शनिवार, 21 अगस्त 2021

थॉमस मैकाले और संस्कृत-अरबी शिक्षा

 यह ‘मिनट्स ऑफ एजुकेशन’ है जो कलकत्ता में शिक्षाविद "थॉमस मेकाले" ने प्रस्तुत किया था!


लॉर्ड मेकाले का यह "बदनाम भाषण" जिसे हर भारतीयों को पढ़ना और समझना जरूरी है। उनके शब्द....


“मुझे बताया गया कि यहाँ की शिक्षा 1813 के ब्रिटिश अधिनियम के तहत निर्धारित की गयी है, जिसमें कोई भी बदलाव संवैधानिक माध्यम से ही संभव है। 


फ़िलहाल एक ख़ास रकम साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मुहैया की गयी है। यहाँ साहित्य का अर्थ वे तमाम संस्कृत और अरबी ग्रंथ हैं। मैं पूछता हूँ, क्या यहाँ के लोगों को मिल्टन की कविताएँ और न्यूटन की भौतिकी नहीं पढ़नी चाहिए? क्या वे कुश-घास से देवताओं की पूजा करना ही सीखते रहेंगे? अगर हम मिस्र का उदाहरण लें, तो वहाँ भी कभी समृद्ध सभ्यता थी। अब वे कहाँ हैं? क्या उन्हें भी आदि काल के चित्रलेख (हीरोग्लिफिक्स) ही पढ़ाए जाएँ? 


मुझे तर्क दिया गया कि यहाँ के समाज को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया। लेकिन, क्या अरबी और संस्कृत जैसी भाषाएँ अब यहाँ के समाज में भी मृतप्राय नहीं है? मैं धर्म के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहता, लेकिन शिक्षा में बदलाव तो अपेक्षित है। क्या जेनर द्वारा स्मॉल पॉक्स के टीका खोजे जाने के बाद भी इन्हें टीका सिर्फ इसलिए नहीं दिया जाए क्योंकि यहाँ की संस्कृति नहीं है?


आज भारत में बोली जाने वाली एक भी ऐसी भाषा नहीं, जिसमें कोई उत्तम साहित्य रचा जा रहा हो, या जो अनुवाद योग्य हो। उन्हें एक ऐसी भाषा में शिक्षा देनी होगी, जो सर्वथा मानक है। कमिटी के आधे लोग अरबी-संस्कृत के पक्ष में हैं, आधे अंग्रेज़ी के। आप ही बताएँ कि तीनों में सबसे उपयुक्त कौन सी भाषा है? 


मुझे संस्कृत और अरबी का कोई ज्ञान नहीं, किंतु मैंने अनुवाद पढ़े हैं और विद्वानों से विमर्श किया है। मैं यह ताल ठोक कर कहता हूँ कि तमाम अरबी और संस्कृत साहित्य मिला कर वह ज्ञान नहीं दे सकते, जो आज यूरोपीय पुस्तकालय का मात्र एक कोना दे सकता है। संस्कृत के सभी ग्रंथों से मिला ज्ञान तो हमारे प्राथमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम के समकक्ष है।


हमें उन्हें अंग्रेज़ी में शिक्षा देनी ही होगी, जो विश्व की भाषा बनती जा रही है। तमाम साहित्य, इतिहास, विज्ञान, तत्त्वमीमांसा, संस्कृति अध्ययन अंग्रेज़ी में हो रहा है। भारत का शासक-वर्ग अंग्रेज़ी पढ़ता और जानता है। यहाँ के समृद्ध परिवार के लोग अंग्रेज़ी ही पढ़ते हैं।


दूसरी बात यह कि हम इन्हें यूरोपीय विज्ञान पढ़ाएँगे। इनके पुस्तकों में है क्या? एक तीस फ़ीट के राजा मिलते हैं, जो तीन हज़ार वर्ष जीते हैं? एक समुद्र मिलता है, जो मक्खन से भरा है? 


हम इन्हें अरबी और संस्कृत पढ़ाने के लिए अपने खजाने से खर्च करते रहे हैं, फिर भी कम लोग पढ़ने आते हैं। इन भाषाओं की किताबें आपने छपवाई, मगर कितनी बिकी? मैंने तो रसीद देखे हैं, अब तक कुछ हज़ार रुपए से अधिक की किताबें बिकी ही नहीं। यहीं के रईस अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए फ़ीस भर कर हमारे खजाने में धन डालते रहे हैं। इसी से स्पष्ट है कि यहाँ की जनता क्या चाहती है। अगर हम इन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देने पर खर्च करें, तो गरीब भी यह भाषा पढ़ पाएँगे।


मैंने हिन्दुओं में यह बात ग़ौर की है कि वह जितनी आसानी से अंग्रेज़ी सीख लेते हैं, उतनी आसानी से संस्कृत नहीं पढ़ पाते। मुझे ऐसे हिन्दू मिले जिन्हें मिल्टन की कविताएँ कंठस्थ हैं। मुझे नहीं लगता कि यह भाषा उनके लिए कठिन होगी। 


मुझे मालूम है कि अभी हमारे पास इतना धन नहीं कि पूरे भारत को शिक्षित कर सकें। मगर हमें एक ऐसा भारतीय वर्ग तैयार करना है, ‘जिसका रंग भारतीय हो, रग़ों में भारतीय खून दौड़ता हो, लेकिन उसका स्वाद अंग्रेज़ों जैसा हो। जो नीति और बुद्धि से अंग्रेज़ हो’। वह वर्ग ही शेष भारत को धीरे-धीरे अपने रंग में ढालेगा।


मेरा बस चले तो मैं आज ही सभी अरबी और संस्कृत के प्रेस बंद कर दूँ। कलकत्ता के मदरसों और संस्कृत कॉलेज पर ताला लगा दूँ। सिर्फ बनारस का संस्कृत महाविद्यालय और दिल्ली का मुस्लिम कॉलेज रहने दिया जाए। जिन्हें रुचि होगी, वहाँ पढ़ लेंगे।


अगर आपकी कमिटी मुझ से सहमत नहीं, तो मैं सदस्यता से इस्तीफ़ा देता हूँ। मैं यहाँ की भाषाओं में लिखे वाहियात विज्ञान और इतिहास को पढ़ाने के लिए सरकारी ख़ज़ाना खर्च करने के समर्थन में क़तई नहीं। यहाँ के लोग वर्तमान शिक्षा-पद्धति में पढ़ते रहे, तो भविष्य में भूखे मरेंगे। मैं इस पाप का भागी नहीं बनना चाहता।


- थॉमस मेकाले, 2 फ़रवरी, 1835




शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

नालंदा विश्वविद्यालय और कुमार गुप्त

 बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल 


है । 


बेचारा यूनेस्को को जो आप बताइएगा , वहीं न वह लिखेगा । 


आपने उसे बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तवंश के राजा कुमारगुप्त ( 415 - 455 ) ने की थी , यही बात उसने लिखी । 


भाई , नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थी नागार्जुन थे और नागार्जुन जब वहाँ पढ़ते थे , तब कुमारगुप्त का जन्म भी नहीं हुआ था । 


फिर कुमारगुप्त ने कैसे स्थापित कर दिया विश्वविद्यालय ?

बुधवार, 18 अगस्त 2021

Gorakhnath and the kanphata yogis by George Weston Briggs

 पुस्तक समीक्षा -----


इंडोलॉजी को विकसित करने में पश्चिमी विद्वानों का बड़ा हाथ है ऐसे ही एक विद्वान थे जियोर्ज वेस्टन ब्रिग्स।  ब्रिग्स ने भारत के मशहूर कल्ट नाथपंथियों पर पिछली शताब्दी में एक किताब लिखी थी। "गोरखनाथ एवं कनफटा जोगी"।  

कानफटे जोगी या गोरखनाथ उत्तर भारत के बड़े इलाके में फैले हुए हैं। गोरखपुर इनका सबसे बड़ा केंद्र है।इस कल्ट की शुरुआत गुरु गोरखनाथ ने की थी। गोरखनाथ कब हुए ?इस विषय में अनेक मत हैं। लेकिन इस बात की अनेक उद्धरणों से पुष्टि होती है कि गोरखनाथ ,पंजाब इलाके से थे। नाथपंथियों के लिए सबसे पवित्र स्थान सिंध में स्थित हिंगलाज है। हिंगलाज पाकिस्तान में है और एक शक्ति पीठ है।   नाथपंथियों के कान बड़े छेद करने के कारण फट जाते थे इसलिए उनके लिए कुछ लोगो ने कनफटा शब्द प्रयोग किया जाता है।ये कनफटे जोगीयो में बड़े जोगी  अपने कान में गैंडे की सींग के कुंडल पहनते थे। सिख गुरु गोविन्द सिंह जी भी अपने कान में गैंडे के सींग के बने कुण्डल पहनते थे। , ये जोगी घूमते रहते थे। बनारस में एक अंग्रेज अध्येता को 1792 में  एक ऐसा जोगी मिला जो तिब्बत , ,ईरान ,अजरबैजान ,आर्मेनिया  ,आर्मेनिया ,ईराक घूम चुका था ,उसने सेंट्रल एशिया के कुछ शहरो का ऐसा सजीव वर्णन किया जिससे पता चलता है वह अवश्य ही वहां गया होगा और  अन्तत बनारस में स्थापित हो गया। जोगी उत्तर भारत की  एक बिरादरी है। मुसलमान जोगी भी हैं। ये जोगी गृहस्थ भी होते थे। और काम धंधा भी करते थे। इनमे से कुछ ही ऐसे थे जो पूर्णत तपस्या करते थे।  लेखक ने लिखा है कि गढ़वाल के ठंडे  इलाको में भी  ऐसे जोगी घोर ठंड में सिर्फ राख लपेट कर रह लेते हैं।  पुस्तक का बड़ा भाग गोरखनाथ के मिथक के पक्षों के बारे में है। कहा जाता है कि गोरखनाथ वज्रयानी सम्प्रदाय के बौद्ध थे उन्हें शाक्त सम्प्रदाय में गुरु मत्स्येन्द्र नाथ लाये।  नेपाल में मत्स्येन्द्रनाथ सबसे पवित्र विभूति हैं। किवंदती है कि मत्स्येन्द्रनाथ नेपाल के मुस्तांग जिले  के मुक्तिनाथ नामक स्थान पर रहते थे। मुक्तिनाथ एक मात्र ऐसा स्थान माना जाता है जहाँ पंचतत्व एकसाथ  विद्यमान हैं. एक मिथक है कि मत्स्येन्द्रनाथ एक रानी के प्यार में पड़ गए और उसके दिन रात मैथुन में वयस्त रहने लगे ,जब गोरखनाथ को पता चला कि उनके गुरु इस स्थिति में हैं तो वो महल में पहुंचे और पुकारा "जाग मछँदर ,गोरख आया।  तब मत्स्येन्द्रनाथ रानी से उत्पन्न अपने २ पुत्रो नेमिनाथ एवं पार्श्वनाथ के साथ वहां से आ गए [ मेरा मानना है कि यह कहानी कुछ लोगो ने जैन मत पर सनातनी  श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए बनाई है ]पुस्तक के अगले भाग में नाथपंथियों की यौगिक क्रियाओ का वर्णन है।  ब्रिग्स का नाथपंथ की इतनी स्टडी करने का मतलब यह भी हो सकता है कि ब्रिग्स ईसाई मिशनरी के लिए काम करता हो।  क्योंकि ब्रिग्स ने "द चमार्स " में up की चमार बिरादरी के बारे में स्टडी करने के बाद लिखा कि अगर मिशनरी इन पर ध्यान दे तो ईसाई जनसंख्या जल्दी बढ़ेगी,क्योंकि संख्या के लिहाज से ये बहुत जयादा हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट जैसी वेबसाइट जिस पर विश्व के छोटे से छोटे समुदाय का वर्णन है इसी बात की और इंगित करती हैं कि कुछ कोलोनियल इंडोलॉजिस्ट्स का बड़ा मकसद ईसाई मिशनरी का मार्ग प्रशस्त करना रहा होगा।  किताब में अनेक महत्वपूर्ण पक्षों की अवहेलना की गयी है यथा गोरख पीठ का नेपाल से सम्बन्ध। एवं गोरखा राज्य से गोरखनाथ से समबन्ध।  यह भी लिखा है कि जब कोई नया वयक्ति गोरख पीठ में जोगी बनने आता था तो उसे  पुलिस थाने में भिजवा कर सत्यापित करवाया जाता था कि कहीं वो अपराधी तो नहीं।  

