मंगलवार, 19 मार्च 2013

mera gaawn.....aur uski chhavi

३ मार्च को पहुच गए अपने गाँव ..............यहाँ आने के बाद बचपन की कई यादे हिलोर मारने लगती है।  मेरा गाँव भी उसी तरह का है जैसे आप-सब का होता होगा।चारो तरफ खेत -खलिहान और पेड़-पौधे,चारो तरफ हरियाली और चारो तरफ खेतो में खिलते उपजते फसले।   इन्ही सब को देखने,महसूसने आ गया गाँव अपने कैमरे के साथ।   

 बहुत पुराना यह पाकड़  का पेड़ है।  मुझे आज भी याद है मै इसकी जड़ो पर बैठ कर पी-पी (गाड़ी) चलाया करता था। मैंने अपने बाबा को नहीं देखा था मेरे जन्म से ही पहले वो दुनिया को छोड़ कर चले गए थे,मेरी दादी(ईया) बताया करती थी की,"बबुआ तोहार बाबा इसी पेड़वा के नीचे बईठ के गाय और भैसइन के चरावत रहले" मै भी इसकी जड़ो पर बैठ कर अपने बाबा को महसूस करता था।
इसी पाकड़ के  पेड़ के ठीक सामने से नदी बहती है।साफ़ -शुद्ध और निर्मल।  हजारो बार इस नदी में नहाया हूँ और आज भी नहाने में वही आनंद और उत्साह आता है।  एक दर्दनाक घटना भी है जो इस नदी के पास आते ही आँख के सामने तैरने लगती है।राजकुमारी नाम था उसका बमुश्किल ६ वर्ष की थी और मै भी उसी की उम्र का ,हम दोनों गाँव के कई बच्चो के साथ नहा  रहे थे कि वो नदी की धारा में न जाने कब समां गयी।  उसकी माँ का रोदन आज भी याद है .........
नदी के उस पार खरबूजा और ककरी की खूब फसल होती थी और हम सब बदमाश नदी पार करके खरबूजा और ककरी की फसल को चुरा लाते थे।  कई बार मार खाए लेकिन जो आनंद चुरा कर खाने में आता था वह आनंद खरीद कर खाने में कहाँ?


 इस पेड़ की कहानी भी बड़ी रोचक है।इसको मेरे पापा ने लगाया था और कहते है कि वह रोज इसकी जड़ो में पानी डाला करते थे।गांव के बड़े-बुजुर्ग पापा को समझाया करते थे कि यह पेड़ तो खुद नदी के किनारे है इसे पानी कि जरूरत ही नहीं है।बाद में जब यह पेड़ बड़ा हो गया तो गाँव के बच्चे इसकी डाल को पकड़ कर बाढ के दिनों में नदी में कूदा करते थे और आज भी वैसे ही कूदा करते है ........
 इसको खोप कहते है।कही -कही बखार भी कहा जाता है। इसमे अतिरिक्त अनाज  रखा जाता है।  यह प्राचीन काल का cold house है जिसमे बिना किसी तकनीक के अनाजो को सुरक्षित रखा जाता है ....
 गाँव की अमराई ....चारो तरफ शांति ही शांति .....
उसी पी-पी वाले पेड़ के सामने छठ माई का स्थान ...........वास्तव में यह एक बौद्ध स्मारक का प्रतीक है   जो बाद में चल कर हिन्दु प्रतीक का रूप धारण कर लिया।   पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में हजारो ऐसे स्मारक मिलेगे जो पहले बौद्ध धर्म के धार्मिक पूजा स्थल थे।
 मेरे पिता द्वारा लगाया गया पेड़ और पी-पी वाला पेड़ ..........के बीच में छठ मईया का मनोरम दृश्य ...
                                                एक और खोप ............जिस पर सुबह का प्रकाश पड़ रहा है
                     खोप और झोपड़ी के बीच सुबह का सूर्य ......जिसकी लालिमा छन कर आ रही है
गाँव के बाहर रहते है यह दरिया बाबा के अनुयायी ...नाम है साहब राम आशीष जी।मैंने पूछा कि आप दरिया बाबा के ही शिष्य क्यों है?  क्या आप जाति-पात को मानते है?..पहले प्रश्न के उत्तर में इन्होने कहा कि "दरिया बाबा किसी आडम्बर किसी दिखावा को नहीं मानते इसलिए मै इनकी तरफ आकर्षित हो गया और बाबा का अनुयायी बन गया।  दूसरे प्रश्न का उत्तर पहले में ही है दरिया बाबा किसी को न बड़ा न किसी को छोटा मानते है ...........
मैंने इनसे दरिया बाबा के  बारे में जानना चाहा तो आपने उनकी एक किताब पकड़ा दी।फोटो में जो किताब दिख रही है वो अब अब मेरे पास है .............घर ले जाकर इसका अध्ययन करुगा .....
 साहब राम आशीष जी ज्ञान दीपक नामक किताब पढते हुए ----
 कुछ दोहे आप को सुनाता हु --धोखा है धंधा या जग बंधा,अँधा चक्षु का सो धावे।।
                                             विविध सियाना मन अरुझाना,झीनि जाल में सो आवै।।

