्या बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के बाद जन्मा है? ======================== संस्कृत व्याकरण के विद्वान् पतंजली 150 BCE में अपने ग्रन्थ महाभाष्य में लिखते हैं: “आर्यों की भूमि कौनसी है? यह सरस्वती नदी से पूर्व में है. कालक वन के पश्चिम हिमालय के दक्षिण और परियत्र पर्वत के उत्तर में” इसका सीधा अर्थ है कि पतंजली के समय में आर्यावर्त (आर्यभूमि) की एक पूर्वी सीमा थी जिसके परे कोई अन्य सभ्यता या धर्म था. पतंजली के चार शताब्दी बाद मानव धर्म शास्त्र में मनु लिखते हैं “हिमालय और विन्ध्य के बीच प्रयाग पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र के बीच आर्यावर्त भूमि है” इसका अर्थ हुआ कि चार शताब्दी बाद पतंजली के लिए जो प्रदेश पूर्व में था वह मनु के लिए मध्यदेश बन जाता है. अर्थात यह क्षेत्र आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. आर्यभूमि के प्रसार के लिए रास्ता अग्नि और यग्य द्वारा बनाया गया इसका अर्थ हुआ ये लोग जंगल जलाते हुए और युद्ध करते हुए आगे बढ़े. मतलब साफ़ है, मनु तक आते आते वह पूर्वी प्रदेश जो आर्यों का नहीं बल्कि असुरों का था वह आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. पतंजली वर्णित कालक वन मनु द्वारा वर्णित प्रयाग या वर्तमान इलाहाबाद के निकट है.पतंजली महाभाष्य के ही समान बाद के बौधायन धर्म सूत्र (१.२.९) और वशिष्ठ धर्म सूत्र (१.८-१२) कहते हैं कि गंगा और यमुना के बीच का क्षेत्र आर्यावर्त है. अन्य स्त्रोत से शतपथ ब्राह्मण (१३.८.१.५) कहता है कि पूर्व (बिहार की ओर) असुर जन रहते हैं (असुरायः प्राच्यः), ये लोग बड़े बड़े गोल आकार के धर्मस्थल बनाते हैं. बाद में महाभारत में उल्लेख है कि इश्वर और वेद को न मानने वाले और गोल गुंबद बनाने वाले असुर अभी भी बने हुए हैं. इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मणों या आर्यों का और उनके धर्म का प्रसार पश्चिम से पूर्व की तरफ हुआ है. शतपथ ब्राह्मण की मानें तो पूर्व की तरफ असुर रहते थे जो सर घुटाये घूमते हैं और गोल गुंबद की तरह धर्मस्थल बनाते थे. ये गुम्बद असल में बौद्ध स्तूप हैं. ऐसी ही रचनाएं जैनों और आजीवकों की भी होती थीं. ये बौद्ध और जैन अहिंसक थे, युद्ध की भाषा में दक्ष नहीं थे. बाद में महाभारत काल तक असुर शूद्र बन चुके थें अर्थात आर्यों के गुलाम हो चुके थे और उनका बौद्ध धर्म क्षीण हो चुका था. अब गहराई से सोचिये, बौद्ध धर्म ब्राह्मण या आर्य आगमन से पहले भी अपने पूर्ण विक्सित रूप में था. इसका मतलब हुआ कि बौद्ध धर्म ब्राह्मण धर्म से न केवल पुराना है बल्कि पूरा ब्राह्मण धर्म बौद्ध धर्म के खिलाफ एक प्रतिक्रान्ति की तरह बुना गया है. यहाँ अंबेडकर एकदम सही साबित होते हैं. 