क्रिस्टोफर हिचन्स और भारतीय समाज

 क्रिस्टोफर हिचन्स तर्कवादियों की दुनिया मे एक जाना माना नाम हैं, रेशनल और वैज्ञानिक सोच का झंडा बुलंद करने के लिए उनका संघर्ष यादगार रहा है। 


दुर्भाग्य से भारतीय समाज में ऐसे लोग बहुत कम हुए हैं और हुए भी हैं तो उनका आम जन से रिश्ता ही नहीं बनने दिया गया है। भारतीय समाज इतना अंधविश्वासी, कुपढ़ और आत्मघाती है कि उसे बुद्धि ज्ञान और नयेपन से डर लगता है। पुराने अंधविश्वासों और कर्मकांडों की खोल में सिमटे रहना और भविष्य को अतीत की राख में दबाते रहना भारत की विशेषता है। 


इस मुल्क में परसाई जैसे आलोचक, दाभोलकर जैसे रेशनलिस्ट या प्राचीन चार्वाकों जैसे तार्किकों नास्तिकों की परंपरा ही नहीं बन पाती। हर पीढ़ी में आसाराम, निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडित खड़े हो जाते हैं और बुद्ध,चार्वाक, लोकायतों की क्रांति पर मिट्टी डालकर चले जाते हैं। 


यूरोप इस मामले में भाग्यशाली रहा है। वहां आरम्भ से ही भौतिकवादियों और नास्तिकों तार्किकों की लंबी और समृद्ध परम्परा रही हैं। उसी के परिणाम में वहां पुनर्जागरण और विज्ञानवाद सहित आधुनिकता आई है जिसका लाभ भारत भी लेता है लेकिन उसे स्वीकार करने में झिझकता है। 


विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, शासन प्रशासन, लोकतंत्र, सभ्यता, भाषा भूषा और नैतिकता सब यूरोप ने भारत को सिखाई है। उसके बिना ये मुल्क एक मिनट खड़ा नहीं रह सकता लेकिन इसके बावजूद इतना नैतिक साहस नहीं कि इन तथ्यों को स्वीकार कर लें।


इसे स्वीकार करना तो दूर उल्टा इन विज्ञानं, तकनीक का इस्तेमाल करके इसी विज्ञानं और सभ्यता का विरोध किया जाता है। 


बच्चों को जिस चिकित्सा, शिक्षा और सुविधा की सुरक्षा में पैदा किया जाता है और पाला जाता है उसका विरोध करते हुये इन्हीं बच्चों को विज्ञानं के विरुद्ध खड़ा किया जाता है। बचपन से ही पूजा पाठ यज्ञ कथाएं उनके दिमाग में ठूंस दी जाती हैं। ये सामूहिक आत्मघात है। इसीलिये एशियाई समाज कुछ भी मौलिक नहीं खोज पाते। वे यूरोप के आज्ञापालक ही बने रहते हैं।


यूरोप का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत पहले ही बाबाओं, गुरुओं और धार्मिक प्रवचनों के घनचक्कर से आजाद हो चूका है। आम जन में थोड़ी सी धर्मभीरुता बची है लेकिन वह उतनी बड़ी और जहरीली नहीं जैसी भारत में है। यहां तो उलटी गंगा बहती है। यहां का तथाकथित क्रन्तिकारी और प्रगतिशील वर्ग सबसे ज्यादा अंधविश्वासी और धर्मभीरु है।


 दर्शन, काव्य या हिंदी साहित्य उठाकर देखिये मनु, शक्तिपूजा, महाभारत रामायण के बिंब और मिथकों की गप्पों पर खड़े कथानक पिछली सदी के आधे हिस्से तक मुख्यधारा के साहित्य पर छाये रहे। 1935 तक साहित्य में नायिका विमर्श और नख शिख वर्णन देख लीजिए। 


लगता ही नहीं कि ये भारत में जन्म लिए पले बढ़े लोगों का साहित्य है। इस साहित्य में देवी देवता, राजे महाराजे, अवतार इत्यादि भरे हुए हैं। आम आदमी, मजदूर किसान या स्त्री का कोई जिक्र ही नहीं।


अंग्रेजों के सत्संग में जब यूरोपीय साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और दर्शन का दरवाजा भारतीयों के लिए खुला तब राममोहन, केशब, विवेकानन्द जैसों को बड़ी शर्म महसूस हुई कि भारत कैसा समाज है? इसी के परिणाम में सती प्रथा उन्मूलन जैसी सामाजिक सुधार हुए, ईसाई धर्म की सेवा भावना सीखकर धार्मिक सुधार किये गए। 


इसके बहुत बाद रवीन्द्रनाथ और प्रेमचन्द जैसे शूद्रों/ पिछड़ी जाति के लेखकों का साहित्य देखिये वे ब्राह्मणवाद और अंधविश्वासी शिल्प सौंदर्य को साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र के मैदान में आकर ललकार रहे हैं। यूरोप के इसी ज्ञान का बीज फूले, गांधी और अंबेडकर की बुलन्द आवाज में भी पल्लवित हो रहा है। और आज जो कुछ भी थोड़ा सुधार हम देख रहे हैं उसका स्त्रोत सीधे सीधे यूरोप के पुनर्जागरण और सामाजिक क्रांति के दर्शन में है।


इस बीच भारतीय पोंगा पंडित क्या कर रहे थे? उन्होंने इस बदलाव पर मिट्टि डालने के लिए धर्म राजनीती और कॉरपोरेट की ज़हरीली त्रिमूर्ति खड़ी की। नई नई कथाएं, पुराण, मिथक, झूठ और अफवाहें खड़ी की। सांप्रदायिक दंगे और मंदिर मस्जिद के बेकार के मुद्दों को राजनीति की धुरी बना दिया। 


ध्यान, समाधि, अध्यात्म और पूरब पश्चिम के संश्लेषण के नाम पर धर्म और अन्धविश्वास की अफीम को फिर से राष्ट्रवाद और देशप्रेम के साथ घोल दिया। नतीजा सामने है। पूरा मुल्क बैंको की कतारों में लगा चिल्लर गिन रहा है।


क्या यह अवश्यम्भावी था? ये रोका नहीं जा सकता था? क्या भविष्य को बदला जा सकता है? 


जरूर बदला जा सकता है। हमारी स्त्रियां और बच्चे अगर इन धार्मिक, बाबाओं, योगियों, कथाकारों की बकवासों से बच सकें या बचाई जा सकें तो हम भी अगली दो पीढ़ियों में भारत में सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र और नैतिकता  सहित विज्ञान भी पैदा कर सकते हैं। 


लेकिन दुर्भाग्य ये कि इन नवाचारों की हत्या करने वाले बाबा, योगी और ओशो रजनीश जैसे रजिस्टर्ड भगवान इतने धूर्त और होशियार हो गए हैं कि वे क्रान्ति के नाम पर ही अन्धविश्वास सिखाने लगते हैं। जहर को दवाई बनाकर पिलाने लगते हैं। और ये अभागा मुल्क उनकी जहरीली खुराकों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने लगता है।


क्या भारतीय समाज नीत्शे, रसल, मार्क्स, कोपरनिकस, गेलिलियो, ह्यूम, डार्विन, आइंस्टीन, डॉकिन्स और  हिचिन्स पैदा कर सकता है? या कम से कम निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडितों को बीच से हटाकर इन तार्किकों को अपनी अगली पीढ़ियों के प्रति उपलब्ध करवा सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करेगा कि भारत सभ्य होगा या नहीं होगा।


Mr Sanjay Shraman


रविवार, 15 अगस्त 2021

कौन आज़ाद हुआ

 कौन आज़ाद हुआ

किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी

मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का

मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही

कौन आज़ाद हुआ

खंजर आज़ाद है सीने में उतरने के लिए

मौत आज़ाद है लाशों पे गुजरने के लिए

कौन आज़ाद हुआ

काले बाज़ार में बदशक्ल चुडै़लों की तरह

कीमतें काली दुकानों पे खड़ी रहती हैं

हर खरीदार की जेबों को कतरने के लिए

कौन आज़ाद हुआ

कारखानों में लगा रहता है

सांस लेती हुई लाशों का हुजूम

बीच में उनके फिरा करती है बेकारी भी

अपने खूंखार दहन खोले हुए

कौन आज़ाद हुआ

रोटियाँ चकलों की कहवाएं हैं

जिनको सरमाये के दल्लालों ने

नफाखोरी के झरोखों में सजा रखा था

बालियाँ धान की गेहूं के सुनहरे खोशे

मिस्र-ओ-यूनान के मजबूर गुलामों की तरह

अजनबी देश के बाज़ारों में बिक जाते हैं

और बदबख्त किसानों की तड़पती हुई रूह

अपने अफलास में मूह ढांप के सो जाती है

कौन आज़ाद हुआ


-- अली सरदार जाफ़री


तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

 Happy Independence Day to all! ❤️


May all in our sub-continent be really independent in their thinking, behaviour and character in all respects!


मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,

हम ने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया,

कुदरत ने तो बख़्शी थी हमें एक ही धरती,

हमने कहीं भारत, कही ईरान बनाया.

जो तोड़ दे हर बंध, वो तूफ़ान बनेगा

इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा.


तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा

इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा.


-साहिर


शनिवार, 14 अगस्त 2021

आज़ादी

आज़ादी की पूर्व संध्या पर एक पंजाबी कविता
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जिसको गुरुदास राम आलम ने लिखी थी। द्वारका भारती ने इसका अनुवाद किया है। 

क्यों भाई निहाल सिंह ,आजादी नहीं देखी ?
ना रे भैया न खाई न देखी !

मैंने जग्गू से सुना ,अम्बाले खड़ी थी 
बहुत बड़ी भीड़ उसके गिर्द लगी थी 
बिरले के घर की ओर चेहरा था उसका 
और लोगो की ओर पीठ थी उसकी 

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लगता है गरीबो से खफ़ा हुई है 
अमीरों के हत्थे पर चढ़ी हुई है 
अख़बारों में पढ़ा वह बड़ी जबर है 
सुंदर तो नहीं है यो भी कानी है 
माने गर कहना हमारा ,हम भी उसे बुलाए 
अपनी झुग्गी-झोपड़ी में ,ज़मी पर सुलाए 
पर पता नहीं क्या खाती है वह 
किस चीज से दिल चुराती है वह 
शिमला में उसके आगे अंडे होते है 
हमारी नाद में सूखे तंडे होते है। 

            दलित निर्वाचित कविताएं 
              कँवल भारती


 

बुधवार, 11 अगस्त 2021

सिंधु घाटी सभ्यता किसकी थी ?

 किसकी थी सिंधु घाटी की सभ्यता ? आपको इसे जानने के लिए दूर नहीं जाना है । 


आप मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रतिनिधि -पुरुष के नाक - नक्शे को गौर से देखिए ।


मूर्ति का मस्तक छोटा तथा पीछे की ओर ढलुआ है । गर्दन कुछ अधिक मोटी है तथा मुँह की गोलाई बड़ी है । होंठ मोटे हैं । नाक चौड़ी और कुछ ऊपर की ओर उभरी हुई है । 


जबकि नृविज्ञानियों ने बताया है कि आर्यों का मस्तक उभरा हुआ लंबा , गर्दन सुराहीनुमा तथा होंठ पतले एवं नाक नुकीली और तीखी होती है । 


नाक - नक्शे का यह विरोधाभास साबित करता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता आर्यों की नहीं थी ।

राजेन्द्र प्रसाद सिंह


बौद्ध स्थल सारनाथ

 बात 1794 की है। तब काशी के राजा चेत सिंह थे और उनके दीवान जगत सिंह थे.....


चेत सिंह और जगत सिंह के नाम पर बनारस में दो मुहल्ले हैं -- एक चेतगंज और दूसरा जगतगंज....


तब जगतगंज के इलाके में जगत सिंह को मार्केट और इमारतें बनवानी थीं, ईंट और पत्थरों की सख्त जरूरत थी.....


सारनाथ के इलाके में सम्राट अशोक एवं अन्य बौद्ध राजाओं ने ईंट और पत्थरों को संजोकर अनेक स्तूप और बौद्ध इमारतें  बनवाई थीं......


सो, जगत सिंह को ईंट और पत्थरों का अकूत खजाना मिल गया, स्तूपों को ढाह - ढाहकर उनके मजदूर ईंट और पत्थर ले जाने लगे .....