                                             लालच लागी मृग पगु पागी, अमर कोस धरी दुख दावे।।
                                             फीटीक शिला गज दसन हिला ,हलित भये तन दुःख पावै।।
मेरे बड़े पिता .....गौर से देखिए होठ के नीचे ....समझ गए न ....सुर्ती यानि खैनी दबाये हुए।निहायत सरल लेकिन कर्मठ ...दिन भर कुछ न कुछ करते हुए ...कहते है खाली बैठने से  हाजमाँ और दिमाग दोनों गड़बड़ा जाता है।

mere shahar me.....

         " क्यों बंजर होती जा रही साहित्य की समृद्ध भूमि"

आज़मगढ़ के साहित्यिक योगदान के सन्दर्भ में इतिहास को यदि खंगाले तो यह धरती साहित्य व विचार की एक संमृद्ध भूमि रही है।  यह धरती प्राचीन काल से ही वैचारिक एवं सांस्कृतिक रूप से विरासत का एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में अपनी एक स्पष्ट व मौलिक पहचान बनाई और इसी पहचान को अयोध्या सिंह उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन, कैफ़ी आज़मी , शिब्ली नोमानी आदि अनेक साहित्यकारों ने इसको आगे बढाया।  यह प्रश्न उठता है कि क्यों यह समृद्ध भूमि आज पूरी तरह से साहित्य एव विचार के क्षेत्र में बंजर है,  क्यों इस भूमि पर नई कोपलो का जन्म नहीं हो रहा है ?  क्यों कोई नये विचार की कलियाँ नहीं खिल रही है।  एकाध उदाहरणों को छोड़ दे तो यह प्रश्न आपको -हमको विचलित तो करते ही है कि क्यों साहित्य के क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज नहीं हो पा रही है। वैसे यह प्रश्न पूरे हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रो के ऊपर सटीक बैठती है लेकिन यहाँ पर मै केवल आजमगढ़ के सन्दर्भ में बात करूँगा।  
आज़मगढ़ भी उसी हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र में पड़ता है, जिसको राजनीतिक भाषा में काऊ बेल्ट कहते है।  यह वही काऊ बेल्ट क्षेत्र है, जो सामंती प्रवृत्ति,उंच-नीच, जाति -पात के घेरे में बुरी तरह जकड़ा हुआ था।  आज़ादी के बाद भी यह प्रवृत्तिया कमोवेश जारी है।  यहाँ के साहित्यकारों के बीच आपसी तनातनी, वैचारिक मतभेद (मनभेद)और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी नए कवियों, लेखको के लिए राह नहीं खोल सकी।  वरिष्ठ साहित्यकारों को आपसी मतभेदों से ही फुर्सत नहीं मिल सकी कि वह एक नवीन विचार दे या नए विचारो को पनपने में सहयोग कर सके।  हिंदी प्रकाशको का व्यवहार भी साहित्यकारों को उभरने न देने के के लिए जिम्मेदार रहे है।  यह प्रकाशक लाभ के लिए और सरकारी खरीद के लिए ही पुस्तको का चयन करते है।वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव का कहना  बिलकुल सही है कि हिंदी साहित्य को नुक्सान जितना हिंदी के विरोधियो ने नहीं किया उतना कालेजो व विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, लेक्चररो और रीडरो  ने किया।  हिंदी साहित्य की रीढ़ तोड़ने में इनका बड़ा योगदान है।।।