गुरुवार, 28 मई 2020

आज़मगढ़ शहर के चौक के पास एक स्थल है उसका नाम "बड़ा देव" है. जो अब एक हिन्दू मंदिर में तब्दील हो चुका है. कुछ वर्ष पहले तक एक पीपल के पेड़ के नीचे डीह बाबा की तरह कुछ हाथी और घोड़े की मृण्मूर्ति थी. अब नही होगा, पक्का !! शब्द की उत्तपत्ति को आप गौर से देखे तो पाएंगे कि यह "बुद्ध देव" का तद्भव "बूढ़ा देव" से और अंत मे "बड़ा देव" बना है। आप को मानने में परेशानी तो होगी लेकिन सोचिएगा....
लघु कथा-- मास्टर सुमेरन को आज कोर्ट में हाज़िर होना है . उन्होंने सरकार की सख़्त भाषा मे आलोचना की है. उनके ऊपर राजद्रोह एवं विभागीय प्रोटोकाल और नियमों के विपरीत लिखने का आरोप है. मास्टर सुमेरन कोर्ट के विटनेस बॉक्स में खड़े है. न्यायधीश पूछता है--"मास्टर सुमेरन आप पर राजद्रोह और अपने विभागीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा है. आप कुछ कहना चाहेंगे ? मास्टर सुमेरन कुछ क्षण चुप रहे फिर बोले, " मी लार्ड ! मैं एक नागरिक होने का फर्ज अदा कर रहा हूँ . मैं सरकार का नौकर होने से पहले एक नागरिक हूँ. इसलिए आलोचना करना मेरा अधिकार है. जब मैं वोट देकर किसी को प्रधानमंत्री बना सकता हूँ तो उसकी आलोचना करने का भी मेरा अधिकार है. और आप बताइए सरकार की आलोचना करना कबसे राजद्रोह हो गया ?" ये सब मुझे न समझाइए. आप कोर्ट में पूछे गए सवाल का जवाब दीजिए. आपके ऊपर सरकार को बदनाम करने और विद्रोह करने का आरोप है. जज ने तल्खी से कहा. सुमेरन को जवाब देना ही था. वे बोले, " मी लार्ड ! लाखों मजदूर, बच्चे, बुजुर्ग आदमी-औरत सड़को पर मर रहे हैं. और इस सरकार ने मुँह-कान बन्द कर रखा है. फिर तैस में आकर कहने लगे. "इन मजदूरों के साथ जो हो रहा उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की है. वो सब अपराधी है जो कुर्सी पर बैठे है. चाहे वह प्रधानमंत्री हो या गांव का प्रधान......" जज ने कहा-"कुर्सी पर तो मैं भी बैठा हूँ" सुमेरन जज की आंखों में आंखे डाल कर बोले,- "आप भी जिम्मेदार है मी लार्ड....."
आइए जानते हैं-- गद्दार दूधनाथ तिवारी को ----------------------------------------------------- अभी अभी 1857 के विद्रोह की आग बुझी भी नही थी कि भारत के सुदूर अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के पोर्ट ब्लेयर द्वीप पर आदिवासियों ने अंग्रेजों के सैनिक अड्डे रॉस आइलैंड पर हमला कर दिया. यह विद्रोह अंडमानी ट्राइब्स (aboriginies) ने अपने 5000 साथियों के साथ तीर-धनुष और भालों से अंग्रेजों की कॉलोनी