सारनाथ की अनेक बौद्ध इमारतें बर्बाद हो गईं....


इसी बर्बादी के दौर में धर्मराजिका स्तूप के गर्भ से पत्थर के बने बाॅक्स में हरे संगमरमर की अस्थि - मंजूषा मिली....


तब बनारस में ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि जोनाथन डंकन थे, उन्होंने इस अप्रत्याशित घटनाक्रम पर एक लेख लिखा.....


जोनाथन डंकन के लेख पढ़े जाने के बाद ब्रिटिश पुरातत्वविदों के बीच खलबली मच गई, अनेक इतिहास - मर्मज्ञ सारनाथ पहुँचने लगे......


लेकिन सारनाथ की पहली पुरातात्विक खुदाई काॅलिन मैकेंजी ने 1815 - 16 में कराई, विशेष सफलता नहीं मिली.....


तब 1834 के दिसंबर महीने में पुरातत्वविदों के बेताज बादशाह एलेक्जेंडर कनिंघम सारनाथ की पवित्र धरती की खुदाई प्रारंभ की, जनवरी, 1836 तक खुदाई जारी रखी.....


धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, चौखंडी स्तूप सामने आए, सारनाथ की प्राचीन गरिमा जिंदा हो उठी......


कनिंघम ने जगत सिंह की भर्त्सना करते हुए लिखा है कि सारनाथ के स्तूपों की दुर्दशा जगत सिंह के ओछेपन का परिणाम है, जिन्होंने अपने मार्केट और महल के लिए इतने सुंदर निर्माण को बर्बाद कर दिया.....


कनिंघम ने आगे लिखा कि इसे बर्बाद करने से उनको कुल मिलाकर विशेष बचत नहीं हुई होगी, लेकिन उन्होंने इस अमूल्य ऐतिहासिक निर्माण को जो क्षति पहुँचाई, वह अवर्णनीय और अक्षम्य है......

राजेन्द्र प्रसाद सिंह



जेम्स प्रिंसेप और देवनापिय असोक

 देवानंपिय पियदस्सी को स्टीवेन्सन ने " द्वधारं पिये पिय " पढ़ा, जाहिर है कि गलत पढ़ा, लेकिन पढ़ने के निकट तो पहुँच ही गए थे.....


बाद में जेम्स प्रिंसेप ने देवानंपिय पियदस्सी पढ़ा, सही पढ़ा, लेकिन देवानंपिय पियदस्सी कौन था, प्रिंसेप को नहीं पता था....


प्रिंसेप ने अनुमान किया कि देवानंपिय पियदस्सी स्वयं बुद्ध का नाम है, लेकिन बुद्ध तो राजा नहीं थे, जबकि आगे पियदस्सी राजा लिखा है.....


सो, प्रिंसेप ने एक दूसरा अनुमान किया कि देवानंपिय पियदस्सी वास्तव में सिलोन के राजा तिस्स हैं, जो देवानंपिय पियदस्सी की उपाधि धारण करते थे.....


लेकिन सवाल यह था कि सिलोन के राजा के इतने सारे शिलालेख भारत में कैसे आए, जरूर बात कुछ और है.....


तब टर्नर सिलोन में थे, पालि साहित्य का अध्ययन कर रहे थे कि दीपवंश को पढ़ते हुए उनकी आँखें चमक उठीं.....


दीपवंश में लिखा था कि बुद्ध के निर्वाण के 218 वर्ष बाद पियदस्सी का सिंहासनारोहण हुआ, जो कि चंद्रगुप्त के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र थे.....


टर्नर ने देवानंपिय पियदस्सी की पहचान सम्राट अशोक के रूप में कर ली, खबर प्रिंसेप को पहुँची, प्रिंसेप ने टर्नर की इस खोज के लिए प्रशंसा की......


घटना 1837 की है, भारत को उसका सम्राट मिल गया, इतिहास एक भयंकर भूल से बच गया....


प्रिंसेप की प्रतिभा में बिजली की तेज थी, धम्म लिपि को पढ़ने के दो साल बाद प्रिंसेप गंभीर रूप से बीमार हो गए.....


बीमारी ऐसी कि नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा, 1840 में दिवंगत हो गए, प्रिंसेप को बड़ी छोटी उम्र मिली थी.....


धम्म लिपि को पढ़ने और प्रिंसेप की मृत्यु के बीच महज तीन साल का फासला था, लेकिन प्रिंसेप ने भारत के हजारों साल के इतिहास को अचानक ही बदल डाला....


20 अगस्त को जेम्स प्रिंसेप का जन्मदिन है, हम भारतीयों की ओर से उन्हें अशेष बधाइयाँ!

राजेन्द्र प्रसाद सिंह




सोमवार, 9 अगस्त 2021

आदिवासी दिवस और गद्दार दूधनाथ तिवारी

 आज विश्व आदिवासी दिवस है तो अंडमान के आदिवासी याद आ गए और याद आ गया दूधनाथ तिवारी

आइए जानते हैं-- दूधनाथ तिवारी को......

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अभी अभी 1857 के विद्रोह की आग बुझी भी नही थी कि भारत के सुदूर अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के पोर्ट ब्लेयर  द्वीप पर आदिवासियों ने अंग्रेजों के सैनिक अड्डे रॉस आइलैंड पर हमला कर दिया. 


यह विद्रोह अंडमानी ट्राइब्स (aboriginies) ने अपने 5000 साथियों के साथ तीर-धनुष और भालों से अंग्रेजों की कॉलोनी रॉस आइलैंड पर किया था। लेकिन ये वीर अंडमानी ज्यादातर मारे गए, कुछ ग़ुलाम बनाए गए. अंडमानी हारे नही होते यदि वे दूधनाथ तिवारी को अपने कबीले में इज्ज़त-बेटी न दिया होता  और अपने कबीले के राज को अपना हमदर्द समझकर  बताया नही होता.


दूधनाथ तिवारी बिहार का रहने वाला था। उसके निजी जीवन की कम जानकारी है . उसने 1857 के सिपाही विद्रोह में भाग लिया था.  वो नेटिव इन्फेंट्री 14 वें रेजिमेंट का साधारण सिपाही था. विद्रोह के बाद उसके ऊपर राजद्रोह और हत्या का आरोप लगाया गया और 8 अप्रैल 1858 को अंडमान के रॉस आइलैंड पर सजा काटने के लिए भेज दिया गया. लेकिन कुछ दिन बाद ही  वो अपने अन्य 90 साथियों के साथ रॉस आइलैंड से भाग गया. वो भागकर जंगल मे गया  उसके सभी 90 दोस्त जंगल मे ही भटक गए.  उसमें कुछ भूख- प्यास और थक कर मर गए कुछ आदिवासियों द्वारा मारे गए.


लेकिन दूधनाथ की तकदीर अच्छी थी. उसको आदिवासियों ने पकड़ लिया और अपने कबीले में ले गए. दूधनाथ तिवारी चालाक और शातिर था . वो आदिवासियों के बीच अच्छे तरीके से रहने लगा . उनके साथ उसका व्यवहार अच्छा था.  उसकी अच्छाईयों को देखते हुए कबीले के मुखिया हीरा ने अपनी दो पुत्रियों लीपा (20 वर्ष) और जिगाह (16 वर्ष) के साथ उसका विवाह कर दिया.आदिवासियों ने उसे अपना मान लिया और अपने कबीले के सभी राज बता दिए.


अंग्रेजो का अंडमान द्वीपसमूह पर आक्रमण करके कब्जा करना वहां के आदिवासियों को अच्छा नही लगा. वे समझते थे कि ये लोग हमारे रीतिरिवाज और उनकी आदिवासियत संस्कृति के लिए खतरा बन सकते हैं. अंदर ही अंदर विद्रोह की आग सुलग रही थी.


Aboriginies कबीले में करीब 6000 की संख्या थी जिसमे से  5000 मर्द-औरतों ने रॉस आइलैंड पर आक्रमण करने की योजना बनाई. 


       JP Walker  एक अंग्रेज अधिकारी था और 1857 के विद्रोह के समय आगरा में  एक अधिकारी के तौर पर नियुक्त था. जिसको विद्रोह के बाद प्रमोशन देकर  रॉस आइलैंड अंडमान का  सुपरिंटेंडेंट बना दिया गया था . दूधनाथ तिवारी मुखबिर बन गया और उसने अपने आश्रयदाताओं के ख़िलाफ गद्दारी की. ज्यादातर अण्डमानी आदिवासी मारें गए कुछ को पकड़कर जेल में डाल दिया गया कुछ को फांसी दे दी गई.

इस विद्रोह को बुरी तरह कुचल दिया गया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी सिर उठाने के काबिल न बचा.


यदि दूधनाथ तिवारी ने गद्दारी न किया होता तो भारत का सुदूर इलाका स्वन्त्रता की पहली अलख जगाता.


आज भी किसी अण्डमानी के सामने दूधनाथ तिवारी का नाम ले लीजिए वो बहुत ही घृणित प्रतिक्रिया देगा.

Ramesh kumar



शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

1930 के दशक के भारत


























 

साहित्य अकादमी में ब्राह्मणवाद-

 साहित्य अकादेमी सम्मान-द्विज अकादमी सम्मान है, जो सिर्फ द्विजों को मिलता है, शूद्रों-अतिशूद्रों को पूरी तरह बाहर रखा गया है- पूरी सूची सहित प्रमाण देख लिजिए 


द्विजों में 50 प्रतिशत  से अधिक  अकेले ब्राह्मण हैं

 

 भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘सूत्रधार’ के नायक भिखारी ठाकुर अपने प्रति होने वाले जातिगत पक्षपातों पर रुआंसा होकर अविनाश चन्द्र विद्यार्थी से कहते हैं-


 ‘जिस साहित्य और साहित्यकार को वे इतनी बड़ी चीज मानते आये थे, वहाँ भी कनफुसुकिया और चपड़ चालाकी, वही डाह, वही ‘बाभन-सूद’ चलता है क्या! रामजी हे रामजी! उसी से बचने के लिए साहित्य और कला में आये और यहाँ भी वही...! चैबे जी की तरह विद्वान होते तो... नहीं नहीं, चैबे जी की तरह विद्वान ब्राह्मण होते तो और बात थी, खाली ‘बाभन’ ही होते तो भी चलता!’

 (‘सूत्रधार’ पृ.304) अंश सत्य घटना पर आधारित है।

 नीचे साहित्य अकादेमी के सन् 1955 से लेकर 2017 तक के साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त करने वालों की वर्षवार, पुस्तकवार और मजबूरन जातिवार सूची दी जा रही है। खुदर्बीन लेकर ढूंढ़िये, सूची में एक भी पिछड़े, शूद्र, अतिशूद्र, अल्पसंख्यक (नारी या पुरुष) का नाम है? साहित्य अकादेमी के कर्ता-धर्ता विद्वान और भारत सरकार के लोग क्या बताने की कृपा करेंगे कि क्यों नहीं है! क्या विगत 63-64 सालों में एक भी जन्मना गैर द्विज साहित्यकार के साहित्य को इस सम्मान योग्य नहीं पाया गया? और तो और आचार्य चतुरसेन शास्त्री, फणीश्वरनाथ रेणु और राजेन्द्र यादव को भी नहीं? जब रेणु और राजेन्द्र ही नहीं माने गये तो सम्मान पाने वालों की सूची में मधुकर सिंह, चंद्र किशोर जायसवाल, संजीव, शिवमूर्ति, कंवल भारती, प्रेम कुमार मणि, रणेन्द्र आदि का नाम कैसे आ पाता! 