                                                                                           यह लेख दैनिक हिंदुस्तान के वाराणसी संस्करण   दिनांक 12  मार्च 2013  को "मेरे शहर में" नामक कालम में प्रकाशित हुआ।

बुधवार, 6 मार्च 2013

डॉ आंबेडकर द्वारा वर्ण व्यवस्था के बारे में गाँधी की आलोचना का उत्तर (पैरा 6 )

 क्या महात्मा गाँधी जिस बात का प्रचार करते है स्वयं भी उस पर चलते है ?जिस चीज का उपयोग सब जगह होता हो,उसका व्यक्तिगत रूप से वर्णन करना मनुष्य पसंद नहीं करता।लेकिन जब मनुष्य किसी एक सिद्धांत का प्रचार करता है,और उसे एक सिद्धांत मानता है,तो यह जानने की इच्छा होती है कि वह व्यक्ति स्वयं उस बात पर कहाँ तक व्यहार करता है,जिसका वह स्वयं प्रचार करता है।यह संभव है कि उन सिद्धांतो के अनुसार चलने में उसे सफलता न मिली हो,क्योकि या तो उसके सिद्धांत इतने ऊँचे है कि उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता,अथवा उनके अनुसार व्यहार करने में असफलता का दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि यह केवल उस व्यक्ति का स्वाभाविक घमंड है।कुछ भी हो,वह हमारे सामने जांच के लिए छोड़ देता है।
मुझे कुछ दोष नहीं देना चाहिए अगर मै महात्मा जी से यह पुछू कि उन्होंने अपने सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए अपनी ही व्यस्था में कितना प्रयत्न किया है। जन्म से महात्मा जी बनिया है।उनके पुरखे कामर्स त्याग कर  राजवाड़ा के दीवान बन गए ,जो ब्राह्मणों का पेशा है। महात्मा जी को अपने महात्मा बनने से पहले जीवन में जब पेशा अपनाने का समय आया तो उन्होंने तौल की अपेक्षा बैरिस्टरी को उचित समझा। फिर कानून का पेशा त्याग कर वह आधे राजनीतिज्ञ और आधे संत बन गए। वाणिज्य जो उनके पूर्वजो का पेशा है, उन्होंने कभी छुआ तक नहीं। मै  उनके छोटे पुत्र को लेता हूँ, वह जन्म से बनिया और अपने पिता का सच्चा अनुयायी है। उसने एक समाचार पत्र के मालिक के यहाँ नौकरी कर रक्खी है, और अपना विवाह एक ब्राह्मण लड़की के साथ किया है। मुझे नहीं मालूम कि महात्मा जी ने अपना पैतृक  पेशा न करने के लिए उसे कभी बुरा कहा हो। किसी भी आदर्श की जाँच करने के लिए उसके केवल निकृष्टतम  उदाहरणो को लेना गलत एव कठोर हो सकता है। निश्चय ही महात्मा जी से अच्छा कोई  दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता।
अगर वो स्वयं अपने आदर्शो को सिद्ध करने में सफल नहीं होते है तो उनका वह सिद्धांत निश्चय ही असंभव है और व्यक्ति के व्याहारिक ज्ञान के बिलकुल विपरीत है।
जिन लोगो ने कर्लायल की पुस्तको का अध्ययन किया है, वे जानते है कि वह सोचने से पहले ही किसी विषय पर बोल दिया करता था। मालूम नहीं जाति -भेद के विषय में महात्मा जी दशा वैसी ही तो नहीं है। नहीं तो कई प्रश्न जो मेरे ध्यान में आते है,ऐसे ही वह बच  कर नहीं निकल सकते। किसी व्यक्ति के लिए किस समय किसी कार्य को अनिवार्य ठहराने के लिए कोइ कार्य पैतृक माना  जा सकता है? क्या किसी पैतृक पेशे को चाहे वह उसकी क्षमता के अनुरूप न हो और उससे कोई लाभ भी न होता हो, उसे करना उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है? क्या किसी ऐसे पैतृक व्यवसाय से चाहे वह व्यक्ति को पाप युक्त ही क्यों न हो, पेट पालना  चाहिए? अगर हर मनुष्य के लिए यह अनिवार्य हो कि  वह अपने बाप-दादा का ही पेशा करे तो कुटने  के बेटे को कुटना ही बनना चाहिए, क्योकि उसका दादा कुटना था और उसकी स्त्री को वेश्या ही बनना चाहिए, क्योकि उसकी दादी वेश्या थी? क्या महात्मा जी अपने बाद के तर्कयुक्त परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार है? मेरे विचार से उनके आदर्श में व्यक्ति को वही व्यवसाय करना चहिये जो उसके बाप-दादा का हो? यह केवल असंभव या अव्यवहारिक ही नहीं अपितु नैतिक दृष्टि से भी अमानवीय है।