रॉस आइलैंड पर किया था। लेकिन ये वीर अंडमानी ज्यादातर मारे गए, कुछ ग़ुलाम बनाए गए. अंडमानी हारे नही होते यदि वे दूधनाथ तिवारी को अपने कबीले में इज्ज़त-बेटी न दिया होता और अपने कबीले के राज को अपना हमदर्द समझकर बताया नही होता. दूधनाथ तिवारी बिहार का एक ब्राह्मण था उसने 1857 के सिपाही विद्रोह में भाग लिया था। वो नेटिव इन्फेंट्री 14 वें रेजिमेंट का साधारण सिपाही था. विद्रोह के बाद उसके ऊपर राजद्रोह और हत्या का आरोप लगाया गया और 8 अप्रैल 1858 को अंडमान के रॉस आइलैंड पर सजा काटने के लिए भेज दिया गया. लेकिन कुछ दिन बाद ही वो अपने अन्य 90 साथियों के साथ रॉस आइलैंड से भाग गया. वो भागकर जंगल मे गया उसके सभी 90 दोस्त जंगल मे ही भटक गए. उसमें कुछ भूख- प्यास और थक कर मर गए कुछ आदिवासियों द्वारा मारे गए. लेकिन दूधनाथ की तकदीर अच्छी थी. उसको आदिवासियों ने पकड़ लिया और अपने कबीले में ले गए. दूधनाथ तिवारी चालाक और शातिर था . वो आदिवासियों के बीच अच्छे तरीके से रहने लगा वो उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करता. उसकी अच्छाईयों को देखते हुए कबीले के मुखिया हीरा ने अपनी दो पुत्रियों लीपा (20 वर्ष) और जिगाह (16 वर्ष) के साथ उसका विवाह कर दिया.आदिवासियों ने उसे अपना मान लिया और अपने कबीले के सभी राज बता दिए. अंग्रेजो का अंडमान द्वीपसमूह पर आक्रमण करके कब्जा करना वहां के आदिवासियों को अच्छा नही लगा. वे समझते थे कि ये लोग हमारे रीतिरिवाज और उनकी आदिवासियत संस्कृति के लिए खतरा बन सकते हैं. अंदर ही अंदर विद्रोह की आग सुलग रही थी. Aboriginies कबीले में करीब 6000 की संख्या थी जिसमे से 5000 मर्द-औरतों ने रॉस आइलैंड पर आक्रमण करने की योजना बनाई. JP Walker एक अंग्रेज अधिकारी था और 1857 के विद्रोह के समय आगरा में एक अधिकारी के तौर पर नियुक्त था. जिसको विद्रोह के बाद प्रमोशन देकर रॉस आइलैंड अंडमान का सुपरिंटेंडेंट बना दिया गया था . दूधनाथ तिवारी मुखबिर बन गया और उसने अपने ही आश्रयदाताओं के ख़िलाफ गद्दारी की. ज्यादातर अण्डमानी आदिवासी मारें गए कुछ को पकड़कर जेल में डाल दिया गया कुछ को फांसी दे दी गई. इस विद्रोह को बुरी तरह कुचल दिया गया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी सिर उठाने के काबिल न बचा. यदि दूधनाथ तिवारी ने गद्दारी न किया होता तो भारत का सुदूर इलाका स्वन्त्रता की पहली अलख जगाता. आज भी किसी अण्डमानी के सामने दूधनाथ तिवारी का नाम ले लीजिए वो बहुत ही घृणित प्रतिक्रिया देगा.