 आश्चर्य की बात है कि इस सूची में कोई मुसलमान लेखक भी नहीं है- राही मासूम रजा, शानी, बदी उज्जमा, आबिद सुरती... कोई नहीं। सूची में जिन चार महिला लेखकों के नाम हैं, उनमें एक भी पिछड़े, दलित (शूद्र, अतिशूद्र), अल्पसंख्यक परिवारों की नहीं (नासिरा शर्मा भी शर्मा (ब्राह्मण) ही हैं, अल्पसंख्यक में गण्य नहीं हो सकतीं।

 


साहित्य अकादेमी सम्मान (हिन्दी)

वर्ष नाम पुस्तक जाति

1955 माखनलाल चतुर्वेदी/हिम तरंगिनि (कविता)/ब्राह्मण

1956 वासुदेव शरण अग्रवाल/पद्मावत संजीवनी व्याख्या (टीका)/ वैश्य

1957 आचार्य नरेन्द्र देव/बौद्ध धर्म दर्शन (दर्शन)/खत्री

1958 राहुल सांकृत्यायन/मध्य एशिया का इतिहास(इतिहास)/ ब्राह्मण

1959 रामधारी सिंह ‘दिनकर’/संस्कृति के चार अध्याय (शोध)/भूमिहार ब्राह्मण

1960 सुमित्रानंदन पंत/ कला बौर बूढ़ा चांद (कविता)/ब्राह्मण

1961 भगवतीचरण वर्मा/भूले बिसरे चित्र (उपन्यास)/कायस्थ

1963 अमृतराय/प्रेमचन्द्र: कलम का सिपाही (जीवनी)/कायस्थ

1964 अज्ञेय/ आंगन के पार द्वार(कविता)/ब्राह्मण

1965 नगेन्द्र/ रस सिद्धान्त (कविता समालोचना)/ब्राह्मण

1966 जैनेन्द्र कुमार/मुक्तिबोध (उपन्यास)/जैन

1967 अमृतलाल नागर/अमृत और विष (उपन्यास)/ब्राह्मण

1968 हरिवंश राय ‘बच्चन’/दो चट्टानें (कविता)/कायस्थ

1969 श्रीलाल शुक्ल/राग दरबारी(उपन्यास)/कायस्थ

1970 रामविलाश शर्मा/निराला की साहित्य साधना(जीवनी)/ब्राह्मण

1971 नामवर सिंह/कविता के नये प्रतिमान (साहित्य आलोचना)/राजपूत

1972 भवानी प्रसाद मिश्र/बुनी हुई रस्सी (कविता)/ब्राह्मण

1973 हजारी प्रसाद द्विवेदी/आलोक पर्व (आलेख संग्रह)/ब्राह्मण

1974 शिवमंगल सिंह सुमन/ माटी की बारात(कविता)/ राजपूत

1975 भीष्म साहनी/तमस (उपन्यास)/खत्री

1976 यशपाल/मेरी तेरी उसकी बात(कविता)/खत्री

1977  शमशेर बहादुर सिंह/चुका भी हूँ नहीं मैं (कविता)/जाट

1978 भारत भूषण अग्रवाल/ उतना वह सूरज है (कविता)/ अग्रवाल वैश्य

1979 सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’/कल सुनना मुझे(कविता)/ब्राह्मण

1980 कृष्णा सोबती/जिन्दगीनामा(उपन्यास)/खत्री

1981 त्रिलोचन /ताप के ताये हुए दिन (कविता)/ राजपूत

1982 हरिशंकर परसाई/विकलांग श्रद्धा का दौर (व्यंग्य)/ब्राह्मण

1983 सर्वेश्वर दयाल सक्सेना/खूंटियों पर टंगे लोग (कविता)/ कायस्थ

1984 रघुवीर सहाय/लोग भूल गये हैं(कथा संग्रह)/कायस्थ

1985 निर्मल वर्मा/कव्वे और काला पानी (कथा संग्रह)/खत्री

1986 केदारनाथ अग्रवाल/अपूर्वा (कविता)/ अग्रवाल वैश्य

1987 श्रीकान्त वर्मा/मगध (कविता)/कायस्थ

1988 नरेश मेहता/अरण्य (कविता)/ब्राह्मण

1989 केदारनाथ सिंह/अकाल में सारस (कविता)/राजपूत

1990 शिवप्रसाद सिंह/ नीला चांद (उपन्यास)/ राजपूत

1991 गिरजाकुमार माथुर/मैं वक्त के हूँ सामने (कविता)/कायस्थ

1992 गिरिराज किशोर/ढाई घर (उपन्यास)/वैश्य

1993 विष्णु प्रभाकर/अर्द्धनारीश्वर(उपन्यास)/वैश्य

1994 अशोक वाजपेयी/कहीं नहीं वहीं (कविता)/ब्राह्मण

1995 कुँवर नारायण/कोई दूसरा नहीं (कविता)/मारवाड़ी जैन

1996 सुरेन्द्र वर्मा/मुझे चांद चाहिए(उपन्यास)/कायस्थ

1997 लीलाधर जगूड़ी/ अनुभव के आकाश में चांद (कविता)/ब्राह्मण

1998 अरूण कमल/नये इलाके में(कविता)/ब्राह्मण

1999 विनोद कुमार शुक्ल/दीवार में एक खिड़की रहती है(उपन्यास)/ब्राह्मण

2000 मंगलेश डबराल/ हम जो दिखते हैं (कविता)/ब्राह्मण

2001 अलक सरावगी/ कलिकथा: वाया बाईपास (उपन्यास)/मारवाड़ी 

2002 राजेश जोशी/ दो पंक्तियों के बीच (कविता)/ ब्राह्मण

2003 कमलेश्वर/कितने पाकिस्तान(उपन्यास)/कायस्थ

2004 वीरेन डंगवाल/दुश्चक्र में स्रष्टा(कविता)/ब्राह्मण

2005 मनोहर श्याम जोशी/क्याप (उपन्यास)/ ब्राह्मण

2006 ज्ञानेन्द्रपति/संशयात्मा (कविता)/ब्राह्मण

2007 अमरकान्त/इन्हीं हथियारों से (उपन्यास)/ कायस्थ

2008 गोविन्द्र मिश्र/कोहरे में कैद रंग(उपन्यास)/ब्राह्मण

2009 कैलाश वाजपेयी/हवा में हस्ताक्षर (कविता)/ब्राह्मण

2010 उदय प्रकाश/मोहनदास (कहानी)/ राजपूत

2011 काशीनाथ सिंह/रेहन पर रग्घू (उपन्यास)/राजपूत

2012 चंद्रकान्त देवताली/पत्थर फेंक रहा हूँ (कविता)/ ब्राह्मण

2013 मृदुला गर्ग/मिल जुल मन (उपन्यास)/ वैश्य

2014 रमेश चन्द्र शाह/विनायक(उपन्यास)/ वैश्य

2015 रामदरस मिश्र/आग की हँसी (कविता)/ब्राह्मण

2016 नासिरा शर्मा/पारिजात (उपन्यास)/ब्राह्मण

2017 रमेश कुंतल मघ/.../ब्राह्मण 


 साहित्य अकादेमी कोई अमूर्त संस्था नहीं है। इसके निदेशक, सचिव, पदाधिकारी, जूरी के सदस्य हाड़ मांस के पुतले होते हैं। इस जात-पात के कोढ़ से ग्रस्त समाज में कोई पक्षपात विहिन निर्णय असंभव-सा लगता है। सम्मान के जूरी, संस्तुतिकर्ता या निर्णायक मंडल के सदस्य कौन लोग होते आये हैं जो जातिवाद के विरुद्ध और साहित्य, कला, संस्कृति और मानवता के पक्ष में अपने लेखन और भाषण में बढ़-चढ़ कर बोलने वाले इस बिंदू पर आकर न्याय के पक्ष में आवाज उठाने में लाचार क्यों हो जाते हैं-

 यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ

 हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा?

 तर्क देने वालों के हजारहा कुतर्क हो सकते हैं, मसलन छूटे हुए नामों में निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, दुष्यन्त कुमार जैसे अनेक नाम हैं। जहाँ तक निराला का प्रश्न है, वे ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ बनकर रहे’

 आज अमीरों की हवेली

 किसानों की होगी पाठशाला

 धोबी, पासी, चमार, तेली

 खोलेंगे अंधेरे का ताला

 ....

 कैसे स्वीकार्य होते!


 राहुल सांकृत्यायन की स्थिति भी कोई बेहतर न थी। उनकी निष्कर्ष था, हिन्दुस्तान तो सबसे बड़े नरक में है, क्योंकि इसके ऊपर बिलायती जोकों की गुलामी भी है और अपनी भी!’ ‘सतमी के बच्चे’ जैसी कहानियाँ और उनका पूरा साहित्य साक्षी है। ऐसे राहुल जी को साहित्य अकादेमी सम्मान मिल गया तो इसके पीछे जवाहर लाल नेहरू थे। नागार्जुन ने तो खुलेआम सामाजिक न्या और दबे-कुचले लोगों के पक्षधर थे। उन्होंने ‘सूअर’ पर भी कविता लिखी- यह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है। नागार्जुन को यह कहकर हटाया गया कि उन्हें मैथिली में पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। नागार्जुन मैथिली से ज्यादा हिन्दी के साहित्यकार थे। इस भोड़े बहाने के बरक्स नोबेल पुरस्कार को रखते हैं- मैडम क्यूरी को दो-दो बार नोबेल मिल चुका है। औरों को भी किसी न किसी बहाने छांटा गया होगा। हमें तो लगता है, आज प्रेमचन्द भी होते तो उन्हें भी अकादेमी ने इसी विनाह पर इस योग्य माना होता। ‘दुष्यंत’ और ‘अदम’ जैसे कितने जन्मना द्विज, जनता के कवि थे, मगर ऐसे सारे जनपक्षधर अकादेमी द्वारा नकारे गए। ‘जन्मना’ अर्हताओं को पूरा करने वाले ऐसे अनेक साहित्यकार हंै जिन्हें अकादेमी ने सम्मानित किया भी तो उनकी दोयम दर्जे या नखदंत विहीन कृतियों को सम्मानित किया, जबकि  उनकी तेजस्वी कृतियों को छोड़ दिया। साहित्य अकादेमी का काम क्या तेजस्विता पर धूल डालना भर रह गया है?


 ऐसा नहीं है कि वंचित ओबीसी, स्त्री, दलित और अल्पसंख्यक साहित्य अकादेमी के सम्मान के लिए मरे जा रहे हैं, पर अगर हों तो गलत क्या है? तुम पियो तो पुण्य, हम पियें तो पाप! परीक्षाओं और साक्षात्कारों में क्यों पूछा जाता है कि अमुक लेखक को कितने सम्मान मिले हैं, किस कृति को अमुक-अमुक पुरस्कार या सम्मान मिला है, विदेश यात्राओं और दीगर चीजों पर यह मुद्दा प्रभाव प्रभाव डालता है। सबसे बुरा यह कि जनता में वही गलत संदेश जाता है। कुल मिलाकर यह भ्रम या गलत संदेश की स्थिति फैलती है कि एक निर्णय रोजी-रोटी और सम्मान के लिए कई-कई निर्णयों को प्रभावित करता है।


 एक भ्रम दूसरी ओर भी फैलता है कि पिछड़े, दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक साहित्य अकादेमी से दूर-दूर रहें, यहाँ उनके लिए कोई स्थान नहीं है, यह सिर्फ और सिर्फ जन्मना सवर्णों के लिए आरक्षित है।


 ध्रुव और उत्तम की वह मिथकीय कथा याद आती है जहाँ पिता की गोद में बैठने को गए धु्रव को उत्तम की माँ यह कहकर वंचित करती है कि गोद में बैठने के लिए तुम्हें मेरी कोंख से जन्म लेना चाहिए था।


 अगर ऐसा नहीं है तो क्या अकादेमी एक श्वेत पत्र जारी करेगी-  सम्मानित लेखक, पुस्तक, वर्ष के साथ-साथ यह भी कि विचारार्थ अन्य किन-किन लेखकों की किन-किन कृतियों को शामिल किया गया, जूरी के सदस्य कौन थे, निदेशक कौन, संस्तोता कौन, क्या निर्णायक मंडल को प्रकाशित सभी श्रेष्ठ कृतियों की जानकारी थी? ऐसा इसलिए कि कम-अज-कम पता तो चले कि वे अर्हतायें कौन-कौन सी हैं जो उन्हें प्राप्त करनी चाहिए थी।


 ऐसा क्या हो गया कि सारी बौद्धिक प्रतिभा द्विजों तक ही केन्द्रित हो गई और विगत 63 वर्षों में एक भी गैर द्विज इस स्तर तक न पहुँच सका? प्रगतिशील माने जाने वाले एक शीर्ष पत्रकार ने तो एक बार यहाँ तक कहा था कि सभी क्षेत्रों में श्रेेष्ठ प्रतिभायें ब्राह्मण वंश से ही आती हैं। क्या मतलब...? वर्गों की तरह वर्णों में भी साहित्य बटा होता है और गैर द्विजों पर घृणा थूकते थे।  दुर्वासागण हमेशा प्रचारित-प्रसारित-पूजित होते रहते हैं।


 साल-दर-साल यह सब स्वस्थ साहित्य के नाम पर चलाया जाता रहा  और कोई चूं तक नहीं करता कि कहीं उनका नाम लिस्ट में आते-आते निकाल न दिया जाये।