शनिवार, 2 मार्च 2013

vaigyanik bhautikvaad (rahul sankritayan)

                                   प्राचीन भारत में यौन सदाचार 

धर्मात्मा लोग जिस वक़्त सदाचार की बात करते है,उस वक़्त उनके ख़याल में रहता है कि सदाचार एक ऐसा अटल-अचल विधान है जो सभी देश काल में एक सा बना रहता है,किन्तु यह धारणा बिल्कुल गलत है।उत्तरी भारत मामा-फूफी की लड़की सगी बहिन के सामान मानी जाती है,जबकि उड़ीसा और गुजरात से दक्खिन उन्हें ब्याहने का हक़ सबसे पहले ममेरे-फुफेरे भाई का होता है।और प्राचीन भारत के सदाचार को जानना चाहते है तो पुरानी पुस्तको को उलटकर देखिये,मैंने इनके बारे में अन्यंत्र (मानव-समाज पृष्ठ 88-96)काफी लिखा है,यहाँ उससे कुछ पंक्तिया उद्धृत करता हू -
"नदी पार होते-होते पराशर का सत्यवती(मल्लाह पुत्री )के साथ समागम प्रसिद्ध है।"यदयपि यहाँ ग्रंथकार ने पराशर के दिव्यशक्ति से कोहरा पैदा कर लज्जा ढकने की कोशिश की है,किन्तु उत्त्थ्यपुत्र दीर्घतमा -ऋग्वेद के कितने ही सूक्तो के कर्ता तथा पीछे गौतम नाम से प्रसिद्ध गौतम-गोत्रियो के प्रथम पूर्वज -ने लोगो के सामने ही स्त्री समागम किया।
"उस पुराने युग में ऋतुकाल के अवसर पर स्त्री किसी पुरुष से रति की भिक्षा माँग सकती थी।शर्मिष्ठा ने इसी तरह ययाति से रति भिक्षा माँगी थी (महाभारत ,आदिपर्व 82) यहीनहीं  ऐसी भिक्षा का देना न स्वीकार करने पर गर्भपात के सामान  होता है,यह भी वही बताया गया है।उलूपी ने भी अर्जुन से रति भिक्षा मागते हुए कहा था कि  स्त्री की प्रार्थना पर एक रात का समागम अधर्म नहीं है। उतंक ने ऋतु  शांति के लिए अपनी गुरु-स्त्री के साथ गमन किया और उसे बुरा नहीं समझा गया।चंद्रमा ने अपने गुरु बृहस्पति की भार्या तारा  के साथ रति की,जिस से बुध पैदा हुआ। गौतमी पत्नी अहल्या का इंद्र के साथ सबंध प्रसिद्ध  है,किन्तु गौतम ने अपनी पत्नी को सदा के लिए त्याज्य नहीं बनाया।


महाभारत काल में विवाह-बंधन कितना शिथिल था,इसके कितने ही उदहारण तो कुमारी कन्याओ से प्रतिष्ठित पुत्र(कानीन )हैं। पांडवो की माँ कुंती जब कुमारी थी ,तभी उस से कर्ण पैदा हुआ था। कुमारी गंगा से शांतनु ने भीष्म को पैदा किया था।पराशर ने कुमारी सत्यवती (मल्लाह पुत्री ) से व्यास को पैदा किया था,पीछे यही सत्यवती शांतनु की रानी बनी।कुंती की सौत माद्री की जन्मभूमि मद्रप्रदेश (वर्तमान स्यालकोट के आस-पास के ज़िले )के उन्मुक्त स्त्री -पुरुष सम्वन्ध की कर्ण ने कड़ी आलोचना की है। .....मद्र देश में पिता ,पुत्र ,माता ,सास ,ससुर ,मामा ,जमाई बेटी ,भाई पाहून ,दास ,दासी का यौन  समिश्रण बहुत ज्यादा था। वहा  की स्त्रिया स्वेच्छापूर्वक पुरुष -सहवास करती ,अपरिचित के साथ भी प्रेम के गीत गाती।गांधारियो की भाति माद्रिया  भी शराब पीती ,नाचती।वहा वैवाहिक सम्वन्ध नियत न था ,स्त्रिया मनमाना पति करती।एक स्त्री के कई पति का उदहारण प्रातः -स्मरणीय पञ्च -कन्यायो में एक द्रोपदी हमारे सामने मौजूद है।