सोमवार, 15 जून 2015

 मेरे  मित्र  साईं बाबा के परम भक्त हैं  प्रत्येक वर्ष नासिक की यात्रा पर जाते है और हर गुरुवार को मंदिर  जाकर दर्शन करते है। जाहिर है प्रसाद भी चढ़ाते है और उस प्रसाद को अपने परिवार अपने इष्ट मित्र को भी देते हैं। उनका मेरा परिचय पुराना है वे मेरी नास्तिकता से पूरी तरह परिचित है बावजूद वे हमेशा मुझको अपने रंग में रंगना चाहते है। इस ख़्याल के बावजूद भी कि मेरा रंग सूर्ख लाल है जिसपर और कोई  रंग कम ही चढ़ता है।
                                       एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कहा कि ,''एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर साहब के यहाँ चलना है।" आगे बताया कि ''वे साईं के बड़े भक्त है। '' मेरे यह कहने पर कि क्या वे आपसे भी बड़े भक्त है ? वे हँसने लगे और बोले कि ''हाँ !वे साईं बाबा के परम भक्त है। अपने घर में साईं की एक भारी मूर्ति लगा रखी है। और कई बार मुझे अपने घर आने के लिए बुलावा भेज चुके है। बड़े अच्छे आदमी है। '' मेरे मित्र ने यह बात एक सांस  कह डाली।
मै तैयार हो गया। हम दोनों उनके घर पहुँचे। उनका  महल नुमा घर देख कर अचंभित थे। चारो तरफ़ समृद्धता दीख रही थी। यह जानकार की हम दोनों आ गए है सम्मान पूर्वक अपने घर के अंदरूनी कक्ष में  गए। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के बाद एक बड़ा हॉल था  जिसमे साईं बाबा की एक बड़ी भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित थी।   साईं बाबा की निमलित आँखे  और ध्यानमग्नअवस्था  से आस्था और शांति  टपक रही थी। उस हॉल में सिर्फ कुछ चटाइयाँ और पूजा -अर्चना में   आने वाली सामग्री ही थी। वहाँ का माहौल पूरी तरह आस्थामय था। चारो तरफ शांति और गरिमामयी उपस्थिति झलक रही थी। मैनेजर साहब और उनकी पत्नी लगातार साईं बाबा के किस्से उनके आशीर्वाद से प्राप्त फल और अपने सुख -सुविधाओं अपने बच्चोंकी   नौकरी, शादी में आयी हुई  अड़चनों को दूर  में करने में बाबा की आशीर्वाद  को रस ले लेकर बता रहे थे। वे बता रहे थे कि हम परिवार के लोग इस हॉल में नंगे पैर ही आते है। सोफे -कुर्सी आदि पर नहीं बैठते। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों ?  तपाक से बोले , ''साईं बाबा के बराबर बैठने से उनका अपमान होगा।आगे बोले  " सुबह -रात दोनों वक़्त बाबा को भोग लगाते है और हम परिवार के लोग कुछ अंतराल के बाद ही भोजन करते है।पूछने पर कहने लगे  , " बाबा को भी खाने में समय लगता है।" मै उनकी "तार्किकता "  अभिभूत था।
उनकी पत्नी सहज -सरल लग रही थी। यह कह कर उठी कि मै आप लोगो के लिए चाय बनाती हूँ।  चाय आने के बीच मै उनके घर के अन्य हिस्से को देखने के लिए उठ कर खड़ा हो गया। मेरे मित्र और मैनेजर साहब बात करने में मशगूल थे। मै उनके घर के उसी हिस्से के पिछवाड़े चला गया।  चारो तरफ गंदगी बिखरी पड़ी थी। पुराने टूटे-फूटे कुर्सी-मेज ,घर के कबाड़ इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अचानक एक स्टोर नुमा कमरे से कुछ हिलता दीखता है। एक बारगी तो डर गया  लेकिन गौर करने लगा की यह किसी की कलाई है। करीब आने पर देखता हूँ एक बुजुर्ग हैं जो   मुझे देखकर अपने पास बुला रहे है.  वे भोजपुरी में पूछते है ,"कहाँ से आईल ह वा ? मेरे पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। मै उन्हें ध्यान से देखता हूँ उनकी हाथ और चेहरे की चमड़ी लटक गयी है। चेहरे पर महीनों से नहीं नहाने का प्रमाण दिख रहा है। जिस बिस्तर का वह इस्तेमाल करते है वह चिंदी-चिंदी हो चुकी है ,तकिया फट कर दो टुकड़ो  बिखरी पड़ी है।  मैंने अपने को सँभालते हुए पूछा ,"बाबूजी !आप मैनेजर साहब के पिता है ? उन्होंने केवल ऊपर-नीचे सिर  हिलाया। मैंने फिर पूछा ,"आप यहाँ पर क्यों है ?" इसका जवाब उनके पास शायद नहीं था। केवल पनियल आँखे थी ,जो सब कुछ बता रही थी।
तब-तक मैनेजर साहब  भनक लग गयी कि मै "वर्जित " इलाके में पहुंच गया हूँ ,जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। वे संभले और करीब-करीब खींचते हुए तथाकथित मंदिर में ले आये और बिना पूछे ही सफाई देने लगे ,"पिता जी की तबियत ठीक नहीं रहती है वे कभी-कभी उग्र हो जाते है चूकि  मै घर पर कम ही रह पाता हूँ इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से  अलग कमरे में रखा है। "
मैंने गंभीर होते हुए कहा , मैंने तो आपसे कुछ नहीं पूछा । "  उनका चेहरा खिसियानी बिल्ली की तरह   हो  गया था । उनकी पत्नी  चाय ले आयी। चाय की चुस्की की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी लेकिन जेहन में उस पिता की आवाज़ चुस्की की आवाज़ से तेज थी। ऐसी कडुवी चाय मैंने आज तक नहीं पी है !!!!