 साहित्य अकादेमी सम्मान के इस मत्स्य न्याय के पक्ष में यह भी तर्क दिए जा सकते हैं कि राधाकृष्ण, धर्मवीर भारती, रांगेय राघव, मोहन राकेश, शरद जोशी, सुरेन्द्र चैधरी आदि सवर्ण प्रतिभायें भी तो थीं जिन्हें अकादेमी सम्मानित न कर सकी। कि भारत की प्रायः आधी आबादी वाली हिन्दी के लिए एक सम्मान है और शेष भाषायें, जिनमें कतिपय भाषाओं के बोलने वालों की कुल संख्या कुछ एक लाख ही है के लिए भी एक सम्मान, तो सबको अकादेमी कैसे मिलती! पूछा जाए क्यों? एक ही वर्ष में सम्मान एकाधिक लोगों को देने का नियम भी तो बनाया जा सकता है। ज्ञानपीठ ने अपना सम्मान बांटा या नहीं? नोबेल पुरस्कार तो प्रायः हर साल बटते देखे गए हैं। अपनी इसी असूझ मात्र की मारी होती अकादेमी तो ऐसी दुविधायें दूर की जा सकती हैं, पर यहाँ तो पूरी की पूरी अकादेमी ही।

 मजेदार बात है कि अकादेमी निराला की साहित्य-सर्जना का सम्मान नहीं करती, वहीं ‘निराला की साहित्य साधना’ को सम्मान योग्य नहीं मानती है।  कभी-कभी लगता है, यह सब बहुत सचेत भाव से नहीं होता होगा, किंचित स्वतः स्फूर्त भाव से होने लगा होगा। तो क्या अतिसंख्य लोगों का ऐसा ही मानना है? अपने अंधकूपप कम्फर्ट जोन के बाहर आकर देखें तो जन्मगत आधारों की धुरी धसकने लगी है। अब जबकि बौद्धिकता की नई-नई अर्गलायें, आयाम और वितान खुलने लगे हैं, साहित्य अकादेमी या ऐसी तमाम संस्थायें अपने वर्गों-वर्णों तक ही सीमित रखकर उन्हें बौद्धिक दारिद्रय में कैद रखने का सांस्कृतिक अपराध नहीं कर रही हैं? एक बार जरा मुड़कर देखे तो उसे पता चलेगा कि रोकने की इतनी कोशिशों के बावजूद क्या रेणु, राजेन्द्र यादव, राही मासूम रजा, रांगेय राघव आदि को साहित्य की स्वीकार्यता को अकादेमी रोक पायी। वे आज भी लोकप्रिय हैं जबकि अकादेमी की सम्मानित अधिकतर साहित्य को कोई पूछता भी नहीं।

 


( इस लेख से मैं पूरी तरह सहमत हूं, तथ्यों को वेरिफाई किया है, सिर्फ सूचना के लिए बता रहा हूं कि यह मेरा लेख नहीं है, बहुत पहले हमने फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित किया था। किसी कारण से मूल लेखक अपना नाम नहीं देना चाहता थे, कारण वाजिब थे। यह सिर्फ इसलिए लिख रहा हूं कि इस शानदार आंख खोल देने वाले तथ्यात्मक लेख का श्रेय मुझे न दिया जाए। कानूनी और नैतिक तौर इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है। यह समयांतर में भी प्रकाशित हुआ था )

Siddarth ramu


बुधवार, 4 अगस्त 2021

ऋ की प्राचीनता

 ऋषियों को , ऋग्वेद को प्राचीन साबित करने के चक्कर में बतौर औजार " ऋ " का आविष्कार हुआ है । 


" ऋ " के आविष्कारक ने " ऋ " का आविष्कार तो बहुत बाद में किया , लेकिन उसे "ऋ" को बहुत प्राचीन साबित करना था । 


सो , " ऋ " को बहुत प्राचीन साबित करने के लिए आविष्कारक ने एक साजिश रची और उसने बगैर सोचे - समझे इसे ले जाकर वर्णमाला के स्वरों में बैठा दिया । 


" ऋ " को वर्णमाला के स्वरों में उसने इसे इसलिए बैठाया कि यह कहा जा सके कि यह बहुत प्राचीन ध्वनि है , तब की है जब इसका उच्चारण स्वर की भाँति होता था । 


मगर " ऋ " का उच्चारण स्वर की भाँति कभी नहीं होता था , सबूत भी नहीं है । इसमें स्वर का कोई गुण नहीं है। पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है । 


" ऋ " का आविष्कारक ऋषियों को , ऋग्वेद को कई मामलों में आधा - अधूरा बहुत प्राचीन साबित करने में तो सफल हो गया , मगर दुनिया के भाषा वैज्ञानिकों को हैरत में डाल गया । 


आज सभी भाषा वैज्ञानिक कहते हैं कि " ऋ " का उच्चारण बहुत प्राचीन काल में स्वर की भाँति कैसे और कहाँ से होता था , हमें नहीं पता है । 


अभिलेखीय साक्ष्य बताते हैं कि " ऋ " प्राचीन ध्वनि नहीं है तो जाने क्यों भाषा वैज्ञानिक इसे प्राचीन मानने पर तुले हुए हैं ?  

Rajendra Prasad Singh

साहिर के न रहने पर कैफ़ी की नज़्म


 साहिर के  न रहने पर कैफ़ी आज़मी ने कुछ यूँ कहा था :


तुम्हारे शहर में आए हैं हम , साहिर कहाँ हो तुम 

ये रूपोश तुम्हारी है सितम, साहिर  कहाँ हो तुम


तुम्हारे घर में हम आकर  ,कभी  प्यासे  न  जायेंगे

उठाओ जाम, कर लें होंट नम, साहिर कहाँ हो तुम


पुराने   दोस्तों  से   हो   गये   क्यों   इतने    बेगाने 

पुकारो तो कहीं से कम से कम, साहिर कहाँ हो तुम 


मेरी  नज़रों में मेरे  दोस्त, एक  मंदिर है  लुधियाना 

ये मंदिर और तुम उसके सनम, साहिर कहाँ हो तुम


— कैफ़ी आज़मी

रॉयल एशियाटिक सोसाइटी और पूर्वी उत्तर प्रदेश

 रॉयल एशियाटिक सोसाइटी और पूर्वी उत्तर प्रदेश 


वर्ष 1823 में स्थापित रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ के पुराने अंक देखते हुए पता लगा कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सदस्यों में आज़मगढ़, जौनपुर, ग़ाज़ीपुर और बलिया के पाठक भी शामिल थे। उल्लेखनीय है कि रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ हेनरी टॉमस कोलब्रुक ने की थी। इंग्लैंड में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना से चार दशक पहले ही 1784 में बंगाल में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना हो चुकी थी। 


पूर्वी उत्तर प्रदेश में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के इन सदस्यों में जहाँ एक ओर ग़ाज़ीपुर से सर सैयद अहमद खाँ थे, जिन्होंने ग़ाज़ीपुर में ही विक्टोरिया स्कूल और साइंटिफिक सोसाइटी भी स्थापित की थी। तो दूसरी ओर, इन सदस्यों में हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आज़मगढ़ में अहरौला के तहसीलदार पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी भी शामिल थे। मन्नन द्विवेदी ने बच्चों के लिए कविताएँ और कहानियाँ लिखकर विशेष ख्याति अर्जित की। वे प्रेमचंद के भी घनिष्ठ मित्र थे।  

 

इन पाठकों में बलिया के डिप्टी कलेक्टर लाला सीताराम बी.ए. भी शामिल थे। मूल रूप से अवध के निवासी लाला सीताराम ने डिप्टी कलेक्टर बनने से पूर्व कुछ समय तक 'अवध अख़बार' का सम्पादन और बनारस, सीतापुर व फ़ैज़ाबाद में अध्यापन भी किया था। उन्होंने संस्कृत की अनेक पुस्तकों यथा मेघदूत, कुमारसम्भव, रघुवंश, ऋतुसंहार, उत्तररामचरित, मालविकाग्निमित्र का हिंदी अनुवाद भी किया था। साथ ही, उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों का उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया था।    


रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सदस्यों में उपर्युक्त व्यक्तियों के साथ शिबली एकेडमी जैसी संस्था भी शामिल थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के पाठकों की सूची इस प्रकार है : 


आज़मगढ़    

1. उदय नारायण गौड़ : वेसले हाई स्कूल, आज़मगढ़ 1923

2. मोहम्मद अज़हर अली : प्रोविंसियल सिविल सर्विस, सदर तहसील आज़मगढ़ 1907

3. पंडित मन्नन द्विवेदी, तहसीलदार, अहरौला आज़मगढ़ 1915

4. शिबली एकेडमी, आज़मगढ़ 

5. यूस्टिस जॉन किट्स : बंगाल सिविल सर्विस, आज़मगढ़ 1884


ग़ाज़ीपुर 

1. सैयद अहमद खाँ, ग़ाज़ीपुर 1873

2. पी.सी. व्हेलर ग़ाज़ीपुर, 1880

3. रमाशंकर मिश्रा, एम.ए. : ऑफिसिएटिंग मजिस्ट्रेट व कलेक्टर, ग़ाज़ीपुर, 1899

4. वीरेश्वर नाथ राय, बीए एलएलबी, वकील, हाई कोर्ट, ग़ाज़ीपुर, 1924

5. जे.एच. रिवेट-कॉर्नैक, बंगाल सिविल सर्विस, ग़ाज़ीपुर, 1872


जौनपुर 

1. सी. रुस्तमजी, 1872

2. आर.सी. सक्सेना, एमडी, बीएस, जौनपुर, 1932


बलिया 

1. लाला सीताराम, डिप्टी कलेक्टर, बलिया, 1899

2. डॉ. मुन्ना लाल, सिविल सर्जन, बलिया, 1901 

3. सी.एस. श्रीवास्तव, एमए बीएससी, प्लीडर, बलिया, 1931

Shubhneet kausik

सोमवार, 2 अगस्त 2021

साहिर

 तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से

न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम

वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे

हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम

छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी

ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुम


मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो

उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं

मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो

ग़म हयात ए ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं

तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो

वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं


मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो

मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है

मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको

मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है

यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है

शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है


मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं

मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम

ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ

मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम

खफ़ा न हो मेरी जुर्रत ए तख़्तब पर

तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम


मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा

मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर ए ग़म न रहो

हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया

यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो

मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की

मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो


मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा

मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता

मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ

मगर ये बर ए मुसाइब उठा नहीं सकता

तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे

निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता


ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले

हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा

हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर

हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका

ये करख़ानों में लोहे का शोर ओ गुल जिसमें

है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा


ये शरहों पे रंगीन साड़िओं की झलक

ये झोँपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें

ये माल रोड पे कारों की रैल पैल का शोर

ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे

गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे

हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छायी हुई


ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ

खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी

ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त

ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर ए मजबूरी

ये ग़म हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को

उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो


-साहिर लुधियानवी 

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

चंबल के बागी



!!चंबल के बाग़ी भी रहे हैं स्वतंत्रता संग्राम के सैनानी!!