"बहिन ,बेटी -पोती के साथ के व्याह के कितने ही उदहारण हमें इन  पुराने ग्रन्थो में मिलते है।इक्ष्वाकु के निर्वासित कुमारो ने अपनी बहिनों से व्याह कर शाक्य वंश की नीव डाली -एस तरह का व्याह स्याम के राजवंश में अब भी मौजूद है। दशरथ जातक के अनुसार सीता राम की बहिन और भार्या दोनों थी।ब्रह्मा की अपनी पुत्री सरस्वती पर आसक्ति पूरण प्रसिद्ध है।ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की कन्या ने अपने दादा (ब्रह्मा )से व्याह किया था। बिना व्याह के स्त्री -पुरुषो का जिस तरह उन्मुक्त सम्वन्ध उसे देखते कोई कह नहीं सकता की यौन सदाचार भारत में सब देश -काल में एक सा चला आया है।जो बात भारत के बारे में है,वही दुनिया के दुसरे मुल्को पर भी लागू है।"

यौन ही नहीं सभी प्रकार के सदाचार बराबर बदलते रहते है।एंगेल्स ने इसी बात की और ध्यान दिलाते हुए लिखा है --
"यदि सच -झूठ के सम्बन्ध में हमने बहुत तरक्की नहीं की ,तो भलाई -बुराई के बारे में तो हम और भी पीछे रहे । भलाई -बुराई का ख्याल एक जाति से दूसरी जाति ,एक काल से दुसरे काल में इतना बदला है कि अक्सर वह एक दुसरे से बिलकुल उलटा है।

एथेंस का न्याय वही नहीं था ,जो आज के इंग्लैंड या भारत का है।याज्ञावल्क्य की भाती सुकरात के श्रोता भी दासता को अन्याययुक्त नहीं समझते थे। बीसवी सदी के भारत में कितनी ही बाते न्यायनुमोदित है ,जिन्हें २२ वीं सदी का भारत अन्याय नहीं समझेगा।


शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

namak majduro ki dasaa, marne ke baad bhee peechha nahi chhutta

                              कच्छ के नमक मजदूर 

कच्छ के रण में बनने वाला नमक देश की करीब 75 फ़ीसदी नमक की जरुरत को पूरा करता है लेकिन बहुत कम लोगों को इस कारोबार में लगे अगरिया समुदाय के नमक मजदूरो की त्रासदी का भान है।ये मजदूर जिंदगी भर नमक बनाते है और अंत में मौत के बाद इन्हे नमक में ही दफ़न कर दिया जाता है।नमक मजदूरों के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि नमक में लगातार काम करने के कारण इनकी टांगे असामान्य रूप से पतली हो जाती है और इस कदर सख्त हो जाती हैं की मौत के बाद की चिता की आग भी उन्हें जला नहीं पाती।
                                               नमक के खेतो में काम करने वाले मजदूर बताते है कि इसलिए चिता की आग बुझने के बाद इनके परिजन इनकी टांगो को इकट्ठा करते है और अलग से नमक की बनाई गई कब्र में दफ़न करते है,ताकि वे अपनेआप गल जाए।
अहमदाबाद से 235 किलोमीटर और कच्छ जिला मुख्यालय से 150 किलोमीटर दूर स्थित सूरजबारी अरब सागर से मात्र 10 किलोमीटर की दुरी पर है।गुजरात के पर्यटक अधिकारी मोहम्मद फारुक पठान ने बताया,"समुदाय के लोग यहाँ सदियों से रह रहे है और जीविका के रूप में उन्हें केवल येही काम आता है। यहाँ का भूजल समुद्री जल के मुकाबले दस गुना अधिक नमकीन है।इस भूजल को नलकूपों से निकाला जाता है और उसके बाद उस पानी को 25 गुना 25 मीटर के छोटे-छोटे खेतो में भर दिया जाता है।पठान ने बताया कि "जब सूरज की किरणे इस पानी पर पड़ती है,तो यह धीरे-धीरे सफ़ेद नमक में बदल जाती है।अगरिया मजदूर हर 15वे दिन इन खेतो से 10 से 15 टन नमक बनाते है।इसके बाद इस  नमक को ट्रकों और ट्रेनों में भर कर देश भर की नमक कंपनियों और रसायन फैक्ट्रियो को भेजा जाता है।।।।।।
                                                                    