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रविवार, 18 जनवरी 2015

प्रतिगामी राह ---


 




 कवि  वेणुगोपाल की एक कविता का अंश है -
                        "कि हिंदी कवि तो 
                          डूबता- उतराता तो अपनी कविता में है 
                          लेकिन 
                          लाश अक्सर उसकी दिल्ली में मिलती है। "
वेणुगोपाल ने इस कविता के माध्यम से सत्ता और साहित्यकार के आपसी सम्बन्ध और परिणाम को रेखाँकित करने की कोशिश  चुटीले अंदाज से किया है लेकिन लोकप्रिय तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपनी मौत  की घोषणा कर निःसंदेह हम-सब को हैरान-परेशान कर दिया है। पेरुमल ने अपनी मौत की घोषणा अपने फेसबुक वॉल पर बेहद निराशा के साथ किया है। हिंदुत्ववादी -जातिवादी संगठनो के कारण वे बेहद परेशान और निराश थे इसलिए अपने विरोधियोँ से आजिज़ आकर मरने की खबर स्वयं अपने फेसबुक वॉल पर  करते है -"लेखक पेरुमल मुरुगल मर चुका है। वह ईश्वर नहीं है ,इसलिए वह फिर अवतरित नहीं होने वाला। इसके बाद एक अध्यापक पी मुरुगन जीवित रहेगा। " इस सुसाइड नोट में मुरुगन ने उन सभी लोगों को धन्यबाद देते हुए लिखा  है कि जिन्होंने उनका साथ दिया और एक लेखक की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए साथ खड़े रहे उन सबका बहुत-बहुत धन्यबाद। अपनी मृत्यु की घोषणा के साथ लेखक ने अपने सभी उपन्यास,कथा-कहानी,कविताएं वापस लेने की बात कही है। अपने प्रकाशकों से कहा है कि वे उनकी किताबों को न बेचें। मुरुगन अपने प्रकाशकों को धीरज और सांत्वना देते हुए लिखते है कि यदि प्रकाशकों को नुकसान होगा तो वे उनकी भरपाई करेंगे। साथ ही साथ अपने पाठकों के लिए भी लिखा है कि वे उनकी पुस्तकों को जला दें। अपने 'सुसाइड नोट' के अंतिम पंक्ति में जातीय ,धार्मिक और राजनीतिक समूहों से अपील करते हुए पेरुमल लिखते है , 'वे अपना विरोध समाप्त कर लेखक को अकेले छोड़ दे क्योकि उसने अपनी सभी किताबों को वापस ले लिया है। '
 पेरुमल मुरुगन अपने   उपन्यास  'माथोरुभगन' को  लेकर काफ़ी विरोध का सामना कर रहे थे। उनके विरोधियोँ में प्रमुख रूप से कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग है जो उपन्यास के विषयवस्तु ,भाषा को लेकर उग्र थे। इस समुदाय का आरोप था कि माथोरुभगन में उनकी जाति की महिलाओं और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। इसलिए कोंगू वेल्लाल गुंडर समुदाय के लोग लेखक से नाराज़ चल रहे थे। यह नाराज़गी तब और भी उग्र रूप धारण कर लिया जब इसमे हिंदुत्व वादी संगठनों  के नेताओं ने हिन्दू देवी -देवताओ के  अपमान का तत्व भी इस विरोध आंदोलन में मिश्रित कर दिया। तब से लेखक बहुत हताश और परेशान था।
प्रश्न यह नहीं है कि  लेखक ने किसी समुदाय ,व्यक्ति या धर्म की आस्था पर चोट पहुँचाया है बल्कि सवाल यह है कि हम किस दौर में रह रहे है कि ज़रा सी तर्क की गर्मी लगी नहीं कि आस्था नामक चीज़ पिघलने लगती है। हम उस दौर में रह रहे है जब  वोल्तेअर कह गया है कि , 'मै तुम्हारे विचारों से सहमत नहीं हूँ लेकिन तुम्हारे विचारों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ। 'तो क्या हम उलटी दिशा में विकास कर रहे है ,जहाँ अंततःहम सभी आदि दशा में पहुँच जाएंगे जहाँ पर आधुनिक यंत्र-संयंत्र और आधुनिक सुविधाएं भी रहेंगी और मध्यकालीन प्रतिगामी विचारों के वाहक भी होंगे ?अभी हाल में फ़्रांस में शार्ली एब्दो पर जानलेवा हमला हुआ जिसमे क़रीब दर्जन भर पत्रकारो और कार्टूनिस्टों की हत्या कर दी गयी, मात्र आस्था को लेकर। शार्ली एब्दो की घटना ज्वलंत उदाहरण है कि हमने विरोध को लोकतांत्रिक तरीके से लड़ना  सीखा ही नहीं यदि सीखा होता तो हमें एके 47 और एके 56 की ज़रूरत नहीं पड़ती और किसी लेख़क को अपनी 'मृत्यु' की घोषणा नहीं करनी पड़ती।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में -- 'तुम्हारी मृत्यु में
                                                      प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु
                                                      कवि कहीं अकेला मरता है। '