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         चंबल के घने बीहड़ और उसकी ऊँची-नीची घाटियाँ सदियों ही से अत्याचार पीड़ित विद्रोहियों की शरण स्थली रही रहे हैं। किंवदंतियों के अनुसार जब परशुराम ने सारी पृथ्वी से क्षत्रियों को समूल नष्ट करने का प्रण लिया और अधिकांश का वध कर डाला, तब उनमें बहुत से क्षत्रियों ने इसी चंबल के बीहड़ में आकर शरण ली थी। अत्याचार पीड़ित क्षत्रियों ने चंबल के जिस-जिस धारा-क्षेत्र को अपना शरण स्थल बनाया था, वह धार या घार क्षेत्र उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हुआ--जैसे कछवाह घार, तँवर घार इत्यादि। बीहड़ और बाग़ियों के लिए प्रसिद्ध चंबल की इस धरती ने अपने आँचल में कई इतिहास प्रसिद्ध पुरूषों को उनके संकट काल में शरण दी है। इतिहास के प्रसिद्ध जन-नायक चंद्रगुप्त मौर्य ने इसी क्षेत्र को सिकंदर और बाद में उसके सेनापति सेल्यूकस की आक्रमणकारी सेनाओं का समाना करने के लिए, अपने सैनिक अभियान का केन्द्र बनाया था। प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने लेखों में मथुरा के पूर्व में विद्रोही-डाकुओं के होने का जिक्र किया है।

        इसी तरह जब तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई और दिल्ली सल्तनत पर मुहम्मद गौरी के गुलाम कुतबुद्दीन ऐबक का शासन आया, तब दिल्ली के आसपास के अधिकांश हिन्दू राजाओं ने चंबल और यमुना के दोआब में आकर ही शरण ली थी। भिण्ड जिले के जिस अंचल को आज भदावर धार कहते हैं उसके रहवासी ‘भदौरिया ठाकुर’ अपने को दिल्ली से पराजित होकर आगरा के पास यमुना नदी के किनारे ‘भदौरा’ गाँव में आ बसे, चौहान भादू राणा का वंशज मानते हैं। सन् 1860 में प्रकाशित ब्रिटिस गजेटियर वोल्यूम-प्प् डी. एल.’’ ड्रेक बुक मेन्स आई. सी. एस. के अनुसार चंबल के दोआब क्षेत्र के इन विद्रोही शासकों से सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक किसी भी शासक ने उनसे ‘जजिया’ कर नहीं वसूल पाया। 

         इस बात के भी स्पष्ट साक्ष्य हैं कि आगरा में औरंगजेब की कैद से छूटकर वीर शिवाजी ने भी अपने गुरू स्वामी समर्थ रामदास के साथ, इन्हीं चंबल के बीहड़ों में आकर शरण ली थी। दतिया जिले के सेंवढ़ा तहसील में पड़ने वाले ‘रतनगढ़’ के देवी मंदिर में स्वामी जी ने शिवाजी की मुक्ति के लिए एक चण्डी यज्ञ भी किया था। अपने से बलशाली शत्रु पर धोखे से हमला करके वापस सुरक्षित स्थानों में जा छुपने वाली ‘गुरिल्ला युद्ध प्रणाली’ की प्रेरणा भी शिवाजी को चंबल के बागियों से ही प्राप्त हुई थी। जिसका सफल प्रयोग उन्होंने मुगलों के विरुद्ध महाराष्ट्र जाकर किया और औरंगजेब से ‘पहाड़ी चूहे’ की उपाधि प्राप्त की थी।

        चंबल के बीहड़ का प्रमुख केन्द्र है उत्तर प्रदेश के इटावा और जालौन जिले का ‘पचनदा’ क्षेत्र है। यहाँ चंबल, कुँआरी, सिंध, पहूज नदियाँ इकट्ठा होकर यमुना में लय हो जाती हैं। उसके दूसरी ओर है भिण्ड, मुरैना, श्यौपुर इत्यादि जिले, जो आज़ादी से पूर्व ग्वालियर की सिंधिया रियासत के अन्तर्गत आते थे। महाराजा छत्रसाल और बाजीराव पेशवा की संधि के अनुसार सिंधियाओं के राज्य की सीमा रेखा उत्तर में चंबल नदी थी। 1857 ई. में जब अंग्रेजों के विरूद्ध देशी राजाओं ने विद्रोह किया तब चंबल का यह अंचल अंग्रेजों की सहायक संधि के तहत काम कर रही ‘सिंधिया’ रियासत में होने के कारण यहाँ कोई बड़ा विद्रोह तो नहीं हुआ, लेकिन दोहरी शासन व्यवस्था के अन्तर्गत पिसती चंबल की स्वाभिमानी जनता चुप नहीं रह सकी थी। उसके लिए महाराष्ट्र से आए सिंधिया और इंग्लैण्ड के अंग्रेज दोनों ही विदेशी थे!

        1192 में तराइन के युद्ध में जब दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान गजनी के सुल्तान से पराजित हुए, तब पृथ्वीराज के एक सेनापति सामंतराव ने अपनी बची खुची सैन्य शक्ति को संगठित कर इटावा व आसपास के इलाकों में अपना राज्य स्थापित किया था। कालांतर में और अधिक सुरक्षित इलाके के रूप में उन्हीं के वंशजों में से एक ने अधिक सुरक्षित इलाके के रूप में ‘पचनदा क्षेत्र के महाभारत कालीन पांडव भीम द्वारा मारे गए बकासुर राक्षस की ऐतिहासिक चक्रनगरी (चकर नगर) को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने चकर नगर में अपना किला और चंबल के किनारे सहसों में अपनी गढ़ी बनाई थी। 

        1857 में इसी चकर नगर रियासत के राजा कुशलपाल सिंह चौहान थे। आज़ादी की जंग का शंखनाद होते ही, राजा कुशलपाल सिंह और उनके तरूण पुत्र वीर योद्धा निरंजसिंह चैहान ने दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया। इस क्षेत्र के अंग्रेज फौज के बाग़ी सिपाही अपनी सैनिक वर्दियों और बन्दूकों सहित दोआब इलाके में आज़ादी की जंग का परवान चढ़ाने आ डटे दुःख और कष्टों को झेल रही व्यापक जनता किसान, छोटे दुकानदार सभी इस युद्ध में शामिल हो गए। राजा कुशलपाल सिंह जनता में बहुत लोकप्रिय थे। उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में बहुत दक्ष थे। उनका अपना कन्हैया घोड़ा, सहयोद्धा मंगल मेहतर और जंगल मेहतर प्राणों से अधिक प्रिय थे। आज़ादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बाग़ी सिपाहियों, किसानों तथा जनता के सभी समुदायों के नेतृत्व को स्वीकार किया। निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्ति चारो ओर दोआब के इस पार भिण्ड जिले के कुशवाहधार तक फैल गई थी।

       उसी दौरान ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज को लेकर जुहीखा घाट पर बर्बर हमला कर दिया और दोआब इलाक में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व स्वयं इटावा का कलेक्टर ए.ओ.ह्यूम कर रहा था। इस युद्ध में दोआब के रणबाँकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या में कुशवाह धार के संग्रामी योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना जी के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए। अंग्रेज दोआब इलाके में दाखि़ल नहीं हो सके।

झाँसी के पतन के बाद झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का कुशवाह धार में आगमन हुआ तब योद्धा निरंजन सिंह और पचनदा क्षेत्र में ही आने वाले भरेह रियासत के राजा रूपसिंह सेंगर अपने योद्धाओं के साथ उनके सहयोग के लिए गये थे और 17 जून 1858 को ग्वालियर के संग्राम में रानी के बलिदान तक साथ रहे थे। झाँसी से कालपी जाते समय कुशवाह धार में पड़ने वाले रौन गाँव के एक जमीदार ने, रानी लक्ष्मीबाई के घोड़े की मृत्यु हो जाने पर अपना घोड़ा और युद्ध के लिए हथियार सैन्य सहायता भी प्रदान की थी। (झाँसी की रानीः वृंदावन लाल वर्मा) 

 मई 1857 से प्रारंभ स्वतंत्रता संग्राम को 1858 के अंत तक दो वर्षों से अधिक समय तक दोआब क्षेत्र में विद्रोही योद्धा निरंजन सिंह ने न केवल युद्ध जारी रखा बल्कि किसी नदी घाट से बर्बर अंग्रेजी फौजों को इलाके में दाखि़ल नहीं होने दिया, उन्होंने डभोली, दिलीप नगर, जुहीखा, सिकरोदा, नदी घाटों को अंग्रेजों से बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी, बर्बर लुटेरी अंग्रेजी फ़ौजों को करारी शिकस्त देकर विद्रोही चम्बल के मानव की श्रेष्ठ गुणवत्ता से दुनिया को परिचित कराया।

          29 मई 1861 में राजा निरंजन सिंह को जयपुर के विश्वासघाती नरेश के इशारे पर वहाँ के पालिटिकल एजेन्ट द्वारा बंदी बना लिया गया था। ब्रिटिश उपनिवेशक शासकों के निष्ठावान सेवक सिन्धिया ने विद्रोही कुशवाहधार के योद्धाओं और उनकी सहयोगी जनता को दण्डित करने का सघन अभियान चलाकर अपने स्थानीय जागीरदारों के सहयोग से साम दाम दण्ड भेद की नीति पर अमल करके बड़ी संख्या में विद्रोहियों को गिरफ्तार कर उनकी हत्याएँ कर दीं थीं और इस कार्य में सहयोग करने वालों को जागीरें तथा इनाम दिए थे।(चंबल घाटी के प्रथम स्वतत्रंता संग्राम 1857 के जननायक: निरंजन सिंह चैहान, अभिनंदन-फरवरी 2007)

         इस प्रकार हम देखते हैं कि चंबल में ब्रिटिश हुकूमत के विरूद्ध विद्रोह की जो ज्वाला भड़की थी उसके अपने निजी कारण थे। लेकिन इसमें विद्रोहियों की प्रेरणा उसकी अपनी ग्वालियर रियासत न होकर, चंबल से लगे उ.प्र. के आगरा, इटावा, जालौन, झाँसी जिले तथा उसके अपने क्रांतिकारी योद्धा थे, जिन्होंने चंबल में स्वतंत्रता की चिन्गारी को जन-जन में भड़काया था। 

         यों तो चंबल अंचल में स्वाधीनता आन्दोलन में अपना अमूल्य योगदान देने वाले कई योद्धा हुए है, लेकिन उनमें ‘गेंदालाल दीक्षित’ नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने चंबल के बाग़पन को अखिल भारतीय स्तर पर क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बनाया था। इनका जन्म आगरा जिले के बाह तहसील के मई गाँव में 1889 में हुआ था। आगरा में पढ़ाई के दौरान देश भक्ति की भवना उनमें हिलोरे मारने लगी। औरैया के डी.ए.वी. स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए उनके मन में बहुत तरह की उमंगे उठती रहीं। उनको अपने देश की अवस्था पर बड़ा दुख होता था। वे आर्य समाजी थे और उस ज़माने में आर्य समाज एक क्रांतिकारी शक्ति के रूप में था। वह केवल एक गुटबंदी नहीं थी, बल्कि लोगों के मन में एक ज्वाला थी, जिसके कारण वे बचैन रहते थे। पर आर्य समाज की भी एक हद तक ही उनकी उमंगों की पूर्ती कर सकता था। 

        गेंदालाल दीक्षित बंगाल और महाराष्ट्र के क्रांतिकारी आन्दोलन की बात पहुँच चुकी थी और उनका मन व्याकुल था कि किसी भी प्रकार इन क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित किया जाए। पर कैसे किया जाय यह समझ में नहीं आता था। फिर उन्होंने सोचा, क्यों न एकलव्य की तरह ही बिना गुरु के साधना की जाए! इस उद्देश्य से उन्होंने एक समिति बनाई जिसका नाम ‘छत्रपति शिवाजी के नाम पर ‘शिवाजी समिति’ रखा। इस समिति का उद्देश्य देश को स्वतंत्र कराना था, उन्हीं उपायों से जिनसे शिवाजी ने महाराष्ट्र को मुगलों की जंजीरों से छुड़ाया था। स्वभाविक रूप से एक शिक्षक होने के नाते उनका ध्यान अपने आसपास के पढ़े-लिखे लोगों की ओर गया। पढ़े-लिखे लोग उन्नति करने, यानी धन और ओहदे के पीछे पड़े हुए थे। इसके अलावा जिस इलाके में वे कार्य कर रहे थे, वह कुछ अधिक पिछड़ा हुआ भी था। इसलिए उन्होंने कुछ विशेष सफलता नहीं मिली। उन्हें बड़ा दुख हुआ कि पढ़े-लिखे लोग उन्नति माने अपनी उन्नति समझते हैं, देश की उन्नति नहीं। इसलिए उनका ध्यान चम्बल और जमुना के बीच बहुत से लोग डाकू बने हुए हैं और वे बड़े साहसी लोग हैं। उन्हें अपने प्राणों की कोई परवाह नहीं है। अस्त्र-शस्त्र चलाना भी जानते हैं, सज़ा से भी नहीं डरते। यदि इन लोगों का ध्यान स्वार्थी कार्यों की ओर से हट कर देश सेवा की ओर लग जाए, तो बहुत लाभ हो सकता है। इसलिए वे बड़ी आशा के साथ डाकुओं की ओर बढ़े और उन्हीं दिनों उन्हें ब्रह्मचारी नामक एक साथी मिल गया जिन्होंने डाकुओं को आजादी आन्दोलन के पथ में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