                                                                                           29 जनवरी 2013
                                                                                           राष्ट्रीय सहारा 

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

chhatisgarh yatra


                  खोपा गांव घूमते-घूमते शाम हो गयी वापसी के वक़्त रास्ते में एक जंगल का फोटो 
आदिवासी का घर जिसका मालिक कही काम से गया है इसीलिए घर बंद है।आप गौर से देखे दरवाजे पर कोई  ताल नहीं लगा है। क्या गरीबी और इमानदारी के बीच कोई सम्वन्ध है ?
 घरो के चारो ऒर मिट्टी की दीवार बना दी जाती है चूकी यहाँ की मिट्टी दोमट लाल होती है जिसके कारण बरसात में यह आसानी से बहती या इसका कटाव नहीं होंता वर्षो तक ज्यों का त्यॊ पड़ा रहता है।
                             डूबता हुआ सूरज जिसकी छटा देखते ही बनती थी।

                       मै और मेरे जीजाजी जिनकी पुत्री के विवाह में शामिल होने के लिए आए थे।

                                                         रिश्तेदार साथ में मेरा परिवार
                                                शाम को पिकनिक मनाते परिवार के सभी लोग
                                            मेरे मित्र सुरेश जी और आदरणीय जीजाजी
                                         रूबी मेरी भांजी जिसके विवाह में हम सब शामिल थे.
                                          एक साथ पिकनिक मनाते साथ में सभी लोग खाना खाते हुए.

CHHTISGARH YATRA

           आदिवासी बाहुल्य खोपा गांव में घूमने के दौरान पता चला की यहाँ पर एक सिद्ध देवी का एक खुला मंदिर भी है।जाकर देखा तो यह एक खुला मैदान रुपी मंदिर था जहाँ पर चारो तरफ खून और शराब के सबूत बिखरे पड़े थे।
मंदिर के मुख्य द्वार पर दो अन्धे आदिवासी हाथ फैलाए छत्तीसगढ़ी बोली में भीख मांग रहे थे ,पूछने पर यह अपने आप को देवी का भक्त बताने लगे।
        मुख्य द्वार से कुछ कदम आगे जाने पर एक बैगा(पुजारी) आपके द्वारा लाये गए पूजा सामग्री को लेकर मंदिर की एक अन्य मूर्ति पर चढ़ावा चढ़ा देता देता है।
                                   येही मुख्य देवी है जिनकी पूजा करने लोग दूर-दूर से आते है
       इनका नाम सुखे लाल है जो मुख्य पुजारी यानि की बैगा है।जब मैंने इनके बारे में पूछा तो इन्होने अपने को बेगा बहादुर बताया।यह लगातार भुनभुना रहे थे जैसे कोई मंत्र पढ़ रहे हो।कुछ वर्ष तक आदिवासियो की पूजा प्रणाली में ब्रह्माणी तत्व नहीं दीखते थे लेकिन अब इसकी भरमार है।इसका कारण मेरी समझ से यह है कि पहले यहाँ पर केवल आदिवासी आते थे लेकिन अब भारी मात्रा में गैरआदिवासी भी यहाँ पर सर झुकाने और बलि देने आते है।
        पत्थरों पर चारो तरफ दूध,शराब और खून इस कदर बिखरा हुआ मिलेगा।सोचने लगा की भला यह कौन सी देवी है जो एक ही साथ दूध,शराब और खून का भक्षण करती है।
         जब पंहुचा तो एक नौजवान जोड़ा अपने उज्जवल भविष्य के लिए बलि दे रहा था,सामने एक सिर विहीन बकरा छटपटा रहा था और उसके गर्दन से खून पिचकारी की तरह निकल रहा था। दृश्य देख कर मै  थोड़ी देर के लिए बिचलित हो गया।
        अभी कुछ ही देर हुआ था की एक और बलि के लिए बकरा आ गया।इस फोटो में आपको कन्हई राम दिख रहे है जिनका काम काम है आने वाले बकरे की बलि देने में सहायता करना।
           बैगा के दूसरे साथी,जिनका काम है बकरे की गर्दन को उडाना और इस तरह उड़ाना की ज्यादा से ज्यादा गर्दन का हिस्सा खोपड़ी से लगा रहे।बताता चलू कि औसतन दिन भर में 20-25 बकरे कटते है और यह सभी गर्दन पर अधिकार बैगा और उसके साथियो का होता है। खराब सौदा नहीं है क्यों ?
                                                     बकरे की गर्दन पर फरसा साधते हुए
                 ...................और धर्म के नाम पर बलिदान .............वाह रे ईश्वर और उनके भक्त।
              येही वह देवी है जो जिनकी पूजा रक्त मांस ,शराब से किया जाता है।जब मैंने देवी को गौर से देखा तो लगा की यह किसी मंदिर का कोई टूटा हुआ भाग है जिसको खोपादेवी(दही रानी )के नाम से अभिसिप्त कर दिया गया है।
           खोपा देवी का चेहरा जिस पर इतना सिन्दूर लगा दिया गया है कि वास्विकता का  पता ही नहीं चलता की यह वास्तव में है क्या ?