                       

रविवार, 20 अप्रैल 2014

                                

अपराधबोध 
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हंस के जनवरी 2014 के अंक में राजेंद्र यादव की सुपुत्री का पापा के नाम एक खुला पत्र प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में रचना ने अपने पिता के वसीयत का ज़िक्र करते हुये खेद के साथ व्यक्त किया है कि वसीयत की जानकारी न होने के कारण अनजाने में उनका अंतिम संस्कार धार्मिक कर्मकांड के साथ किया गया जबकि राजेंद्र यादव ने बाकायदे अपनी वसीयत में यह  इच्छा प्रकट की थी कि 'मेरे मृत शरीर को किसी अस्पताल में दान कर दिया जाय या फिर बिना किसी रीति -रिवाज़ के विद्युत दाह कर दिया जाये। '  लेकिन बक़ौल रचना , "मुझे इसका कोई अंदाज नहीं था ,दूसरा किसी अपने को अंतिम संस्कार का प्रबन्ध करने का मेरा पहला अनुभव था। सोचने की शक्ति तो जैसे ख़त्म ही हो गयी थी और सोच -समझ की ऐसी शून्यता में मै पण्डितो के कहे अनुसार चलती चली गयी ,जो उन्होंने बोला मै करती चली गयी -एक रोबोट की तरह। सोचा ही नहीं कि आप (राजेंद्र यादव )इन सबके कितने ख़िलाफ़ थे। "

ठीक इसी तरह की भावनाएं अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व दलित कहानीकार ओम प्रकाश वाल्मीकि ने व्यक्त किया। वाल्मीकि साहब ने बड़े दुःखपूर्वक यह सूचना दी कि , जिस रीति -रिवाज़ ,कर्मकांड ,आडम्बर का मै   भीषण विरोधी हूँ। उसी कर्मकांड के साथ मेरी पत्नी चंदा मेरी मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार करना चाहती है। इस  काम के सहयोग लिए अपनी बहन को भी बुला लिया है।   आपको बताता चलु ओमप्रकाश वाल्मीकि पिछले कुछ महीनो से रोग ग्रसित थे और करीब -करीब मृत्यु शैय्या पर पड़े थे। उनके जीवन की अंतिम सांध्य बेला जानकार उनकी पत्नी और साली ने मिलकर ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ उनका अंतिम संस्कार करने की योजना को कार्यरूप दे दिया था। 