         गेंदालाल दीक्षित को यह लगा कि अब उन्होंने वह गुर पा लिया है, जिसके जरिये वे भारत की स्वतंत्र करा सकते हैं। पढ़े-लिखे लोग ‘उन्नति’ करना चाहते हैं, वे लिबलिबे हैं। और उनका दिमाग पिलपिला है। यदि उनमें से कुछ देश की सेवा करने को तैयार भी हो जाएँ तो वे मरने-मारने से डरेंगे और सबसे बड़ी कमी यह है कि उन्हें बाकायदा गोलियाँ चलाने की शिक्षा देनी पढ़ेगी; जबकि ये डाकू प्रकृति के पुत्र हैं, न तो मारने से घबराते हैं और न मरने से चौंकते हैं। गोलियाँ चला लेते हैं। अक्सर अच्छे निशानेबाज भी हैं। यदि भारत के सारे डाकू संगठित हो गए और देश का कार्य करने पर तुल गए, तो वे देश को स्वतंत्र करा सकेंगे। इस के अलावा धन की भी किल्लत नहीं रहेगी, क्योंकि जब धन की ज़रूरत होगी तो कहीं डाका डाल लिया जाएगा।

        गेंदालाल दीक्षित डाकुओं का संगठित करने के साथ-साथ कुछ छात्रों को भी संगठित करने लगे। इस टोली का नाम ‘मातृवेदी’ रखा गया और इसमें बहुत-से भले घर के लोग शामिल हुए, जिनमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारी ‘राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और औरया के मुकुन्दी लाल का नाम सबसे प्रमुख है। इस प्रकार दीक्षित जी ने डाकुओं के साथ-साथ एक दल और खड़ा गया जिसमें केवल शिक्षित लोग ही थे। इस दल के सामने क्या उद्देश्य था, यह उसके सदस्यों द्वारा गाई जाने वाली प्रतिज्ञा से ही पता लग सकता है। प्रतिज्ञा इस प्रकार है-

है  देश को  स्वाधीन  करना  जन्म  मम  संसार में,  तत्पर   रहूँगा  मैं सदा अंग्रेज-दल  संहार में।

अन्याय   का   बदला चुकाना  मुख्य  मेरा धर्म है, मद-दलन  अत्याचरियों  का  प्रथम  शुचि  कर्म है।

मेरी  अनेकों  भावनाएँ  उठ  रहीं   हृद्धाम   में,  बस   शांत  केवल  कर सकूँगा  मैं  उन्हें   संग्राम में।

स्वाधीनता   का   मूल्य   बढ़कर  है  सभी  संसार में, बदला  चुकेगा  हरणकर्ता  के  रूधिर  की धार से।

अंग्रेंज-रुधिर-प्रभाव से निज पितृ तर्पण करूँ, अंग्रेज सिर  सहित भक्ति  मैं  जननि  के  अर्पण करूँ।

हो  तो  दुष्ट दुःशासन-रूधिर  स्नान से यह द्रोपदी, हो सहस्रबाहु  विनाश से यह रेणुका सुख में पगी।

है  कठिन  अत्याचार  का ऋण ब्रिटिश ने हमको दिया,सह ब्याज उसके  उऋण का हमने कठिन प्रण है किया।

मैं  अमर  हूँ  मेरा  कभी  भी  नाश  हो सकता  नहीं, है   देह नश्वर त्राण इसका हो नहीं सकता कहीं।

होते  हमारे  मात  जग  में  पद-दलित  होगी  नहीं, रहते  करोड़ों  पुत्र  के  जननी  दुखित  होगी  नहीं।

उद्धार   हो  जब   देश  का  इस  क्लेष  से  तलवार  से, भयभीत  होंगे नहीं  हम  जेल  से कारागार से।

रहते  हुए  तन  प्रण  रण से मुख न मोड़ेंगे कभी, कर  षक्ति  है  जब  तक न अपने शस्त्र छोड़ेगे कभी।

परतंत्र   होकर   स्वर्ग   के  भी  वास  की  इच्छा  नहीं,  स्वाधीन   होकर   नरक  में  रहना  भला  उससे  कहीं।

है सुवर्ण पिंजर वास अति दुःखपूर्ण सुन्दर कीर को, वह चाहता स्वच्छंद विचरण अति विपन गंभीर को।

जंजीर की झंनकार में शुभ गीत गाते जाएँगे, तलवार के आघात  में  निज  जय  मनाते जाएँगें।

हे ईश! भारतवर्श  में  शतबार  मेरा  जनम   हो, कारण  सदा  ही  मृत्यु का देशोपकारक  कर्म  हो।

        इस प्रकार गेंदालाल दीक्षित एक तरफ तो डाकुओं का संगठन करते रहे। इसमें उनका दाहिना हाथ लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी रहे। ब्रह्मचारी बहुत ही साहसी व्यक्ति था और अपनी जान हथेली पर लिए घूमता था। यहाँ तक कि ग्वालियर राज्य को यह फिकर हुई कि ब्रह्मचारी को पकड़ लिया जाए, यद्यपि उस समय तक किसी को पता नहीं था कि ब्रह्मचारी इस प्रकार एक क्रान्तिकारी नेता की देख-रेख में कार्य कर रहा है। चारों तरफ खुफिया दौड़ने लगे और लोगों से कहा गया कि ब्रह्मचारी को गिरफ्तार करा दो तो इनाम-इकराम मिलेगा। 

        पर ब्रह्मचारी पकड़ में नहीं आया और अपना काम साहस के साथ करने लगा। अस्सी आदमियों का एक गिरोह बन और इस गिरोह के साथ ब्रह्मचारी तथा गेंदालाल एक महाजन के यहाँ डाका डालने  के लिए रवाना हुए। धनी का घर बहुत दूर था, इसलिए पैदल चलते हुए रास्ते में एक जगह पड़ाव डालना ज़रूरी था। वहीं पर खाने-पीने की व्यवस्था हुई और सब लोग विश्राम करने लगे।

         उनके साथ में एक ऐसा आदमी भी था जो पुलिस से मिला हुआ था। उसने सोचा कि अच्छा मौका है, किसी तरह ब्रह्मचारी को ज़हर खिला दूँ तो काम बन जाए। इस लिए वह सबकी सेवा करने के लिए बड़े उत्साह से आगे बढ़ा। उसने पूड़ियाँ बनवाईं और ज़हर डाली हुईं पूड़ियाँ ब्रह्मचारी के सामने रख दीं। जब ब्रह्मचारी ने पूड़ियाँ खाईं, तो उसकी जीभ ऐंठने लगी। पर वह बहुत तगड़ा आदमी था, मरा नहीं। इसके विपरीत वह सावधान हो गया और उसने चारों तरफ आँखें दौड़ाकर समझ लिया कि इसके लिए कौन दोषी है। मुख़बिर ने भी समझ लिया कि उसका पता लग गया है तो वह जल्दी से पानी लेने के बहाने जाने लगा। इस पर ब्रह्मचारी ने पास रखी बंदूक उठाई और धाँय से वहीं गोली मार दी। गोली चलते ही चारो तरफ हलचल मच गई और पास ही कहीं पुलिस थी, वह भी आ गई। मुख़बिर ने पुलिस वालों को आस ही पास रखा था। पुलिस और ब्रह्मचारी के दल में डटकर लड़ाई हुई और दल के पैंतीस आदमी वहीं पर गोली से मारे गए। पुलिस वाले संख्या में कम थे, पर उनके पास सब तरह का सामान था। जो मारे गए सो मारे गए और घटनास्थल पर ब्रह्मचारी और गेंदालाल गिरफ्तार हो गए।

         गेंदालाल तो गिरफ़्तार हो गए पर उनके युवक काम करते रहे। यह तय हुआ कि एक टुकड़ी ग्वालियर जाए और जेल तोड़कर गेंदालाल को निकाल लाए, पर यह काम अभी हो नहीं पाया था, योजना चालू थी कि षड्यंत्र फूट गया और गिरफ्तारियाँ हुईं। इस प्रकार वह षड्यंत्र चला जिसका नाम ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ पड़ा। ग्वालियर जेल में गेंदालाल दीक्षित पर बहुत अत्याचार हुए, ग्वालियर से जब उन्हें मैनपुरी जेल लाया गया और कुछ दिन में ही वे जेल से फ़रार हो गए। ग्वालियर जेल में दी गई यातनाओं के कारण उन्हें क्षय रोग हो गया था। एक क्रांतिकारी मित्र ने उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। अपने अंतिम समय में गेंदालाल ने अपनी पत्नी से कहा था-‘‘तुम रोती हो तो रोओ, किन्तु-आखिर इस रोने से क्या हासिल? दुःख तो मुझे भी है। मैंने किस बात का बीड़ा उठाया था और उसे कितना सिद्ध कर पाया। मर तो मैं रहा हूँ, पर जिस कारण मैं मर रहा हूँ वह पूरा कहाँ हुआ। मैं यह देखकर मर रहा हूँ कि मैंने जो कुछ भी किया वह छिन्न-भिन्न हो गया। मुझे दुःख है कि माता पर अत्याचार करने वालों से बदला नहीं ले सका, जो मन की बात थी वह मन में ही रह गई। मेरा यह शरीर नष्ट हो जाएगा, किन्तु मैं मोक्ष नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि बार-बार इसी भूमि पर जन्म लूँ और बार-बार इसी के लिए मरूँ। ऐसा तब तक करता रहूँ जब तक कि देश गुलामी की जंजीरों से छूट न जाए।’’

         उनके साथी डाकुओं को तो पहले ही सजा हो चुकी थी, पर मैनपुरी में जो षड्यंत्र चला, उसमें कई लोगों को छः छः साल की सजा हुई थी। एक सबसे मज़ेदार बात यह है कि इसमें नेता तो जेल से भाग गया था और राम प्रसाद बिस्मिल पकड़े नहीं जा सके। मकुन्दी लाल तथा अन्य कुछ लोगों को सजाएँ हुईं। पर ये लोग भी जल्दी आम माफ़ी में छूट गए। केवल मुकुन्दी लाल को नहीं छोड़ा गया और उन्हें सज़ा काटनी पड़ी। गेंदालाल दीक्षित 21 दिसंबर 1920 को सरकारी अस्पताल के क्षय-रोग वार्ड में अनाथों की तरह दुःखद मृत्यु हुई थी।

         कहने को तो चंबल के इस अमर बाग़ी के साथ ही चंबल में बग़ावत की चिंन्गारी समाप्त हो जानी थी, लेकिन विद्रोह की ज्वाला को अखिल भारतीय स्तर पर और ज्यादा भड़काया था गेंदालाल दीक्षित की ‘मातृवेदी संस्था’ के दो युवा राम प्रसाद बिस्मिल और मकुन्दी लाल ने। जो आगे चलकर काकोरी कांड के अभियुक्त बने और जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी की सज़ा हुई थी। गेंदालाल दीक्षित का यह दल बंगाल के दल से स्वतंत्र था। 

         पं. राम प्रसाद बिस्मिल के बाप दादा मूल रूप से ग्वालियर राज्य के रहने वाले थे। तोमर घार में चम्बल नदी के किनारे के दो गाँव रुअर-बरबाई उस युग मेें बहुत प्रसिद्ध थे, क्योंकि वहाँ के लोग बड़े ही उदण्ड थे।, कभी कर नहीं देते थे। कई बार राजा की तरफ़ से फौज़ आदि भेजी जाती थी, तो लोग अपने जानवरो को लेकर जंगलों में चल देते थे। घर पर ऐसी कोई चीज़ नहीं छूटती थी, जिसे बेचकर अधिकारी कुछ वसूल कर सकते। वहाँ के एक ज़मींदार के सम्बन्ध में यह कथा है कि एक बार राज्य के लोगों ने उसे पकड़ लिया और बहुत सताया। कई दिनों तक उन्हें भूखा-प्यासा रखा, फिर पैरों में सूखी घास डलवाकर आग लगवा दी, पर वह टस से मस न हुआ। उसका कहना यही था कि मैंने मालगुजारी नहीं दी तो इतने बड़े महाराज हैं, उनका क्या बिगड़ जाएगा? राज्य को यही बात लिख दी गई तो उस ज़मीदार के पास जितनी ज़मीन थी, वह उसे माफ़ी में दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल के पूर्वज इन्हीं गाँवों के तोमर ठाकुर थे, जो घरेलू झगड़ों के चलते शाहजहाँ पुर चले गए थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा आर्यसमाज स्कूल में हुई थी, स्वामी सोमदेव को वे अपना गुरू मानते थे। स्वामी जी की मृत्यु के बाद रामप्रसाद देशभक्ति की पुस्तकें पढ़ने लगे और उनके मन में यह चेतना जागी कि अपने परिवार से भी बड़ा कोई समुदाय है और देशवासी बड़े दुःखी हैं। वे इसके बाद लखनऊ कांग्रेस का अधिवेशन देखने गए। इसी अवसर पर रामप्रसाद को यह मालूम हुआ कि क्रांतिकारियों की कोई गुप्त समिति भी कार्य कर रही है और उन्होंने निश्चय किया कि क्रांतिकारी आन्दोलन में भाग लेना चाहिए। इस आन्दोलन के नेता पं. गेंदालाल दीक्षित थे। समिति को धन की कमी थी। पर लोगों को क्रांतिकारी बनाने के लिए साहित्य की ज़रूरत थी, इसीलिए पुस्तक लिखी गई--‘अमरीका को स्वाधीनता कैसे मिली’। साथ ही एक पर्चा भी छापा। ब्रिटिश सरकार ने पर्चा तथा पुस्तक दोनों ही ज़ब्त कर लिए। (भारत के क्रांतिकारीः मन्मथ गुप्त)