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

chhtisgarh yatra


ये है इस घर के मुखिया प्लास्टिक का धागा बनाते हुए।जब मैंने इनसे पूछा की क्या आप लोग सन(सनई )नहीं बोते  इन्होने कहा कि आज-कल के बच्चे इन्हे नहीं बोना चाहते क्योकि इसमे मेहनत ज्यादा लगता है।
विकास की मार आदिवासी क्षेत्रो में भी है।कुछ वर्ष पहले जो नदी-तालाब स्वच्छ दीखते थे अब गंदगी से भरे पड़े है।

chhatisgarh yatra

 यह "ढेकी" है जिससे धान कूटा जाता है।आदिवासी रोज-ब -रोज धान कूटते है और उसे पका कर खाते है।आपको बताता चलु कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते है।यहाँ का मुख्य भोजन चावल ही है।।।
 आज से 10 वर्ष पहले जब मै यहाँ आया था तो आदिवासियों के घरो में इतने मवेशी नहीं दिखते थे।अब इनके घरो में न्यून्तम सुविधाए दिखती है।

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

chhatisgarh yatra

                                                      सूरजपुर(छत्तीसगढ़ ) के एक गाँव खोपा 




पिछले कई वर्षो से मै छत्तीसगढ़ जाता रहा हू।कभी निजी यात्रा पर तो कभी इस इलाके की सभ्यता -संस्कृति को देखने।इस बार निजी यात्रा पर था अपनी भांजी की शादी में पूरे परिवार के साथ।शादी निपटते ही मै निकल अपने शोध यात्रा में ............
इस शोध यात्रा में मै सूरजपुर जो पहले सरगुजा का ही एक भाग था के खोपा गांव जो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है में अपने कैमरा के साथ जा पंहुचा।
1994 में जब मै पहली बार सरगुजा  के इस  इलाके में पंहुचा था तो मै यहाँ के आदिवासियों को देख कर हतप्रभ था.सच मानिए तब पहली बार मैंने ऐसी गरीबी देखी थी और भीषण दैन्यता के बावजूद उनकी ईमान्दारी को तो आज भी सोच कर श्रद्धा से सर झुक जाता है।येही श्रद्धा मुझे बार-बार अपनी ओर खीच लाती है।1994 में मै 17-18 वर्ष का था और इलाहाबाद विश्वविधालय में B.A.प्रथम वर्ष का छात्र हुआ करता था।तब मै नहीं जानता था की इन आदिवासियो की गरीबी का जिम्मेदार कौन है-खुद वेहै ,उनका ईश्वरहै या हमारे देश-प्रदेश के नीति-नियंता............
पूरे सरगुजा की इंच-इंच भूमि में कोयला है और इस कोयले को निकालते है वहाँ के आदिवासी और इस काले सोने पर अय्यासी करते है उत्तर प्रदेश, बिहार के सामर्थ्यवान लोग।उपनिवेश और उपनिवेशी का रिश्ता आज भी बददश्तूर जारी है।इसी इलाके में दुबारा पंहुचा परिवर्तन देखने अपने कैमरे के साथ, जिसे आप के साथ बाटना चाहता हू -------

आदिवासियों का घर  इतना प्रकृति के अनुकूल है की किसी भी  मौसम में आपको कोई  कठिनाई नहीं होगी।इनके घर की ख़ूबसूरती आपको आकर्षित अवश्य करेगी।

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

kavita

                                                    

                                                    खाने की टेबल पर जिनके
                                                    पकवानों की रेलम पेल
                                                    वे पाठ पढ़ाते हमको
                                                    संतोष करो ,संतोष करो !