तो क्या रचना और  चंदा को इसका ज़िम्मेवार माना जाय ? क्या राजेंद्र और ओमप्रकाश वाल्मीकि को मृत्यु के पश्चात उनके निहायत करीबी रिश्ते ने जो अपराध किया है उसके लिए उन्हें दोषी माना जाये ? क्यों न इसकी पूरी ज़िम्मेदारी स्वयं राजेंद्र यादव  औरओमप्रकाश वाल्मीकि को ही माना जाए। 

जनवरी 2014 के उक्त पत्र के पहले रचना यादव ने हंस के दिसंबर 2013 के अंक में स्मृतिशेष 'हे भगवान प्लीज़ मेरे पापा को कुछ मत होने देना 'लिख कर अपने पिता को श्रद्धांजलि दिया था। इस लेख में रचना ने अपने पिता को याद करते हुए ज़िक्र किया है कि ,"जिस उम्र में बच्चों को अपने पिता से स्नेह,संरक्षण,सुरक्षा और सहयोग आदि मिलता ही है ,मै बचपन से उन सबसे वंचित रही। तब पापा से मेरा इतना ही रिश्ता था कि मै जानती थी वे मेरे पिता है ,जो जन्मदिन पर मुझे उपहार देते है ,कभी -कभी हँसी -मज़ाक भी करते है और बस।  इसके सिवाय तो कुछ था ही नहीं। पापा की अपनी ही दुनिया थी. ……… उनकी इस निहायत निजी दुनिया में परिवार और परिवार वालो के लिए तो कोई जगह थी ही नहीं।"

रचना ने जो अपराध अपने पिता की मृत्यु के बाद अनजाने में किया,उक्त पंक्तिं को पढ़ने के बाद आपको रचना से नाराज़गी होने के बजाय सहानुभूति होने लगती है क्योंकि राजेंद्र चाहे कितने बड़े रचनाकार विचारक क्यों न हो एक पिता ,एक पति के रूप में असफ़ल ही रहे। उसी असफ़ल पिता का अंतिम संस्कार यदि अनजाने में ब्राह्मणी कर्मकांड के साथ कर देती हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी रचना के वजाय उनके पिता पर ज्यादा मानी जानी चाहिए। 

चूकि ओमप्रकाश वाल्मीकि की पत्नी चंदा इस प्रकार लिख कर अपने पति को श्रद्धांजलि नहीं दिया है इसलिए उनके विचारों को जानना अभी तो कठिन ही है। मै चंदा को समझने के लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' का सहारा लेता हूँ। जूठन में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है , 'बात सन 1980 के आस -पास की है। मै और मेरी बीबी चंदा राजस्थान भ्रमण से वाया दिल्ली चंद्रपुर (महाराष्ट्र ) लौट रहे थे। जयपुर से पिंक सिटी एक्सप्रेस में सीट मिली थी। पास की सीट पर एक संभ्रांत परिवार पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे बैठे थे ,जो जयपुर से नई दिल्ली जा रहे थे। बात -चीत में पता चला कि पति किसी मंत्रालय में अधिकारी थे। सामान्य बात -चीत चल रही थी। सहज और सुखद वातावरण था। राजस्थान की खूबसूरती पर चर्चा चल रही थी। मेरी पत्नी और अधिकारी की पत्नी घुलमिल कर बतिया रही थी। स्त्रियों में परिचय की दीवार जल्दी टूटती है। अचानक बातचीत का विषय बदल गया। अधिकारी की पत्नी ने मेरी पत्नी से पूछा ,"बहन जी आप लोग बंगाली है ?"  मेरी पत्नी ने सहजता से उत्तर दिया ,"जी नहीं ,उत्तर प्रदेश के है। मेरे पति आर्डिनेंस फैक्टरी ,चंद्रपुर में पोस्टिड है। "
कौन जात हो" अधिकारी की पत्नी ने दूसरा सवाल दागा। प्रश्न सुनते ही मेरी पत्नी का चेहरा फ़क्क पड़ गया और वो मेरी और देखने लगी। 
सारा माहौल बिगड़ गया। जैसे अचानक स्वादिष्ट व्यंजन में मक्खी गिर गयी। जब तक मेरी पत्नी कुछ देती ,मैंने कहा -"भँगी"
भँगी शब्द सुनते ही सन्नाटा छा गया। '