राम प्रसाद ‘मातृवेदी’ संगठन के लिए कई पिस्तौलें, टोपीदार बन्दूकें आदि एकत्रित कर लीं। मैनपुरी में कुछ क्रांतिकारी गिरफ्तार हो चुके थे और उन पर मुकदमा चल रहा था। इन्हीं दिनो दिल्ली में कांग्रेस हुई। यह तय हुआ कि ज़ब्त पुस्तक ‘अमरीका को स्वतंत्रता कैसे मिली’ की बाकी प्रतियाँ कांग्रेस में बेची जाएँ। वहाँ खुल्लम-खुल्लाा नवयुवक यह कहकर पुस्तक बेच रहे थे कि यू.पी. में ज़ब्त किताब ले लो। पुलिस वालों को इसकी खबर लगी और खुफ़िये पुस्तकें पकड़ने दौड़ पड़े। एक टेण्ट में दो सौ के करीब ज़ब्त पुस्तके थीं। रामप्रसाद एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला हाथ पर लगाए हुए, अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटकर, पुलिस के सामने से निकल गए।

इस के बाद वे बराबर क्रान्तिकारी कार्य करते रहे। दिल्ली कांग्रेस से लौटकर वे शाहजहाँपुर पहुँचे। वहाँ पकड़ धकड़ जारी थी। इसलिए वे वहाँ से चल पड़े । सात आठ आदमी थे। रात के दो बजे थे। पुलिस वालों ने टोका तो ‘छात्र हैं, लखनऊ जा रहे हैं,’ कह कर बचे। अब मालूम हुआ कि मैनपुरी षड्यंत्र में रामप्रसाद का भी वारंट है। इसलिए वे भागकर गाँव पहुँचे और वहाँ बिलकुल खेतिहर की तरह खेती करने लगे और थोड़े ही दिनों में अच्छे-खासे किसान बन गए थे। 

         राम प्रसाद का फ़रारी का जीवन बड़ा कष्टकर रहा था। इसी बीच प्रथम महायुद्ध समाप्त होने पर कुछ राजनीतिक कैदियों को आम माफ़ीनामें में छोड़ दिया गया, साथ ही फ़रारों पर से गिरफ्तारी का परवाना होने के कारण राम प्रसाद अब खुलेआम घूमने लगे थे। असहयोग आन्दोलन की लहर पूरे देश में फैल गई थी। राम प्रसाद ने रोजी-रोटी के लिए गाँधी के चरखा और करघा से प्रेरित हो बुनकर बन गए। ‘बोल्सेविको की करतूत’, ‘मन की लहर’ और ’स्वदेशी रंग’ क्रांतिकारी पुस्तकें भी लिखीं। चौरी चौरा कांड के कारण गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया था। इससे क्रांतिकारियों में ही नहीं गाँधी के सच्चे अनुयायी मोती लाल नेहरू इत्यादि में भी निराशा पैदा हो गई थी। जब आन्दोलन वापस ले लिया गया तो क्रांतिकारी फिर संगठन में लग गए। 

         उत्तर भारत में शचीन्द्रनाथ सान्याल के नेतृत्व में फिर से क्रांतिकारी दल अंगड़ाई लेकर उठ खड़ा हुआ। राम प्रसाद अपने साथी अशफ़ाकउल्ला, रोशनसिंह, प्रेमकृष्ण खन्ना आदि के साथ इसमेें शरीक हो गए। राम प्रसाद को अस्त्र-शस्त्र खरीदने, चलाने, छिपाने तथा डकैतियाँ डालने का अच्छा अनुभव था, इस कारण वे जल्दी ही दल के ‘हिंसा-विभाग’ के नेता हो गए। डकैतियाँ डालना इसलिए जरूरी था कि दल को धन चाहिए था, पर्चे छपाने को पैसा चाहिए थे, अस्त्र-शस्त्र के लिए पैसे चाहिए थे तथा चैबीस घंटे दल का कार्य करने वाले लोगों को सत्तू-चना खिलाना था। रेल का किराया देना था, इत्यादि इत्यादि। इस दल का नाम ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ रखा गया। उद्देश्य ऐसे प्रजातंत्र की स्थापना था, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण असंम्भव हो। दल के अन्य नेताओं में सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, दामोदरस्वरूप सेठ, राजेन्द्र नाथ लहिड़ी, विष्णुशरण दुबलिस आदि थे। दल की एक क्रांतिकारी परिषद थी, जिसमें सारे निर्णय किए जाते थे।

कुछ दिनों तक गाँवों में डकैतियाँ डालने के बाद दल को यह अनुभव हुआ कि यह ठीक नहीं है। इसमें धन कम मिलता था, साथ ही कई बार साहसी गाँव वालों पर बेकार का अत्यचार होता था, कई बार मुख़बिर भी ग़लत खबर देते थे। चंबल में रहते हुए राम प्रसाद को पता था कि मध्यकाल में जब इस अंचल से मुगलों की सेना रसद लेकर इधर से गुज़रती थी, तो यहाँ के बाग़ी उसे लूट लिया करते थे। इस काम में यहाँ के स्थानीय राजा भी उनकी मदद किया करते थे। दूसरे क्रांतिकारियों के लिए डाका डालना तो आवश्यक था। रूस तथा इंग्लैण्ड के क्रांतिकारी भी दल के लिए डाका डाला करते थे। रूसी नेता स्तालिन ने इसी प्रकार बाकू के पास एक डाके में भाग लिया था। तब इस सम्बन्ध में बहुत सोच-विचार के बाद राम प्रसाद ने निर्णय लिया कि यदि लूटना ही है तो सरकारी माल क्यों न लूटा जाए? राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके क्रांतिकारी साथियों की इसी मंशा का परिणाम था; भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह स्वर्णिम अध्याय--‘काकोरी काण्ड’। जिसके अन्तर्गत 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जा रही 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन को मात्र दस क्रांतिकारियों ने मिलकर काकोरी स्टेशन के नज़दीक लूट लिया था। काकोरी ट्रेन डकैती में जिन लोगों ने भाग लिया था, उनके नाम इस प्रकार थे--राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मन्मथनाथ गुप्त थे। इनमें बनवारी लाल बाद को मुखबिर बन गया। 

           कुछ दिन बाद सब अभियुक्तों पर लखनऊ जिला जेल में मुकदमा चला, मुकदमें में दफ़ा 121(सम्राट के विरूद्ध युद्ध-घोषणा), 120(राजनीतिक षड्यंत्र), 396(कत्ल-डकैती), 302(कत्ल) के अनुसार अभियोग पेश किया गया। अट्ठारह महीने मुकदमा चलने के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ लहिड़ी और रोशन सिंह, असफाकउल्ला को 17-19 दिसंबर 1927 को फाँसी हुई। काकोरी कांड में शामिल चन्द्रशेखर आज़ाद गिरफ्तार नहीं किए जा सके थे। जिन्होंने बाद में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, बटुकेश्वर दत्त इत्यादि शहीदों के साथ, चंबल के बाग़ियों की उस विद्रोही परंपरा को अपने शहीद होने तक सम्पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया था।...  

          आज़ादी के बाद इतिहास का उत्खनन का कार्य बहुतेरे कारणों यथा विश्वासघातियों के चेहरे उजागर होने, स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं की आज़ादी की अवधारणा सामने आने के फलस्वरूप विभिन्न शासक वर्गों के घिनोने जनविरोधी चरित्र बेनक़ाब होने के डर आदि से नहीं किया है। यही कारण है कि शहीदों को उनके विचारों आदर्शों के आधार पर स्मरण न कर औपचारिक रूप से रस्म अदाई कर ली जाती है।


-जितेन्द्र विसारिया


सोमवार, 26 जुलाई 2021

अशोक के शिलालेख और विनय पिटक

 विनयपिटक और अशोक के शिलालेख में प्रयुक्त तिथियों के नामकरण आज प्रयुक्त तिथियाँ से हूबहू क्यों मेल खाती हैं ??


    विनयपिटक बोधियों (ज्ञानियों)का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें विनय अर्थात नियमों का संकलन है। भिक्खुसंघ के लिये 227 और भिक्खुनी संघ के लिये 311विनय दिए गये हैं उपासक और उपसिका संघ के विनयपिटक भी थे लेकिन अभी उपलब्ध नहीं हैं।


विनयपिटक अनुसार कोई विनय टूटने पर उपोसथागार की व्यवस्था थी। उपोसथागार अर्थात अपराध स्वीकृती का स्थल। हर उपसथागार की सीमायें निर्धारित थी।

और तिथियाँ भी निर्धारित थी। विनयपिटक अनुसार यह तिथियाँ पखवाड़े की दोनों अष्टमियाँ , अमावस्या के पूर्व की  चतुर्दशी तथा पूर्णिमा हैं।


 सम्राट अशोक के अभिलेखों में भी इन तिथियों पर जीव हिंसा प्रतिबंध की गई थी।

 देखिये दिल्ली टोपरा स्थित मुख्य शिला स्तंभ का भाग पांच की पंक्ति  

"अठमीपखाये चातुदसाये  पंनडसाये तिसाये"


𑀅𑀞𑀫𑀻𑀧𑀔𑀸𑀬𑁂 𑀘𑀸𑀢𑀼𑀤𑀲𑀸𑀬𑁂  𑀧𑀁𑀦𑀟𑀲𑀸𑀬𑁂 𑀢𑀺𑀲𑀸𑀬𑁂


जो आज पंचांग प्रचलन में है उसमें भी तिथियाँ के नाम विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों में उल्लेखित तिथियाँ जैसे अठमी अब अपभ्रंषित शब्द (अष्ठ्मी), चातुदस अर्थात अब अपभ्रंषित शब्द (चतुर्दर्श)

पंनडसाये अर्थात पंचदशी (अमावस्या ) तिसाये अर्थात तीसवें , पुण्णिमा (पूर्णिमा) उल्लेखित हैं।


यही तिथियाँ हम आज भी उपयोग कर रहे हैं।


सम्राट अशोक के बाद सबसे बड़ा बुद्धिस्ट राजा शक वंशीय कुषाण हुये हैं। शक संवत इसी कुषाण वंशी राजा कनिष्क ने 78 ई में शुरू किया है । शक संवत  आज भारत का राष्ट्रीय संवत भी  है 


विक्रम संवत लगभग 57 ईसा पूर्व में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। जिसे चंद्रगुप्त विक्रमादिय ने शूरू किया है। और आपको ज्ञात होगा की विक्रमादित्य नाम की उपाधि धारण करने वाले राजाओं की संख्या 100 से अधिक है। धम्मलिपि में एक अभिलेख भी मिलता है जिसमें वेकमादत  𑀯𑁂𑀓𑀫𑀸 𑀤𑀢  राजा का उल्लेख है।


  अर्थात विक्रमादिय शब्द भी वेकमादत से ही अपभ्रंषित हैं।


विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों  में उल्लेखित तिथियाँ और आज प्रयोग की जा रही तिथियाँ हूबहू  मेल खाती हैं ।


इससे यह सिद्ध होता है कि शक संवत और विक्रम संवत विनयपिटक और सम्राट अशोक के शिलालेखों में उल्लेखित पंचाग का ही अनुकरण है।



फोर्ट विलियम कॉलेज

फोर्ट विलियम कॉलेज  ****** यह बड़ी मजेदार बात है कि सन् 1783 जॉन बी.गिलक्राइस्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सहायक सर्जन के तौर पर नियुक्त ...