                                                    उनके कंधो की खातिर
                                                    हम पेट काट कर टेक्स भरे
                                                    और नसीहत सुनते जाय
                                                    त्याग करो ,भई त्याग करो !

                                                    मोटी -मोटी तोंदो को जो
                                                    ठूस-ठूस कर भरे हुए
                                                    हम भूखों को सीख सिखाते
                                                     सपने देखो,धीर धरो !

                                                    बेड़ा गर्क देश का करके
                                                    हमको शिक्षा देते है
                                                    तेरे बस की बात नहीं
                                                    हम राज करे,तुम राम भजो !!
                                                                                            बर्तोल्ड ब्रेख्त 

रविवार, 9 दिसंबर 2012

                                                                  बर्बरता की ढाल ठाकरे  
                                                   
                                                                   बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !
                                                                   कैसे फासिस्टी प्रभुओ की -
                                                                   गला रहा है दाल ठाकरे  !
                                                                   अबे संभल जा,वो आ पंहुचा बाल ठाकरे !
                                                                   सबने हां की , कौन ना करे !
                                                                   छिप जा ,मत तू उधर ताक  रे !
                                                                   शिव -सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लए -ताल ठाकरे !
                                                                   सभी डर  गए ,बजा रहा है गाल ठाकरे !
                                                                   अपने भक्तो को कर देगा अब तो मालामाल ठाकरे !
                                                                   ज रही सहाद्री -घाटिया ,मचा रहा भूचाल ठाकरे !
                                                                    मन ही मन कहते राजा जी ,जिये भला सौ साल ठाकरे !
                                                                   चुप है कवि ,डरता है शायद ,खींच नहीं ले खाल ठाकरे !
                                                                    कौन नहीं फसता है , देखे ,बिछा चुका है जाल ठाकरे !
                                                                    बाल ठाकरे !बाल ठाकरे !बाल ठाकरे !बाल ठाकरे !
                                                                    बर्बरता के ढाल ठाकरे !
                                                                    प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
                                                                    धन -पिशाच के इंगित पाकर ऊँचा करता भाल ठाकरे !
                                                                    ला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
                                                                    बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !!!!
   
                                                                                                                        नागार्जुन
                                                                                                              (यह कविता  'जनयुग' में 1970 में प्रकाशित हुआ था।यह आज भी कितना प्राशंगिक है .यू  ही कोई महान कवि  नहीं होता )
                                                      

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

शनिवार, 24 नवंबर 2012

      bakhang fall यह सिक्किम का ख़ूबसूरत झील है(इस फोटो में हम लोगो के साथ मेरा ड्राइवर भी है जिसका नाम राजेन्द्र तमांग है .
                                                               झील ठीक मेरे पीछे
                                          पीछे झील और आगे मेरे वरिष्ठ मित्र
inchey monastry देखने के बाद उसी दिन दोपहर में bakhang fall देखने पहुचे।मेरा चालक राजेंद्र तमांग जिसकी निश्छल मुस्कराहट ध्यान बरबस आपको अपनी तरफ़ खीचती है।तमांग बौद्ध है ,आपको बताता चलू कि पूरे सिक्किम में बौद्धों की संख्या सबसे अधिक है।सिक्किम ही भारत का एक ऐसा राज्य है जिसका भारत में विलय रायशुमारी द्वारा हुआ।
मठ का मुख्य द्वार 
                                                           बौद्ध भिक्षु प्रसन्न मुद्रा में
                                                                 मै और मेरे मित्र 
                                                                       प्रार्थना चक्र
सिक्किम (गंगटोक)का सबसे प्राचीन बौद्ध मठ लगभग 300 वर्ष एक बौद्ध भिक्षु ने इसकी स्थापना की थी .महात्मा बुद्ध की विशाल मूर्ति यहाँ पर है लेकिन फोटो लेना मना होने के कारण मै उसे नहीं खीच सका .यहाँ आकर मन को अध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है .

फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...