जातिवाद के इतने कठोर दंश को सहने के वावजूद चंदा अपने पति का अंतिम संस्कार उसी ब्राह्मण वादी तरीके से कर रही है वो भी उस व्यक्ति का जो ब्राह्मणवाद का घोर विरोधी रहा है। तो क्या इसके लिए चंदा को ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए ?
राजेंद्र यादव को एक विचारक ,बुद्धिजीवी और काल मरोड़क संपादक के तौर पर याद किया जाना चाहिए। यह वही राजेंद्र है जिन्होंने अन्धविश्वास ,कुरीतियाँ ,पुरुषवादी अहंकार ,धर्म और वर्ण जाति पर कस कर चोट पहुंचाया। अपनी क़लम से उन्होंने समाज के अंतर्विरोधों का जम कर लिखा। 

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी अपनी कहानियो ,कविताओं के माध्यम से वर्ण व्यस्था और परलोकवादी व्यवस्था के प्रबल विरोध करते रहे है ,उन्ही के साथ ऐसा छल ?

तो फिर क्यों न उन्हें ही स्वम का अपराधी माना जाए ????
राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ मृत्यु के पश्चात जो कुछ हुआ ,बुरा हुआ लेकिन इसके जिम्मेवार तो वे ही है। उन्होंने दुनिया को बदलने का जो सराहनीय प्रयास किया है इसके लिए उन्हें पूरा प्रगतिशील समाज याद रखेगा लेकिन अपने ही परिवार को बदल पाने और उस मानसिकता से दूर न कर पाने की ज़िम्मेदारी तो उनकी ही है। ऐसा क्यों  होता है कि महान व्यक्ति दुनिया को बदलने का ज़ज्बा लिए दिन रात एक कर देते है वही अपने घर ,अपने लोगो जिनके साथ वह हर समय रहता है उसी पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता ?इसके लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार क्यों नहीं माना जाए। 

काश ऐसा होता तो उनके करीबियों को किसी वसीयत की ज़रूरत नहीं पड़ती, किसी चंदा को अपने पति को न समझने का आऱोप नहीं लगता ,और न विरोधियो को हँसने का मौका मिलता। 

                                                                           
                                                                               

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

 पिछले हफ्ते एक जरूरी काम से सासाराम जाना पड़ा।  तो लगे हाथ शेरशाह सूरी का मक़बरा देखने चला गया।
अकबर के राज्यकाल के पूर्व हिन्दू -मुस्लिम स्थापत्य कला का संभवतः सबसे सुंदर नमूना शेरशाह का मक़बरा है। इसे स्वयं शेरशाह ने सहसराम  बिहार में झील के बीच कुर्सी देकर बनवाया था। इसकी डिजाइन मुस्लिम है,लेकिन इसके भीतरी भाग में हिन्दू ब्रैकेट और पटाई के तीरो के ऊपरी भागो (horzontal architraves) का सुन्दर प्रयोग किया गया है। किसी आलोचक ने ठीक कहा है ,"तुगलक काल की इमारतो के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के बीच जैसे संपर्क स्थापित करता है। "

इतनी  खूबसूरत कला का हस्र देखकर दिल टूट गया। चारो तरफ़ गंदगी का जैसे अंबार लगा है। झील में इतनी काई जमी है कि पानी काला -मटमैला दिखता है। यद्यपि यह भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन है जिस पर सम्भवतः लाखो रूपये सलाना इसकी देखरेख के लिए आता होगा।
दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हम अपनी विरासत को बचाने में असमर्थ है ………………।




























फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...